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21 दिसंबर, 2025

प्रोजेक्ट चीता की नई शुरुआत: बुंदेलखंड के जंगलों में लौटेगी तेज दौड़

 

बुंदेलखंड की डायरी


प्रोजेक्ट चीता की नई शुरुआत: बुंदेलखंड के जंगलों में लौटेगी तेज दौड़

मध्य प्रदेश में चीता प्रोजेक्ट को मिली नई गति: नौरादेही में दौड़ेगा चीतों का  झुंड

रवीन्द्र व्यास 



  बुंदेलखंड के  वीरांगना रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व (वी डी टी आर)नौरादेहीसागर को मध्य प्रदेश का चीतों का तीसरा घर बनने की राह पर तेजी से बढ़ रहा है। लंबे समय से प्रशासनिकतकनीकी और प्रक्रियात्मक बाधाओं से अटके प्रोजेक्ट चीता प्रोजेक्ट  को अब  शासन ने 5.20 करोड़ रुपये के बजट को मंजूरी दे दी है हालांकि इसकी घोषणा भी बुंदेलखंड में ही सी एम् मोहन यादव ने की  थी |  बजट के  बाद निर्माण कार्य शुरू हो गया है। नए साल 2026 में यहां चीतों की दहाड़ गूंजने लगेगीऔर जुलाई तक 3-4 चीते की शिफ्टिंग होने की पूरी उम्मीद है।


      बुंदेलखंड के   वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व (वी डी टी आर) मध्य प्रदेश का सातवां टाइगर रिजर्व है, जिसे 2023 में इसे देश का 54  टाइगर रिजर्व का दर्जा मिला है |   सागरदमोह और नरसिंहपुर जिलों में 2,339.12 वर्ग किलोमीटर में फैले इस टाइगर रिजर्व  का  1,414 वर्ग किलोमीटर कोर क्षेत्र और 925.12 वर्ग किलोमीटर बफर क्षेत्र शामिल है। 

रिजर्व में  बाघतेंदुआभेड़ियासियार फॉक्सधारीदार हाइना और स्लॉथ बियर  जैसे 18 स्तनधारी प्रजातियां पाई जाती हैं। हिरण प्रजातियों में चीतलसांभरचिंकारानीलगायब्लैकबक और चार सींग वाला चिंकारा(चौसिंगा) शामिल हैं। इसके अलावा 177 पक्षी प्रजातियां,16 मछली,सरीसृप और 10 उभयचर प्रजातियां भी यहाँ पाई जाती हैं | 



जैव विविधता से परिपूर्ण यह रिजर्व  क्षेत्र सूखे पर्णपाती वनों से आच्छादित है,। नर्मदा-यमुना बेसिन में स्थित होने से यहां विविध भू-आकृति जैसे पहाड़ियांघाटियां और मैदान हैं। हाल ही में चौसिंगा की दुर्लभ दृष्टि ने जैवविविधता को नई ऊंचाई दी है

प्रोजेक्ट चीता की नई शुरुआत

भारत में लुप्त हो चुके चीतों को पुनर्वसित करने का महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट चीता अब मध्य प्रदेश के तीन टाइगर रिजर्व में फैल चुका है। पहले कुनो नेशनल पार्क और माधव नेशनल पार्क के बाद वी डी टी आर तीसरा गंतव्य बनेगा। यह प्रोजेक्ट न केवल जैव विविधता को मजबूत करेगाबल्कि बुंदेलखंड क्षेत्र के पर्यावरण संरक्षण और इको-टूरिज्म को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगा।

रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर डॉ. ए. ए. अंसारी की मानें तो  बजट स्वीकृति के बाद टेंडर प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। मार्च 2026 तक सभी निर्माण कार्य समाप्त हो जाएंगे। इसके बाद चीतों को जुलाई तक यहां  लाया जाएगा। मोहाली क्षेत्र में कुल 8 बोमा (बाड़े) तैयार किए जा रहे हैंजो चीतों के लिए आदर्श आवास साबित होंगे।

  क्वारंटाइन से सॉफ्ट रिलीज तक

प्रोजेक्ट के तहत बनने वाले बाड़ों का डिजाइन चीते की प्राकृतिक आदतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं:

  क्वारंटाइन बोमा: प्रत्येक 50 हेक्टेयर क्षेत्रफल में। यहां चीतों को शिफ्टिंग के बाद प्रारंभिक अवधि (क्वारंटाइन) में रखा जाएगाताकि उनकी सेहत और अनुकूलन की जांच हो सके। इसके बाद इन्हे  100 हेक्टेयर क्षेत्रफल वाले  सॉफ्ट रिलीज बोमा  रखा जाएगा । ये बाड़े चीतों को धीरे-धीरे जंगलों में छोड़ने के लिए उपयोग होंगेजहां वे स्वतंत्र रूप से शिकार और घूम सकेंगे। इन बोमा में  पानी की व्यवस्थाशिकार के लिए छोटे जानवरों का प्रबंधननिगरानी के लिए कैमरे और बिजली की व्यवस्था भी रखी जायेगी ।

बोमा चीतों को तनाव मुक्त रखेंगे और रिजर्व के 1 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में उनकी सुरक्षित घुमक्कड़ी सुनिश्चित करेंगे। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसारनौरादेही का जंगल चीतों के लिए उपयुक्त है क्योंकि यहां घास के मैदानपहाड़ियां और शिकार की प्रचुरता उपलब्ध है।

चुनौतियां और भविष्य की संभावनाएं

 प्रोजेक्ट चीता के तहत अब तक कुनो में 20 से अधिक चीते लाए जा चुके हैंजिनमें से कुछ ने सफलतापूर्वक शावकों को जन्म भी  दिया है। वी डी टी आर में आने वाले चीते दक्षिण अफ्रीका या नामीबिया से लाए जा सकते हैं।इसको लेकर स्थानीय निवासियों और पर्यावरण प्रेमियों में उत्साह है। यह न केवल वन्यजीव संरक्षण को बढ़ावा देगाबल्कि सागर-दमोह क्षेत्र में रोजगार और पर्यटन के नए अवसर पैदा करेगा।  यह परियोजना इको-टूरिज्म को बढ़ावा देकर रोजगार सृजन और आर्थिक विकास लाएगी। पर्यावरण जागरूकता अभियान से मानव-वन्यजीव संघर्ष कम होगा।


