15 फ़रवरी, 2016

परम्परागत खेती से बदली गाँव की तस्वीर 
रवीन्द्र व्यास 
 सूखा की त्रासदी के बीच  बुंदेलखंड  के  सूखा  ग्रस्त  टीकमगढ़  जिला का एक  गाँव अपनी परम्पराओ को अपनाकर
 सूखा का डट कर मुकाबला कर रहा है । कल तक जिस गाँव से पलायन का  तांता लगता था , गाँव वीरान और बेजार 
हो जाता था ,आज उस गाँव से रोजगार की तलाश में होने वाला पलायन रुक गया है । गाँव के दलित पड़े लिखे नौजवान
 भी सरकारी नौकरी नहीं खेती करना ज्यादा बेहतर मानने लगे हैं । गाँव में यह परिवर्तन  यू ही नहीं आया बल्कि  इसके
 लिए गाँव वालों ने बुंदेलखंड की खेती की  प्राचीन परम्पराओ को अपनाया है । 


       जब हम  टीकमगढ़ जिले के   गयाजीत पुरा  गाँव में पहुंचे  तो  ऐसा लगा मानो बुंदेलखंड के मीलो लम्बे वीराने में 
आशा की एक किरण मिल गई हो ।  बुन्देलखंडियो के जुझारूपन  और  विपरीत परिस्थितियों में भी संघर्ष की क्षमता 
अदभुत मानी जाती है । इस गाँव में भी यही सब कुछ देखने और समझने को मिला । यह गाँव भी आम बुंदेलखंड के गाँवों
 की तरह  छोटा सा गाँव है , ज्यादातर किसान  एक दो एकड़ में अपनी खेती कर अपने और अपने परिवार की जिंदगी की 
गाडी खींचते थे ।  मौसम के मिजाज का असर इस गाँव में भी अन्य गाँवों की ही तरह हुआ ।  प्रकृति के प्रकोप को सहते 
सहते इस गाँव के किसान भी अपनी किस्मत को कोसने लगे थे । परदेश में मजदूरी भी की पर अपने गाँव और खेत की डोर 
से सदैव बंधे रहे ।

 कुछ समय पहले इन गाँव वालों को जैविक खेती का फंडा  एक एन जी ओ वालो ने समझाया था । जैविक खेती की जगह 
जब उन्हें बताया गया की यह तो आज की भाषा है ,  हमारे समाज में खेती की जो पुरातन परम्परा है वह यही है । जिसमे
 किसी रासायनिक खाद का प्रयोग नहीं होता । जैविक बनाम  परम्परागत खेती का  यह समीकरण भी गाँव वालों को तब 
समझ में आया जब उन्हें बतया गया डीएवीपी और यूरिया खाद लेने जाने में होने वाली परेशानी  और खाद के साथ मिलते
 कर्ज के तोहफे से इससे मुक्ति मिल सकती है । कुछ को समझ आया कुछ को नहीं  भी आया । जब गाँव के कुछेक किसानों 
ने इसे अपनाया उन्हें फायदा मिला तो  अब गाँव में एक बड़ा परिवर्तन आया है । गाँव के अधिकाँश किसानो ने   फसल 
,भूमि  ,जल और खाद के प्रबंधन को समझा और  जैविक खेती को अपनाया ।  अब वे अपने खेत की हर जगह का उपयोग,
 कर अच्छा लाभ कमा रहे । सूखे के इस दौर में भी उनके चेहरे पर ख़ुशी है । 


                       सूखे बुंदेलखंड में   खेतो में अपनी फसल को निहारते  नन्द राम  के चेहरे की ख़ुशी देख कर मन में यही 
विचार आया काश बुंदेलखंड और देश का हर किसान ऐसा ही खुश हाल हो जाए । नन्द राम के पास भी मात्र  दो एकड़ की खेती
 है  , जिसके बल पर वो अपने  परिवार की गाडी खींचते थे । कभी मजदूरी कर के तो कभी कर्ज लेकर । आज सूखे के इस साल
 में जब बुंदेलखंड का किसान हाहाकार कर रहा है , किसानो के चेहरे  से मुस्कान गायब हो गई है । , इस दौर में भी  नन्द राम
 के चेहरे पर मुस्कान है ।  नन्द राम ने  अपने खेत की हर जगह का उपयोग फसल के लिए किया । यहां तक की पपीता के 
पेड़ों के  नीचे ,मिर्च , हल्दी , अदरक , अरबी , रतालू  जैसी नगदी फसल लगाकर भूमि का ज्यादा से ज्यादा उपयोग फसल पाने 
के लिए किया । वहीँ उन्होंने कम लाभ वाली गेंहू जैसी फसल से तौबा कर ली ।  जिस दो एकड़ के खेत से नन्द राम सिर्फ हजार
 रु साल में बचा पाते थे  आज वह उसी जगह से हर  साल पचास हजार का शुद्ध मुनाफ़ा कमा रहा है । 


