27 दिसंबर, 2015

Bundelkhand Dayri_ Talab



बुंदेलखंड की डायरी 
   सिमटते बुंदेलखंड के चंदेली तालाब 
रवीन्द्र व्यास 
        
·         बुंदेलखंड में जल सहेजने की परम्परा हजारों वर्ष पुरानी है | इस इलाके हजारों की संख्यामें तालाब  गौंड और चंदेल शासकों द्वारा  बनवाए गए | जल सहेजने के लिए बने ये तालाब आजभी  अपने निर्माण की कारीगरी के कारण लाजबाब हें | इन इलाकों से होने वाला सिचाई सिस्टमभी आज के ज्ञानीध्यानी इंजीनियरों के लिए शोध का विषय है | तालबों से भूमि की नमी औरजल स्तर बना रहता था | आज इनके विनाश से नमी भी गायब हुई और जल स्तर भी नीचे पहुँचगया | ये स्थिति तब है जब लोगों को पता है की आधिकांश शहरों को पीने के पानी के लिए भी तालबों पर आश्रित रहना पड़ता है । बदलते  वक्त के सुविधा भोगी समाज ने समाज के लिएजीवन दाई सरोवरों से कोई सरोकार वर्षों तक नहीं रखा | जिस समाज को इन सरोवरों को सुरक्षितऔर संरक्षित रखना चाहिए था वही इसका दुश्मन बन बैठा | परिणाम ये हुए की सैकड़ों की संख्यामें ये तालाब नष्ट  हो गए | 
·          ,
 बुंदेलखंड का अधिकाँश इलाका ऐसी भूमि पर बसा है जहाँ का बड़ा भाग पथरीला  है , यहाँ सालभर बहने वाली नदियों का भी अभाव रहा ,एसे में यहाँ रोजगार के मुख्य साधन कृषि को लेकरएक बड़ी समस्या का सामना यहाँ के लोगो को करना पड़ता था \ तब के शासकों ने इसकासमाधान खोजा | उन्होंने बडे स्तर पर तालाबों की श्रंखला बनाई और अकेले बुंदेलखंड इलाके में 2100 से ज्यादा तालाब बनाये गए | क्योंकि की यहाँ की भू -संरचना इस तरह की है की तालाबबनाना ज्यादा आसान था | तालाबों के बनवाने से एक बड़ा लाभ यहाँ के कुओं को हुआ उनका जलस्तर बढ गया , तालाब से बनी नहरों से खेत तक पानी पहुँचने लगा और लोगो को इसका लाभ मिलने  लगे ,|
·    तालाबों के निर्माण की इंजीनियरी ,
इन तालाबों का निर्माण किसी तकनीक ज्ञान प्राप्त इंजीनियरों ने नहीं की थी बल्की यहाँ केकारीगरों और शिल्पियों की रचना थी , जो अपने अनूठे शिल्प के कारण जाने जाते थे | हरतालाब को एक दूसरे तालाब से इस तरह से जोड़ा गया था की के बूंद भी बेकार ना जाये |  येसिस्टम् समय के साथ बर्बाद हो गए | तालाब का बंधान पत्थरों  को आपस में इंटर लॉकिंग सिस्टम से से बनाया जाता था ।  ये सिस्टम   सदियाँ  बीतने के बाद भी यथावत है । 
·तालाबों की उपेक्षा के कारण क्या हालात बने ,
तालाबों पर कंक्रीट के जंगल खडे कर दिए गए | इनमे गंदी नालियों को जोड़ दिया गया | परिणामये हुआ की तालाबों का विशाल आकार कहीं सिमटा तो कहीं बिलकुल ही ख़त्म हो गया | जोतालाब जल स्तर बनाए रखते थे , उनकी उपेक्षा के कारण गाँव ,शहर का जल स्तर घट गया |छतरपुर जिले के  बिजावर कसबे के लोग बताते हें की यहाँ आज से  ४० साल पहले कुँए की  जगती पर खड़े होकर बाल्टी  भर लेते थे | जब से तालबों की दुर्दशा हुई है और लोगों ने टयूब वेलसे पानी उलीचना शुरू किया है , तब से पानी निकालने के लिए सौ हाथ की रस्सी लगने लगी है |शहरों में तो दशा और भी भयानक है , जल स्तर घटने के कारण लोगों के हेंड पम्पों ने भी जबाबदेना शुरू कर दिया है |
बुंदेलखंड का इलाका ग्रेनाईट चट्टानों पर बसा  है | यही कारण है की यदि यहाँ सौ दो सौ  फिट तक पानी मिल जाए तो ठीक वरना पानी नहीं मिलता | तालाबों के विनाश के कारण पानी काजल स्तर हर साल गिरता जा रहा है | भूमि से नमी गायब होने के कारण बड़ी संख्या में हरे भरेपेड़ सूख रहे हें ,।  हमीरपुर इलाके में तो भूमि से नमी ख़त्म होने के कारण धरती ही फट गई थी |
 सरोवर क्यों ? 
· पानी ही वो द्रव्य है जो  लोगों के जीवन का आधार तो है ही ,साथ ही इसी से जुडी है समाज की अर्थ व्यवस्था | बुंदेलखंड इलाके में इस अनमोल  जल से नाता तोड़ने का अभिशाप  यहां के लोग भोग रहे हैं ।  चार-पांच साल के  निरंतर सूखे और प्राकृतिक प्रकोप के  कारण यहाँ का किसानआत्म ह्त्या करने को मजबूर होता है |
        
·                  ·         इन सबके मूल में यदि  देखा जाये तो  बुंदेलखंड में इस सामजिकसमीकरण को सदियों पहले पहचाना गया था , | बुंदेलखंड म की भू -संरचना को देख कर इसकाइंतजाम तालाब से किया गया ,तालाबों को इस हिसाब से बनवाया गया  की उसमे ज्यादा सेज्यादा जल भराव हो सके | जिसका लाभ किसानो को इससे निकली नहरों से मिले , और  भू जलस्तर बना रहे जिसका लाभ भी किसानो को मिले | तालाबों को इस तरह से बनाया जाता था कीहर तालाब एक दूसरे से जुड़ा रहे ताकि पानी की कोई बूंद व्यर्थ ना जाये |
·         बुंदेलखंड की पारंपरिक संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं ‘तालाब। आम बुंदेली गांव कीबसावट एक पहाड़उससे सटे तालाब के इर्द-गिर्द हुआ करती थी। बुंदेलखंड  के टीकमगढ़, छतरपुर ,पन्ना , दमोह ,सागर , महोबा , बांदा ,हमीरपुर , ललितपुर , झाँसी  जिले केतालाब नौंवी से 12वी सदी के बीच वहां के शासक रहे चंदेल राजाओं की तकनीकी सूझबूझ केअद्वितीय उदाहरण है। कालांतर में बुंदेलखंड  में 2100 से अधिक चंदेल कालीन तालाब हुआ करतेथे। कुछ को समय की गर्त लील गई और कुछ आधुनिकीकरण की आंधी में ओझल हो गए।
        
 कालिदास की तरह "जिस डाल पर बैठे उसी को काट डालने की कहावत को मानव समाज नेचरितार्थ किया | समाज के जो पहरेदार थे वे सोते रहे या सोने को मजबूर रहे | परिणाम ये हुआकी तालाबों में पानी नहीं बचा , और तालाबों से रिचार्ज होने वाले कुओं और नलकूपों ने भी जबाबदे दिया | अब हालात बने हें प्यास लगने पर कुआँ खोदने के ,। 

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