स्थानीय निवासियों को जागरूकता कार्यक्रमों से जोड़ा जा रहा हैताकि चीतों के साथ सह-अस्तित्व सुनिश्चित हो।गांव विस्थापन के बाद बने खुले मैदान आदर्श साबित होंगेलेकिन संघर्ष प्रबंधन भी जरूरी है। यह कदम वन्यजीव संरक्षण में स्थानीय सहयोग को मजबूतकरेगा।

रोजगार अवसरों में वृद्धि

प्रोजेक्ट से स्थानीय युवाओं को गाइडिंगड्राइवरहोटल स्टाफ और 'चीतामित्रजैसे नए रोजगार मिलेंगे। कुनो नेशनल पार्क के अनुभव से प्रेरित होकर यहां होटलरिसोर्ट और पर्यटन सेवाओं में निवेश बढ़ेगा। सागर क्षेत्र की राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पहचान मजबूत होगी।

नौरादेही चीता दर्शन से पर्यटन को नई रफ्तार मिलेगीजिससे स्थानीय व्यापार जैसे खान-पानपरिवहन और हस्तशिल्प को लाभ पहुंचेगा। इको-टूरिज्म से क्षेत्रीय आय मेंइजाफा होगा |   

आंकड़ों की दौड़ में मध्य प्रदेश सबसे आगे

मध्य प्रदेश प्रोजेक्ट चीता में अग्रणी राज्य बन चुका हैजहां कुनो में 25 चीते (9 वयस्क: 6 मादा, 3 नर; 16 शावक) और गांधी सागर सहित कुल 27 चीते मौजूद हैं। वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व (वीडीटीआर) का कुल क्षेत्र 2,339 वर्ग किमी (कोर: 1,414 वर्ग किमीबफर: 925 वर्ग किमी) हैजो राज्य का सबसे बड़ा टाइगर रिजर्व है।

मध्य प्रदेश सरकार का यह कदम बुंदेलखंड के इको-सिस्टम को मजबूत करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। 2026 में नौरादेही के जंगलों में चीतों की तेज दौड़ देखने को मिलेगीजो राज्य की वन्यजीव संरक्षण नीति की सफलता का प्रतीक बनेगी।  रिजर्व के विशाल घास मैदान पर्यटकों को आकर्षित करेंगे।

                                                दरअसल  भारत में चीतों का इतिहास अभी का नहीं बल्कि प्राचीन काल से जुड़ा है | एक समय था  जब वे पूरे उपमहाद्वीप में फैले हुए थे।  गुफा चित्रों से भी चीतों की  उपस्थिति  प्रमाणित होती है।

  इतिहासकार बताते हैं कि   मुगल काल में चीतों का शिकार के लिए  उपयोग होता था । सम्राट अकबर के पास 1,000 चीते थे जो काले हिरण और चिंकारा का शिकार करते थे।  दिल्ली सल्तनत और राजपूत राजाओं ने भी इन्हें पालतू बनायालेकिन कैद में प्रजनन न होने से संख्या घटी।औपनिवेशिक काल में शिकारखेती विस्तार और पशुपालकों के संघर्ष से चीते कम हुए। 1918-1945 में अफ्रीका से 200 आयात किए गए। 1947 में कोरिया रियासत के महाराजा रामानुज प्रताप सिंह ने अंतिम तीन चीतों का शिकार किया। 1952 में भारत सरकार ने इसे विलुप्त  घोषित किया ।


15 दिसंबर, 2025

Rivar_मरती नदियाँ आबाद होते माफिया

 


बुंदेलखंड की डायरी 

मरती नदियाँ आबाद होते माफिया 

रवीन्द्र व्यास 

 बुंदेलखंड  मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के 14 जिलों वाला यह ऐतिहासिक क्षेत्र विंध्याचल की पहाड़ियों से घिरा है। यहां केनबेतवा,, धसानयमुनाजामनीसोनारबागे और उर्मिल जैसी नदियाँ जीवन रेखा हैं। ये न केवल कृषिपेयजल और आजीविका का आधार हैबल्कि उच्च गुणवत्ता वाली लाल बालू जिसे स्थानीय लाल सोना कहते हैं,भी प्रदान करती हैं।  दुर्भाग्य सेअंधाधुंध खनन ने इन नदियों को मृत्यु के कगार पर ला खड़ा किया है। छोटी नदियों को तो राजस्व रिकॉर्ड में नाला बता दिया गया हैजिससे उनका संरक्षण ही असंभव हो गया शहरीकरण की होड़ में रेत की भूख बढ़ रही हैलेकिन बुंदेलखंड की जीवन रेखा केन नदी इसका शिकार बन रही है। पन्ना से बांदा तक बहने वाली इस नदी पर अवैध खनन ने पारिस्थितिकी को तबाह कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट का 24 अगस्त 2025 का ऐतिहासिक फैसला जिसने पुनर्भरण अध्ययन बिना जिला सर्वे रिपोर्ट (डीएसआर) को अमान्य घोषित किया,अब केन पर सीधा असर डालेगा। लेकिन माफियाराजनीति और प्रशासन की सांठगांठ से नदी का संकट गहरा रहा है।



   दरअसल  2000 से पहले रेत खनन सीमित और मजदूरी पर आधारित  था,घरेलू जरूरतों के लिए ही नदी की रेत ली जाती थी। उसके बाद जेसीबीपोकलैंड जैसी मशीनों ने नदियों की 20 से 50 तक  फीट तक खुदाई शुरू कर दी। जिससे ना सिर्फ  प्राकृतिक प्रवाह बाधित हुआ  बल्कि किनारों की उपजाऊ जमीन नष्ट हो गईं। इन सबका असर ये हुआ कि आज  नदियाँ सूख रही हैंजलस्तर गिर रहा है।किनारे वासियों का संकट नदी  किनारे के किसानकुम्हारमछुआरे और ढीमर बेरोजगार हो गए नतीजतन बुंदेलखंड में  पलायन बढ़ा। 

  खनन के दुष्प्रभाव सामने आने लगे हैं  जलस्तर नीचे जा रहा हैकृषि प्रभावित हो रही हैमिट्टी की नमी  घट रही है।  प्राकृतिक संसाधनों के  अनियंत्रित  दोहन का  असर  जलवायु को भी बिगाड़ रहा  हैं।अवैध खनन पर   एनजीटी में शिकायतें भी हुईंलेकिन कार्रवाई नगण्य। राजनीतिक संरक्षण से केन-बेतवा जैसी नदियाँ के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो गया  हैं बांदा जिले में केन की लोअर स्ट्रीम सबसे ज्यादाप्रभावित हैजहां खप्टिहा कलां में दर्जनों पोकलेन ,नदी के  बीच से   रेत खोद रही हैं और ब्लैकलिस्ट खदानें (356/1-3) फिर सक्रियहैं। सांडी गांव में रेत खत्म होने पर  खेत गड्ढों में बदल गएकिसानों से जबरन कॉन्ट्रैक्ट लिया जा रहा। डीएमजे. रीभा ने अमलोर खादर और मरौली में छापे मारे डेस्कॉन बिल्डटेक पर 2.32 करोड़ और अन्य पर 39.76 लाख जुर्माना लगायालेकिन आसिफ इकबाल जैसे सिंडिकेट हावी हैं।

