बुंदेलखंड की डायरी
कलेक्टर हटाने का विधायक का अल्टीमेटम दाखिले दफ्तर
रवीन्द्र व्यास
मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले का बिजावर विधानसभा क्षेत्र इन दिनों फिर सुर्ख़ियों में है | पुराने लोगों को 1965-67 का वह दौर याद आने लगा है जब प्रदेश में संविद सरकार बनी थी | संविद सरकार बनवाने में बुंदेलखंड के बिजावर के राजपरिवार की प्रमुख भूमिका थी | बिजावर ही वह जगह थी जहाँ कांग्रेस सरकार को उखाड़ फेंकने की सियासी रणनीति बनी थी | हाल ही में 2008 से 2013 के विधान सभा कार्यकाल में बिजावर तब सुर्ख़ियों में जब यहाँ की बीजेपी विधायक के समजावादी पति पर कानून का शिकंजा कसा था | अब फिर बिजावर सहित सम्पूर्ण छतरपुर जिला प्रदेश में राजनैतिक सुर्ख़ियों में है | असल में बिजावर के सपा विधायक राजेश शुक्ल सहित जिले के सभी कांग्रेसी विधायक मध्य प्रदेश सरकार के वर्तमान हालात और बेलगाम ब्यूरोक्रेसी को देख कर खफा हैं | इनकी नाराजगी मंत्री से कही ज्यादा यहां के कलेक्टर को लेकर है | छतरपुर कलेक्टर ने भी ऐसा दांव चला कि विधायक जी द्वारा हफ्ते भर का अल्टीमेटम सरकार ने दाखिले दफ्तर कर दिया |
समाजवादी पार्टी के प्रदेश के इकलौते विधायक राजेश शुक्ला ने पिछले दिनों छतरपुर के पत्रकारों से चर्चा में कहा था कि छतरपुर कलेक्टर का तबादला एक हफ्ते के अंदर हो जाएगा। इसके लिए मुझे भोपाल में डेरा डालना पड़े तो मै डालूगा। बिजावर विधायक ने कहा कि जिले में कलेक्टर विधायकों की अनुशंसा पर ही रहेंगे। यदि छतरपुर में किसी को कलेक्टरी करना है तो उन्हें विधायकों की बात सुननी पड़ेगी। अन्यथा वह इस जिले में नहीं रह पाएंगे। विधायक शुक्ला ने यह भी कहा कि प्रदेश में कमलनाथ के मंत्री विधायकों को महत्व कम दे रहे हैं| हफ्ता भर बीत गया विधायक जी के सूत्र बताते हैं कि जिले के सरकार समर्थक पांचो विधायकों ने मुख्य मंत्री से कलेक्टर को मोहित बुन्दस को जिले से हटाने की मांग की थी | विधायकों की कमलनाथ सरकार ने नहीं सुनी ,इसके पीछे भी सियासी कारण बताये जाए रहे हैं |
कांग्रेसी सियासत से जुड़े लोग ही बताते हैं की कलेक्टर मोहित बुन्दस के स्थानांतरण ना होने के पीछे कई कारण हैं | एक तो कलेक्टर मोहित बुन्दस अजाक्स जैसे संगठन से जुड़े हैं , उनकी छतरपुर में नियुक्ति एक सोची समझी सियासी रणनीति के तहत की गई थी | उनको यहां भेजने के पीछे जहां कांग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह का हाथ था वही अजाक्स के प्रमुख कंसोटिया जी का भी वरद हस्त था | इसके पीछे सियासी अतीत दोहराने की एक सोची समझी रणनीति है | यही कारण है कि पांच विधायकों ने जब मुख्य मंत्री से कलेक्टर के स्थानांतरण की बात तो साथ में की | बाद में दो विधायकों ने मुख्यमंत्री को यह भी बताया कि हम तो साथ आ गए हमें कलेक्टर से कोई आपत्ति नहीं है | दूसरी तरफ सरकार चलाने वाले