मरती नदियाँ आबाद होते माफिया
रवीन्द्र व्यास
बुंदेलखंड मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के 14 जिलों वाला यह ऐतिहासिक क्षेत्र विंध्याचल की पहाड़ियों से घिरा है। यहां केन, बेतवा,, धसान, यमुना, जामनी, सोनार, बागे और उर्मिल जैसी नदियाँ जीवन रेखा हैं। ये न केवल कृषि, पेयजल और आजीविका का आधार है, बल्कि उच्च गुणवत्ता वाली लाल बालू जिसे स्थानीय लाल सोना कहते हैं,भी प्रदान करती हैं। दुर्भाग्य से, अंधाधुंध खनन ने इन नदियों को मृत्यु के कगार पर ला खड़ा किया है। छोटी नदियों को तो राजस्व रिकॉर्ड में नाला बता दिया गया है, जिससे उनका संरक्षण ही असंभव हो गया | शहरीकरण की होड़ में रेत की भूख बढ़ रही है, लेकिन बुंदेलखंड की जीवन रेखा केन नदी इसका शिकार बन रही है। पन्ना से बांदा तक बहने वाली इस नदी पर अवैध खनन ने पारिस्थितिकी को तबाह कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट का 24 अगस्त 2025 का ऐतिहासिक फैसला जिसने पुनर्भरण अध्ययन बिना जिला सर्वे रिपोर्ट (डीएसआर) को अमान्य घोषित किया,अब केन पर सीधा असर डालेगा। लेकिन माफिया, राजनीति और प्रशासन की सांठगांठ से नदी का संकट गहरा रहा है।
दरअसल 2000 से पहले रेत खनन सीमित और मजदूरी पर आधारित था,घरेलू जरूरतों के लिए ही नदी की रेत ली जाती थी। उसके बाद जेसीबी, पोकलैंड जैसी मशीनों ने नदियों की 20 से 50 तक फीट तक खुदाई शुरू कर दी। जिससे ना सिर्फ प्राकृतिक प्रवाह बाधित हुआ बल्कि किनारों की उपजाऊ जमीन नष्ट हो गईं। इन सबका असर ये हुआ कि आज नदियाँ सूख रही हैं, जलस्तर गिर रहा है।किनारे वासियों का संकट नदी किनारे के किसान, कुम्हार, मछुआरे और ढीमर बेरोजगार हो गए नतीजतन बुंदेलखंड में पलायन बढ़ा।
खनन के दुष्प्रभाव सामने आने लगे हैं जलस्तर नीचे जा रहा है, कृषि प्रभावित हो रही है, मिट्टी की नमी घट रही है। प्राकृतिक संसाधनों के अनियंत्रित दोहन का असर जलवायु को भी बिगाड़ रहा हैं।अवैध खनन पर एनजीटी में शिकायतें भी हुईं, लेकिन कार्रवाई नगण्य। राजनीतिक संरक्षण से केन-बेतवा जैसी नदियाँ के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो गया हैं | बांदा जिले में केन की लोअर स्ट्रीम सबसे ज्यादाप्रभावित है, जहां खप्टिहा कलां में दर्जनों पोकलेन ,नदी के बीच से रेत खोद रही हैं और ब्लैकलिस्ट खदानें (356/1-3) फिर सक्रियहैं। सांडी गांव में रेत खत्म होने पर खेत गड्ढों में बदल गए, किसानों से जबरन कॉन्ट्रैक्ट लिया जा रहा। डीएमजे. रीभा ने अमलोर खादर और मरौली में छापे मारे डेस्कॉन बिल्डटेक पर 2.32 करोड़ और अन्य पर 39.76 लाख जुर्माना लगाया, लेकिन आसिफ इकबाल जैसे सिंडिकेट हावी हैं।
पन्ना अजयगढ़ से रामनई तक मशीनों का आतंक पन्ना जिले के अजयगढ़ से शुरू होकर रामनई-बरौली-जिगनी में 2 किमी लंबी खाई बन गई, जहां लिफ्टर मशीनें और गुंडे सक्रिय हैं | किसान बूढ़ीबाई पर 22 करोड़ जुर्माना लगा था । आनंदेश्वर एग्रो जैसीफर्में नियम तोड़ रही हैं, नदी तल 10 से 15 मीटर गहरा हो गया। केन बचाओ आंदोलन यहां जोर पकड़ रहा है,
छतरपुर के बीरा-चंदला पुल के नीचे पोकलेन पानी में रास्ता बनाकर खनन कर रही, रोज 500 ट्रक रेत ले जाते हैं , फायरिंग और विवाद यहाँ आम बात है । बरुआ-परेई खदान में 22 ट्रक जब्त हुए थे , तटबंध भी टूटे।गौरिहार क्षेत्र में हैवी मशीनें 4-6 फीट मिट्टी हटाकर रेत निकाल रही हैं , यहाँ नदी ने मार्ग बदल लिया है ।
पर्यावरणीय क्षति:: जिलों में खनन से भूजल 20-30 फीट नीचे पहुँच गया है , महाशीर जैसी मछलियां लुप्त हो रही हैं , कटान-बाढ़ की समस्या मिल रही जो अलग है , 2023 की बाढ़ में बांदा का एक गांव तबाह हो गया था । आज हालत केन नदी की बांदा जिले में ऐसी है कि धारा पतली हो गई है ,मानो नदी नहीं कोई नाला बह रहा हो | नदी किनारे के हेंड पम्प भी मुश्किल से पानी दे रहे हैं | माफिया कानपुर-लखनऊ सिंडिकेट से जुड़े वे प्रभावशाली लोग हैं जो उत्तर प्रदेश ही नहीं एमपी में भी खुदाई करने से नहीं डरते | डरता अगर कोई है तो वो है आम आदमी और प्रशासन |
अगर केन नदी को बचाना है तो नदी के दोनों तटों के 200 मीटर क्षेत्र को बफर जोन बनाकर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए , ड्रोन से निगरानी की जाए , ग्राम पंचायत की अनुमति ग्राम सभा के बाद अनिवार्य करें।रेत को प्रमुख खनिज घोषित कर ई-टेंडरिंग लाएं, एम-सैंडप्रोत्साहन दें। बांदा डीएम रीभा की कार्रवाई सराहनीय मानी जायेगी इसी तरह की कार्यवाही पन्ना और छतरपुर कलेक्टर से भी अपेक्षित है , वरना केन का क्र्रिया कर्म करने में लोभ की राजनीति पीछे नहीं रहेगी | रेत खनन से जैव-विविधता नष्ट हो रही , भू-कटाव-भूस्खलन बढ़ रहे। रेत पानी शुद्ध करने में सहायक होती है, लेकिन सैंड-पंपों ने यह क्षमता छीन ली। वैज्ञानिक खनन नीति, सतत निगरानी और कठोर कार्रवाई जरूरी। सरकार-समाज मिलकर नदियों को बचाए, वरना बुंदेलखंड का भविष्य अंधकारमय।
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