पन्ना अजयगढ़ से रामनई तक मशीनों का आतंक पन्ना जिले के अजयगढ़ से शुरू होकर रामनई-बरौली-जिगनी में किमी लंबी खाई बन गईजहां लिफ्टर मशीनें और गुंडे सक्रिय हैं किसान बूढ़ीबाई पर 22 करोड़ जुर्माना लगा था । आनंदेश्वर एग्रो जैसीफर्में  नियम तोड़ रही हैंनदी तल 10 से 15 मीटर गहरा हो गया। केन बचाओ आंदोलन यहां जोर पकड़ रहा है,

 छतरपुर के बीरा-चंदला पुल के  नीचे  पोकलेन पानी में रास्ता बनाकर खनन कर रहीरोज 500 ट्रक रेत ले जाते हैं फायरिंग और विवाद यहाँ  आम बात है  । बरुआ-परेई खदान में 22 ट्रक जब्त हुए थे तटबंध भी टूटे।गौरिहार क्षेत्र में हैवी मशीनें 4-6 फीट मिट्टी हटाकर रेत निकाल रही हैं , यहाँ नदी ने मार्ग बदल लिया  है ।

पर्यावरणीय  क्षति:: जिलों में खनन से भूजल 20-30 फीट नीचे पहुँच गया है ,  महाशीर जैसी  मछलियां लुप्त हो रही हैं , कटान-बाढ़  की समस्या  मिल रही जो अलग है , 2023 की  बाढ़ में बांदा का एक  गांव तबाह हो गया था । आज  हालत केन नदी की बांदा जिले में ऐसी है कि धारा पतली हो गई है ,मानो नदी नहीं कोई नाला बह रहा हो  | नदी किनारे के हेंड पम्प भी मुश्किल से पानी दे रहे हैं माफिया कानपुर-लखनऊ सिंडिकेट से जुड़े वे प्रभावशाली लोग हैं जो  उत्तर प्रदेश ही नहीं एमपी में भी खुदाई करने से नहीं डरते डरता अगर कोई है तो वो है आम आदमी और प्रशासन |   

अगर केन नदी को बचाना है तो नदी के दोनों तटों के  200 मीटर क्षेत्र को  बफर जोन बनाकर  पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए , ड्रोन से निगरानी की जाए , ग्राम पंचायत की  अनुमति ग्राम  सभा के बाद  अनिवार्य करें।रेत को प्रमुख खनिज घोषित कर ई-टेंडरिंग लाएंएम-सैंडप्रोत्साहन दें। बांदा डीएम रीभा की कार्रवाई सराहनीय मानी जायेगी इसी तरह की कार्यवाही पन्ना और छतरपुर कलेक्टर से भी अपेक्षित है  , वरना केन का क्र्रिया कर्म करने में लोभ की राजनीति पीछे नहीं रहेगी |      रेत खनन से जैव-विविधता नष्ट हो रही भू-कटाव-भूस्खलन बढ़ रहे। रेत पानी शुद्ध करने में सहायक होती हैलेकिन सैंड-पंपों ने यह क्षमता छीन ली। वैज्ञानिक खनन नीतिसतत निगरानी और कठोर कार्रवाई जरूरी। सरकार-समाज मिलकर नदियों को बचाएवरना बुंदेलखंड का भविष्य अंधकारमय।

09 नवंबर, 2025

राजनीति और परंपरा के बीच बुंदेलखंड

 


 बुंदेलखंड की डायरी 








राजनीति और परंपरा के बीच बुंदेलखंड

  सागर से फरीदाबाद तक, जहां आस्था, व्यंग्य और सत्ता आमने-सामने चलते हैं

रवीन्द्र व्यास 

बुंदेलखंड की मिट्टी इस हफ़्ते भी मौन नहीं रही। कहीं नेता खोजे जा रहे हैं, कहीं आस्था की आरती गूंज रही है, और कहीं सिविल ड्रेस में आई कहानी जांच-परख से पहले ही वायरल हो चुकी है। यह वही धरती है जहां लोक रीति और राजनीति, दोनों एक ही छतरी में सिर झुकाकर चलते हैं।

सागर: लापता नेता और जनता की खोज अभियान

सागर में कांग्रेस ने विचारधारा की नहीं, बल्कि नेताओं की लोकेशन खोजने की मुहिम शुरू कर दी। शहर की दीवारों पर चिपके पोस्टर पूछ रहे हैं  कहीं देखा है इन्हेंइनमें भाजपा सांसद, विधायक और महापौर के फोटो भी हैं।

जनता मुस्कराई, आखिर किसी ने तो पूछा कि हमारे नेता आख़िर दिखते कहां हैं। मोतीनगर से धर्मश्री तक सड़क चौड़ीकरण के नाम पर हुई बुलडोजर कार्रवाई में गरीबों के घर मिटे, मगर अमीरों की दीवारें टिकी रहीं। विडंबना यह कि पूरा विवाद विधायक के अपने वार्ड से उठा और वे खुद लापता सूची में शामिल पाए गए।

जब कार्यकर्ता धरने के लिए उनके घर पहुंचे, तो विधायक अचानक प्रकट हुए और जनता ने सीख ली  राजनीति में गायब होना भी प्रचार का हिस्सा है। 

दमोह: वीडियो, सस्पेंस और सिविल ड्रेस वाले सज्जन

दमोह का घटनाक्रम किसी राजनीतिक थ्रिलर से कम नहीं। युवक राघवेंद्र का दावा है कि उसे सिविल ड्रेस वाले कुछ लोग उठा ले गए, 15 किलोमीटर दूर वीडियो मिटाओ क्लास हुई, और बाद में पता चला कि वे तो पुलिसकर्मी थे।

असल में सारा विवाद शुरू हुआ था मंत्री जी पर  शराब बिक्री के  आरोप को लेकर ।

इधर राज्य मंत्री धर्मेंद्र सिंह ने फेसबुक पर लाइव होकर वीडियो को फेक बताया, और चेतावनी दी कि सरकार बदनाम करने वालों पर कार्रवाई होगी।

'सरकार को बदनाम करोगे तो पड़ेंगे डंडे'उन्होंने लाइव में कहा कि जो लोग अनर्गल टिप्पणियां कर उन्हें या सरकार को बदनाम करने की कोशिश करेंगे, उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी होगी और डंडे भी पड़ेगे। मंत्री ने आगे कहा कि पुलिस की कार्रवाई फेसबुकिया पर हुई है। मंत्री ने कहा में मेरे पिता और मैं खुद नशा मुक्त हूं। जब भगवती मानव संगठन राजनीतिक दल नहीं था, तब में उसका सदस्य भी रहा था

सोशल मीडिया पर बहस छिड़ी  मंत्री लोग भी तो फेसबुक पर ही बोलते हैं, तो फिर जनता की पोस्ट पर डंडा क्यों?

