27 दिसंबर, 2015

बुंदेलखंड में ठण्ड से तीन  की मौत 

दमोह /छतरपुर /
बुंदेलखंड का इलाका इन दिनों शीत  लहर की चपेट में है । कड़ाके की ठण्ड में पिछले ६० घण्टे के दौरान दो लोगों की मौत हो गई । एक की मौत छतरपुर जिला अस्पताल में हुई । दमोह जिला में दो  की मौत खेत पर सिचाई करते समय हो गई । 

               दमोह जिला के  नोहटा थाना क्षेत्र के बम्होरी गांव  का   गन्नू यादव (35)  शुक्रवार की रात खेत  पर सिंचाई के लिए गया था । शनिवार की  सुबह बेहोश मिला । उसे  इलाज के लिए जिला अस्पताल लेकर आए जहां डॉक्टर ने मृत घोषित करदिया।  दमोह जिले के ही कुम्हारी थाना क्षेत्र के हाथीघाट बेलखेड़ी के  संतोष अहिरवार (30) की भी ठंड लगने से मौत हो गई । 

छतरपुर  जिला अस्पताल में  भद्दू पटेल (60 ) की मौत ठण्ड लगने से हो गई । उसे उसके परिजन १३ दिसंबर को जिला अस्पताल में इलाज के लिए लाये थे । इलाज के बाद उसे कोई लेने नही आया तब से वह यही  घूमता रहता था ।

