2025 के दिसंबर का दूसरा सप्ताह सुर्खियों से भरा रहा,
खजुराहो कैबिनेट: तोते का आम, अमरूद के पेड़ पर!
धीरेन्द्र कुमार नायक,
मध्यप्रदेश के मोहन मुख्यमंत्री ने जब बुन्देलखण्ड के छतरपुर खजुराहो में कैबिनेट बुलाई घोषित की, तो लगा कि अब तो केन-बेतवा का असली रोडमैप बनेगा। मन प्रसन्न हो गया। लेकिन विवादास्पद खर्चे पर नहीं जाना ,ट्रेन में भजन गाते मंत्रीगण महंगे होटल में ठहरे, नई सफारी से जानवर देखे।
उधर खजुराहो में तीन कर्मचारी भोजन विषाक्तता से मरे, परिजन न्याय मांग रहे थे मुख्यमंत्री या प्रभारी मंत्री नहीं पहुंचे!
कैबिनेट में छतरपुर को क्या मिला? कुछ नया नहीं। केन-बेतवा पर पुराना ढोल पीटा गया। बचपन में मदारी गांव आते एक तरफ नेवला बांधते, बांस की टोकरी में सांप को बीन बजाते। सांप के कान होते नहीं। फिर क्यों नाचता? धुन से या बीन घुमाने से? मां कहतीं,
'बिना यह जिय जानके शेष दिए न कान, घरा मेघ सब डोलहे, तानसेन की तान।'
मादरी सांप-नेवले की लड़ाई दिखाए बिना पैसे बटोर लेता। 65 साल हो गए, लड़ाई कभी नहीं देखी पैसे हमेशा बटोरे।यही केन-बेतवा का हाल! अटलजी गए, उमा भारती रहीं कुछ न हुआ। अब खजुराहो में ढोल पीटा।
ताजा खबर: एमपी सरकार ने केंद्र को 'सस्ता' प्रस्ताव भेजा—पाइप से नदी जोड़ें, 218 की जगह 149 किमी पाइपलाइन, 78 की जगह 200 मैगावाट ज्यादा बिजली, सिंचाई 4.5 से 6.12 लाख हेक्टर।
लेकिन ये छतरपुर-पन्ना-टीकमगढ़ से बाहर! हमारा पानी पाइप से ले जाकर मुख्यमंत्री के क्षेत्र के खेत लबालब भरेंगे, हमें सूखे में झुनझुना देकर तसल्ली दें? जैसे आज जिला पानी यूपी भेजता है।कच्ची नहर से पानी बहेगा तो बिना खर्च के कुओं का जलस्तर बढ़ेगा, कृषि रकबा फैलेगा। पाइप से? सिर्फ पूंजीपति विक्रेता को कमीशन! कौन बदलेगा बुन्देलखण्ड का जीवन सांप-नेवला की लड़ाई या सरकार का जुमला?
मेडिकल कॉलेज 5 साल पहले स्वीकृत, भवन तैयार स्टाफ स्वीकृति तो बस तोते का आम अमरूद के पेड़ पर!
140 करोड़ के देश में 5.5 करोड़ केस पेंडिंग:
न्यायपालिका की 'नियत' या निपटाने की कमी?
लोकसभा में कानून मंत्री बोले: 5.5 करोड़ केस इंतजार में सुप्रीम कोर्ट में 90,897, 25 हाईकोर्ट में 63.63 लाख, निचली अदालतों में 4.84 करोड़। कारण? जटिलता, गवाह, जांच एजेंसी, वकील, अदालतों की कमी। न्यायाधीशों की जिम्मेदारी? का नामोनिशान नहीं!मैं वकील हूं। 50% दोष अदालतों का जो निपटाना चाहें, वकील-गवाह-एजेंसी सब दो महीने में आ जाते। एमपी हाईकोर्ट 5 साल पुराने केस निपटाने का टारगेट देता, बाकी? कोई नहीं पूछता। मित्र वकील ने राजीनामा कराया, एक लाख रिकॉर्ड पर दिलवाए फैसला 6 महीने बाद भी लटका। एक जज को 5 स्टाफ, 3 चपरासी, फर्राश छतरपुर में 11 जज, 20 मजिस्ट्रेट। लेकिन डिस्पोजल? एक जज दिनभर में एक विवादित केस भी नहीं निपटाता।
हकीकत: जज ही काम टालते हैं। 12 बजे कोर्ट, 2 बजे लंच, 3 के बाद शुरू, 5 से पहले बंद 4 घंटे 'कार्य'! वरिष्ठ जज की निगरानी हो, गुटबाजी न हो, तो काम बने। मैंने ऐसे जज देखे, जिन्होंने अपनी-अन्य अदालतों के पेंडिंग निपटाए हाईकोर्ट बंद करनी पड़ी। नियत हो तो संभव!
जनप्रतिनिधियों की निधि में भ्रष्टाचार: पुराना खेल, नया स्टिंग!
भ्रष्टाचार ऐसा कि 'सकल पदार्थ है जग माही, कर्महीन नर पावत नाही।' न किया या न कर पाया, तो उंगली उठती है। RSS सर कार्यवाह हौसबोले जी बोले: काम समय पर न करना भी भ्रष्टाचार! अधिकार अपात्र को देना भ्रष्टाचार। पुराने जमाने में नजराना (काम की गारंटी), शुक्राना (काम होने पर), जबराना (दबाव) आज तीनों मिक्स!
राजस्थान विधायक की निधि पर स्टिंग: विकास फंड में कमीशन सेटिंग। नया क्या? हर जगह चर्चा रहती है। क्रांतिकारी कवि हरिओम पावर ने कविता लिखी—'बंद करवाऊंगा!' लेकिन भ्रष्ट जनप्रतिनिधियों वाले देश में नैतिकता? हाह!विकास निधि का अधिकार खत्म हो, तो चाटुकार भागेंगे। 80 के दशक की तरह विधायक बैग लटकाए अफसरों के चक्कर लगाएंगे फार्महाउस गायब! मोदीजी की सरकार पारदर्शी बनेगी जब संसद में बिल लाए: निधि सीधे खत्म। तब लोकसभा सदस्य नहीं, 'क्षेत्र सेवक' होंगे। कर्मचारियों पर भय बनेगा। मनरेगा से बापू रोजगार योजना बनाकर भ्रष्टाचार रुकेगा? हंसाओ मत!अगले सप्ताह फिर हलचलों के साथ।
धीरेन्द्र कुमार नायक, एडवोकेट, जिला छतरपुर, मध्यप्रदेश।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें