बुंदेलखंड की उपेक्षित जल सरचनाये
रवीन्द्र व्यास
बुंदेलखंड के उत्तर प्रदेश वाले इलाके के जिलों में प्रदेश सरकार ने सूखा से स्थाई राहत का रास्ता तलाशने का प्रयास किया है ।
उत्तर प्रदेश सरकार को शायद समझ आ गया है की पानी बगैर बुंदेलखंड में जीवन नहीं बचेगा । इसी को ध्यान में रख कर सरकार ने 2000 तालाब खुदवाने का फैसला किया है । सरकार के मुख्य सचिव आलोक रंजन की अध्यक्षता में शुक्रवार को हुई बैठक में यह निर्णय लिया गया ।हालांकि प्राचीन तालाबों और बुंदेलखंड की परम्परागत जल संरचनो की दशा सुधारने
की कोई योजना नहीं बताई गई है । बुंदेलखंड के लिए सरकार का यह निर्णय कितना लाभकारी होगा यह तो आने वाले समय में पता चलेगा । पर फिलहाल तात्कालिक जरुरत पानी है जिसके लिए सरकार को प्रयास करने की जरुरत है ।
उत्तर प्रदेश सरकार को शायद समझ आ गया है की पानी बगैर बुंदेलखंड में जीवन नहीं बचेगा । इसी को ध्यान में रख कर सरकार ने 2000 तालाब खुदवाने का फैसला किया है । सरकार के मुख्य सचिव आलोक रंजन की अध्यक्षता में शुक्रवार को हुई बैठक में यह निर्णय लिया गया ।हालांकि प्राचीन तालाबों और बुंदेलखंड की परम्परागत जल संरचनो की दशा सुधारने
की कोई योजना नहीं बताई गई है । बुंदेलखंड के लिए सरकार का यह निर्णय कितना लाभकारी होगा यह तो आने वाले समय में पता चलेगा । पर फिलहाल तात्कालिक जरुरत पानी है जिसके लिए सरकार को प्रयास करने की जरुरत है ।
उत्तर प्रदेश सरकार जो २००० तालाब बुंदेलखंड इलाके में बनवाएगी उसके लिए 50 फीसदीअनुदान देगी । मतलब साफ़ है तालाबों से जनता की भागीदारी को भी जोड़ा जा रहा है । ताकि जल संकट के प्रति हम जागृत हो , अपनी नदियों, तालाबों के लिए कुछ आस्था का भाव जाग्रत हो । ऐसा ना हो की इन तालाबों को सरकार का तालाब मान ले , और काम निकलने पर उसी का विनाश कर फसल बोने लगें |
पानीजिसकेबिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। बुंदेलखंड में एक बड़ा और अहम सवाल बन गया है ?
जिंदगी से पानी का जुड़ाव कितना है इसकी बानगी लोक कहावतो , भजनो , धर्म ग्रंथो और फ़िल्मी कथाओ में देखने सुनने को मिल जाती है । बुंदेलखंड में पानी के महत्व को सदियों पहले पहचान लिया गया था । इसी कारण बुंदेलखंड में गाँव -गाँव में जल संरचनाओं का विकाश और विस्तार किया गया । यह भी ध्यान रखा गया था कि यदि अपर्याप्त वर्षा हो तब कैसे इस समस्या से निपटा जाए । आज भी बुंदेलखंड की प्राचीन जल प्रबंधन प्रणाली देश में अनोखी मानी जाती है और इसको देखने और समझने देश के जल प्रबंधन से जुड़े लोग आते रहते हैं । ये अलग बात है की हमने अपनी नादानियों और स्वार्थो के चलते इनके विनाश में कोई कसर नहीं छोड़ी ।
बुंदेलखंड की परम्परागत जल संरचनाओं में निर्मल बहती नदी ,तालाब , कुए
और बावड़ी ही थे । इसके अलावा प्राकृतिक जल श्रोत जो आज भी रहस्य मय हैं । छतरपुर जिले का भीम कुण्ड कुण्ड , अर्जुन कुण्ड, जोगी दंड पन्ना जिले का बृहस्पति कुण्ड , टाइगर रिजर्व के अंदर का झलरिया महादेव का स्थान रहष्य मई जल श्रोत के केंद्र हैं।छतरपुर जिले में ही एक गाँव है नौगांव ब्लाक में एक गाँव है जोरन । इस गाँव के बारे में कहा जाता है की इस गाँव में कभी 84 कुए और 52 बावड़ी हुआ करती थी । आज यह गाँव भी जल संकट से जूझ रहा है ।
और बावड़ी ही थे । इसके अलावा प्राकृतिक जल श्रोत जो आज भी रहस्य मय हैं । छतरपुर जिले का भीम कुण्ड कुण्ड , अर्जुन कुण्ड, जोगी दंड पन्ना जिले का बृहस्पति कुण्ड , टाइगर रिजर्व के अंदर का झलरिया महादेव का स्थान रहष्य मई जल श्रोत के केंद्र हैं।छतरपुर जिले में ही एक गाँव है नौगांव ब्लाक में एक गाँव है जोरन । इस गाँव के बारे में कहा जाता है की इस गाँव में कभी 84 कुए और 52 बावड़ी हुआ करती थी । आज यह गाँव भी जल संकट से जूझ रहा है ।
