27 फ़रवरी, 2016

JNU_Nraty Gopal Das


जेएनयू के जन्म से ही  राष्ट्र द्रोह का काम रहा : महंत नृत्य गोपाल दास राम जन्म भूमि मंदिर निर्माण की कोई तिथी तय नहीं हुई है :-महंत नृत्य गोपाल दास 



छतरपुर /एम पी /27 फरवरी 2016 
 राम जन्म भूमि न्यास के प्रमुख संत महंत नृत्य गोपाल दास ने आज पत्रकारों से चर्चा करते हुए  कहा की मोदी सरकार अब तक की सर्वश्रेष्ठ सरकार है । जवाहर लाल नेहरू विश्व विद्यालय के जन्म से ही यही काम होता रहा है । राम जन्म भूमि मंदिर निर्माण के लिए मोदी जी को थोड़ा  समय दिया गया है । मंदिर निर्माण की संत समाज ने कोई तिथी तय नहीं की है । बुंदेलखंड में दुर्भिक्ष से निपटने के लिए संत समाज पहल करेगा । 
                             जेएनयू के सवाल पर महंत ने कहा  की जवाहर लाल नेहरू विश्व विद्यालय ,इसका जो जन्म है जन्म से ही राष्ट्र द्रोह , साधू संतों का द्रोह वा लोक समाज के विपरीत हमेशा से ही रहा है । जवाहर लाल नेहरू विश्व विद्यालय का यही काम रहा है । इसलिए हम लोग पागल जो लोग होते हैं " वातल भूत विवश मन वारे ते नहीं बोले वचन सँवारे "" इसलिए हम लोग ऐसे लोगों की बातो पर ध्यान नहीं  देते । सारा राष्ट्र और जनता मोदी का समर्थन कर रही है , उनके क्रिया कलाप का आदर करते हैं , भविष्य में भी मोदी से राष्ट्र के अभुय्थान बड़ी आशा है । राहुल गांधी द्वारा जेएनयू के छात्रों के समर्थन के सवाल पर उन्होंने कहा राहुल कहीं आसमान से तो नहीं आ गए जैसे वो वैसे ही उनका विश्व विद्यालय सब एक ही थेली के चट्टे बट्टे हैं । 
 रामजन्म भूमि पर मंदिर निर्माण के सवाल पर महंत ने कहा की  मोदी जी को थोड़ा सा और समय दिया गया है क्योंकि अभी देश में अकाल -दुर्भिक्ष की स्थिति है । मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में जल संकट है , ऐसे  वे उलझे हुए हैं उन्हें  कष्ट नहीं देना चाहते । थोड़े समय बाद धर्माचार्य मिलकर मंदिर निर्माण की पहल करेंगे । 
मंदिर निरमें की तारीख तय होने से उन्होंने इंकार करते हुए कहा की संत समाज ने कोई तिथी तय नहीं की है । केवल जगद गुरु रामभद्राचार्य जी ने ही एकाँकी घोषणा की है \ रामभद्राचार्य जी की तिथि की घोषणा में साधू समाज का कोई हाथ नहीं कोई साथ नहीं , यह उनका स्वतंत्र विचार है , भगवान करे उनकी वाणी सत्य हो । 
     बुंदेलखंड में अकाल से निपटने में संत समाज के योगदान के सवाल पर उनका कहना था , संत समाज पहल करेगा और सरकार से आग्रह करेगा । 

