30 नवंबर, 2025

BKD_State_राज्य बनने का सपना और सांसदों की नींद की कहानी

 :बुंदेलखंड डायरी: 

"राज्य बनने का सपना और सांसदों की नींद की कहानी

जो बुंदेलखंड का नहींवो किसी काम का नहीं

रवीन्द्र व्यास 

बुंदेलखंड  वह क्षेत्र जहां सौ वर्षों से संघर्ष की आग जल रही है, लेकिन आज भी संसद की परिक्रमा करने वाले सांसद ठंडे बस्ते में बैठे हुए हैं। यहां पीने के पानी की भट्टी सुलगती है, जमीन मेहनत के अभाव में बंजर हो रही है, और खदानों की  मिट्टी में मजदूरों के खून की धारा बह रही है।  संसद में खड़े वे नौ जनप्रतिनिधि? उनके लिए बुंदेलखंड का हित नहीं, अपने परिवार के हित के टिकट से बड़ा कोई मसला नहीं।2008 में राहुल गांधी ने सूखे बुंदेलखंड में दलितों की झोपड़ी में रात बिताई थी, देश को जागने का नाटक भी खूब चला । मायावती ने 2011 में विधानसभा में राजनीति का तमाशा लगा राज्य निर्माण की वकालत की। फिर नरेंद्र मोदी, राजनाथ सिंह और उमा भारती ने तीन साल में राज्य बनाने का वादा कर बुंदेलखंडियों के सपनों को हवा दी। लेकिन अब ये सपने मुंगेरीलाल के हसीन सपने हो गए ?

 सांसदों की यह राजनीतिक कवायद  देखिए  उनका  या तो मुद्दे से मोहभंग हैं या फिर राजनीति के  खेल में इतने उलझे हैं कि बुंदेलखंड की भूख-प्यास उनकी तालिका से बाहर है।जब बुंदेलखंड निर्माण मोर्चा ने इन नौ सांसदों का सामूहिक पुतला कचहरी पर फूंका, तो एक भयावह सच दिल को झकझोर गया , जो बुंदेलखंड के हित के लिए नहीं खड़ा, वह रोटी के भूखे के बराबर भी नहीं। पर पुलिस नाम की चौकीदारी वाले लोग आए और ऐसा लगा जैसे सांसदों के हित में उठी आवाज दबाना हो। लेकिन बुंदेलखंड के वीर योद्धा पीछे नहीं हटे। कफन बांधकर,  आर-पार की लड़ाई के इरादे से तैयार होकर संघर्ष को नया आयाम दिया।

फतेहपुर में बुंदेलखंड राष्ट्र समिति ने सांसदों के सरकारी आवासों पर घेराव की योजना बनाई है, क्योंकि अब जन जागरण का दौर समाप्त हो चुका है। जन आक्रोश का समय है, और जनप्रतिनिधि या तो इस जनाग्रह की आग में जलेंगे या राजनीति से विदा लेंगे। 1955 से चली आ रही यह मांग आखिर कब पूरे देश के नक्शे पर बुंदेलखंड का नाम लिखेगी? तीन बड़े क्षेत्रीय आंदोलन झारखंड, उत्तराखंड और तेलंगाना को बताया जाता है कि उनका नेतृत्व, जन एकता और स्पष्ट आवाज़ ही सफलता का मूल मंत्र था। लेकिन बुंदेलखंड में नेतृत्व कमजोर पड़ा, चुप्पी हावी हुई और शासक अपनी राजनीति के मोहरे गढ़ते रहे।

राजनीतिक बेईमानी की बात छोड़िए ,उत्तर प्रदेश के  बुंदेलखंड की असली कहानी तो उस खदान की साफ उजली धूल में दबी है, जहां देश की सबसे बड़ी पत्थर मंडी चलती है। खदानों में 300-400 फीट गहराई तक जाने वाली अवैध खनन, यहां के माफियाओं की सत्ता का जोर  रहा है। रोज लाखों की आय  पर मजदूरों की जान की कीमत तय  20 से 22 लाख रुपया। हैवी ब्लास्टिंग के धमाके गांव-शहर हिला रहे हैं, खेत सूख रहे हैं, किसान परेशान हैं, और अफसर-नेता ठंडी चाय पीते हुए अफसरशाही के खेल में मशगूल।एसटीएफ की छापेमारी और नाराज़गी एक दिन की बहार हैं, वरना खदान माफिया सरकार के नियमों को सिर्फ दिखावे के लिए मानते हैं। नियम कानून का मज़ाक उड़ाते हुए बड़े पत्थर खेतों पर गिराते हैं, और सरकारी तंत्र में बैठे लोग सबसे बड़ा भ्रष्टाचार सृजित कर रहे हैं। ओवरलोडिंग के चलते ट्रकों की कतारें चलती हैं, जो न सिर्फ सड़कें उजाड़ती हैं बल्कि सरकार को करोड़ों का राजस्व नुकसान पहुंचाती हैं। पर राजस्व खाते की समझ रखने वाली राजनीति के लिए यह कोई खबर नहीं।

भयानक हालात के बावजूद जनता में संघर्ष की आग बुझनी नहीं चाहिए, पर सवाल उठता है कि इतने वर्षों की लड़ाई में क्यों अभी तक बुंदेलखंड राज्य का नक्शा नहीं बना? क्या सांसदों की प्राथमिकता परिवार की राजनैतिक विरासत संजोने की है, या क्षेत्र के विकास की? जब तक सांसद अपनी कुर्सी बचाने के लिए सांसद नहीं बनेंगे, तब तक बुंदेलखंड की जनता की पीड़ा कौन सुनेगा?साइकिल यात्राएं, जन आंदोलनों के बीच शासन और प्रमाणीकरण की राजनीति बुंदेलखंड की आवाज को दबाने में लगी है। सांसदों के आवासों पर चिपकाए गए जो बुंदेलखंड का नहीं, वो किसी काम का नहीं स्टिकर भी एक तख्ती बनकर रह गई है। असली सवाल यह है कि क्या कोई बुंदेलखंड प्रेमी वादे से आगे उठकर अपनी जिम्मेदारी समझेगा? या फिर राजनीति की चासनी में फंसकर क्षेत्र की आवाज दबाए रखेगा?बुंदेलखंड की जनता अब केवल रग-रग बुंदेली गीतों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों से संतुष्ट नहीं है, बल्कि जमीन, पानी, और सत्ता से जुड़े हक की लड़ाई लड़ रही है। जनता की उम्मीदें सिर पर कफन बांधने वाले नायकों को इस क्षेत्र का सम्मान दिलाने की प्रतीक्षा कर रही हैं। क्या आज का बुंदेलखंड कल तक अपने अस्तित्व और अधिकारों के लिए संसद का दरवाजा खटखटाएगा, यह केवल समय ही बताएगा।

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