09 दिसंबर, 2015

Mid Day Meal_

मिड डे मील का सच---हाँथ में खाना लेकर खाने को मजबूर बच्चे
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राजेन्द्र सिंह
लवकुश नगर/छतरपुर
जहाँ सूबे के मुखिया शिवराज सिंह के समर्थक  प्रदेश में उनके कार्यकाल के 10सफल वर्ष पुरे होने का जश्न मना रहे हैं  वो प्रदेश के हर बच्चे बच्चियों को अपना भांजा भांजी मानते है। केंद्र से लेकर राज्य सरकार शिक्षा व्यवस्था के स्तर सुधरने के लाख दावे करती है,भले ही मध्याह्न भोजन यहाँ तक की बच्चों को दूध  पिलाने की व्यवस्था  लागू की गयी है, लेकिन छतरपुर जिले के लवकुशनगर ब्लॉक के  पंचमनगर प्राथमिक शाला के 120 बच्चे पिछले 5- 6वर्षों से भिखारियों की तरह  हाँथ में खाना लेकर खाने को  मजबूर हैं |
ये तस्वीरें किसी भंडारे या लंगर का नही है ये नजारा है एक शासकीय प्राथमिक शाला का जहाँ पर अध्यनरत 120 छात्र कुछ इस तरह से भोजन करते है न कोई बिछौना न ही कोई बर्तन ,हाँथ में रोटियां ,घर से कटोरी ले आये तो दाल या सब्जी उसी में ले  ली नहीं तो सुखी रोटी ही सही ,आखिर पेट भरना है ,इस दृश्य को देख कर शायद ही कोई माँ बाप अपने बच्चों को इस तरह खाने दे लेकिन यहाँ ये सिलसिला पिछले 5 -6वर्षों से चला आ रहा है ,लेकिन किसी ने  भी इस ओर ध्यान नहीं दिया , मासूम बच्चों पूनम ,रूबी ,सोनू आदिवासी ,शनि आदिवासी,देशराज आदिवासी से जब हम रूबरू हुए तो उन बच्चों को कुछ पता ही नहीं उन्हें तो बस इसी तरह खाना खाने की आदत है, और हो भी क्यों न जब यहाँ के ग्रामीण और इन बच्चों के अभिभावक अपने और अपने बच्चों के अधिकारों के बारे में नहीं जानते या फिर जानकर भी अपनी आवाज नही उठाते और अपनी वही लकीर की फ़क़ीर जिंदगी जीने में मस्त हैं तो भला ये मासूम क्या जाने।
इस संबंध में जहाँ हेड मास्टर राज किशोर सिंह का कहना है की 6 वर्ष पहले यहाँ बर्तनो की चोरी हो गयी थी और उसके बाद कई बार अधिकारीयों से इस बारे में कहा गया लेकिन अभी तक कोई व्यवस्था नही की गई  है।

वहीँ ग्रामीणो का अपना तर्क है ,माध्यमिक शाला के पी टी ए अध्यक्ष कमलकिशोर यादव के अनुसार कभी बर्तनो की चोरी हुई ही नहीं हुई
जब हमने इस सम्बन्ध में,बी आर सी सी मोमिन खान से बात की तो उनका कहना था की मुझे इस बात की जानकारी ही नहीं सभी जगह बर्तनों के लिए पर्याप्त राशि भेजी गयी थी।
वही  जब हमने इस गंभीर मुद्दे को  जनपद पंचायत के सी ई ओ  प्रतिपाल सिंह बागरी के सामने  रखा तो उन्होंने  मामले को गंभीरता से लेते हुए पंचायत के मद से थालियों की व्यवस्था कराने की बात की है ,
जाहिर है बेहद ही पिछड़े आदिवासी बाहुल्य इस गाँव में कोई भी अधिकारी या जनप्रतिनिधि   सुध लेने नहीं जाता अगर जाता होता तो जो प्रदेश के मुखिया अपने को इन बच्चों का मामा कहते है उनके  ये भांजे भंजियां एक शासकीय संस्था इतने लंबे अरसे से इस तरह भिखारियों के माफिक भोजन करने को मजबूर नहीं होते, बहरहाल कब ये व्यवस्था सुधरेगी इसका हमें भी इन्तजार रहेगा ।




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