Bundelkhand Dayri_ Talab



बुंदेलखंड की डायरी 
   सिमटते बुंदेलखंड के चंदेली तालाब 
रवीन्द्र व्यास 
        
·         बुंदेलखंड में जल सहेजने की परम्परा हजारों वर्ष पुरानी है | इस इलाके हजारों की संख्यामें तालाब  गौंड और चंदेल शासकों द्वारा  बनवाए गए | जल सहेजने के लिए बने ये तालाब आजभी  अपने निर्माण की कारीगरी के कारण लाजबाब हें | इन इलाकों से होने वाला सिचाई सिस्टमभी आज के ज्ञानीध्यानी इंजीनियरों के लिए शोध का विषय है | तालबों से भूमि की नमी औरजल स्तर बना रहता था | आज इनके विनाश से नमी भी गायब हुई और जल स्तर भी नीचे पहुँचगया | ये स्थिति तब है जब लोगों को पता है की आधिकांश शहरों को पीने के पानी के लिए भी तालबों पर आश्रित रहना पड़ता है । बदलते  वक्त के सुविधा भोगी समाज ने समाज के लिएजीवन दाई सरोवरों से कोई सरोकार वर्षों तक नहीं रखा | जिस समाज को इन सरोवरों को सुरक्षितऔर संरक्षित रखना चाहिए था वही इसका दुश्मन बन बैठा | परिणाम ये हुए की सैकड़ों की संख्यामें ये तालाब नष्ट  हो गए | 
·          ,
 बुंदेलखंड का अधिकाँश इलाका ऐसी भूमि पर बसा है जहाँ का बड़ा भाग पथरीला  है , यहाँ सालभर बहने वाली नदियों का भी अभाव रहा ,एसे में यहाँ रोजगार के मुख्य साधन कृषि को लेकरएक बड़ी समस्या का सामना यहाँ के लोगो को करना पड़ता था \ तब के शासकों ने इसकासमाधान खोजा | उन्होंने बडे स्तर पर तालाबों की श्रंखला बनाई और अकेले बुंदेलखंड इलाके में 2100 से ज्यादा तालाब बनाये गए | क्योंकि की यहाँ की भू -संरचना इस तरह की है की तालाबबनाना ज्यादा आसान था | तालाबों के बनवाने से एक बड़ा लाभ यहाँ के कुओं को हुआ उनका जलस्तर बढ गया , तालाब से बनी नहरों से खेत तक पानी पहुँचने लगा और लोगो को इसका लाभ मिलने  लगे ,|
·    तालाबों के निर्माण की इंजीनियरी ,
इन तालाबों का निर्माण किसी तकनीक ज्ञान प्राप्त इंजीनियरों ने नहीं की थी बल्की यहाँ केकारीगरों और शिल्पियों की रचना थी , जो अपने अनूठे शिल्प के कारण जाने जाते थे | हरतालाब को एक दूसरे तालाब से इस तरह से जोड़ा गया था की के बूंद भी बेकार ना जाये |  येसिस्टम् समय के साथ बर्बाद हो गए | तालाब का बंधान पत्थरों  को आपस में इंटर लॉकिंग सिस्टम से से बनाया जाता था ।  ये सिस्टम   सदियाँ  बीतने के बाद भी यथावत है । 
·तालाबों की उपेक्षा के कारण क्या हालात बने ,
तालाबों पर कंक्रीट के जंगल खडे कर दिए गए | इनमे गंदी नालियों को जोड़ दिया गया | परिणामये हुआ की तालाबों का विशाल आकार कहीं सिमटा तो कहीं बिलकुल ही ख़त्म हो गया | जोतालाब जल स्तर बनाए रखते थे , उनकी उपेक्षा के कारण गाँव ,शहर का जल स्तर घट गया |छतरपुर जिले के  बिजावर कसबे के लोग बताते हें की यहाँ आज से  ४० साल पहले कुँए की  जगती पर खड़े होकर बाल्टी  भर लेते थे | जब से तालबों की दुर्दशा हुई है और लोगों ने टयूब वेलसे पानी उलीचना शुरू किया है , तब से पानी निकालने के लिए सौ हाथ की रस्सी लगने लगी है |शहरों में तो दशा और भी भयानक है , जल स्तर घटने के कारण लोगों के हेंड पम्पों ने भी जबाबदेना शुरू कर दिया है |
बुंदेलखंड का इलाका ग्रेनाईट चट्टानों पर बसा  है | यही कारण है की यदि यहाँ सौ दो सौ  फिट तक पानी मिल जाए तो ठीक वरना पानी नहीं मिलता | तालाबों के विनाश के कारण पानी काजल स्तर हर साल गिरता जा रहा है | भूमि से नमी गायब होने के कारण बड़ी संख्या में हरे भरेपेड़ सूख रहे हें ,।  हमीरपुर इलाके में तो भूमि से नमी ख़त्म होने के कारण धरती ही फट गई थी |
 सरोवर क्यों ? 
· पानी ही वो द्रव्य है जो  लोगों के जीवन का आधार तो है ही ,साथ ही इसी से जुडी है समाज की अर्थ व्यवस्था | बुंदेलखंड इलाके में इस अनमोल  जल से नाता तोड़ने का अभिशाप  यहां के लोग भोग रहे हैं ।  चार-पांच साल के  निरंतर सूखे और प्राकृतिक प्रकोप के  कारण यहाँ का किसानआत्म ह्त्या करने को मजबूर होता है |
        
·                  ·         इन सबके मूल में यदि  देखा जाये तो  बुंदेलखंड में इस सामजिकसमीकरण को सदियों पहले पहचाना गया था , | बुंदेलखंड म की भू -संरचना को देख कर इसकाइंतजाम तालाब से किया गया ,तालाबों को इस हिसाब से बनवाया गया  की उसमे ज्यादा सेज्यादा जल भराव हो सके | जिसका लाभ किसानो को इससे निकली नहरों से मिले , और  भू जलस्तर बना रहे जिसका लाभ भी किसानो को मिले | तालाबों को इस तरह से बनाया जाता था कीहर तालाब एक दूसरे से जुड़ा रहे ताकि पानी की कोई बूंद व्यर्थ ना जाये |
·         बुंदेलखंड की पारंपरिक संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं ‘तालाब। आम बुंदेली गांव कीबसावट एक पहाड़उससे सटे तालाब के इर्द-गिर्द हुआ करती थी। बुंदेलखंड  के टीकमगढ़, छतरपुर ,पन्ना , दमोह ,सागर , महोबा , बांदा ,हमीरपुर , ललितपुर , झाँसी  जिले केतालाब नौंवी से 12वी सदी के बीच वहां के शासक रहे चंदेल राजाओं की तकनीकी सूझबूझ केअद्वितीय उदाहरण है। कालांतर में बुंदेलखंड  में 2100 से अधिक चंदेल कालीन तालाब हुआ करतेथे। कुछ को समय की गर्त लील गई और कुछ आधुनिकीकरण की आंधी में ओझल हो गए।
        
