बुंदेलखंड की डायरी
बुंदेलखंड की दिवाली के अनोखे रंग
रोशनी से बढ़कर परंपरा का पर्व
रवीन्द्र व्यास
भारतभर में दीपों का त्योहार दीवाली समृद्धि और रोशनी का प्रतीक माना जाता है, लेकिन बुंदेलखंड में इसका स्वरूप कहीं अधिक गहरा और जीवंत है। यहां दीपावली केवल दीपों की जगमगाहट का नहीं, बल्कि लोक परंपराओं, पशुपालक संस्कृति और सामूहिक आस्था का उत्सव है। बुंदेलखंड के गांवों में दीपों के साथ लठ्ठमार दिवारी, मौनिया नृत्य और धार्मिक अनुष्ठान इस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान बन चुके हैं।लोक कलाएं जो मिट्टी की महक लिए हैंइस क्षेत्र के लोकगीत और नृत्य सदियों से लोगों के श्रम, विश्वास और सामाजिक संदेशों के वाहक रहे हैं। हालांकि आधुनिकता की रफ्तार के साथ गांवों की परंपराएं अब सिमटती जा रही हैं, पर कई स्थानीय कलाकार और संस्थाएँ इन्हें पुनर्जीवित करने में जुटी हैं।
ऐसा ही एक जीवित उदाहरण है दिवारी या मौनिया नृत्य जो बुंदेलखंड की चारागाही संस्कृति और लोक आस्था दोनों का संगम है।सरीला: जहां एक पत्थर से शुरू होती है दिवाली की थाप हमीरपुर के सरीला कस्बे में दशहरे पर गाड़ा गया पत्थर दीपावली की रात उखाड़ा जाता है। यही क्षण मौनिया नृत्य के आरंभ का संकेत बनता है। यदुवंशी समुदाय पत्थर की पूजा के बाद इसे निकालता है और फिर पूरी रात मंदिरों के बाहर नृत्य करता है। ढोल-नगाड़ों की थाप और लाठियों की टकराहट के बीच मौन धारण किए नर्तक मोरपंख सजाकर थिरकते हैं। यह दृश्य वीरता और अनुशासन दोनों का मोहक संगम बन जाता है।
लठ्ठमार दिवारी: लोक नृत्य में छिपी गोवर्धन कथा
दीपावली के अगले दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा के मौके पर खेले जाने वाला लठ्ठमार दिवारी नृत्य वास्तव में श्रीकृष्ण की गोवर्धन पर्वत कथा का प्रतीक है। लोककथा के अनुसार, जब श्रीकृष्ण ने इंद्र के कोप से गोकुल की रक्षा के लिए पर्वत उठाया, तब ग्वालों ने उनके सम्मान में यह नृत्य किया था।आज भी यदुवंशी समुदाय के कलाकार बारह वर्षों का मौन व्रत लेकर बारह गांवों में यह नृत्य करते हैं। लाठियों के संग प्रदर्शन केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्मसंयम, साहस और वीरता की धरोहर है। नगाड़ों की थाप और घुंघरुओं की झंकार के साथ यह प्राचीन परंपरा लोगों को अपने गौरवशाली अतीत की याद दिलाती है।
मौनिया नृत्य:
पशुपालक जीवन की साधनादीपावली की रात पूजा के बाद अहीर, गड़रिया और पाल समुदाय तालाब और नदियों में स्नान कर मौन व्रत लेते हैं। इन्हीं को मौनिया कहा जाता है। लाल-पीली पोशाकें, घुंघरू, और मोरपंखों से सजे हाथ, मौन चेहरे और कदमों की थिरकन , यह सब मिलकर एक ऐसा दृश्य बनाते हैं, जो लोकजीवन की सरलता और गहराई दोनों को उजागर करता है।मौनिया प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा तक गांव-गांव घूमते हैं। वे डोल, नगाड़ा, मंजीरा और मृदंग की थाप पर नृत्य करते हैं, पर स्वयं मौन रहते हैं। लोकसंस्कृति के विद्वान डॉ. के.एल. पटेल बताते हैं कि इस मौन का उद्देश्य पशुओं के मौन दर्द को समझना और उनके श्रम के प्रति संवेदनशील होना है। यह साधना ही मौनियों की आत्मा है।
