15 दिसंबर, 2025

Rivar_मरती नदियाँ आबाद होते माफिया

 


बुंदेलखंड की डायरी 

मरती नदियाँ आबाद होते माफिया 

रवीन्द्र व्यास 

 बुंदेलखंड  मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के 14 जिलों वाला यह ऐतिहासिक क्षेत्र विंध्याचल की पहाड़ियों से घिरा है। यहां केनबेतवा,, धसानयमुनाजामनीसोनारबागे और उर्मिल जैसी नदियाँ जीवन रेखा हैं। ये न केवल कृषिपेयजल और आजीविका का आधार हैबल्कि उच्च गुणवत्ता वाली लाल बालू जिसे स्थानीय लाल सोना कहते हैं,भी प्रदान करती हैं।  दुर्भाग्य सेअंधाधुंध खनन ने इन नदियों को मृत्यु के कगार पर ला खड़ा किया है। छोटी नदियों को तो राजस्व रिकॉर्ड में नाला बता दिया गया हैजिससे उनका संरक्षण ही असंभव हो गया शहरीकरण की होड़ में रेत की भूख बढ़ रही हैलेकिन बुंदेलखंड की जीवन रेखा केन नदी इसका शिकार बन रही है। पन्ना से बांदा तक बहने वाली इस नदी पर अवैध खनन ने पारिस्थितिकी को तबाह कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट का 24 अगस्त 2025 का ऐतिहासिक फैसला जिसने पुनर्भरण अध्ययन बिना जिला सर्वे रिपोर्ट (डीएसआर) को अमान्य घोषित किया,अब केन पर सीधा असर डालेगा। लेकिन माफियाराजनीति और प्रशासन की सांठगांठ से नदी का संकट गहरा रहा है।



   दरअसल  2000 से पहले रेत खनन सीमित और मजदूरी पर आधारित  था,घरेलू जरूरतों के लिए ही नदी की रेत ली जाती थी। उसके बाद जेसीबीपोकलैंड जैसी मशीनों ने नदियों की 20 से 50 तक  फीट तक खुदाई शुरू कर दी। जिससे ना सिर्फ  प्राकृतिक प्रवाह बाधित हुआ  बल्कि किनारों की उपजाऊ जमीन नष्ट हो गईं। इन सबका असर ये हुआ कि आज  नदियाँ सूख रही हैंजलस्तर गिर रहा है।किनारे वासियों का संकट नदी  किनारे के किसानकुम्हारमछुआरे और ढीमर बेरोजगार हो गए नतीजतन बुंदेलखंड में  पलायन बढ़ा। 

  खनन के दुष्प्रभाव सामने आने लगे हैं  जलस्तर नीचे जा रहा हैकृषि प्रभावित हो रही हैमिट्टी की नमी  घट रही है।  प्राकृतिक संसाधनों के  अनियंत्रित  दोहन का  असर  जलवायु को भी बिगाड़ रहा  हैं।अवैध खनन पर   एनजीटी में शिकायतें भी हुईंलेकिन कार्रवाई नगण्य। राजनीतिक संरक्षण से केन-बेतवा जैसी नदियाँ के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो गया  हैं बांदा जिले में केन की लोअर स्ट्रीम सबसे ज्यादाप्रभावित हैजहां खप्टिहा कलां में दर्जनों पोकलेन ,नदी के  बीच से   रेत खोद रही हैं और ब्लैकलिस्ट खदानें (356/1-3) फिर सक्रियहैं। सांडी गांव में रेत खत्म होने पर  खेत गड्ढों में बदल गएकिसानों से जबरन कॉन्ट्रैक्ट लिया जा रहा। डीएमजे. रीभा ने अमलोर खादर और मरौली में छापे मारे डेस्कॉन बिल्डटेक पर 2.32 करोड़ और अन्य पर 39.76 लाख जुर्माना लगायालेकिन आसिफ इकबाल जैसे सिंडिकेट हावी हैं।

पन्ना अजयगढ़ से रामनई तक मशीनों का आतंक पन्ना जिले के अजयगढ़ से शुरू होकर रामनई-बरौली-जिगनी में किमी लंबी खाई बन गईजहां लिफ्टर मशीनें और गुंडे सक्रिय हैं किसान बूढ़ीबाई पर 22 करोड़ जुर्माना लगा था । आनंदेश्वर एग्रो जैसीफर्में  नियम तोड़ रही हैंनदी तल 10 से 15 मीटर गहरा हो गया। केन बचाओ आंदोलन यहां जोर पकड़ रहा है,

 छतरपुर के बीरा-चंदला पुल के  नीचे  पोकलेन पानी में रास्ता बनाकर खनन कर रहीरोज 500 ट्रक रेत ले जाते हैं फायरिंग और विवाद यहाँ  आम बात है  । बरुआ-परेई खदान में 22 ट्रक जब्त हुए थे तटबंध भी टूटे।गौरिहार क्षेत्र में हैवी मशीनें 4-6 फीट मिट्टी हटाकर रेत निकाल रही हैं , यहाँ नदी ने मार्ग बदल लिया  है ।

पर्यावरणीय  क्षति:: जिलों में खनन से भूजल 20-30 फीट नीचे पहुँच गया है ,  महाशीर जैसी  मछलियां लुप्त हो रही हैं , कटान-बाढ़  की समस्या  मिल रही जो अलग है , 2023 की  बाढ़ में बांदा का एक  गांव तबाह हो गया था । आज  हालत केन नदी की बांदा जिले में ऐसी है कि धारा पतली हो गई है ,मानो नदी नहीं कोई नाला बह रहा हो  | नदी किनारे के हेंड पम्प भी मुश्किल से पानी दे रहे हैं माफिया कानपुर-लखनऊ सिंडिकेट से जुड़े वे प्रभावशाली लोग हैं जो  उत्तर प्रदेश ही नहीं एमपी में भी खुदाई करने से नहीं डरते डरता अगर कोई है तो वो है आम आदमी और प्रशासन |   

अगर केन नदी को बचाना है तो नदी के दोनों तटों के  200 मीटर क्षेत्र को  बफर जोन बनाकर  पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए , ड्रोन से निगरानी की जाए , ग्राम पंचायत की  अनुमति ग्राम  सभा के बाद  अनिवार्य करें।रेत को प्रमुख खनिज घोषित कर ई-टेंडरिंग लाएंएम-सैंडप्रोत्साहन दें। बांदा डीएम रीभा की कार्रवाई सराहनीय मानी जायेगी इसी तरह की कार्यवाही पन्ना और छतरपुर कलेक्टर से भी अपेक्षित है  , वरना केन का क्र्रिया कर्म करने में लोभ की राजनीति पीछे नहीं रहेगी |      रेत खनन से जैव-विविधता नष्ट हो रही भू-कटाव-भूस्खलन बढ़ रहे। रेत पानी शुद्ध करने में सहायक होती हैलेकिन सैंड-पंपों ने यह क्षमता छीन ली। वैज्ञानिक खनन नीतिसतत निगरानी और कठोर कार्रवाई जरूरी। सरकार-समाज मिलकर नदियों को बचाएवरना बुंदेलखंड का भविष्य अंधकारमय।

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