 कालिदास की तरह "जिस डाल पर बैठे उसी को काट डालने की कहावत को मानव समाज नेचरितार्थ किया | समाज के जो पहरेदार थे वे सोते रहे या सोने को मजबूर रहे | परिणाम ये हुआकी तालाबों में पानी नहीं बचा , और तालाबों से रिचार्ज होने वाले कुओं और नलकूपों ने भी जबाबदे दिया | अब हालात बने हें प्यास लगने पर कुआँ खोदने के ,। 

20 दिसंबर, 2015

bundelkhand Dairy_

बुंदेलखंड की डायरी 
गाँव वालों ने बना लिया तालाब

रवीन्द्र व्यास 
 बुंदेलखंड में  सरकार  के बनाये  तालाब भले ही सूखे और वीरान पड़े हो , पर मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले के  शुक्लान टौरिया गाँव के लोगों ने अपनी मेहनत और लगन से सूखे के हालात में भी गाँव का तालाब ,पानी से लबालब भर लिया है   पहाड़ के किनारे बसे इस गाँव तक पहुँचने के  लिए कोई पक्की  सड़क नहीं है  इसलिए नेता जी भी चुनावी मौसम में ही  यहां आते हैं   अस्सी परिवारों  वाले इस गाँव के लोगों को  जीवनदाई जल के  लिए भी भटकना पड़ता था । आज गाँव का यह तालाब उन्हें सूखे से लड़ने की शक्ति देता है । 

                                                       गाँव के एकलौते  चंदेलकालीन तालाब  में पानी ठहरता ही नहीं था  पहाड़ से जैसा पानी आता था वैसा ही कुछ समय बाद बह जाता था  गाँव वालों की दशा सागर किनारे मीन  प्यासी जैसी थी \ कल तक  जो तालाब सूखा रहता था  

