05 दिसंबर, 2015

RAM_LOK

-राम लोक की एक संवेदना है ::डॉश्यामसुन्दर दुबे



छतरपुर। 5 दिसम्बर 15
देश के प्रसिद्ध साहित्यकार एवं लोकसंस्कृतिविद्, कवि, लेखक, मनीषी डॉ. नर्मदा प्रसाद गुप्त की स्मृति में प्रसंग नर्मदा आयोजन समिति द्वारा सरस्वती महाविद्यालय के सभागर में आयोजित डॉ. नर्मदा प्रसाद गुप्त व्याख्यान माला के अंतर्गतलोक में रामपर बोलते हुए वरिष्ठ साहित्यकार एवं लोकसंस्कृति के अध्येता डॉ. श्यामसुन्दर दुबे ने कहा कि लोचन से जो कुछ अवलोकित किया जा रहा है, वह सभी लोक है। संस्कृत में लोक का अर्थ हम जो भी अवलोकित कर रहे हैं, वह सभी लोक है। शास्त्र की रचना लो के बाद हुई। लोक शास्त्र से बड़ा जेठा है। डॉ. गुप्त की स्मृतियों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि गुप्त जी का वैदुष्य, गुप्त जी का शोध सर्वेक्षण का तरीका, गुप्त जी का लोकसंस्कृति के प्रति समर्पण विलक्षण था।
मुक्तिबोध पीठ के निदेशक प्रो. डॉ. श्याम सुन्दर दुबे ने कहा कि राम लोक की एक संवेदना है। वे लोक में इतने रमे हुए हैं कि वे लोक का दुख-दर्द, जय-पराजय सब अपने में समेटे हैं। किसी भी रचना में जब इतनी ताकत जाये कि वो हमारा संरक्षण करने लगे तब वह दैवीय हो जाती है। राम का चरित्र पूरब से पश्चिम तक, उत्तर से दक्षिण तक सर्वत्र फैला हुआ है। जन्म से लेकर मृत्यु तक पूरे लोक में राम विद्यमान रहते हैं
 अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में पूर्व प्राचार्य डॉ. हरिश्चंद्र शर्मा ने सफल कार्यक्रम के लिए आयोजकों को बधाई देते हुए डॉ. गुप्त के बारे में विभिन्न विद्वानों की सम्मतियाँ सुनाईं। समिति के अध्यक्ष डॉ. बहादुर सिंह परमार ने डॉ. श्यामसुन्दर दुबे का परिचय देते हुए उन्हें सारस्वत व्यक्तित्व का धनी बताया। डॉ. गुप्त के सानिध्य में अपने दिनों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि बुंदेलखण्ड को पूरे भारत में प्रसिद्ध दिलाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान था।
            वरिष्ठ अधिवक्ता नारायण काले ने कहा कि प्रो. दुबे के द्वारा लोक में राम विषय को लेकर दिये गये व्याख्यान को सुनकर मैं अभिभूत हूँ। सुरेंद्र शर्माशिरीषने भी डॉ. गुप्त के संस्मरण सुनाये। विशिष्ट अतिथि अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक नीरज पाण्डेय ने अपनी चिर-परिचित शैली में कहा कि लोक का महत्व अधिक है। लोकतंत्र हो, प्रशासन हो, कोई भी क्षेत्र हो। लोक का समावेश सभी जगह विद्यमान है। .आई.जी. श्रीमती रश्मि पाण्डेय ने आयोजन की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए कहा कि आज शास्त्र के राम को स्थापित किया जा रहा है, जबकि लोक के राम को स्थापित किया जाना चाहिए। विशिष्ट अतिथि नपाध्यक्ष श्रीमती अर्चना सिंह ने अपने उद्बोधन में कहा कि इतना सुन्दर व्याख्यान सुनकर बहुत आल्हादित हूँ। व्यावहारिकता से जीवन चलता है, किताबों से नहीं। राम का चरित्र जीवन में बहुत उपयोगी है। मैं दादा जी से मिली तो नहीं हूँ, लेकिन उनकी स्मृति में आयोजित कार्यक्रमों में भागीदारी से मैंने उनके व्यक्तित्व कृतित्च को समझा है।
            मुख्यअतिथि का दायित्व निर्वहन कर रहीं छतरपुर विधानसभा की विधायक श्रीमती ललिता यादव ने गुप्त जी के सानिध्य को उल्लखित करते हुए कहा कि गुप्त जी ने बुन्देली संस्कृति भाषा को जीवन पर्यंत उन्नत किया, मैं उनके चरणों में नमन करती हूँ। मुझे डॉ. गुप्त का आशीर्वाद हमेशा मिलता रहा। डॉ. दुबे के व्याख्यान की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि ऐसा अद्भुत विश£ेषण राम के बारे में मैंने इससे पहले कहीं नहीं सुना। प्रो. दुबे ने लोक में राम की व्यापकता को नई ऊँचाईयाँ दीं। सीता की वेदना को भी अभिव्यक्त कर दिया। हम सभी को लोक में राम को समझना होगा। लोक में विवाह के समय लडक़े-लडक़ी को राम-सीता के रूप में ही देखा जाता है। उन्होंने आयोजन समिति को संबल प्रदान करते हुए कहा कि कि ऐसे आयोजन होते रहना चाहिए।

 आभार प्रदर्शन करते हुए समिति के प्रधान संरक्षक सरदार प्यारा सिंह ने सभी उपस्थितों का आभार ज्ञापित करते हुए कहा कि इतना अच्छा व्याख्यान मैंने पहले कहीं नहीं सुना, इस हेतु डॉ. दुबे बधाई के पात्र हैं। ऐसे कार्यक्रमों को गति मिलती रहे यही मेरी कामना है। कार्यक्रम में नगर के साहित्यकार, सुधीजन महाविद्यालय स्टाफ मौजूद रहा।

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