यह मुस्कान  सिर्फ नन्द राम तक सीमित नहीं है , बल्कि इस गाँव के अधिकाँश किसानो के  चेहरों पर ख़ुशी और  संतोष की
 झलक देखने को मिलती है ।   फसल प्रबंधन के साथ गाँव के इन किसानो ने रासायनिक खाद से भी तौबा कर ली है । अब ये 
अपनी बनाई जैविक खाद का उपयोग खेतों में करते हैं ।   ये जैविक खाद भी ये खुद अपने खेतों पर बनाते हैं । इसका नाम इन 
लोगो ने " जीव अमृत" रखा है । इसमें  दस किलो गोबर १० किलो गाय का मूत्र ,  किलो गुड , किलो बेसन एक की में 
सड़ा देते हैं ,१५ दिन में सड़  ाता है ,१५ दिन होने के बाद इसमें २००लीटर पानी का एवरेज बना  उसमे मिलाकर एक 
मटका में छेद कर रखते हैं  उस मटके को वहां लगाते हैं  जहां  फसल के लिए पानी जाता है पानी में एक एक बून्द कर 
गिरता है और पूरीफसल में फ़ैल जाता है ।


 इस जीव अमृत ने इन की काया ही पलट दी है । अब इस गाँव के किसान ही कहने लगे हैं की  लागत कम ,पैसा  लगता नहीं , क्योंकि रासायनिक खाद में पैसा लगता  था वह उसी को नहीं होता था , अब इस में कुछ नहीं लगत बढ़िया फायदा हो जाता है
 इस खाद से दुगनी फसल होने लगी है   जैविक खाद के लिए इन लोगों ने शौचालय का भी गजब उपयोग निकाला है ।  गाँव में 
सफाई के साथ  यह शौचालय उन्हें   जैविक खाद भी उपलब्ध करा रहा है । मानव मूत्र को यूरिया की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं
 खेत पर जैविक खाद के लिए  शौचालय अलग से बनाया है । इससे ,मूत्र अलग होता है , मल लग होता है और शौच का पानी 
अलग निकलता है वह सिचाई के लिए उपयोगआता है  मूत्र  यूरिया का काम करता है , और जो मल है वह डीएपी  का काम
 करता है  आता है  मूत्र  यूरिया का काम करता है , और जो मल है वह डीएपी  का काम करता है  रासायनिक खाद की जगह
 जैविक खाद के लिए यह शौचालय  पयोगी  साबित हो रहा है 
    अब इसे गाँव वालों का हौसला ही कहेंगे की जब जिले के दूसरे खेत वीरान पड़े हों तब ये  अपने खेतों में सूखे के साल में धान 
जैसी फसल लगाने का साहस कर रहे हैं । 
                                 गाँव के ही   जय राम अहिरवार बातो बातों में बताने लगे की इस खेती से गाँव के कई लोग 
 जुड़ गए हैं । 60 फीसदी  आदमी ,जिनके पास कम कम मींन  थी परेशान थे , अब उनकी रेशानी भी दूर हो गई ,। पहले 
हम लोग बीज खेत में फेक दिया और जोत दिया  अब इसको बढ़िया लाइन विधि से  लगाने लगे तो इसमें   बीज कम लगता है और उपज ज्यादा होती हैजहां चार पैली धान बोना है वहां  किलो में हो जाती है  बढ़िया , एक एक पौधा
 लगा दिया ,  फसल से३० -४० बाले निकलती हैं  अब सब्जी अच्छी होने लगी है , हमारे पास दो ढाई एकड़ जगह है ,पहले कपड़ा भी नहीं ले पाते थे , अब इसमें क्या हो गया है की बढ़िया फायदा होता है , बचत भीहो ाती है  , बच्चों के स्कूल 
की फ़ीस हो जाती है   नाते रिश्तेदारी में हो आते है कपड़ा हो जातेशादी विवाह बगैरह हो जाते हैं  
                         
 खेती में निरंतरता की पद्धति  लेकर दुनिया भरमें बहश छिड़ी  ,खेती में निरंतरता की पद्धति को अपनाने को लेकर 
तमाम तरह की बातें की जारही हैं  ऐसे समय में   लगता है इस  गाँव के किसानो ने निरंतरता की पद्धत्ति को  सिद्ध करके
 दिखा दिया है  आज जिस सूखे बुंदेलखंड में किसान आत्म ह्त्या करने को मजबूर है , और सरकार  उन का दुःख दूर 
करने में नाकाम है ऐसे में इन लोगों ने अपनी लागत को घटाया हैउत्पादन को पांच गुना तक ढ़ाया  है । वह भी , बुंदेलखंड जैसेइलाके में हां एक फसल हो पाती थी वहां गयाजित पुरा  जैसे गाँव में तीन फस ले रहे हैं  । 
सरकार का कृषि विभाग किसानो को दूर दराज ले जाकर  उनको कृषि की बारीकियां समझाने का कागजी प्रयास करता है ,
यदि आस पास के ऐसे किसानो  को देखा जाए और उनके द्वारा अपनाई गई देशी विधि को समझा जाए तो  एक बड़ा परिवर्तन 
संभव किया जा सकता है । 


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