अब  उसी तालाब में अटखेलियां करते बच्चो को देख हर  मन खुश  हो जाता है  अब गाँव वालों को पानी के लिए मीलों दूर नहीं जाना पड़ता   नहाने धोने से लेकर कपड भी अब इसी तालाब पर धुलते हैं   तो  प्यासे पशुओं की प्यास भी ये तालाब बुझा रहा है , वहीँ गाँव वालों की प्यास बुझाने के लिए इस तालाब ने  गाँव के कुओं का जल स्तर बड़ा दिया है   वो भी इस  सूखे के हालात में 
           गाँव के सूर्य प्रकाश शुक्ला  बताते हैं की उन्हें यह प्रेरणा पड़ोस के गाँव से मिली जहाँ गाँव वालों ने परमार्थ संस्था के सहयोग से तालाब बनाया  था । हमारे यहाँ तो तालाब था उसका भराव श्रोत भी अच्छा था किन्तु पानी रुकता नहीं था । हमने भी संस्था से सहयोग माँगा उन्होने  तालाब निर्माण का तकनीक ज्ञान और  सहयोग देकर गाँव वालों ने मिलकर  तालाब बनवाया ।  आज दो चार दस गाँव में पीने के लिए भी पानी नहीं है हमारे यहां आज भी पानी है। 
 गाँव वालों तालाब बंनाने के लिए गाँव की  बैठक की  तय किया की अब  किसी के सामने हाथ नहीं फैलाएंगे, बहुत फैला लिए सरकार और नेताओ के सामने हाथ अब  अपने बल से गाँव के तालाब को बनाएंगे  धन की कमी आपस में चन्दा जोड़ कर पूर्ण करेंगे    तालब से जिन लोगों के खेत तक तक पानी पहुंचेगा वे प्रति एकड़ चार सौ बारह रुपये देंगे  गाँव वाले के इस जज्बे को देख कर एक स्वयं सेवी  संस्था परमार्थ  ने तीन लाख  रुपये दे दिए   इस तरह तीन लाख तीस  हजार में  गाँव का तालाब बन कर तैयार हो गया ।इतना ही नहीं  गाँव के लोगों ने  इसके रख रखाव की भी  योजना बनाई है \  अब वे हर उस किसान से ५० _५० रु लेंगे जो इस तालाब के पानी का उपयोग सिचाई के लिए करेगा  इस पैसे से  रख रखाव किया जाएगा 
 । 
                                    बुंदेलखंड का टीकमगढ़ वह जिला है जहाँ 1100  से ज्यादा चंदेलकालीन तालाब  आज से हजार वर्ष पूर्व (12 वी सदी ) बनाये गए थे ,। सरकारी रिकार्ड में 995 तालाब दर्ज है , ।  जिनमे से पांच  सैकड़ा से ज्यादा तालाब गायब हो गए ,।  आज जब द्वार पर अकाल दस्तक दे रहा है , किसान मौत को गले लगा रहे हैं तब लोगों को अपने परम्परागत तालाबों की उपयोगिता समझ आ रही है । पर विडंबना यह देखिये की आम जन को तो तालाब का महत्व समझ आ रहा किन्तु  समाज के नीति निर्धारकों को इससे कोई सरोकार नहीं है । यहां तक की सरकार के रिकार्ड में यह पता ही नहीं है की कितने तालाब हैं । सिचाई विभाग के पास जरूर 40 हेक्टेयर से बड़े 88 चंदेल कालीन तालाब हैं । 40 हेक्टेयर से कम के 211  तालाब पंचायत ,नगर पंचायत और नगर पालिका को सौंपे गए थे ,36 राजस्व विभाग के पास ,55 आम निस्तारी और 26 निजी कास्तकारों के कब्जे में हैं । कुल 421 तालाबों के अलावा शेष 564 तालाबों का अस्तित्व समाप्त हो गया  जिन का रिकार्ड किसी के पास नहीं है ।   
        अधिकारियों ने धन की लालसा में लापता तालाबों की खोज नहीं की नए तालाबों का निर्माण की योजनाये बना कर काम शुरू किये गए । बुंदेलखंड पैकेज से सिचाई विभाग ने 6 नए तालाबों का निर्माण कर रहा है । बगाजमाता तालाब , टीलादांत ,करियापाठा ,बंजारी ,सतीघाट , बरुआनाला तालाब का निर्माण कर रहा है । इन तालाबों के निर्माण पर 15483.14 लाख रु व्यय होंगे । लोगों को विस्थापन की त्रासदी भोगना पड़ रही है सो अलग । 
                       ओरछा स्टेट का 1907 का  गजट बताता है की उस दौर में पांच लाख एकड़ से ज्यादा भूमि पर खेती होती थी , जिसमे डेढ लाख एकड़ भूमि की सिचाई इन तालाबों से होती थी । आज के हालात में जिले में  11 हजार हेक्टेयर की सिचाई तालाबों से होती है । तालाबों से नाता तोड़ने का ही परिणाम है वर्षा का अधिकाँश जल नदी नालों के माध्यम से बह जाता है , साथ ही बहा ले जाता है अपने साथ  जिले की उपजाऊ मिटटी , और तैयार करता है बीहड़ के निशा । गाँव -गाँव के भरे तालाब ना सिर्फ तापमान का संतुलन बनाते हैं बल्कि जमीन की नमी  और भू -जल स्तर भी बनाये रखते हैं । 
                      