पहाड़ों पर बने तालाब और कुण्ड यहां के लोगों के लिए किवदंतियों का मानो एक बड़ा खजाना है । चाहे वो अजयगढ़ के पहाड़ पर बने तालाब और कुण्ड हो या कालिंजर के पहाड़ पर बने तालाब और कुण्ड हों ।चित्रकूट की गुप्त गोदावरी ,हनुमान धारा , देवांगना , अनुसुइया ,बांके सिद्ध क्षेत्र ,आदि जल श्रोतो के बड़े केंद्र माने जाते हैं ।
यहां बहने वाली प्रमुख नदियों में केन , बेतवा , धसान , उर्मिल , पहुज , रिहंद ,जामनी, सहजाद , खापार ,बन्ने ,केवलारी , केल ,चंद्रावल ,अर्जुन.लहेरी ,बिरमा ,उत्तरी ,रोहणी ,श्यामरी , आदि नदियों पर बने बाँध भी बुंदेलखंड के वर्षा जल का 10 से 15 फीसदी जल राशि ही संरक्षित कर पाते हैं । 85 फीसदी पानी बह जाता है । देश में अग्रेजो का शासन आया उनके काल में बुंदेलखंड इलाके में बड़े -बड़े बाँध बनवाए गए । अकेले छतरपुर जिले में अंग्रेज शासकों ने पांच बाँध बनवाए थे । जिनका जल बुंदेलखंड इलाके में सिचाई के काम आता है । पर इन बांधों में खाश बात है बांधों की ऊंचाई नदी के तट लेबल से बहुत ज्यादा ऊँची नहीं रखी गई । नदी पर बने इन बांधों में अतरिक्त जल भंडारण के लिए बाँध के ऊपर लोहे के गेट बनवाए गए जो वर्षा काल के बाद खड़े किये जाते थे । इन बांधों की संरचना देख कर साफ़ होता है की बाँध से विस्थापन की समस्या भी ना के बराबर आई होगी । आजादी के बाद देश में कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए बुंदेलखंड में भी बड़े -बड़े बाँध बनवाए गए , हजारों लोग विस्थापित किये गए ।ज्यादा लागत के इन बांधों से सिचाई का रकबा तो बड़ा किन्तु यह उतना फायदे बंद नहीं रहा जितने की तालाब थे । और आज भी विस्थापन के दर्द से जूझ रहे हैं । विस्थापन से मिले पैसे चार दिन की चांदनी फिर अन्धेरी रात जैसे रहे । अपनी जमीन के ये मालिक कालान्तर में मजदूर बनने को मजबूर हुए ।
“सेव वाटर, वाटर विल सेव अस. कहने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मो दी ने 28 जून 2015 को “मन की बात” कार्यक्रम में वर्षा जल सं ग्रह की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए मानसून में लोगों से खेत का पानी खेत मेंगाँव का पानी गाँव में एवं शहर का पानी शहर में रोकने हेतु , वर्षा जल संग्रह करने की अपील जनता से की थी । प्रधान मंत्री की यह अपील जनता तो छोडो सरकार के प्रशासन तंत्र में कितनी कारगर रही इसकी मिसाल है इस बार का सूखा और जल त्रासदी । मध्य प्रदेश वाले इलाके मेंबुंदेलखंड पैकेज से बने 774 स्टॉप डेमो में 90 फीसदी ऐसे स्टॉप डेम हैं जिनमे प्रशासन तंत्र और उसकी जल उपभोक्ता समितियों ने फाटक लगाना ही जरुरी नहीं समझा । यह स्थिति तब बनी जब मौसम विभाग ने इलाके में कम वर्षा की चेतावनी दे दी थी ।
मध्य प्रदेश में एक दशक पहले शुरू किया गया था जलाभिषेक अभियान । इस अभियान के एक वर्ष की सफलता से उत्साहित मुख्य मंत्री सिंह ने कहा था की लोगों ने संरक्षण की अपनी परम्पराओ से जिस तरह खुद को जोड़ा है ,उसके अदभुत परिणाम दिखने लगे हैं । नई और पुरानी जलसंरचनो में छलकते जल बिंदु हमें विशवास दिला रहें हैं कि हम धरती की प्यास बुझा सकते हैं । मुख्य मंत्री जी का यह विशवास बुंदेलखंड इलाके में ही खंडित हो गया है । बुंदेलखंड इलाके में भी सैकड़ों की संख्या में किसानो के खेत पर तालाब कागजों में दर्शाये गए ,यही तालाब यदि यथार्थ में होते तो शायद मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके की सूखा में भी इतनी बुरी दुर्दशा ना होती ।
जल है तो कल है _ जैसे संवेदन शील मसले पर विलम्ब से ही सही पर जीवन की चाह में लोगों को जल संरक्षण के लिए लोगों को मजबूर होना ही पडेगा ।


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