रवीन्द्र व्यास
छतरपुर दो नवम्बर :अभी तक: वर्षा ऋतू की विदाई और शरद ऋतू
के आगमन
के साथ ही छतरपुर नगर में एक
नव उल्लास और उत्साह से सरोबोर होने की परम्परा पिछले 175 वर्षों से
चली आ रही है । रियासत काल में उमंग और
उत्साह का यह मेला जल बिहार श्रावण द्वादसी से शुरू होता था और तीन दिन तक चलता था । चूँकि यह
वर्षा काल का समय रहता था इस कारण बाद में
अश्वनी शुक्ल से ( दशहरा के
दो दिन बाद ) लगने लगा था । यह परम्परा आज भी जीवन्त बानी हुई
है और आज
यह मेला जलबिहार छतरपुर के छत्रसाल चौराहे के निकट मैदान पर लगता है । यह अलग बात है की नगर के बुद्धि हीन विकास पुरुषो ने मेला की भूमि को नष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी ।
छतरपुर मेला जल बिहार के सम्बन्ध में प्रामाणिक दस्तावेज बताते हैं की इस मेला जल बिहार का शुभारम्भ छ्हतरपुर
रियासत के महाराज प्रताप सिंह के शासन काल में ( 1816 —1854 ) के
दौरान हुआ । पहले यह
मेला राजमहल परिसर
के आसपास लगता था । मेला में विभिन्न देवालयों के देवो के विमान मेला में गाजे बाजे के साथ आते थे । उन्हें भक्तिपूर्वक स्थापित किया
जाता था , स्वयं महाराज आकर देवो की
पूजा कर मेला की शुरुआत करते थे । इस दौरान रात्रि में अखंड कीर्तन और भजन, कथा प्रवचन , रामलीला,, नाटक , नौटंकी , नृत्यगान चलते
रहते थे । देवों
के विमानों की साज सज्जा के आकर्षण की
होड़ लगती थी । रियासत के
प्रशासनिक जानकरी से लोगों को अवगत
कराने के लिए विभिन्न विभागों की प्रदर्शनी भी लगाईं जाती थी । इसमें कौन
से विभाग का मंडप सर्वश्रेष्ठ
है इसकी प्रतियोगिता होती थी ।
मेला
में क्षेत्र ही नहीं बल्कि देश की प्रसिद्ध गायिकाएं और
नृत्यंगनाये , बुलाई जाती थी
। नृत्य गायन का
आंनद लेने आसपास का बड़ा जनसमूह जुटता था । सारा माहौल रस और लावण्य और भक्ति
के सागर में सराबोर रहता था । । मेला में सर्कस, झूला, मौत का कुआ नाटक मण्डली खेल तमाशे वाले लोगों के विशेष आकर्षण का केंद्र होते थे । इस अवसर पर होने वाले कुशती दंगल में दूर दूर से पहलवान भाग लेने आते थे , मेला के
अंतिम दिन होने
वाली आतिशबाजी प्रतियोगिता विशेष आकर्षण का केंद्र होती थी । मेला
में छतरपुर ही नहीं दूर दराज के दुकानदार अपनी दुकाने लगाते थे लगभग
हर तरह की दुकाने लगती थी ।
समय
और बढ़ती आबादी के साथ राजमहल परिसर के आस पास का स्थान मेला के हिसाब से काम लगने लगा , जगह की कमी को देखते हुए १९५१ -१९५२ में इसे महराजा क्लब मैदान में स्थानांतरित कर दिया गया । आजादी के पहले तक जहां इस मेला का आयोजन छतरपुर रियासत द्वारा किया जाता था ,वहीँ आजादी के बाद शासन और
जनप्रतिनिधियों की एक कमिटी द्वारा आयोजित किया
जाने लगा । जिसे मेला जल बिहार कमेटी के
नाम से जाना जाता था , जिसमे जिला कलेक्टर ही प्रायः इसके अध्यक्ष होते थे । शुरुआत में
मेला की अवधि सात दिन थी जिसे बढ़ाकर १५ दिवस किया गया । मेला में
आने वाले देवालयों के विमानों की
संख्या भी धीरे धीरे घटने लगी और सिर्फ
एक विमान तक सीमित होकर रह गई ।
मेला
कमेटी के प्रबंध
काल में मेला
जल बिहार को
और आकर्षक बनाने
के लिए कई
और विधाए जोड़ी गई
। विभागों की
प्रदर्शनी , अखिल भारतीय
कवि सम्मेलन , मुशायरा
, लोक नृत्य , लोक
गीत , सैर सम्मेलन
, संगीत प्रतियोगिता , सांस्कृतिक प्रतियोगिता की
शुरुआत की गई
। कवि सम्मलेन
और मुशायरा की
ख्याति सम्पूर्ण बुंदेलखंड और
विंध्य इलाके तक फैली
, जिसमे देश के
नामी कवियों ने
इस मंच से
रचना पाठ कर
जल बिहार मेला
का गौरव बढ़ाया
।
शैल चतुर्वेदी,
निर्भर हाथरशी ,काका हाथरशी
, गोविन्द व्यास, नीरज ,सोम
ठाकुर , अशोेक चक्रधर , कुवंर
बेचैन , ,शिशु पाल
सिंह, बलबीर सिंह,
