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बुंदेलखंड _तंत्र मन्त्र

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RSS Suresh Yadav 23 Oct16

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RSS कोई तो मेरे मुन्ना (सुरेश यादव )से मिला दे

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रवीन्द्र व्यास  छतरपुर / कोई तो मेरे मुन्ना (सुरेश यादव ) से हमें मिला दे , ये दर्द भरी आवाज है सुरेश यादव के माता पिता की । सुरेश यादव के माता पिता को अपने पुत्र के साथ  बालाघाट जिले की बैहर थाना पुलिस ने बर्बर अत्याचार की खबर गांव वालों ने टी वी पर देख दी थी ।  और मामला देश में सुर्खियों में छाया रहा । छतरपुर से ५० किमी दूर ५०० की आबादी वाले टौरिया टेक गाँव के रहने वाले सुरेश का परिवार गरीबी और अभावों में जीने को विवश है । जिले में आर एस एस की नर्सरी के रूप में विख्यात इस गाँव के सुरेश यादव सहित  तीन नोजवान संघ के पूर्ण कालिक  प्रचारक का दायित्व निभा रहे हैं ।

                सुरेश के पिता भगीरथ यादव ने बताया कि  जबसे अपने पुत्र की खबर सुनी पलंग पकड़ लिया है ।  माता किशोरी बाई का रो रो कर बुरा हाल है । भगीरथ के तीन बेटों और तीन बेटियों में सुरेश सबसे छोटा बेटा है । छोटा  बेटा लाडला होता है इस कारण उसकी हर बात बेटे की खुशी के लिए मान लेते थे । जब उसने १८-१९ साल की उम्र में देश के लिए काम करने की बात कही तो हमने पहले समझाने का प्रयास किया । घर से दूर जाने की विपत्ति भी बताई थी । जब वह न…

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पूर्णता की ओर  रेल का  अधूरा सपना 
रवीन्द्र व्यास 

 बुंदेलखंड रेलवे सुविधाओं के मामले में भी सबसे निचली पायदान पर खड़ा नजर आता है ।जबकि  किसी भी राष्ट्र के बेहतर विकाश के लिए परिवहन तंत्र एक महत्व पूर्ण कारक माना जाता है । बेहतर सड़कों और रेलवे लाइनों को उसकी धमनिया माना जाता है । इनका बेहतर तंत्र जितना विकशित होगा वह राष्ट्र प्रगति पथ पर उतनी ही तीव्रता से आगे बढेगा । यह बात प. जवाहर लाल नेहरू भी कहते रहे किन्तु खुद उनकी  ही पार्टी के लोग इस मसले पर गंभीर नहीं रहे ।  अटल जी के शासन काल में इस दिशा में काम शुरू  हुए , प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना और स्वर्णिम चतुर्भुज जैसी योजनाओ की शुरुआत हुई । उन्ही के काल  में २० सितंबर 1998 को ललितपुर सिंगरौली रेलवे लाइन का शिलान्यास खजुराहों में किया गया था । लगभग छह संसदीय सीटो को प्रभावित करने वाली यह  रेल परियोजना लगभग हर चुनाव में मुख्य मुद्दा रही है । मंगलवार  की शाम सवा चार बजे ललितपुर से खजुराहो  रेल योजना का शुभारम्भ रेल मंत्री सुरेश प्रभु करेंगे । हालांकि यह छड़ भी स्वप्न के अधूरे भाग के  पूर्ण होने के समान होगा । 

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बुंदेलखंड में दशहरा का  पान 
रवीन्द्र व्यास 


उत्सव धर्मिता में  बुंदेलखंड जैसी मिसाल और कहीं कम ही देखने को मिलती है । परम्पराओं के पर्वो में बुंदेलखंड के लोग शायद अपने कष्टो का निदान तलाश लेते हैं । खेत पर अन्न से परिपूर्ण फसलों के समय जब नवरात्र आते हैं तो बुंदेलखंड कोना कोना ऐसा लगता है मानो  किसी धर्म स्थल पर आ गए हों । दशहरा के दिन शुभता की तलाश और रावण दहन  के बाद  लोगों का एक दूसरे से  गले मिलना ,रोरी लगाना और पान का बीड़ा एक दूसरे को खिलाना देख कर यही लगता है मानो शुभता और संस्कृति की यही डोर है जो दुनिया से भारत देश को अलग पहचान दिलाये है । वीरता और विजय के प्रतीक विजयदशमी के दिन बुंदेलखंड में अस्त्र -शस्त्र के पूजन की परम्परा सदियों से चली आ रही है ।
                                             बुंदेलखंड में दशहरा मनाने का भी अपना एक अलग अंदाज है । इस दिन की शुरुआत भी अपने तरह की अनोखी होती है । सुबह से लोग इस प्रयास में रहते हैं की कुछ शुभ दर्शन हो जाए , घर के जेठे {बुजुर्ग } फरमान जारी करते हैं की देखो मछली लेकर आया है , दर्शन कर लो , जाकर देखो कहीं नीलकंठ देख आओ । पूछने पर …

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प्रथकता  की आग में सुलगता  बुन्देलखण्ड  रवीन्द्र व्यास  पृथक बुन्देलखण्ड राज्य निर्माण की मांग को लेकर बुंदेलखंड सुलग रहा है । चुनावी मौसम में इसकी तपन कुछ ज्यादा ही तीव्र हो जाती है । दो राज्यों में बटे हुए बुंदेलखंड को एक अलग राज्य का दर्जा देने की मांग काफी समय से की जा रही है , चुनावी मौसम में हर दल और उसका नेता  इसका समर्थन भी करता है । वोट डलने के बाद हर नेता इसे भूल जाता है । फिर वो चाहे उमा भारती हो या मायावती , राहुल गांधी हो या बीजेपी का घोषणा पत्र हो । यही कारण है की बुंदेलखंड राज्य आंदोलन की मांग को लेकर अब लोग नेताओं को घेरने लगे हैं ।  अक्टूबर माह में झाँसी आये कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को इसी मुद्दे पर बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा के कार्यकर्ताओ ने घेरा था । जिस बुंदेलखंड में आजादी की चिंगारी 1857 से 15 वर्ष पहले केवल हरबोलों की जागरूकता के कारण फैली थी उसी बुंदेलखंड में आजादी के बाद अलग राज्य का आंदोलन टुकड़ों में विभक्त हो गया  है , जिसके चलते हर कोई इस मांग को नजरअंदाज कर आगे बढ़ जाता है ।                                          उत्तर प्रदेश में चुनावी संग्राम शुरू हो…

Special Report - Times of hardship in Bundelkhand | भूखा-प्यासा बुंदेलखंड

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