18 दिसंबर, 2015

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बाघों को बचाने के लिए  कुत्तों का टीकाकरण 
रवीन्द्र व्यास 
छतरपुर  /  18 दिसम्बर 15/पन्ना टाईगर रिजर्व  के बाघों  को  कुत्तों  से बचाने  के लिए  कुत्तों  का  टीकाकरण अभियान जारी है ।  टाइगर रिजर्व  की सीमा से जुडे 15  गांव के 600  कुत्तों का अब तक टीकाकरण किया गया है ।टाइगर रिजर्व् में   पी -233 बाघिन की मौत  सीडीए ब्रेन वायरस के कारण हुई थी । उसके बाद से  पार्क प्रबंधन ने यह कदम उठाया है । कुत्तों को रेबीज तथा अन्य घातक बीमारियों से बचाव के टीके लगाए जा रहे हैं। 

                                                        क्षेत्र संचालक पन्ना टाईगर रिजर्व आलोक कुमार ने बताया कि दो दिसंबर से कुत्तों के टीकाकरण का कार्य प्रारंभ किया गया है। कुत्तों को रेबीज सहित केनाईन डिस्टेम्पर एवं 8 अन्य घातक बीमारियों से बचाव के टीके लगाए जा रहे है। जिससे टाईगर रिजर्व के वन्य प्राणियों से सम्पर्क में आने पर उनमें इन घातक रोगों का प्रकोप न हो।  ग्राम अकोला, अमझिरिया, बांधी, बराछ, झलाई, जरधोवा, इटवा, रमपुरा, तारा, डोभा, धनगढ, जनवार, बहेरा, मनकी एवं कटरिया के लगभग 600 कुत्तों का अब तक टीकाकरण किया जा चुका है। शेष लगभग 600 कुत्तों का भी टीकाकरण किया जा रहा है। टीकाकरण के फलस्वरूप पन्ना टाईगर रिजर्व के बाघ एवं अन्य प्राणी रेबीज सहित अन्य घातक बीमारियों से बचेंगे। इसके साथ साथ इन गांव के सभी कुत्तों को भी रेबीज से मुक्ति मिलेगी। उन्होंने आमजनता से टीकाकरण में सहयोग की अपील की है। 

