डबल एम फैक्टर की अजब कहानी — बिहार में नीतीश की मुस्कान और तेजस्वी की मायूसी
रवीन्द्र व्यास
बिहार की राजनीति एक बार फिर सबको चौंका गई। कोई इसे किस्मत कहे या गणित, पर इस बार सत्ता की कुर्सी पर बैठी है वही शख्सियत, जो गठबंधन बदलो, लेकिन मुस्कान मत बदलो नीति में यकीन रखती है नीतीश कुमार। 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने 243 में से 200 से ज्यादा सीटें झटक लीं, और महागठबंधन पिछली बेंच पर बैठकर जोड़-घटाव का हिसाब लगाता रह गया।
कहने को तो जीत वोटों का खेल है, लेकिन असल में यह एम का खेल था , यहां एम का मतलब मुसलमान नहीं था। नीतीश जी के लिए एम यानी महिला था। तेजस्वी यादव जहां पुराने एम पर भरोसा कर बैठे, वहीं नीतीश ने नया एम छेड़ा और सीधा दिल जीत लिया।
नीतीश का डबल एम फार्मूला
नीतीश ने भाजपा का आजमाया हुआ फार्मूला आगे बढ़ाया , चुनाव से ठीक पहले महिलाओं के खातों में पैसा डालो और दिल में जगह बना लो। मगर उन्होंने इसे और आकर्षक बना दिया: परिवार की एक महिला को दस हजार रुपये का तोहफा, और आगे दो लाख तक का भरोसा ।
इस महिला रोजगार योजना ने बिहार की सियासी गिनती ही बदल दी। शराबबंदी, साइकिल योजना, नल-जल योजना के बाद अब महिला मुद्रा योजना ने नीतीश को फिर से महिलाओं का मसीहा बना दिया।
जेडीयू का वोट बैंक सिर्फ जातियों में नहीं, भावनाओं में बंटा वह भी मातृशक्ति के नाम पर। जहां तेजस्वी यादव अखबारों में योजनाएं वादे बनाते रहे, नीतीश ने उन्हें वोट बैंक खातों में बदल दिया।
नीतीश बनाम तेजस्वी का एम फैक्टर
तेजस्वी का एम फैक्टर (मुसलमान) पुराने भरोसे वाले साथी जैसे थे, लेकिन नीतीश का एम फैक्टर (महिलाएं) नए दौर की ताकत साबित हुआ। कुछ इलाकों में मुस्लिम वोट भी जेडीयू की ओर खिसक गए। यानी तेजस्वी के लिए डबल झटका एम भी गया, महिला भी।
नीतीश ने यह खेल 2005 में ही शुरू कर दिया था, साइकिल योजना, आरक्षण में महिला आरक्षण और शराबबंदी जैसे फैसलों से उन्होंने महिला सशक्तिकरण को वोट कन्वर्जन का स्थायी फार्मूला बना दिया। इस बार दस हजार रुपये ने तो कमाल ही कर दिया कागज पर नहीं, खाते में दिखने वाला वादा।
महागठबंधन का बेजोड़ गठजोड़
महागठबंधन ने इस बार जातीय पत्तों की गड्डी सजाई। मल्लाह, तंती, पासवान, यादव, मुसलमान सबको जोड़ा, पर निकला क्या? वही 37 प्रतिशत वोट शेयर जो 2020 में था। सवाल उठता है इतनी मेहनत कर भी फायदा नहीं मिला तो वादा कहां कम पड़ा या विश्वास कहां टूट गया? शायद इसलिए क्योंकि जनता को अब नारे नहीं, विश्वास चाहिए मोदी स्टाइल या नीतीश ब्रांड वाला वादा जो सीधे खाते में आए।
कटौती खाते में गए :प्रशांत किशोर के JSP के वोट
प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी (JSP) ने 3.5% वोट ले जाकर विरोधी खेमे की गणित बिगाड़ दी। वे चुनाव में उतरे तो थे बदलाव के नाम पर, लेकिन काम हुआ बटवारे का। जो वोट तेजस्वी के हिस्से में जाना था, वह JSP और AIMIM की थैली में चला गया। परिणामतः एनडीए को मिली ऐतिहासिक जीत ।एनडीए को महज 10 प्रतिशत वोट का बढ़त मिला, पर सीटें दोगुनी से ज्यादा बढ़ गईं।
चुनावी अखाड़े का आखिरी सीन बड़ा फिल्मी रहा , भाजपा ने कंधों पर जीत का भार उठाया, लेकिन चमक नीतीश की मुस्कान में दिखी। तेजस्वी को शायद अब समझ में आया होगा कि बिहार की राजनीति में जो एम को साधेगा, वही सिंहासन संभालेगा।

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