दुनिया के देश क्यों खरीद रहे हैं भारत से गोबर
रवीन्द्र व्यास
भारत आज केवल मसालों, चाय या इंजीनियरिंग उत्पादों का निर्यात नहीं कर रहा, बल्कि अब "गोबर" जैसे पारंपरिक ग्रामीण उत्पाद ने भी वैश्विक बाजार में अपनी पहचान बना ली है। अमेरिका, चीन, सऊदी अरब, ब्राजील, कुवैत और मालदीव जैसे देश भारत से गोबर खरीद रहे हैं। यह बदलाव केवल धार्मिक मान्यता या जिज्ञासा का नहीं, बल्कि हरित अर्थव्यवस्था की दिशा में बढ़ते वैश्विक कदमों का परिणाम है। देश में आ रहा यह परिवर्तन किसानों और पशुपालकों को एक नया आर्थिक स्रोत उपलब्ध कराएंगे साथ ही छुट्टा जानवरों की समस्या से भी मुक्ति दिला सकते हैं |
भारत में लगभग 30 करोड़ मवेशी हैं जो प्रतिदिन करीब 3 करोड़ टन गोबर उत्पन्न करते हैं। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था, जैविक उर्वरक, बायोगैस और पारंपरिक ईंधन (उपले) की भारी आपूर्ति होती है। यही विशाल उत्पादन आधार भारत को इस क्षेत्र में निर्यात क्षमता देता है | 30–50 रुपये प्रति किलो की दर से इसका निर्यात होता है, हालांकि गोबर का निर्यात मूल्य गोबर के प्रकार और प्रसंस्करण (पाउडर, खाद, या उपला) पर निर्भर करता है।
पिछले एक दशक में कई देशों ने रासायनिक खादों पर निर्भरता कम करने का निर्णय लिया है। यूरोप, सऊदी अरब और चीन जैसे देशों में ऑर्गेनिक एग्रीकल्चर सर्टिफिकेशन कड़े हुए हैं। गोबर से बनी खाद पर्यावरण सुरक्षित, कार्बन-न्यूट्रल और मिट्टी के माइक्रोबियल बैलेंस को बनाए रखने वाली मानी जाती है।इसलिए विदेशी किसान विशेषकर भारत का गोबर पाउडर और लिक्विड मेन्यूर मंगाते हैं।
भारतीय गोबर में मैग्नीशियम, फास्फोरस, और नाइट्रोजन के प्राकृतिक अंश जैसे सूक्ष्म तत्त्व पाए जाते हैं जो मिट्टी की संरचना को सुधारते हैं | कुवैत और सऊदी अरब के कृषि वैज्ञानिकों ने पाया कि भारतीय गोबर से बने जैविक खाद ने खजूर की फसल में न केवल उत्पादन बढ़ाया बल्कि फलों के आकार और मिठास में भी सुधार किया।
रेगिस्तानी और गर्म देशों जैसे सऊदी अरब, कुवैत या यूएई में मिट्टी की उपजाऊ क्षमता सीमित है और जल संसाधन भी कम हैं। वहां के किसान कम सिंचाई वाली खेती के साथ जैविक खाद का प्रयोग करना चाहते हैं। भारतीय गोबर उनकी इस जरूरत को सस्ते और व्यवहारिक रूप में पूरा करता है।
रासायनिक उर्वरकों से उत्पादित अनाज और फल में नाइट्रेट की मात्रा बढ़ने से कैंसर व अन्य रोगों का खतरा साबित हुआ है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट में भी रासायनिक खेती के दुष्प्रभाव पर चेतावनी दी गई है। इसलिए अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देशों में भी ऑर्गेनिक फर्टीलिज़ार की मांग लगातार बढ़ रही है, जिसमें भारतीय गोबर एक विश्वसनीय विकल्प बन चुका है।
दरअसल भारत का गोबर केवल कृषि उत्पाद नहीं, बल्कि पारंपरिक उपयोग से भी जुड़ा है दीवार लेपन, पूजा सामग्री, पर्यावरण-अनुकूल उत्पाद (गोबर के दीये, ब्रिक्स, धूप आदि)।
भारत से गए उपले या पाउडर का उपयोग सिंगापुर, मालदीव और नेपाल जैसे देशों में धार्मिक आयोजनों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी किया जाता है।
कुछ देशों में हिंदू समुदाय के मंदिर गोवर्धन पूजा या दीपावली के समय भारत से आयातित गोबर उपले मंगाते हैं।
आर्थिक और भविष्य की संभावनाएं
भारत में गोबर आधारित स्टार्टअप और बायो फर्टिलाइजर यूनिट्स का विस्तार तेजी से हो रहा है।गोबरधन योजना के तहत देश की कई ग्राम पंचायतें अपशिष्ट से ऊर्जा और आय अर्जित कर रही हैं।एक अनुमान के मुताबिक़ 2030 तक गोबर निर्यात 400 करोड़ रुपये से अधिक हो सकता है। जैविक फसल उत्पादन के साथ यह ग्रीन ब्रांड इंडिया की पहचान को और मजबूती देगा।
बुंदेलखंड ही नहीं देश में एक समय किसानों के जीवन, आय और खेती में गौ वंश गहरा प्रभाव था । यह परंपरा खेतों की उर्वरा शक्ति बढ़ाने का साधन थी, जिसे दुनिया के देश भी मान रहे हैं , पर बुंदेलखंड सहित देश के अनेक क्षेत्रो में किसान अब गोवंश को हानि का कारण मानने लगा है ।लेकिन मशीनीकरण और आर्थिक रूप से गोवंश को हानिप्रद मानकर किसान ऐसे पशुओं को स्थायी रूप से छोड़ने लगे हैं ।यही खुले में छूटे गोवंश से आज के दौर में बुंदेलखंड के ग्रामीण त्रस्त हैं |
यही लाखों अन्ना पशु खेतों में घुसकर फसलों को बर्बाद कर देते हैं। छतरपुर ,टीकमगढ़ , पन्ना ,दमोह , झांसी, ललितपुर और बांदा जिलों में ही हर साल हजारों एकड़ खेती चौपट होती है ।
कई किसान रातभर खेतों की रखवाली करने को मजबूर हैं, जिससे उनकी श्रम उत्पादकता, स्वास्थ्य और आमदनी प्रभावित हो रही है।कुछ किसानों ने तो इस विपत्ति के कारण खेती ही छोड़ दी है ।
हालांकि बुंदेलखंड के लगभग प्रत्येक जिले में गौशालाएँ हैं, लेकिन उनकी क्षमता सीमित है। जबकि खुले में घूमने वाली गायों की संख्या उससे कई गुना अधिक है ।इस समस्या से निपटने के लिए कुछ क्षेत्रों में किसानों ने सामूहिक पहल भी की है , ललितपुर और महरौनी क्षेत्रों में किसानों ने गांव में अन्ना पशुओं को एक स्थान पर चरने की व्यवस्था की है , जिससे फसलें भी बचीं और गायों को भी भूख से मुक्ति मिली ।
गोवंश के इस अर्थ तंत्र को सही ढंग से एमपी ,यूपी में लागू किया जाए तो यह किसानों के लिए कुछ अवसर भी लेकर आ सकता है | गोबर और मूत्र से जैविक खाद तैयार कर बेचने की व्यवस्था की जा सकती है।यदि इसे सामूहिक चराई, बायोगैस संयंत्र, और जैविक उर्वरक इकाइयों से जोड़ा जाए तो यही संकट किसान आय वृद्धि का साधन भी बन सकता है। पंचायत स्तर पर गोबरधन क्लस्टर या बायोगैस इकाइयां स्थापित कर अन्ना पशुओं को संसाधन में बदला जा सकता है।
गोबर बेचकर आय बढ़ा सकते हैं किसान
ग्रामीण किसान अब केवल दूध बेचने तक सीमित नहीं हैं वे गोबर से भी आय बढ़ा सकते हैं। भारत में कई राज्य सरकारें, डेयरी बोर्ड और सेल्फ-हेल्प ग्रुप किसानों से गोबर खरीदकर खाद, बायोगैस, लकड़ी और अन्य उत्पाद बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं।
राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड ने गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, राजस्थान, ओडिशा और बिहार में 15 कंप्रेस्ड बायोगैस प्लांट स्थापित करने का निर्णय लिया है।इन प्लांट के लिए किसानों से सीधे पशुओं का गोबर खरीदा जाएगा। इससे किसान गोबर बेचकर प्रति माह हजारों रुपये कमा सकते हैं ।गोबर से वर्मी कंपोस्ट (जैविक खाद) तैयार कर किसान अपने या पड़ोसी खेतों में बेच सकते हैं। कई राज्यों में सरकारें और पंचायतें खुद किसानों से यह खाद खरीदती हैं।कई किसान हर महीने 20–30 क्विंटल वर्मी कंपोस्ट तैयार कर ₹2–3 लाख तक सालाना आय अर्जित कर रहे हैं ।
मध्य प्रदेश के मऊगंज जिले में गोबर से लकड़ी बनाने की यूनिट स्थापित की गई है, जहाँ दो रुपये प्रति किलो के हिसाब से गोबर खरीदा जाता है।100 पशुओं की एक गो शाला एक साल में 7 लाख तक की कमाई कर सकती है। ये लकड़ियाँ अंतिम संस्कार और भट्ठी ईंधन दोनों में प्रयुक्त होती हैं । सीधी जैसे जिलों में गोबर से मूर्तियां, गमले, अगरबत्ती स्टैंड और सजावटी हस्तशिल्प बनाए जा रहे हैं।प्रशिक्षण के लिए वन विभाग और स्वयं सहायता समूह ग्रामीणों की मदद करते हैं। केवल ₹4–5 हजार प्रारंभिक लागत से कोई भी व्यक्ति यह काम शुरू कर सकता है ।
आज देश गोबर को कचरे के बजाय आर्थिक संपत्ति में बदलने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।एक किसान अगर 4–5 दुधारू पशु रखता है तो औसतन माह में 3000–7000 तक शुद्ध आय प्राप्त कर सकता है।सरकार की राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड की गोबरधन योजना की बायोगैस पहल और स्थानीय हस्तनिर्मित उत्पाद इन सभी से भविष्य में ग्रामीण आत्मनिर्भरता को नई गति मिलने वाली है। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में गोबर का निर्यात एक नया आय स्रोत बन सकता है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा। यदि भारत सरकार गोबर आधारित उत्पादों के निर्यात को प्रोत्साहन दे, तो यह ग्लोबल ग्रीन ट्रेड में भारत की भूमिका को मजबूत कर सकता है।
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