अब प्रदेश में हर वीडियो खुद खबर बन सकता है  राजनीति अब बयानबाजी से नहीं, कैमरा एंगल से चल रही है।

खजुराहो: जब पूजा और प्रतिबंध आमने-सामने आए

विश्व प्रसिद्ध खजुराहो में  सीजेआई पर जूता फेंकने वाले  अधिवक्ता राकेश किशोर ने श्री मतंगेश्वर महादेव मंदिर में आरती   के बाद कहा  मंदिरों में प्रदर्शन नहीं, दर्शन होने चाहिए।

उन्होंने ASI द्वारा पूजा रोकने को परंपरा पर प्रहार बताया और खंडित मूर्तियों की पुनः प्राणप्रतिष्ठा की वकालत की।उन्होंने  जवारी मंदिर में भगवान विष्णु की खंडित मूर्ति के दर्शन किए और कहा कि ऐसी मूर्तियों की पुनः प्राण-प्रतिष्ठा कर पूजा प्रारंभ की जानी चाहिए, क्योंकि खंडित विग्रहों की पूजा शास्त्र सम्मत नहीं है।

स्थानीय संतों और संगठनों ने खजुराहो बचाओ अभियान के माध्यम से यह संदेश दिया कि यह नगरी केवल स्थापत्य कला नहीं, बल्कि जीवित परंपरा की आत्मा है।

वहीं उन्होंने सैन्य एयरबेस की योजना को सांस्कृतिक खतरा बताते हुए विकल्प स्थल की मांग की।

 

भापेल का फुलेर मेला तालाब में भरा आस्था का जल

 बुंदेलखंड में कार्तिक मास की अपनी अनोखी परम्पराएं हैं  सागर जिले के भापेल गांव की पहाड़ी पर इस बार भी कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर 300 वर्ष पुराना बाबा फूल नाथ का फुलेर मेला सजा।

कहते हैं बाबा ने अपने तपस्थल पर खोदे इस तालाब को आशीर्वाद दिया था कि यह कभी सूखेगा नहीं  और आज भी उसका जल इस कथन को सत्य बनाता है।

मन्नत पूरी होने पर भक्त घंटा चढ़ाते हैं या मुंडन संस्कार करवाते हैं। बुंदेली बरेदी नृत्य, भजन, मिठाई और हस्तशिल्प की गूंज इस मेले को आस्था और लोकजीवन दोनों को  उत्सव बना देती है।

 

पदयात्रा में बढ़ते कदम: बागेश्वर महाराज और जनश्रद्धा

फरीदाबाद से निकली सनातन हिंदू एकता पदयात्रा दिन-ब-दिन भावनाओं का विराट संगम बनती जा रही है। बागेश्वर धाम के पीठाधीश पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री भक्ति और संगठन के सूत्र में लाखों श्रद्धालुओं को जोड़ रहे हैं।

वे कहते हैं मेहनत और पुरुषार्थ ही आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित रखेगा। यात्रा में वे घायलों की खुद मरहम-पट्टी करते हैं, युवा कदम मिलाते हैं, और महाराज नगाड़ा बजाकर झूम उठते हैं।

भक्तों के बीच क्रिकेटर शिखर धवन, उमेश यादव, महाबली खली तक शामिल हुए। केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने भी महाराज का आशीर्वाद लिया इस तरह राजनीति और संत समाज बिना आमंत्रण के फिर आमने-सामने आ गए।

अंततः 

सागर नेता ढूंढ रहा है, दमोह सच्चाई, खजुराहो पूजा की स्वतंत्रता, और भापेल लोक सांस्कृतिक संतुलन।

बुंदेलखंड की डायरी बस यही कहती है  यहाँ हर पोल के पीछे एक पोस्टर, हर मंदिर के पीछे एक विवाद, और हर यात्रा के पीछे एक विश्वास खड़ा है।

राजनीति, लोक संस्कृति और श्रद्धा  तीनों मिलकर इस भूभाग को बार-बार उसी सवाल तक ले आती हैं  कहां है असली जागरण, और कौन है वास्तव में लापता’?

21 अक्टूबर, 2025

बुंदेलखंड की दिवाली के अनोखे रंग रोशनी से बढ़कर परंपरा का पर्व

 बुंदेलखंड की डायरी 


बुंदेलखंड की दिवाली के अनोखे रंग
  
रोशनी से बढ़कर परंपरा का पर्व 
 
रवीन्द्र व्यास


भारतभर में दीपों का त्योहार दीवाली समृद्धि और रोशनी का प्रतीक माना जाता है, लेकिन बुंदेलखंड में इसका स्वरूप कहीं अधिक गहरा और जीवंत है। यहां दीपावली केवल दीपों की जगमगाहट का नहीं, बल्कि लोक परंपराओं, पशुपालक संस्कृति और सामूहिक आस्था का उत्सव है। बुंदेलखंड के गांवों में दीपों के साथ लठ्ठमार दिवारी, मौनिया नृत्य और धार्मिक अनुष्ठान इस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान बन चुके हैं।लोक कलाएं जो मिट्टी की महक लिए हैंइस क्षेत्र के लोकगीत और नृत्य सदियों से लोगों के श्रम, विश्वास और सामाजिक संदेशों के वाहक रहे हैं। हालांकि आधुनिकता की रफ्तार के साथ गांवों की परंपराएं अब सिमटती जा रही हैं, पर कई स्थानीय कलाकार और संस्थाएँ इन्हें पुनर्जीवित करने में जुटी हैं। 


ऐसा ही एक जीवित उदाहरण है दिवारी या मौनिया नृत्य जो बुंदेलखंड की चारागाही संस्कृति और लोक आस्था दोनों का संगम है।सरीला: जहां एक पत्थर से शुरू होती है दिवाली की थाप हमीरपुर के सरीला कस्बे में दशहरे पर गाड़ा गया पत्थर दीपावली की रात उखाड़ा जाता है। यही क्षण मौनिया नृत्य के आरंभ का संकेत बनता है। यदुवंशी समुदाय पत्थर की पूजा के बाद इसे निकालता है और फिर पूरी रात मंदिरों के बाहर नृत्य करता है। ढोल-नगाड़ों की थाप और लाठियों की टकराहट के बीच मौन धारण किए नर्तक मोरपंख सजाकर थिरकते हैं। यह दृश्य वीरता और अनुशासन दोनों का मोहक संगम बन जाता है।
लठ्ठमार दिवारी: लोक नृत्य में छिपी गोवर्धन कथा



दीपावली के अगले दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा के मौके पर खेले जाने वाला लठ्ठमार दिवारी नृत्य वास्तव में श्रीकृष्ण की गोवर्धन पर्वत कथा का प्रतीक है। लोककथा के अनुसार, जब श्रीकृष्ण ने इंद्र के कोप से गोकुल की रक्षा के लिए पर्वत उठाया, तब ग्वालों ने उनके सम्मान में यह नृत्य किया था।आज भी यदुवंशी समुदाय के कलाकार बारह वर्षों का मौन व्रत लेकर बारह गांवों में यह नृत्य करते हैं। लाठियों के संग प्रदर्शन केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्मसंयम, साहस और वीरता की धरोहर है। नगाड़ों की थाप और घुंघरुओं की झंकार के साथ यह प्राचीन परंपरा लोगों को अपने गौरवशाली अतीत की याद दिलाती है।

मौनिया नृत्य: 


पशुपालक जीवन की साधनादीपावली की रात पूजा के बाद अहीर, गड़रिया और पाल समुदाय तालाब और नदियों में स्नान कर मौन व्रत लेते हैं। इन्हीं को मौनिया कहा जाता है। लाल-पीली पोशाकें, घुंघरू, और मोरपंखों से सजे हाथ, मौन चेहरे और कदमों की थिरकन , यह सब मिलकर एक ऐसा दृश्य बनाते हैं, जो लोकजीवन की सरलता और गहराई दोनों को उजागर करता है।मौनिया प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा तक गांव-गांव घूमते हैं। वे डोल, नगाड़ा, मंजीरा और मृदंग की थाप पर नृत्य करते हैं, पर स्वयं मौन रहते हैं। लोकसंस्कृति के विद्वान डॉ. के.एल. पटेल बताते हैं कि इस मौन का उद्देश्य पशुओं के मौन दर्द को समझना और उनके श्रम के प्रति संवेदनशील होना है। यह साधना ही मौनियों की आत्मा है।

गीतों में बुना लोक जीवन का दर्शन

दिवारी गीतों में जीवन का दर्शन और लोकनीति समाई हुई है। ये गीत न केवल श्रद्धा या श्रृंगार के हैं, बल्कि समाज के नैतिक मूल्यों और श्रम की गरिमा को भी रेखांकित करते हैं। गायक जब ताल मिलाते हैं, तो श्रोताओं को लगता है जैसे पूरी प्रकृति उनके साथ गा रही हो।इतिहासकार मानते हैं कि दिवारी गीतों की परंपरा लगभग दसवीं सदी के आसपास आरंभ हुई। वहीं एक अन्य लोककथा के अनुसार, द्वापर युग में कालिया मर्दन के बाद जब ग्वालों ने श्रीकृष्ण का असली रूप देखा, तब उन्होंने इसी नृत्य और गीत के माध्यम से उन्हें धन्यवाद दिया। श्रीकृष्ण ने उन्हें सिखाया कि गौसेवा ही मनुष्य और समाज के कल्याण की मूल जड़ है।

बदलते समय में संघर्षरत परंपरा 

बुंदेलखंड के गांव अब तेजी से कस्बों में बदल रहे हैं; पशुपालन घटा है, और साथ में दिवारी की परंपरा भी। छतरपुर के रामजी यादव कहते हैं, पहले गांव में हर गली में मौनिया दल दिख जाते थे, अब बस आयोजन तक सीमित हैं। फिर भी यह परंपरा पूरी तरह लुप्त नहीं हुई है। चरखारी, बिजावर और सागर में स्थानीय आयोजन आज भी मौनिया नृत्य को जीवंत रखने का प्रयास कर रहे हैं। विदेशी पर्यटक भी खजुराहो में इन्हें देखकर मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।

सागर और टीकमगढ़ में घर-घर की दीवाली

सागर जिले के सानौधा गांव में आज भी कुम्हार, माली और पौनी दीपावली से पहले घर-घर जाकर दीये, फूल और रुई पहुंचाते हैं। यह परंपरा पेशेवर सहयोग के साथ सामाजिक एकता की मिसाल भी है। वहीं टीकमगढ़ में लोग अब भी छुई मिट्टी से घरों की पुताई करते हैं और चौखट पर लोहे की कील ठोकते हैं । यह बुराइयों को घर से दूर रखने का प्रतीक है।

सत-असत के संघर्ष की प्रतीक रस्म 

हमीरपुर और बांदा जिले के कुछ गांवों में दीपावली के अगले दिन गाय और सुअर की प्रतीकात्मक लड़ाई कराई जाती है। यह विचित्र लगने वाली रस्म वास्तव में जीवन के दो पहलुओं  पवित्र और अपवित्र, सत्य और असत्य  के संघर्ष का प्रतीक है। इस आयोजन में मौनिया ढोल-नगाड़ों की थाप पर नाचते हैं, और लोकगीतों से धर्म व नीति की व्याख्या करते हैं।

दीवाली: सिर्फ रोशनी नहीं, जीवन की साधना

बुंदेलखंड की दीपावली केवल उत्सव नहीं, बल्कि संस्कृति का सशक्त दस्तावेज है। यहां दिवारी नृत्य हो या गाय-सुअर की प्रतीकात्मक लड़ाई  हर आयोजन मनुष्य, पशु और प्रकृति के पारस्परिक संबंधों की अनूठी व्याख्या करता है।इस क्षेत्र के लिए दीपावली केवल दीपों की चमक नहीं, बल्कि धरती, श्रम और आस्था के बीच रोशनी फैलाने का माध्यम है। यही कारण है कि बुंदेलखंड में यह पर्व लोकजीवन की आत्मा बनकर हर वर्ष नये अर्थों में झिलमिलाता है।