13 दिसंबर, 2015

Bundelkhand Dairy_

बुंदेलखंड की डायरी 
 बीहड़ में बदलता बुंदेलखंड 
रवीन्द्र व्यास 

 बीहड़ का नाम सुनते ही आम जन मानस में भय व्याप्त होता है । पर अब यही बीहड़ बुंदेलखंड इलाके में दिन बा दिन बढ़ते जा रहे हैं । कहा जा सकता है की धरा से लेकर आकाश तक प्रकृति बुंदेलखंड से रूठी हुई है । कभी वर्षा , कभी सूखा ,कभी पाला तो कभी ओला से त्रस्त है यहाँ का किसान । नदी कछारों के तटीय इलाको के  किसान बड़ते बीहड़ों से चिंतित हैं । जिस सरकार की ओर वह आशा भरी नजरों से देख रहा है उसकी स्थिति कुछ ऐसी है कि  " हालत देख परिस्थितियों का मूल्यांकन  करने की परम्परा ना हमारे देश के नौकर शाहों में रही और ना ही राजनेताओं में ।प्यास लगने पर कुआँ खोदने की इस परम्परा का निर्वाह करते हुए ,  जब हालात बिगड़ जाते हैं और बेकाबू हो जाते हैं तब बनती है इस देश में योजना । लगभग ऐसा ही हाल बुंदेलखंड इलाके में देखने को मिल रहा जहां तेजी से बीहड़ फैलते जा रहे हैं भूमि बंजर होती जा रही है , पर इस भीषण समस्या की तरफ किसी का भी ध्यान नहीं है । नेता और अधिकारी शायद तब जाग्रत होंगे जब बीहड़ के कारण गाँव के गाँव साफ़ होने लगेंगे ।  
                     बुंदेलखंड के मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के इलाके में बीहड़ तेजी से बढ़ रहे हैं । हालांकि मध्य प्रदेश के  सागर , छतरपुर , पन्ना , टीकमगढ़ का एक बड़ा भू भाग पठारी क्षेत्र है जब की उत्तर प्रदेश  का अधिकाँश इलाका मैदानी है ।  बीहड़ की जब बात आती है तो चम्बल के बीहड़ो का ही जिक्र आता है, वहां मौजूद बीहड़ों की  रोक थाम के सारे प्रयास बौने साबित हुए हैं । किन्तु बुंदेलखंड इलाके के चित्रकूट , हमीरपुर , बांदा , महोबा , झांसी ( गरौठा ), ललितपुर,छतरपुर, पन्ना , टीकमगढ़ जिले में पनपते बीहड़ों की तरफ किसी का ध्यान नहीं है । 
                     अपने पिछले कार्य काल में छतरपुर_टीकमगढ़  के बीजेपी सांसद ने सदन में बुंदेलखंड में फैलते बीहड़ों की बात उठाई थी । सांसद वीरेंद्र खटीक ने संसद में बताया था , की पिछले बीस वर्षो में इस इलाके में तेजी से भू क्षरण हुआ है , जिसके कारण छतरपुर जिले में  धसान और केन नदी के आस-पास डेढ़ लाख एकड़ ,पन्ना जिला में 50 हजार एकड़ ,टीकमगढ़ जिला में 12 हजार एकड़ , दतिया जिला में 70 हजार एकड़ और दमोह जिला में 62 हजार एकड़ जमीन बीहड़ो में बदल रही है । जिसके कारण इस इलाके के 471 गाँवों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है । 
मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड  इलाके से कहीं ज्यादा  भयावह हालात उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके के हैं । चित्रकूट में तेजी से बनते बीहड़ों के कारण यह इलाका डकैतों का सुरक्षित ठिकाना रहा है । बांदा , महोबा , झाँसी , उरई ,जालौन, और हमीरपुर जिलों में भी बीहड़ों का फैलाव  तेजी से बढ़  रहा  है । बेतवा और यमुना से घिरा हमीरपुर जिला  एक ऐसे मुहाने पर खड़ा है जिसकी  आम आदमी कल्पना भी नहीं कर सकता है । भू - वेत्ताओ की यदि माने तो हमीरपुर के हालात वाकई चिंता जनक हैं ।  दोनों नदियों  और इससे मिलने वाली सहायक नदी और मौसमी नालों के कारण इस जिले में बीहड़ बनने की दर दो प्रतिशत आंकी गई है । जबकि राष्ट्रीय पैमाने पर देश में हर साल 0. 5  फीसदी की दर से ८ हजार एकड़ भूमि बीहड़ों में बदल रही है । 