आनंद मिश्रा ,वीरेंद्र
मिश्र, माणिक वर्मा, चंचल,
इन्दीवर, बालकवि बैरागी , ओम
प्रकाश आदित्य, नूतन कपूर
और किरण भारतीय
जैसे ख्याति नाम इस
मंच पर अपनी
रचना पाठ कर
चुके हैं ।
इस
मंच पर संगीत सम्मलेन के दौर में देश के प्रसिद्ध शहनाई वादक बिस्म्मिला खां , बांसुरी वादक रघुनाथ सेठ , गायिका श्रीमती निर्मिला देवी , कत्थक नर्तक गोपीकृष्ण , मुशायरे में बेकल उत्साही , कैफ भोपाली ,शमीम जयपुरी , खुमार बाराबंकी , बशीर बद्र, बशीम बरेलवी , मलिकजदा मंजूर ,सक्लन हैदर, फानी निजामी, सागर आजमी, बाली आसी, कृष्ण बिहारी नूर , राहत इंदौरी , अंजुम रहबर, नसीम नख्त ,और समसी मिनाई जैसे कलाकार और रचनाकार अपनी विधा का प्रदर्शन कर यहां के रसिक श्रोताओं का मन मोह चुके हैं ।
1969 -1972 में नगर
पालिका अध्यक्ष प. श्रीनिवास शुक्ल ने नगर के प्रतिष्ठित और वरिष्ठ कवियों वा साहित्यकारों को सम्मानित करने की परम्परा शुरू की थी , बाद में इसे बुंदेलखंड तक कर दिया गया ।१९७४ से इस मेला जल बिहार की सम्पूर्ण व्यवस्था का दायित्व नगर पालिका को सौंपा गया , तभी से मेला जल बिहार का आयोजन नगर पालिका करती चली आ रही है ।
अतीत
की इस सुनहरे आयोजन को आधुनिक जनप्रतिनिधियों बनाम नेताओं , धर्म के कारोबारियों ने नेस्तनाबूद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । जिस माहराज क्लब के मैदान पर यह मेला आयोजन की जगह सुनिश्चित की गई थी , उसी स्थान पर प्रशासन ने कई सरकारी इमारतें खड़ी कर दी । बची खुची
भूमि को बर्बाद करने का काम बीजेपी शासन काल में तत्कालीन नगर
सुधार न्यास अध्यक्ष राम स्वरुप खरे ने
शुरू किया
था , जिसे नगर के जागरूक नागरिकों ने कुछ समय के लिए रुकवा दिया था । बाद में यहाँ की नगर पालिका ने इस
जगह दुकाने बनवाकर जान विरोध
को दरकिनार कर दिया । वर्तमान नगर
पालिका अध्यक्ष अर्चना सिंह इसमें और
दो कदम आगे निकल कर यहां निर्माण कार्य करवाकर मेला भूमि को समाप्त करने के लिए संकल्पबद्ध हैं ।
छतरपुर नगर पालिका परिषद इस बार भी मेला के आयोजन में जुटी है । नगर पालिका इस बार भी मेला को भव्यता प्रदान करने की बात कर रही है । नगर पालिका सीमित होते मैदान में कैसे इसे भव्यता प्रदान करेगी
यह तो वह ही जाने । ये अलग
बात है की नगर के
इस मेला के विस्तार के लिए जन पर्तिनिधियो और प्रसासन कुछ नहीं किया । ना ही बाहरी व्यापारियों को बुलाने की कोई योजना है ना ही कर में छूट की कोई योजना शासन के सामने रखी । मेला में
होने वाले आयोजनो में कवि , सम्मलेन और मुशायरे में भी कवि और
शायर बुलाने का आयोजको का अपना गणित है , तू मुझे बुला में तुझे बुलाऊंगा । राई की
फूहड़ता के नाम पर जुड़ने वाली भीड़ को मेला आयोजक अपनी सफलता मानने लगे हैं ।
छतरपुर नगर के भूगोल को देखा जाए तो नगर की
बढ़ती आबादी के बीच नगर
के मध्य में यही एक मात्र सार्वजनिक
मैदान सिकुड़ते -सिकुड़ते बचा था , जहाँ तमाम तरह
के आयोजन किये जा सकते थे । उसे भी हमारे तथाकथित जान सेवक नष्ट करने में जुटे हैं , नेताओं की कृपा से जिला के अधिकारी का पद पाने वाले प्रशासनिक अधिकारी इस तमाशे पर मौन रहना ही अपनी कर्तव्य निष्ठा समझते हैं । अपने सामर्थ्य और शौर्य
को गँवा चुका जन मानस भी यह सवाल नहीं कर सकता की नगर के
इस ऐतिहासिक मेला मैदान को समाप्त कर मेला किस जगह ले जा कर लगाओगे ? कल के दिन कोई किसी जाति विरादरी का अधिकारी और न्याय की कुर्सी पर आसीन हो जाए तो यह
मेला ग्राऊँड किसी
समाज के नाम हो जाए तो भी अचम्भा नहीं होगा । वोट के लिए अपने जमीर को गिरवी रखने वाले नेता तब भी
यही कहेंगे भाई वाह क्या अच्छा कार्य हुआ है ।
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