11 अक्टूबर, 2025

बुंदेलखंड: धरोहरों, विकास और जन आस्था की नई धड़कन

 बुंदेलखंड की डायरी 

बुंदेलखंड: धरोहरों, विकास और जन आस्था की नई धड़कन

रवीन्द्र व्यास 

बुंदेलखंड, देश की वह धरा , जहाँ मिट्टी में इतिहास की गंध है, पत्थरों में आस्था की छाप, और लोगों के चेहरे पर जीवन की जिद है । खुदाई में निकली मूर्तियों की सांस्कृतिक चमक, शहरों में उठते फ्लाईओवरों की रफ्तार, मंदिरों में उमड़ते विश्वास की लहरें और जनजीवन के विकास की आकांक्षाएं सभी एक साथ उमड़ती हुई प्रतीत होने लगी हैं | 

 

दमोह: धरती के गर्भ से उभरा इतिहास

दमोह जिले के तेंदूखेड़ा ब्लॉक के ग्राम दौनी में पठादो की पहाड़ी पर पिछले एक साल से चल रही पुरातात्विक खुदाई ने इतिहास की परतें खोल दी हैं। कलचुरी काल (10वीं-11वीं शताब्दी) की ब्रह्मा, विष्णु, शिव, उमा-महेश्वर, अर्धनारीश्वर, पार्वती और वायुदेव जैसी अद्भुत मूर्तियां मिली हैं। इन प्रतिमाओं की कला और प्रतीकात्मकता इस क्षेत्र के उस गौरवशाली युग की कहानी कहती है जब बुंदेलखंड धार्मिक और सांस्कृतिक उत्कर्ष का केंद्र था।

गांव के पास स्थित सिद्ध हनुमान मठ आज भी आस्था का जीवंत केंद्र बना हुआ है, जहां लोगों का विश्वास है कि हनुमान जी की मूर्ति का एक पैर पाताल लोक तक जाता है। इस लोककथा और खुदाई में मिले प्रमाण दोनों मिलकर बुंदेलखंड की मिट्टी की गहराई दिखाते हैं जहाँ इतिहास और श्रद्धा एक ही धारा में बहती हैं।

टीकमगढ़: आधुनिकता की ओर एक पुल

धरोहरों के इस अंचल में अब विकास की रफ्तार भी जोड़ ली गई है। टीकमगढ़ शहर को पहला फ्लाईओवर मिलने जा रहा है चकरा तिराहा से सिंधी धर्मशाला तक 1.5 किमी लंबा पुल, जिसकी लागत लगभग 150 करोड़ रुपये होगी। यह परियोजना बुंदेलखंड की शहरी सोच की झलक है जहाँ भीड़भाड़ और पुरानी सड़कों के बीच से निकल कर आधुनिक यातायात व्यवस्था की तस्वीर बन रही है।

ब्रिज कॉर्पोरेशन के इस प्रस्ताव से उम्मीद है कि सिविल लाइन से लेकर बाजार क्षेत्र तक की जाम से त्रस्त जनता को राहत मिलेगी। यह सिर्फ एक फ्लाईओवर नहीं, बल्कि छोटे शहरों की बढ़ती आकांक्षा और आत्मनिर्भर संरचना का प्रतीक बनकर उभर रहा है। 

ओरछा: आस्था और पर्यटन का संगम

ओरछा, जहां श्री राम राजा की नगरी बसी है, अब श्री राम राजा लोक के रूप में नवसृजन की दिशा में बढ़ रही है। पर्यटन विभाग ने इसे पी पी पी  मोड में विकसित करने के लिए डालमिया समूह के साथ समझौता प्रक्रिया शुरू की है।

12 एकड़ में बनने वाले इस परियोजना में म्यूजियम, लाइट एंड साउंड शो और सांस्कृतिक स्थलों का जीर्णोद्धार किया जाएगा। बुंदेला राजवंश के इतिहास से लेकर स्वतंत्रता सेनानियों तक की कथाओं को संग्रहालयों में दर्ज करने की योजना है। यह प्रयास बुंदेलखंड की पहचान को आधुनिक पर्यटन के नक्शे पर नयी ऊंचाई देगा जहाँ विरासत का संवर्धन और आर्थिक जीवंतता, साथ जुड़े हों।

छतरपुर: मेले में झूमती परंपरा

छतरपुर का मेला जलविहार 2025 इस बार फिर बुंदेलखंड की जीवंत आत्मा बनकर लौटा है। नगर पालिका परिषद द्वारा आयोजित यह 10-दिवसीय उत्सव केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि लोक संस्कृति की पुनर्दृष्टि है।

 स्कूलों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से लेकर आल्हा गायन, लोकगीत, भजन, कवि सम्मेलन, राई नृत्य, बैंड नाइट और मुशायरा जैसे आयोजनों से यह मेला बुंदेलखंड की सांगीतिक और काव्य परंपरा को नई ऊर्जा देता है। मेला परिसर में सर्कस, मीना बाजार और लोक व्यंजन  स्थानीय कारीगरों और व्यवसायियों के लिए भी नई उम्मीदें लेकर आए हैं।

यह आयोजन बताता है कि बुंदेलखंड न सिर्फ इतिहास की धरोहर हैबल्कि वह आज भी जीती-जागती संस्कृति में सांस लेता है।

सागर: विश्वास का जल स्रोत

सागर जिले के पास नोनिया-सेसई के जंगल में निकली चमत्कारी बावड़ी  ने पूरे बुंदेलखंड को कौतूहल में डाल दिया है। ग्रामीणों का दावा है कि इस बावड़ी के जल से असाध्य रोग ठीक हो रहे हैं। लोगों की भीड़ पूजा अर्चना और श्रद्धा का माहौल दिखाता है कि आस्था अब भी इस भूमि की जड़ों में बसी है।

वन विभाग के लिए यह अवसर और चुनौती दोनों बन गया है एक तरफ वन संपदा पर दबाव है, तो दूसरी ओर धार्मिक पर्यटन की संभावना। विज्ञान चाहे जो कहे, पर जनविश्वास बुंदेलखंड को उसकी सांस्कृतिक निरंतरता से जोड़े रखता है।

झांसी: शासन और संकल्प का केंद्र

उत्तर प्रदेश के हिस्से में आने वाला झांसी, बुंदेलखंड के प्रशासनिक और राजनीतिक नेतृत्व का प्रमुख केंद्र है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की हालिया समीक्षा बैठक में बिजली चोरी पर अंकुश, महिला सुरक्षा, कचरा निस्तारण, अतिवृष्टि राहत और औद्योगिक निवेश को लेकर महत्वपूर्ण निर्देश दिए गए।