बीहड़ बनने की अपनी एक अलग कहानी है , पिछले कुछ समय से  विकाश के नाम पर सरकार और समाज ने प्रकृति से नाता तोड़ लिया है । जंगलों को तेजी से काटा गया है।  संयुक्त राष्ट्र की सितम्बर 2015 में जारी  रिपोर्ट के अनुसार पिछले 25 सालों में देश में दक्षिण अफ्रीका के क्षेत्रफल के बराबर जंगल नष्ट हो चुका है । बुंदेलखंड इलाका भी इससे अछूता नहीं रहा है , कभी बाँध के नाम पर , कभी सड़क के नाम पर तो कभी  शहरों की सुंदरता और विस्तार के नाम पर ,। इन सबके  अलावा  खेतों के विस्तार के नाम पर वन भूमि के जंगल  साफ़ कर खेत बनाये गए ।  जो धरा  हरियाली के श्रृंगार से सजी थी उसके श्रृंगार को उजाड़ने का अभिशाप यह हुआ की वर्षा का पानी अपने साथ बड़ी तादाद में मिटटी बहा ले गया । असमतल  जमीन  होने के कारण  जगह -जगह से पानी बहने लगता  , जो धीरे धीरे नाली  और फिर  उसी से  जमींन पर दर्रे  दर्रे बनने  के कारण  कालांतर में गहरी घाटी नुमा बन जाती है । इन दर्रों का पानी जब गहरी घाटी  से गहराई की ओर (नदी)  बहता  है तो उस समय  मिटटी भी  खिसकती है । पानी के इस तीव्र्व बहाव के कारण नदियों के किनारे  की जमीन  बीहड़  में बदलने लग जाती  हैं । वर्षा काल में और खासकर बाढ़ के हालात में स्थिति और विकराल हो जाती है । 
                                                     बुंदेलखंड इलाके  में  केन , बेतवा , यमुना , धसान , उर्मिल , बाघिन , लखेरी , केल , श्यामरी , जामुनी  आदि नदियां  और  इनकी सहायक नदिया के वे तमाम  तट वर्ती इलाके जिनके किनारे  बंजर  और वीरान हैं  तेजी से बीहड़ो में बदल रहे हैं ।  इसमें सबसे प्रमुख है केन नदी के किनरे वाले इलाके ।  बेतवा , और यमुना का रौद्र प्रवाह , और इसमें मिलने वाले सहायक नदी के प्रवाह   उत्तर प्रदेश के इलाके को जहां  बीहड़ों में बदल रहें हैं , वहीँ गरौठा  कस्बे में निकली  लखेरी नदी  के किनारे  भी  बीहड़ों में बदल गए हैं । 
                                                    यहां  पनपने वाले बीहड़  सरकार और समाज के कृत्यों पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं । देखा जाए तो इन बीहड़ों से  सिर्फ उपजाऊ भूमि ही नष्ट नहीं होती , बल्कि  ये कई तरह की सामजिक समस्याओ को भी जन्म देती हैं । चम्बल के और चित्रकूट के बीहड़ इसके सबसे बड़े प्रमाण हैं जहा इन बीहड़ो के कारण डकैत पनपे  और आतंक के पर्याय बने ।  बीहड़ो में बसे  गाँव सामाजिक शोषण के पर्याय बने ।  बुंदेलखंड के बीहड़ों पर बनी  पहली फिल्म गोरैया"  में यहां के बीहड़ों में  महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों को दर्शाया गया है ।  
बीहड़ रोकने के प्रयास :- भू_ संरक्षण  विशेषज्ञ , और भू वेताओं की बातों पर यदि  अमल किया जाए  तो समस्या पर लगाम लग सकती है ।  जरुरत है ऐसे इलाकों में सघन वृक्षारोपण की ,  मेड बंधान , बनरहे बीहड़ो को  समतली करण की प्रक्रिया  , और मेड बंधान और  खेतों पर हरित पट्टिका बनाकर रोका जा सकता है । सामाजिक संस्था सोशल मीडिया फाउंडेशन ने इस दिशा में कुछ उपयोगी कार्य जनता को जाग्रत करने और  इन मुद्दों को समझाने का प्रयास तो  किया है ।  सरकार ने 1954 में बीहड़ो के सर्वेक्षण  सुधार की योजना को मंजूरी दी थी । योजना भी बनी ,  सुधार भी हुआ था  पर  फिर वही  अपने ढर्रे पर  चलने लगा । 1977 -1978 में मध्य प्रदेश की सरकार ने बीहड़ सुधार की योजना जरूर केंद्र को भेज कर भिंड , मुरैना ,ग्वालियर , दतिया  और छतरपुर जिले के एक लाख हेक्टेयर भूमि सुधार का प्रस्ताव दिया था ।मध्य प्रदेश  सरकार का  ये प्रस्ताव केंद्र के लाल बस्ते में दफ़न हो गए थे । जरुरत है  इसके लिए एक ऐसे अभियान की जिसमे सरकार के साथ सामाजिक जागरूकता हो  ताकि  बीहड़  उत्पन होने वाले हालातों पर भी रोक लगे । 



