Bundelkhand Dayri_Bunkar

बुंदेलखंड की डायरी :
 वीरान होती बुंदेलखंड के बुनकरों की बस्तियाँ 
रवीन्द्र व्यास 
बुंदेलखंड के बुनकरो की बस्तियां भी वीरान हो रही हैं ।अंग्रेजो की चरखा विरोधी रीति -नीति से लोहा लेने वाले बुनकर
 अपनी ही सरकार से हार गए हैं । प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी अपने संसदीय इलाके बनारस में बुनकरों के इस कारोबार को 
बचाने जी जान से जुटे हैं । दूसरी तरफ बुंदेलखंड के लुप्त होते इस परम्परागत खादी और वस्त्र उद्योग को बचाने की 
चिंता किसी को नहीं है । चाहे वे इस इलाके से चार बार चुनी गई सांसद उमा भारती , वे केंद्र में  मंत्री भी हैं 
या कांग्रेस शासन काल में मंत्री रहे प्रदीप जैन ही क्यों ना हो । सियासत के ये पुरोधा अपनी सियासत में तो व्यस्त
 रहे पर बुंदेलखंड के इस कुटीर उद्योग की समस्याओ की तरफ किसी का ध्यान नहीं गया । और ना ही इनलोगों ने 
जरुरत समझी इस उद्योग को जीवन देने की । 
      बुनकरों ने हालातों से हारकर हाथकरधा कबाड़ में फेक  दिए हैं |जिन हाथों में सृजन की ऐसी कला थी की 
सामन्य से वस्त्रों में कला के रंग से सराबोर कर देते थे आज उनके हाथ मिटटी से सने हैं और गेंती फावड़ा लेकर 
मजदूरी को मजबूर हैं  । यह स्थिति तब बनी जब देश में गांधी के नाम पर शासन करने वालों ने गांधी के कुटीर
 उद्योगों के सपने को कुचला । सरकार के इस कुचक्र के कारण  छतरपुर जिले का सरसेड ,हरपालपुर और झाँसी जिले 
का रानीपुर का यह कुटीर उद्योग बर्बाद हो गया है । 
           मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के एक छोटे से गाँव सरसेड में आज से तीस साल पहले कोई सौ से ज्यादा  
हथकरधा , लगे थे । 40  लोगों ने पावर लूम की छोटी -छोटी इकाईयां लगा रखी थी । इस कारोबार से यहां के डेढ़ सौ 
से ज्यादा परिवारों के 1500 लोगों का जीवन इससे चलता था ।  यहां के बुनकर कच्चा माल  झांसी के रानीपुर से लाते
 थे और रानीपुर टेरीकॉट के नाम से कपड़ा बना कर रानीपुर के ही बड़े व्यापारियों को बेच आते थे । कुछ सीधे बाजार
 में भी बेच देते थे । दरअसल इनके पास इतना पैसा नहीं होता था की ये कच्चा माल  और बने हुए कपडे का स्टॉक 
कर सकें । फायदा बहुत ज्यादा ना होने के बावजूद एक हथकरधा से पांच से सात लोगों का रोजगार चलता था । जिससे
 इनके जिंदगी की गाडी मजे से चलती रहती थी । 
                                                                                                                 तीस साल पहले गुलजार रहने वाला यह गाँव बढ़ती आबादी के बावजूद भी बेरौनक हो गया है ।
 यहांआज के हालात में चार पांच हथकरधा भी नहीं चल पा रहे हैं । बुनकरों में ज्यादातर लोग मजदूरी की तलाश में 
पलायन कर गए हैं ।

                देश में रानी पर टेरीकाट के नाम से बड़े -बड़े  कपड़ा मिल मालिकों की नींद हराम करने वाला झांसी  
