16 नवंबर, 2025

ओरछा : परंपरा का उत्सव, आस्था का संगम

 बुंदेलखंड की डायरी 


 ओरछा : परंपरा का उत्सव, आस्था का संगम





श्री राम-जानकी विवाह महोत्सव: बुंदेलखंड की सांस्कृतिक चेतना का अनूठा प्रतीक

 

रवीन्द्र व्यास 

 

बुंदेलखंड की धरती सदियों से आस्था, वीरता और लोकजीवन की समृद्ध परंपराओं की साक्षी रही है। यहां की मिट्टी में भक्ति घुली है और परंपराएं जीवंत हैं। इन्हीं में एक पावन परंपरा है  ओरछा और उसके आसपास मनाया जाने वाला श्री राम-जानकी विवाह महोत्सव, जो लगभग पांच शताब्दियों से इस क्षेत्र में धर्म, संस्कृति और सामाजिक एकता का प्रतीक बनकर हर वर्ष नई ऊर्जा का संचार करता है।

 

ओरछा को बुंदेलखंड की अयोध्या कहा जाता है। यहां के रामराजा मंदिर में भगवान राम को राजा के रूप में पूजा जाता है । यह भारतवर्ष का एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहां देवता को "राजा" का दर्जा प्राप्त है और उन्हें प्रतिदिन राजसी गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाता है। यही परंपरा ओरछा को सिर्फ धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक विचारधारा का केंद्र बनाती है।


ऐतिहासिक परंपरा और लोक विश्वास 

 

इतिहासकार बताते हैं कि ओरछा में राम-जानकी विवाह उत्सव की शुरुआत बुंदेला  शासन के दौरान हुई थी। पांच सौ वर्षों से चली आ रही यह परंपरा हर युग में समयानुकूल रूप ग्रहण करती रही है, पर इसका मूल भाव आस्था और सामाजिक एकता  आज भी अक्षुण्ण है।बुंदेलखंड के लोगों के लिए यह आयोजन केवल धार्मिक श्रद्धा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अस्मिता से जुड़ा पर्व है। इस दौरान बुंदेली लोकगीतों, पारंपरिक नृत्यों और रीति-रिवाजों के माध्यम से लोक संस्कृति सजीव हो उठती है। विवाह की प्रत्येक रस्म  जैसे मंडप पूजन, हल्दी, तिलक, बारात, पांव पखराई या धनुष यज्ञ  न केवल धार्मिक अर्थ रखती है, बल्कि एक सामाजिक संवाद का माध्यम भी है, जहां लोग जाति, वर्ग और गांवों की सीमाओं से परे मिल बैठते हैं।

 

आधुनिकता के दौर में स्थायी परंपरा 

 

डिजिटल और तकनीकी युग में जब पारंपरिक धार्मिक आयोजन धीरे-धीरे सीमित हो रहे हैं, तब ओरछा और बिजावर जैसे स्थानों की यह परंपरा स्थिरता और जड़ता के बजाय नवजीवन का उदाहरण पेश करती है। इस वर्ष भी ओरछा में विवाह पंचमी पर तीन दिवसीय भव्य आयोजन की तैयारियां जोर-शोर से हो रही हैं।मंदिर प्रशासन ने पारंपरिक आमंत्रण की परंपरा को बनाए रखते हुए डिजिटल कार्ड तैयार किए हैं, जिन्हें सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से शेयर किया जा रहा है। साधु-संतों, जनप्रतिनिधियों, प्रदेश के मंत्रियों, और देश के प्रमुख धार्मिक संस्थानों को आमंत्रण भेजा गया है। यह न केवल आस्था का विस्तार है, बल्कि परंपरा का आधुनिक रूपांतरण भी है। जब परंपरा अपने मूल भाव को खोए बिना समय की रफ्तार से चलना सीख लेती है, तभी वह सजीव रहती है , ओरछा इसका सशक्त उदाहरण है।

23 नवम्बर को गणेश पूजन और भट्टी पूजन होगा।24 नवम्बर को मंडप की रस्म और पंगत का आयोजन रहेगा।25 नवम्बर को विवाह पंचमी पर भगवान श्रीराम की वर यात्रा निकलेगी और जनकपुर में श्री राम-जानकी का विवाह संपन्न होगा।26 नवम्बर की सुबह ‘राम कलेवा’ के साथ तीन दिवसीय आयोजन का समापन होगा ।

 

लोक जीवन की ऊर्जा और सामाजिक समरसता

 

श्रीराम-जानकी विवाह महोत्सव की   सामाजिक भूमिका भी है। यह आयोजन स्थानीय समाज को जोड़ने का अवसर देता है। भंडारे में हर वर्ग के लोग एक साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण करते हैं, जिससे सामाजिक समरसता की भावना प्रबल होती है। मंदिर समितियों, स्थानीय संगठनों और प्रशासन की संयुक्त भागीदारी इस आयोजन को सशक्त बनाती है।

 

ओरछा, बिजावर और ललितपुर  तीनों स्थानों पर यह पर्व क्षेत्रीय सहभागिता का उत्सव बन जाता है। यहां राम और सीता केवल देवी-देवता नहीं, बल्कि परिवार, प्रेम, सम्मान और मर्यादा के प्रतीक हैं। इनके विवाह की पुनःअभिव्यक्ति समाज को यह संदेश देती है कि परंपरा केवल अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक मूल्यों की अभिव्यक्ति है।

 