स्थानीय नागरिकों ने सड़क सुधार, बिजली और सफाई पर फोकस की सराहना की, जबकि विपक्षी दल जमीन पर अमल की रफ्तार पर सवाल उठा रहे हैं। विश्लेषकों के अनुसार, योगी सरकार की योजनाओं से बुंदेलखंड का नगरीय ढांचा मजबूत हो सकता है अगर क्रियान्वयन समय पर हो।

खेल, स्वास्थ्य और उद्यमिता को मिल रहा प्रोत्साहन इस क्षेत्र के युवा जनमानस को उत्साहित कर रहा है। टीबी मुक्त झांसी अभियान जैसे कदम इस क्षेत्र को नई सामाजिक दिशा दे रहे हैं।

  अतीत और भविष्य का संगम

अक्टूबर 2025 का बुंदेलखंड एक ऐसी भूमि है जो एक साथ कई कालों में जी रही है | दमोह की खुदाई अतीत की जड़ों को खोज रही है,ओरछा और छतरपुर संस्कृति को आधुनिक पर्यटन में बदल रहे हैं,टीकमगढ़ और झांसी विकास का ढांचा खड़ा कर रहे हैं,जबकि सागर की बावड़ी श्रद्धा की लहर उठाए हुए है।

यह वही बुंदेलखंड है जो अपनी धरोहर संभालते हुए, विकास और आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ा रहा है। इतिहास की धूल से उठती मूर्तियाँ और सड़कों पर बनते पुल दोनों मिलकर कह रहे हैं यह क्षेत्र केवल इतिहास नहीं, बल्कि भविष्य की सृष्टि का आधार है।

04 अक्टूबर, 2025

रावण का पुतला हुआ राख , राजनीतिक अहंकार की आग बरक़रार

 बुंदेलखंड की डायरी 

 रावण और राजनीति 

रावण का पुतला हुआ  राख , राजनीतिक अहंकार की आग बरक़रार 

रवीन्द्र व्यास 


बुंदेलखंड के सागर की दशहरा रात हमेशा की तरह रोशनी और जयघोष से भरी थी, लेकिन इस बार शहर की हवा में कुछ अलग बेचैनी थी। मैदान में रावण का पुतला जलने से ठीक पहले, नगर निगम की राजनीति ने खुद एक नया रावण गढ़ लिया था  अहंकार, गुटबाजी और प्रोटोकॉल की राजनीति का रावण।  


कार्यक्रम के निमंत्रण पत्र पर नगर निगम की महापौर संगीता तिवारी का नाम पांचवें नंबर पर छप गया। पहली नज़र में यह मात्र एक त्रुटि  थी, पर सागर की राजनीति जानने वालों के लिए यह संकेत था , गुटों में बंटी बीजेपी का एक और अध्याय खुल रहा था। महापौर ने तुरंत ऐलान किया कि जहाँ उनका अपमान होगा, वहाँ वे नहीं जाएँगी। उन्होंने साफ कहा कि यह केवल नाम नीचे रखने की बात नहीं, महिला प्रतिनिधि एवं सागर की प्रथम नागरिक  की गरिमा का प्रश्न है। 

इस कार्ड विवाद ने जैसे पुराने घावों को फिर से हरा कर दिया। सागर के नगर निगम में महीनों से मेयर और अधिकारियों के बीच खींचतान चल रही थी। महापौर का आरोप था कि निगम आयुक्त राजकुमार खत्री उनकी उपेक्षा करते हैं  मुख्यमंत्री के कार्यक्रमों में उनसे स्वागत नहीं कराया गया, कन्यादान योजना में उन्हें मंच पर बुलाने में देर की गई, और अब दशहरा आयोजन में नाम नीचे डाल दिया गया। 

खत्री ने हमेशा की तरह जवाब दिया  त्रुटि थी, सुधार ली गई। लेकिन सच यही था कि सागर की राजनीति में यह त्रुटि नहीं, प्रवृत्ति बन चुकी थी। 

सागर में बीजेपी की राजनीति पिछले कुछ  वर्षों से आंतरिक खींचतान का मैदान बनी हुई है। महापौर संगीता तिवारी भूपेंद्र सिंह गुट से आती हैं, जबकि विधायक शैलेंद्र जैन और जिलाध्यक्ष श्याम तिवारी दूसरे गुट से। निगम का प्रशासनिक ढांचा इनके बीच रस्साकशी का अखाड़ा बन चुका है। 

जहाँ मेयर इसे एक महिला जनप्रतिनिधि के खिलाफ साजिश मानती हैं, वहीं दूसरा पक्ष इसे प्रोटोकॉल की भूल बताकर टालता है। 

दशहरे के दिन जब लोग प्रतीकात्मक रावण को आग दे रहे थे, तब नगर निगम में बैठी राजनीति अपने भीतर का रावण और भी बड़ा बना रही थी। शहर के बुद्धिजीवी इसे अंदरूनी दहन कह रहे थे। 

कांग्रेस ने मौके का कोई अवसर नहीं छोड़ा। प्रवक्ता आशीष ज्योतिषी ने तंज करते हुए कहा, कार्यक्रम नगर निगम का है, लेकिन कार्ड पर बीजेपी जिलाध्यक्ष का नाम पहले कैसे आया? लगता है नगर निगम अब बीजेपी का मंडल कार्यालय बन गया है।शहर कांग्रेस अध्यक्ष महेश जाटव ने महापौर को सुझाव दिया कि यदि सम्मान नहीं मिल रहा तो उन्हें किसी अन्य दल में जाने या स्वतंत्र प्रतिनिधि के रूप में काम करने पर विचार करना चाहिए। 

इस बीच जैसीनगर से भी राजनीति की एक और चिंगारी उठी। मंत्री गोविंद सिंह राजपूत ने पूर्व मंत्री भूपेंद्र सिंह का नाम लिए बगैर उन  पर सार्वजनिक रूप से हस्तक्षेप के आरोप लगाए। उन्होंने तंज कसा, भैया अपने घर की चिंता करो, हमारे जैसीनगर पर मत बोलो।  

इस सार्वजनिक ठिठोली ने साफ कर दिया कि मध्यप्रदेश के इस राजनीतिक क्षेत्र में हर कोई खुद को राम कहता है, लेकिन अपने भीतर के रावण को जलाने की हिम्मत किसी में नहीं। 

