13 दिसंबर, 2015

Bundelkhand Dairy_

बुंदेलखंड की डायरी 
 बीहड़ में बदलता बुंदेलखंड 
रवीन्द्र व्यास 

 बीहड़ का नाम सुनते ही आम जन मानस में भय व्याप्त होता है । पर अब यही बीहड़ बुंदेलखंड इलाके में दिन बा दिन बढ़ते जा रहे हैं । कहा जा सकता है की धरा से लेकर आकाश तक प्रकृति बुंदेलखंड से रूठी हुई है । कभी वर्षा , कभी सूखा ,कभी पाला तो कभी ओला से त्रस्त है यहाँ का किसान । नदी कछारों के तटीय इलाको के  किसान बड़ते बीहड़ों से चिंतित हैं । जिस सरकार की ओर वह आशा भरी नजरों से देख रहा है उसकी स्थिति कुछ ऐसी है कि  " हालत देख परिस्थितियों का मूल्यांकन  करने की परम्परा ना हमारे देश के नौकर शाहों में रही और ना ही राजनेताओं में ।प्यास लगने पर कुआँ खोदने की इस परम्परा का निर्वाह करते हुए ,  जब हालात बिगड़ जाते हैं और बेकाबू हो जाते हैं तब बनती है इस देश में योजना । लगभग ऐसा ही हाल बुंदेलखंड इलाके में देखने को मिल रहा जहां तेजी से बीहड़ फैलते जा रहे हैं भूमि बंजर होती जा रही है , पर इस भीषण समस्या की तरफ किसी का भी ध्यान नहीं है । नेता और अधिकारी शायद तब जाग्रत होंगे जब बीहड़ के कारण गाँव के गाँव साफ़ होने लगेंगे ।  
                     बुंदेलखंड के मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के इलाके में बीहड़ तेजी से बढ़ रहे हैं । हालांकि मध्य प्रदेश के  सागर , छतरपुर , पन्ना , टीकमगढ़ का एक बड़ा भू भाग पठारी क्षेत्र है जब की उत्तर प्रदेश  का अधिकाँश इलाका मैदानी है ।  बीहड़ की जब बात आती है तो चम्बल के बीहड़ो का ही जिक्र आता है, वहां मौजूद बीहड़ों की  रोक थाम के सारे प्रयास बौने साबित हुए हैं । किन्तु बुंदेलखंड इलाके के चित्रकूट , हमीरपुर , बांदा , महोबा , झांसी ( गरौठा ), ललितपुर,छतरपुर, पन्ना , टीकमगढ़ जिले में पनपते बीहड़ों की तरफ किसी का ध्यान नहीं है । 
                     अपने पिछले कार्य काल में छतरपुर_टीकमगढ़  के बीजेपी सांसद ने सदन में बुंदेलखंड में फैलते बीहड़ों की बात उठाई थी । सांसद वीरेंद्र खटीक ने संसद में बताया था , की पिछले बीस वर्षो में इस इलाके में तेजी से भू क्षरण हुआ है , जिसके कारण छतरपुर जिले में  धसान और केन नदी के आस-पास डेढ़ लाख एकड़ ,पन्ना जिला में 50 हजार एकड़ ,टीकमगढ़ जिला में 12 हजार एकड़ , दतिया जिला में 70 हजार एकड़ और दमोह जिला में 62 हजार एकड़ जमीन बीहड़ो में बदल रही है । जिसके कारण इस इलाके के 471 गाँवों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है । 
मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड  इलाके से कहीं ज्यादा  भयावह हालात उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके के हैं । चित्रकूट में तेजी से बनते बीहड़ों के कारण यह इलाका डकैतों का सुरक्षित ठिकाना रहा है । बांदा , महोबा , झाँसी , उरई ,जालौन, और हमीरपुर जिलों में भी बीहड़ों का फैलाव  तेजी से बढ़  रहा  है । बेतवा और यमुना से घिरा हमीरपुर जिला  एक ऐसे मुहाने पर खड़ा है जिसकी  आम आदमी कल्पना भी नहीं कर सकता है । भू - वेत्ताओ की यदि माने तो हमीरपुर के हालात वाकई चिंता जनक हैं ।  दोनों नदियों  और इससे मिलने वाली सहायक नदी और मौसमी नालों के कारण इस जिले में बीहड़ बनने की दर दो प्रतिशत आंकी गई है । जबकि राष्ट्रीय पैमाने पर देश में हर साल 0. 5  फीसदी की दर से ८ हजार एकड़ भूमि बीहड़ों में बदल रही है । 