125 वर्ष पुरानी बिजावर की परंपरा'


 

छतरपुर जिले के बिजावर में यह आयोजन सवा सौ वर्षों से निरंतर प्रचलित है। महारानी कंचन कुँवर द्वारा आरंभ की गई यह रस्म आज भी उसी श्रद्धा से निभाई जाती है। हर वर्ष अयोध्या धाम जाकर देवताओं और ऋषि-मुनियों को हल्दी चावल देकर आमंत्रित किया जाता है। इस धार्मिक संवाद की सरल परंतु गहन परंपरा समर्पण, शुचिता और प्रतीकात्मक धार्मिक सम्बन्ध को अभिव्यक्त करती है।हाल के वर्षों में विधायक राजेश शुक्ला और तहसीलदार अभिनव शर्मा जैसे स्थानीय नेतृत्व ने इस आयोजन को प्रशासनिक सहयोग देकर इसकी गरिमा बढ़ाई है। यहां भी मंडप स्थापना, मायना, द्वारचार, धनुष यज्ञ, पांव पखराई जैसी रस्में वैदिक विधि से संपन्न होती हैं। 

 

पर्यटन और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव


 ओरछा में मनाए जाने वाले धार्मिक आयोजनों ने न केवल भक्तों को आकर्षित किया है, बल्कि धार्मिक पर्यटन को भी नई दिशा दी है। विवाह पंचमी महोत्सव के दौरान हजारों श्रद्धालु ओरछा पहुंचते हैं। इससे स्थानीय व्यापार, हस्तशिल्प, भोजन, परिवहन और आवास सेवाएं सक्रिय हो जाती हैं। ओरछा किला, जहांगीर महल, राय प्रवीण महल और बेतवा तट जैसे स्थल पर्यटकों के लिए आकर्षण के केंद्र बनते हैं।यह धार्मिक आयोजन अप्रत्यक्ष रूप से क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को गति देता है, जो वर्तमान ग्रामीण भारत के लिए अत्यंत सकारात्मक संकेत है। परंपरा और अर्थनीति का यह संतुलन दिखाता है कि संस्कृति केवल अतीत का अवशेष नहीं, बल्कि भविष्य की संभावनाओं का आधार भी बन सकती है।

 

आध्यात्मिकता और प्रशासनिक अनुशासन का संगम 


रामराजा मंदिर की सबसे विशिष्ट विशेषता है  राजसी गार्ड ऑफ ऑनर। हर दिन भगवान श्रीराम को औपचारिक सैनिक सम्मान मिलता है। यह नियम बताता है कि धार्मिकता और प्रशासनिक अनुशासन बुंदेलखंड की परंपरा में परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। यही समन्वय समाज के संगठन और अनुशासन का आदर्श प्रस्तुत करता है।आज जब राजनीति और सार्वजनिक जीवन में मूल्यों का क्षरण देखा जा रहा है, तब ओरछा का यह दृश्य  जहां भक्त और सैनिक एक साथ श्रद्धा अर्पित करते हैं  यह संदेश देता है कि धर्म यदि व्यवस्था के साथ संतुलित रहे, तो समाज सशक्त और स्थिर रहता है।

 

सांस्कृतिक चेतना का पुनर्जागरण

 

श्रीराम-जानकी विवाह उत्सव केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि बुंदेलखंड के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक है। यह त्योहार लोककलाओं, बुंदेली संगीत, लोकभाषा और सामुदायिकता की पुनःस्थापना करता है। महिलाओं द्वारा गाए जाने वाले मंगलगीत न केवल भजन हैं, बल्कि लोकसंस्कृति के जीवंत दस्तावेज़ हैं।यहां धर्म और संस्कृति एक-दूसरे में घुल-मिल जाते हैं, जहाँ पूजा और उत्सव के बीच कोई सीमा नहीं रहती। श्रद्धालु जब बारात में शामिल होकर राजा रामचंद्र की जयका उद्घोष करते हैं, तो वह केवल भक्ति का प्रदर्शन नहीं, बल्कि अपनी पहचान और परंपरा के प्रति सामूहिक अभिव्यक्ति होती है।संतुलन और निरंतरता का संदेश समाज में परंपराओं की प्रासंगिकता तभी बनी रहती है, जब वे बदलते समय के साथ तालमेल बिठा सकें। ओरछा का यह आयोजन इस संतुलन की मिसाल है। इसमें धार्मिकता का अनुशासन है, सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का विस्तार है और सामाजिक एकता की भावना है।

 

  ओरछा की गलियों से लेकर बिजावर के मंदिरों तक, श्री राम-जानकी विवाह महोत्सव हर वर्ष यह स्मरण कराता है कि परंपरा किसी जाती या क्षेत्र की नहीं, बल्कि संस्कृति की आत्मा है। यह उत्सव इतिहास, अध्यात्म और सामाजिक चेतना का ऐसा संगम है, जिसमें भक्ति और जीवनदर्शन एकाकार हो जाते हैं।पांच सौ वर्षों से चली आ रही यह परंपरा न केवल बुंदेलखंड के लोकजीवन को आलोकित करती है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक एकता का भी सशक्त प्रमाण है। जब पूरा नगर दुल्हन की तरह सजता है, बारात निकलती है, भजन गूंजते हैं और भक्त भावविभोर होकर नृत्य करते हैं तो यह केवल उत्सव नहीं, बल्कि उस विश्वास की अभिव्यक्ति है जिसने भारत की आत्मा को सदियों से जीवित रखा है।

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