छतरपुर का दशरथ माँझी
राजेंद्र सिंह
आदमी के दृढ़ निश्चय के आगे उसकी विपरीत परिस्थितियाँ भी घुटने टेक देतीं है। ऐसे में जीत की परिभाषा उसके पद चिन्ह अमिट कर जाती है। उम्र के जिस पड़ाव में शरीर को आराम की जरुरत होती है। तब अपनी जिद पर जीत करने वाले 68 वर्षीय सीताराम न सिर्फ अपने ग़ाँव बल्कि आसपास के क्षेत्र में युवाओं के लिए प्रेरणा स्त्रोत बन गए है।
छतरपुर जिले के लवकुशनगर जनपद पंचायत की ग्राम पंचायत प्रतापपुराके ग्राम हडुआ निवासी 68 वर्षीय सीताराम राजपूत के परिवार के पास लगभग साठ बीघा जमीन है। यह जमीन उसे उसके ननिहाल में मिली थी। पिता की बचपन में हत्या हो गई। उस समय सीताराम की उम्र महज नौ साल थी। उसे और उसके पांच साल छोटे भाई को लेकर उसकी माँ उत्तरप्रदेश के महोबा जिले के बिलबई गाँव से लेकर अपने मायके हडुआ आ गयी, जब सीताराम थोड़े बड़े हुए तो उन्होंने न सिर्फ सारे परिवार की जिम्मेदारी संभाली बल्कि परिवार कि खातिर उन्होंने अपनी शादी तक नही की। । पूरा इलाका पथरीला होने के कारण असिंचित जमीन में परिवार का पालन पोषण करना मुश्किल था, ऐसे में सीताराम ने अपने परिवार के मिलकर एक कुआँ खोदा जिसमे पानी तो निकला लेकिन इतना पर्याप्त नहीं था की खेतों में सिचाई हो सके ,इसके बाद फिर दूसरा कुआँ सारे परिवार ने खोदा इसमें भी जिद सीता राम राजपूत की थी कुआँ तो खोदा गया लेकिन इस बार भी किस्मत ने उनका साथ नहीं दिया और कुँए में पत्थर निकल आया अब सीताराम के सारे परिवार ने हार मान ली थी लेकिन सीताराम कहाँ हार मानने वाले थे, जब उन्होंने घर वालों से कहा तो सब नाराज हो गए ,क्योंकि न ही परिवार के पास मजदूरी देने को पैसा था और न ही उन्हें पानी निकलने की उम्मीद, ऐसे में परिवार ने उनका साथ छोड़ दिया सब नाराज थे ,गाँव के लोग पागल कहने लगे लेकिन सीताराम अपने कर्म पथ पर अकेले ही निकल पड़े रोज अकेले जितना हो सकता खुदाई करते और खुद ही मिटटी फेंकते ,मन में सिर्फ एक सहारा था खुद पर आत्म विश्वाश और ऊपर वाले पर भरोसा ,वो बस;; छोड़िये न हिम्मत बिसारिये न राम ,इस बात को रटते रहे,, , गहराई होती गयी ,और लगभग डेढ़ साल के अंतराल के दौरान आखिर लगभग 30 फिट गहराई में पानी निकाल इस 68 वर्ष के बुजुर्ग ने अपनी हिम्मत और जज्बे से वो कर दिखाया जिसपर आज न सिर्फ उनके घर वालों ,गांव के लोगो बल्कि सारे इलाके को उनपर नाज है।
जाहिर है जिस उम्र में लोग बिस्तर पकड़ लेते है उस वक्त बिना किसी मदद सीताराम ने वो काम कर डाला जिससे जो गाँव वाले उस पर हँसते थे आज उन्हें उस गाँव का निवासी होने पर गर्व का एहसास होता है ऐसे में हम भी इस आदर्श बुजुर्ग की हिम्मत और उसके जज्बे को नमन करते है।और अब सारा इलाका इस बुजुर्ग को छतरपुर के माझी नाम से पुकारता है।
राजेन्द्र सिंह

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें