बुंदेलखंड में दशहरा का पान
रवीन्द्र व्यास
उत्सव धर्मिता में बुंदेलखंड जैसी मिसाल और कहीं कम ही देखने को मिलती है । परम्पराओं के पर्वो में बुंदेलखंड के लोग शायद अपने कष्टो का निदान तलाश लेते हैं । खेत पर अन्न से परिपूर्ण फसलों के समय जब नवरात्र आते हैं तो बुंदेलखंड कोना कोना ऐसा लगता है मानो किसी धर्म स्थल पर आ गए हों । दशहरा के दिन शुभता की तलाश और रावण दहन के बाद लोगों का एक दूसरे से गले मिलना ,रोरी लगाना और पान का बीड़ा एक दूसरे को खिलाना देख कर यही लगता है मानो शुभता और संस्कृति की यही डोर है जो दुनिया से भारत देश को अलग पहचान दिलाये है । वीरता और विजय के प्रतीक विजयदशमी के दिन बुंदेलखंड में अस्त्र -शस्त्र के पूजन की परम्परा सदियों से चली आ रही है ।
बुंदेलखंड में दशहरा मनाने का भी अपना एक अलग अंदाज है । इस दिन की शुरुआत भी अपने तरह की अनोखी होती है । सुबह से लोग इस प्रयास में रहते हैं की कुछ शुभ दर्शन हो जाए , घर के जेठे {बुजुर्ग } फरमान जारी करते हैं की देखो मछली लेकर आया है , दर्शन कर लो , जाकर देखो कहीं नीलकंठ देख आओ । पूछने पर बताया जाता है की इनके दर्शन शुभ होते हैं साल भर शुभ रहता है । नहाने _ धोने के बाद तैयार हो जाओ पूजन करना है , उठाओ हथियार और उन्हें साफ़ करो उनकी पूजा होनी है । अरे आज दशहरा है सौंप सुपाड़ी , लौंग ,लायची , चूना कत्था पान का कोई इंतजाम हुआ की नहीं । कुछ मिठाई वगैरह बनाई की नहीं ,नहीं तो बाजार से ले आओ ।समी के दर्शन पूजन करना है । ये आवाजे दिन भर सुनने को बुंदेलखंड के घरो में मिलती है । नीलकंठ को भगवन शिव का सबसे प्रिय पक्षी माना जाता है । मान्यता है की भगवान् राम के आराध्य देव भी भगवान् शिव हैं और शिव के प्रिय पक्षी नीलकंठ के दर्शन से हर कार्य में विजयश्री मिलती है । भगवान् राम ने भी रावण वध के पूर्व नीलकंठ के दर्शन करने का उल्लेख मिलता है ।
शाम को रावण दहन के बाद उसी रात या दूसरे दिन या ये कहें कई दिनों तक दशहरा मिलन का कार्यक्रम चलता रहता है । मेल मिलाप के इस दौर में पान खिलाना आवश्यक माना जाता है । बुंदेलखंड की पुरानी रियासतों में इस परम्परा का आज भी राजशी अंदाज में निर्वाहन होता है । छतरपुर रियासत के राज परिवार के वा विधायक विक्रम सिंह उर्फ़ नाती राजा बताते हैं की हमारी रियासत में आजादी के पूर्व 11 जागीरें थी , दशहरा के दूसरे दिन सभी जागीरों के लोग यहां आकर मिलते हैं , एक दूसरे को पान भेंट किया जाता है । यह सब भाईचारे का प्रतीक है ।
राजनगर महाविद्यालय के प्राचार्य और साहित्यकार बहादुर सिंह परमार बुंदेलखंड में दशहरा के पर्व के सम्बन्ध में बताने लगे की यह पर्व वीरता का एक उत्सव है , इसे वीरो का पर्व भी कहते हैं , इस दिन अस्त्र -शस्त्र की पूजा होती है ,और आज भी पुलिस के हथियारों का इस दिन पूजन होता है । पान खिलाने की परम्परा के पीछे बीडा ( पान) उठाने की बात चंदेलो के समय से इस इलाके में चली आ रही है । राज दरबार में पान के बीड़ा रखे जाते थे , युध्द में जाने लिए बीडा उठाया जाता था , जो यह बीड़ा उठाता था यह माना जाता था की वह युध्द भूमि में जाने को तैयार है । दशहरा का पर्व ऋतू परिवर्तन का भी सूचक है वर्षा ऋतू के बाद शरद ऋतू इसी से शुरू होती है , चूँकि वर्षा ऋतू में युध्द नहीं हो पाते थे इस कारण इस समय युध्द के लिए राजाओं की सेना कूच करती थी । पान की इस परम्परा का उल्लेख अनेक समकालीन ग्रंथो में मिलता है ।
बुंदेलखंड के प्रमुख साहित्यकार सुरेंद्र शर्मा शिरीष बताते हैं की बुंदेलखंड में पान का पान का अपना एक अलग महत्व है , धर्म कर्म से लेकर आदर और निरादर तक में इसकी भूमिका है । भगवान् को पान चढ़ाया जाता है , बगैर पान के पूजा अधूरी मानी जाती है । इसी तरह राज दरबार में अपने अतिथि के स्वागत में पान खिलाने की परम्परा रही है । दसहरा में पान एक दूसरे को देना और ख़िलाना सम्मान का सूचक है । बुंदेलखंड में तो एक कहावत है "बीडा उठाना " किसी कार्य को करने के संकल्प लेना ,बीड़ा (पान) उठाकर ही लिया जाता रहा है । पान का पत्ता मान सम्मान का तो प्रतीक है ही साथ ही यह , असत्य पर सत्य का बीड़ा उठाने का संकल्प भी दर्शाता है । यह अलग बात है की आज के में सत्य का बीड़ा सिर्फ दिखावे के लिए रह गया है ।


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