नजर बाग पैलेस की मौन पीड़ा 

राजनीतिक धुएं से दूर, सागर के बीचो बीच खड़ा है नजर बाग पैलेस  एक वीरान, टूटी दीवारों वाला ऐतिहासिक महल, जिसके पत्थर आज भी चुपचाप इतिहास का भार ढो रहे हैं।  2 दिसंबर 1933 का वह दिन जब महात्मा गांधी दमोह से सागर आए थे, यहीं नजर बाग पैलेस में रुके थे। जिस पल उन्होंने यह स्थान चुना, पैलेस सागर के गर्व का प्रतीक बन गया। दीवारों पर बने भित्ति चित्र, झिलमिलाते कांच वाली खिड़कियां और सजीव गलियारों ने उस दौर में आज़ादी की खुशबू महसूस की थी। 

 लेकिन अब वही दीवारें दीमक और अंधेरे के कब्जे में हैं। जो खिड़कियां कभी रोशनी का स्वागत करती थीं, अब वहां से धूल झाँकती है। अफसरों की देखरेख खत्म होते ही पैलेस मानो भुला दिया गया। स्मार्ट सिटी मिशन ने सोचा कि सामने एक पार्क बना देने से इतिहास के घाव भर जाएँगे। कुछ समय लोग वहाँ आए, फोटो खिंचवाए, फिर सब शांत हो गया। आज पार्क की लाइट टूटी हैं, बाउंड्री ध्वस्त है और फव्वारे निष्क्रिय। 

पैलेस अब खुद से पूछता है क्या मैं गांधीजी की उपस्थिति की स्मृति के रूप में याद किया जाऊँगा, या केवल एक खंडहर के रूप में गूगल मैप  पर तलाशा जाऊँगा?  यह सवाल केवल एक इमारत का नहीं, बल्कि उस सोच का है जो विकास की भीड़ में धरोहरों की आत्मा भूल जाती है। 

देवरी का बापू मंदिर

इसी सागर जिले की देवरी नगर की एक गली में सुबह के साथ गूंजती है आवाज रघुपति राघव राजा राम…” 

लगभग एक सदी पुराना बापू मंदिर, जो कभी स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा गांधीजी की स्मृति में बनाया गया था, अब इस शहर की जीवित आत्मा बना है। वर्षों की उपेक्षा में मंदिर टूट चुका था, मूर्ति खंडित थी, और दीवारों से गिरती प्लास्टर की परतें सवाल पूछ रही थीं। 

2012 में राजू दीक्षित ने इस मंदिर को पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया। उन्होंने अपने जीवन की सारी आरामदायक संभावनाएँ छोड़ दींपरिवार, नौकरी, निजी सुख सब कुछ भुलाकर कहा, जब तक मैं हूँ, यह मंदिर और गांधीजी की याद जिंदा रहेगी।  वे रोज़ सवेरे गांव से निकलकर मंदिर तक आते हैं, सफाई करते हैं, दीपक जलाते हैं और गांधीजी के नाम का कीर्तन करते हैं। आसपास के बच्चे प्रभात फेरी निकालते हैं, और हर 2 अक्टूबर को यह पुराना मंदिर सजीव हो उठता है  जैसे इतिहास ने फिर से साँस ली हो। 

राजू दीक्षित का यह समर्पण बताता है कि भले राजनीति गांधी को मंच पर रखकर भाषण देते रहे, पर उनके विचार आज भी कुछ आम लोगों के जीवन में साँस ले रहे हैं। 

सागर  का द्वंद्व 

आज का सागर दो चेहरों वाला शहर है। एक तरफ नगर निगम में गुटबाजी और प्रोटोकॉल की राजनीति है, जहाँ कार्ड में नाम ऊपर-नीचे होने पर भी आहत अहंकार सिर उठाता है। दूसरी तरफ बापू मंदिर की वह शांति है, जहाँ कोई व्यक्ति बिना पद और प्रचार के सिर्फ मानवीय मूल्यों को बचाए रखने की लड़ाई लड़ रहा है। 

नजर बाग पैलेस की टूटी दीवारें सत्ता की उपेक्षा का प्रतीक हैं, और बापू का मंदिर नागरिक स्नेह का चिन्ह। दोनों के बीच में खड़ा सागर शहर एक नैतिक सवाल पूछता है  जब बाहर का रावण हर साल जलता है, तो भीतर के रावण कब जलेंगे?  

दशहरे की रात रावण का पुतला राख बन गया, लेकिन राजनीतिक अहंकार की आग नहीं बुझी। 

अब ऐसी ही राज कथा छतरपुर जिला में देखने को मिली जहां बीजेपी के पूर्व विधायक पुष्पेंद्र नाथ पाठक ने पूर्व प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा को जन्मदिन की व्यंग्यात्मक शुभकामना दी। उन्होंने अपने फेसबुक वॉल पर लिखा है कि

 जन्मदिन की शुभकामनाएं मान्यवर!

सच्ची मुस्कान वाली ये आखिरी तस्वीरें हैं आपके साथ श्रीमान विष्णु जी..

प्रदेशाध्यक्ष की घोषणा होने के बाद, खजुराहो से भोपाल जाने के लिए आपका नौगांव होकर निकलना हुआ... तब यह उल्लास और उमंग से स्वागत हुआ था, इसमें आपके निश्छल भाव और हम लोगों की खुशियां बही जा रही थीं..

हालांकि इसके बाद भी अपनी खूब मुलाकातें हुईं, मगर उनमें ये निश्छल मुस्कान नहीं उभर पाई..

क्योंकि..

हर मुलाकात में हमने छतरपुर जिले के संगठन की समस्याओं से आपको अवगत कराया और मात्र एक समाधान भी सुझाया...

लेकिन..

जैसे भारतीय इतिहास में, सनकी सुल्तान मोहम्मद बिन तुगलक ने चमड़े के सिक्के चलवा कर अपने को दर्ज किया...

वैसे ही अपने सुल्तान बनने पर यहां छतरपुर में चमड़े के सिक्के चलवा कर, आपने अपना नाम अमर कर लिया...

हालांकि इस पर, आपकी तरफ से, अपना 1to1 विचार विमर्श लंबित है..कोई 3 वर्षों से..

उम्मीद है अगले जन्मदिन के पूर्व हम आप त्रुटियों को ठीक करने की सहमति बनाने में सफल होंगे..

आपके सुखी, स्वस्थ, समृद्ध और यश-कीर्ति पूर्ण जीवन के लिए अनेकानेक शुभकामनाएं..हार्दिक बधाई...

बिन तुगलक बना कर बधाई देने का ये अंदाज सियासत में ही देखने को मिलता है।अगर इसी अंदाज के साथ उनके अध्यक्ष कार्यकाल में बधाई देने का साहस करते तो बात कुछ और होती।













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