12 दिसंबर, 2015

Uma Bharti Tikamgarh

नेहरू गांधी परिवार अपने आपको देश के कानून से ऊपर मानता है :: उमा भारती 


छतरपुर  //  नेशनल हेराल्ड मसले पर संसद ठप्प है , और जब इस मसले पर आज टीकमगढ़ में पत्रकारों ने उमा भारती से सवाल किया तो उन्होंने दो टूक कहा की ये कानून का मसला है और नेहरू गांधी परिवार अपने आपको कानून और संविधान से ऊपर मानता है । वे  आज टीकमगढ़ अपनी मौसेरी बहिन के निधन के बाद उनके परिजनों को सांत्वना देने आई थी । 
                                  पत्रकारों से चर्चा करते हुए  उमा भारती ने कहा की ये कानून का मसला है और नेहरू गांधी परिवार अपने आपको कानून और संविधान से ऊपर मानता है । ये तो दुर्भाग्य पूर्ण है देश के लिए की देश के नेता जो चुनाव जीतते हैं वो अपने आपको कानून और संविधान से बड़ा मानते हैं । झाबुआ चुनाव में बीजेपी  की पराजय के सवाल पर उन्होंने  कहा की लोकतंत्र में हार जीत  लोकतंत्र की खूबी है । प्रदेश में फिर शिवराज के नेतृत्व में सरकार बनेगी ।

Waild Animal_Attack

भालू के हमले में सात घायल 


पन्ना  /12 दिसम्बर 15/ टाइगर रिजर्व एरिया से सटे  पन्ना नगर  में आज सुबह उस समय  अफरा तफरी मच गई  जब एक भालू  ने  कई व्यक्तियों पर हमला कर  सात व्यक्तियों को घायल कर दिया । पन्ना के रानीगंज मोहल्ला एवं ग्रामपुरूषोत्तमपुर में  भालू के हमले में  घायल लोगों को   उपचार के लिए जिलाचिकित्सालय में भर्ती किया गया  है। 
                                   आज सुबह हुए भालू के  हमलेमें रानीगंज के नत्थू खटीक गेंदा रानी खटीक, और पुरूषोत्तमपुर के  राजा कुशवाहाश्रीमती श्याम बाई ओमरे तिजिया बाई सुदामा प्रसाद निवासी  एवं  रामबाग के कमलदास जोशी घायल हो गए। घटना की जानकारी लगते ही वन विभाग तथापुलिस विभाग के अधिकारी मौके पर पहुंच कर  बचाव में जुट गए लोगों को घायल कर  भालू वापस विश्रामगंज रेंज के जंगलों की ओर चला गया  

 घटना की जानकारी लगते ही पन्ना कलेक्टर शिवनारायण सिंह ौहान ने  जिला चिकित्सालय पहुँच कर  घायलों का हालचाल जाना। उन्होंने घायलों  भरोषा दिलाया  कि भालू केहमले से   घायल हुए लोगों का   निःशुल्क   इलाज  होगा।  वन विभाग द्वारा निर्धारित मापदण्डों के अनुसार मुआवजा दिया जाएगा। 




विकास की उमंग और चुनौतियों के संघर्ष का बुंदेलखंड

  बुंदेलखंड की डायरी  विकास की उमंग और चुनौतियों के  संघर्ष का  बुंदेलखंड  रवीन्द्र व्यास  दो राज्य में बटे बुंदेलखंड के लिए    2025  में कई...