जिले के रानीपुर के बुनकरों की दशा भी अब किसी से छिपी नहीं है । रानीपुर के बुनकरों के इस कारोबार को संजीवनी 
देने का प्रयास जरूर शुरू हो गया है । केंद्रीय सूक्ष्म ,लघु वा मध्यम उद्योग मंत्रालय ने रानीपुर हथकरधा उद्योग की 
एक डी एस आर (डायग्नोस्टिक स्टडी रिपोर्ट ) तैयार करवाई है । जिसमे यहां डाइंग प्लांट ,साइजिंग मशीन वा केलेंडरिंग 
मशीन और अन्य जरुरी संसाधन स्थापित किये जाएंगे । बुनकरों को आधुनिक पद्धति से वस्त्र निर्माण और उनके विक्रय
 के गुर सिखाये जाएंगे । इन सब पर आठ करोड़ रु खर्च किये जाएंगे । जिसमे  बुनकरों को दस फीसदी अंश दान देना 
होगा । यहां के दो सौ से ज्यादा बुनकरों ने सरकार के इस प्रस्ताव पर अपनी सहमति भी जाता दी है ।      
                                  रानीपुर  अपने हथकरधा उद्योग के कारण बुंदेलखंड ही नहीं देश में अपनी एक अलग पहचान बनाये था ।
 उस दौर में कपड़ा व्यापारी अपनी दुकान पर " रानीपुर टेरीकॉट  यहां मिलता है " का बोर्ड लगा कर ग्राहकों को अपनी और आकर्षित
 करते थे । कभी यहां पांच हजार हथकरधा  हुआ करते थे । उद्योग पर ग्रहण लगा और यह संख्या सेकड़ो में सिमट गई ।  यहां ढाई सौ 
 से ज्यादा हाथ करधा  ,पावरलूम मशीने रोजाना 50 हजार मीटर रानीपुर टेरीकॉट का कपड़ा बनाते थे । यहां के 20 हजार परिवारों के 
रोजगार और जीवन को चलाने वाले इस कारोबार को ग्रहण तब लगा  जब से देश में बड़े उद्योगपतियों के कदमो में सरकार पलक पांवड़े
 बिछाने लगी । एक योजना बद्ध तरीके से इस उद्योग को नष्ट किया गया । क्योंकि इस "रानीपुर टेरीकॉट '" ब्रांड के नाम से सस्ता  और अच्छा कपडा कपड़ा उद्योग के बड़े मिल मालिको को बेचैन कर रहा था ।  
                                      पर यह रानीपुर के बुनकरों की जीवटता का ही परिणाम है की उन्होंने  हालातों से हार नाही मानी । 
आज भी वे तोलिया(गमछा ) चादर  जैसी कई रोजमर्रा के वस्त्रों के सृजन में जुटे हैं । काम काम हुआ तो लोग ने  मजदूरी की तलाश 
में पलायन भी पलायन भी किया तो कुछ ने यहीं अपना रोजगार तलाश लिया । 
                                      बुनकरों में कपड़ा निर्माण के दौरान एक शब्द का इस्तेमाल हमेशा होता है "ताना -बाना " । कपड़ा 
निर्माण का यह ताना बाना दरअसल  यहां की जीवन शैली का भी तना बाना था।  इस के चलते ही यहां बुनकर ही नहीं  छीपी , रंग रेज 
, धोबी ,माल ढोने वाले और व्यापारियों का भी आपस में ताना बाना जुड़ा रहता है ।  इस उद्योग पर ग्रहण लगा तो इन लोगों की जीवन
 शैली पर भी असर हुआ । रोज के हजारो कमाने वाले ये लोग भी दो जून की रोटी को मोहताज हो गए , ये अलग बात है की व्यापारी ने 
कपड़ा का ब्रांड बदलकर अपने को इस संकट से उबार लिया । किन्तु इसी पर आश्रित लोगों की दशा तो आज भी नेताओं के लिए भले ही चिंतनीय ना हो किन्तु समाज से सरोकार रखने वाले लोगों के लिए चिंतनीय है । 
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