रणनीति कारों ने कलेक्टर मोहित बुन्दस से विधयाकों के उन तमाम काले सफ़ेद कामो की सूचि भी एकत्र कर ली जो पिछले आठ माह में कराये गए | सूत्रों के अनुसार रणनीतिकारों ने यह सूचि सरकार के मुख्य सचिव के माध्यम से एकत्र की स्वयं मोहित बुन्दस ने यह सूचि मुख्य सचिव को सौंपी थी | बताते हैं की मुख्य सचिव ने सारी जानकारी मुख्य मंत्री को दी उसके बाद कलेक्टर को अभय दान प्राप्त हो गया |
कलेक्टर ही नहीं मंत्रियो के कामकाज से भी ख़फ़ा हैं विधायक :
सियासत का एक दौर था जब बुंदेलखंड के विधायकों के सवालों पर अच्छी अच्छी सरकारें कटघरे में खड़ी हो जाती थी | अब वह दौर देखने को मिल रहा है जब सरकार से जुड़े विधायक अपनी ही सरकार के मंत्रियों पर खुले तौर पर भ्रस्टाचार के आरोप लगा रहे हैं | हद तो तब हो जाती है जब सांसद के द्वारा मंत्रियो को पत्र लिख कर उनके कामकाज का हिसाब माँगा जाता है | कमरे के अंदर की ये बाते बाहर क्यों आती हैं ? ये सब क्यों होता है और किसके इसारे पर होता है यह सियासत के जानकार भली भाँती जानते हैं |
मध्यप्रदेश सरकार को समर्थन दे रहे इकलौते समाजवादी पार्टी के विधायक राजेश शुक्ला का साफ़ कहना है कि प्रदेश सरकार के कुछ मंत्रियों के कारण पूरी सरकार की छवि खराब हो रही हैं । ये आम चर्चा है कि ये मंत्री पैसा लेकर काम करते हैं । लोग बीजेपी सरकार जैसे भ्रष्टाचार की बात कहते हैं । उन्होंने बताया कि विधायक यदि इनको किसी कार्य का पत्र दे तो यह उस पर कार्य नहीं करते । वहीं कार्य यदि अधिकारी कहे तो तत्काल मंत्री जी कार्य करते हैं । यह यही साबित करता है कि ये मंत्री पैसा लेकर काम करते हैं । असल में ये कुछ मंत्री अपने आपको भगवान समझते हैं । पिछले कुछ दिनों में जिस तरह के विवाद के हालात सरकार के सामने बने उसमे राजेश शुक्ला कोई अकेले विधायक नहीं है जिन्होंने इस तरह के आरोप लगाए हैं | सत्ता धारी दल के कई विधायकों ने सरकार के मंत्रियों और प्रशासन के कामकाज को लेकर खुले तौर पर नाराजगी जताई है |
मध्यप्रदेश में कांग्रेस सरकार बनने के बाद बुंदेलखंड के लोगों को उम्मीद थी की एक बेहतर प्रशासनिक तंत्र वाला कामकाज लोगों को देखने को मिलेगा | पर जिस तरह का प्रशासनिक तंत्र लोगों को देखने को मिला उसने आम जन की उम्मीदों पर पानी फेर दिया | जिसकी एक बानगी लोक सभा चुनाव में देखने को मिली थी | हालांकि इस मामले में यह भी स्पष्ट है कि गलतिया अकेले प्रशासनिक तंत्र की नहीं मानी जा सकती है बहुत कुछ विधयाकों के व्यवहार और उनकी कार्य के प्रति वचनबद्धता पर भी निर्भर करता है | छतरपुर और बुंदेलखंड से चुने गए अधिकाँश विधायक जितने के बाद अपनी अपनी जातियों तक सिमट गए याहं तक तो ठीक था पर दूसरी जाति के लोग उन्हें दुश्मन नजर आने लगें यह उनके सियासी स्वास्थ्य के हिसाब से खराब ही कहा जा सकता है |
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