बीहड़ बनने की अपनी एक अलग कहानी है , पिछले कुछ समय से  विकाश के नाम पर सरकार और समाज ने प्रकृति से नाता तोड़ लिया है । जंगलों को तेजी से काटा गया है।  संयुक्त राष्ट्र की सितम्बर 2015 में जारी  रिपोर्ट के अनुसार पिछले 25 सालों में देश में दक्षिण अफ्रीका के क्षेत्रफल के बराबर जंगल नष्ट हो चुका है । बुंदेलखंड इलाका भी इससे अछूता नहीं रहा है , कभी बाँध के नाम पर , कभी सड़क के नाम पर तो कभी  शहरों की सुंदरता और विस्तार के नाम पर ,। इन सबके  अलावा  खेतों के विस्तार के नाम पर वन भूमि के जंगल  साफ़ कर खेत बनाये गए ।  जो धरा  हरियाली के श्रृंगार से सजी थी उसके श्रृंगार को उजाड़ने का अभिशाप यह हुआ की वर्षा का पानी अपने साथ बड़ी तादाद में मिटटी बहा ले गया । असमतल  जमीन  होने के कारण  जगह -जगह से पानी बहने लगता  , जो धीरे धीरे नाली  और फिर  उसी से  जमींन पर दर्रे  दर्रे बनने  के कारण  कालांतर में गहरी घाटी नुमा बन जाती है । इन दर्रों का पानी जब गहरी घाटी  से गहराई की ओर (नदी)  बहता  है तो उस समय  मिटटी भी  खिसकती है । पानी के इस तीव्र्व बहाव के कारण नदियों के किनारे  की जमीन  बीहड़  में बदलने लग जाती  हैं । वर्षा काल में और खासकर बाढ़ के हालात में स्थिति और विकराल हो जाती है । 
                                                     बुंदेलखंड इलाके  में  केन , बेतवा , यमुना , धसान , उर्मिल , बाघिन , लखेरी , केल , श्यामरी , जामुनी  आदि नदियां  और  इनकी सहायक नदिया के वे तमाम  तट वर्ती इलाके जिनके किनारे  बंजर  और वीरान हैं  तेजी से बीहड़ो में बदल रहे हैं ।  इसमें सबसे प्रमुख है केन नदी के किनरे वाले इलाके ।  बेतवा , और यमुना का रौद्र प्रवाह , और इसमें मिलने वाले सहायक नदी के प्रवाह   उत्तर प्रदेश के इलाके को जहां  बीहड़ों में बदल रहें हैं , वहीँ गरौठा  कस्बे में निकली  लखेरी नदी  के किनारे  भी  बीहड़ों में बदल गए हैं । 
                                                    यहां  पनपने वाले बीहड़  सरकार और समाज के कृत्यों पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं । देखा जाए तो इन बीहड़ों से  सिर्फ उपजाऊ भूमि ही नष्ट नहीं होती , बल्कि  ये कई तरह की सामजिक समस्याओ को भी जन्म देती हैं । चम्बल के और चित्रकूट के बीहड़ इसके सबसे बड़े प्रमाण हैं जहा इन बीहड़ो के कारण डकैत पनपे  और आतंक के पर्याय बने ।  बीहड़ो में बसे  गाँव सामाजिक शोषण के पर्याय बने ।  बुंदेलखंड के बीहड़ों पर बनी  पहली फिल्म गोरैया"  में यहां के बीहड़ों में  महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों को दर्शाया गया है ।  
बीहड़ रोकने के प्रयास :- भू_ संरक्षण  विशेषज्ञ , और भू वेताओं की बातों पर यदि  अमल किया जाए  तो समस्या पर लगाम लग सकती है ।  जरुरत है ऐसे इलाकों में सघन वृक्षारोपण की ,  मेड बंधान , बनरहे बीहड़ो को  समतली करण की प्रक्रिया  , और मेड बंधान और  खेतों पर हरित पट्टिका बनाकर रोका जा सकता है । सामाजिक संस्था सोशल मीडिया फाउंडेशन ने इस दिशा में कुछ उपयोगी कार्य जनता को जाग्रत करने और  इन मुद्दों को समझाने का प्रयास तो  किया है ।  सरकार ने 1954 में बीहड़ो के सर्वेक्षण  सुधार की योजना को मंजूरी दी थी । योजना भी बनी ,  सुधार भी हुआ था  पर  फिर वही  अपने ढर्रे पर  चलने लगा । 1977 -1978 में मध्य प्रदेश की सरकार ने बीहड़ सुधार की योजना जरूर केंद्र को भेज कर भिंड , मुरैना ,ग्वालियर , दतिया  और छतरपुर जिले के एक लाख हेक्टेयर भूमि सुधार का प्रस्ताव दिया था ।मध्य प्रदेश  सरकार का  ये प्रस्ताव केंद्र के लाल बस्ते में दफ़न हो गए थे । जरुरत है  इसके लिए एक ऐसे अभियान की जिसमे सरकार के साथ सामाजिक जागरूकता हो  ताकि  बीहड़  उत्पन होने वाले हालातों पर भी रोक लगे । 



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