गीतों में बुना लोक जीवन का दर्शन
दिवारी गीतों में जीवन का दर्शन और लोकनीति समाई हुई है। ये गीत न केवल श्रद्धा या श्रृंगार के हैं, बल्कि समाज के नैतिक मूल्यों और श्रम की गरिमा को भी रेखांकित करते हैं। गायक जब ताल मिलाते हैं, तो श्रोताओं को लगता है जैसे पूरी प्रकृति उनके साथ गा रही हो।इतिहासकार मानते हैं कि दिवारी गीतों की परंपरा लगभग दसवीं सदी के आसपास आरंभ हुई। वहीं एक अन्य लोककथा के अनुसार, द्वापर युग में कालिया मर्दन के बाद जब ग्वालों ने श्रीकृष्ण का असली रूप देखा, तब उन्होंने इसी नृत्य और गीत के माध्यम से उन्हें धन्यवाद दिया। श्रीकृष्ण ने उन्हें सिखाया कि गौसेवा ही मनुष्य और समाज के कल्याण की मूल जड़ है।
बदलते समय में संघर्षरत परंपरा
बुंदेलखंड के गांव अब तेजी से कस्बों में बदल रहे हैं; पशुपालन घटा है, और साथ में दिवारी की परंपरा भी। छतरपुर के रामजी यादव कहते हैं, पहले गांव में हर गली में मौनिया दल दिख जाते थे, अब बस आयोजन तक सीमित हैं। फिर भी यह परंपरा पूरी तरह लुप्त नहीं हुई है। चरखारी, बिजावर और सागर में स्थानीय आयोजन आज भी मौनिया नृत्य को जीवंत रखने का प्रयास कर रहे हैं। विदेशी पर्यटक भी खजुराहो में इन्हें देखकर मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।
सागर और टीकमगढ़ में घर-घर की दीवाली
सागर जिले के सानौधा गांव में आज भी कुम्हार, माली और पौनी दीपावली से पहले घर-घर जाकर दीये, फूल और रुई पहुंचाते हैं। यह परंपरा पेशेवर सहयोग के साथ सामाजिक एकता की मिसाल भी है। वहीं टीकमगढ़ में लोग अब भी छुई मिट्टी से घरों की पुताई करते हैं और चौखट पर लोहे की कील ठोकते हैं । यह बुराइयों को घर से दूर रखने का प्रतीक है।
सत-असत के संघर्ष की प्रतीक रस्म
हमीरपुर और बांदा जिले के कुछ गांवों में दीपावली के अगले दिन गाय और सुअर की प्रतीकात्मक लड़ाई कराई जाती है। यह विचित्र लगने वाली रस्म वास्तव में जीवन के दो पहलुओं पवित्र और अपवित्र, सत्य और असत्य के संघर्ष का प्रतीक है। इस आयोजन में मौनिया ढोल-नगाड़ों की थाप पर नाचते हैं, और लोकगीतों से धर्म व नीति की व्याख्या करते हैं।
दीवाली: सिर्फ रोशनी नहीं, जीवन की साधना
बुंदेलखंड की दीपावली केवल उत्सव नहीं, बल्कि संस्कृति का सशक्त दस्तावेज है। यहां दिवारी नृत्य हो या गाय-सुअर की प्रतीकात्मक लड़ाई हर आयोजन मनुष्य, पशु और प्रकृति के पारस्परिक संबंधों की अनूठी व्याख्या करता है।इस क्षेत्र के लिए दीपावली केवल दीपों की चमक नहीं, बल्कि धरती, श्रम और आस्था के बीच रोशनी फैलाने का माध्यम है। यही कारण है कि बुंदेलखंड में यह पर्व लोकजीवन की आत्मा बनकर हर वर्ष नये अर्थों में झिलमिलाता है।
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