22 फ़रवरी, 2016

Bundelkhand_Bhim Kund

/बुंदेलखंड में है अथाह जल श्रोत का केंद्र भीमकुण्ड



 रवीन्द्र व्यास 




बुंदेलखंड आज सूखे की भयावहता से विचलित है , लोग पीने के पानी के लिए परेशान हैं समाजवादी नेता रघु ठाकुर को बुंदेलखंड की समस्याओं को लेकर दिल्ली के जंतर मंतर पर धरनादेना पड़ रहा है  उसी बुंदेलखंड में पानी का एक ऐसा अथाह श्रोत भी है  जो आज भी लोगों केलिए किसी रहष्य से कम नहीं है | समुद्र कि गहराई तो भले ही माप ली गई हो पर इसकी गहराईआज तक कोई नहीं माप सका |
                                            छतरपुर जिला के बड़ा मलहरा के पास अथाह जल का श्रोत है  भीम कुंड । ऊपर से देखने पर एक 50 से 75 मीटर  व्यास का आकार दिखता है । भूवैज्ञानिक मानते हैं की यह इलाका चूना पत्थर( लाइम स्टोन ) का इलाका है , जहां यह कुण्ड बना है वह भी  लाइम स्टोन की केविटी वाली सरचनाओ  कारण ही बना है लाइम  स्टोन  ज्यादा नर्म होता है , और पानी के संपर्क मे आने के कारण इसमे जगह जगह   ेविटी बन जाती है जिसके कारण इसमे पानी जमा रहता है | पानी के अथाह भंडारण और कभी ख़त्म ना होने के पीछे उनका मानना है कि  सका किसी जल स्रोत से  सम्पर्क हो सकता है | 
मान्यताएं 
इस कुण्ड को लेकर अलग अलग तरह की लोक मान्यता है । कुछ लोग इसकी  इसकीउत्पत्ति द्वापर युग में होना मानते हैं । किवदंत्ती है कि वनवास काल का काफी समय पांडवों काबुंदेलखंड इलाके में बीताइसी दौरान  द्रोपदी निर्जला एकादशी का व्रत रखा शाम के समय जबउनका व्रत पूर्ण हुआ । प्यास से व्याकुल  द्रोपदी को  पीने का  पानी जब कहीं नजर नहीं आया तब   भीम ने पानी की तलाश में गदा मारा था जिससे यह कुंड बना | कुण्ड तक पहुँचने के लिए अर्जुन ने बाड़ से सीडिया बनाई थी ।  इसके बाद कुछ समय तक पांडव भी इसी जगह रहे । 
 एक और किवदंती यह भी है की  जब नारद मुनि आकाश मार्ग से विचरण कर रहे थे तभी उन्हें धारा पर कुछ स्त्री और परुष घायल अवस्था में दिखे थे । नारद जी ने उनके दुःख कारण पूंछा तो उन्होंने बतया था की वे  संगीत की राग और रागनियाँ हैं , हमारी यह दशा  पृथ्वी  लोक के अनाड़ी गायकों के दोषपूर्ण  गायन से हुई है । इस दशा से मुक्ति हमें तभी मिलेगी  जब कोई कुशल  संगीतज्ञ सामगान का गायन करे । सामगान के ज्ञाता नारद जी ने  तत्काल ही गायन शुरू कर दिया । उनके इस गायन को सुन सम्पूर्ण देवलोक मगन  गया , और स्वयं भगवान विष्णु उसी स्थान पर द्रवीभूत हो कर जा पहुंचे । द्रवीभूत विष्णु जी का स्पर्श पा कर सभी राग और रागनियाँ स्वास्थ्य हो गई । इन्ही राग रागनियों ने भगवान विष्णु से अनुरोध किया की वे इसी रूप में यही रुक जाए ताकि और पीड़ितों का भी भला हो सके । भगवान  उनकी यह बात मान ली और जल के रूप में इस कुण्ड में रुक गए । इस कारण कुछ लोग इसे नील कुण्ड भी कहते हैं । 
इस कुंड की गहराई आज तक कोई नहीं नाप सका | कहते हें की यहाँ पहले प्रेत आत्माओं का वाशरहता था , लोग यहाँ जाने से डरते थे | १९५६ में बिजावर रियासत के राजा ने यहाँ सीडियांबनवाई थी | इसी दौरान एक महंत यहाँ आकर रुके उन्होने इस स्थान को प्रेत आत्माओं से मुक्तकराया |

गहराई का रहष्य 

भीम कुण्ड की गहराई आज तक कोई नहीं माप सका है । एक बार नो सेना के गोता खोरों नेइसकी गहराई नापने का प्रयास किया था ,।  और एक बार  सागर विश्व विद्यालय के भू_ विज्ञान एम टेक के  छात्रों ने इसकी गहराई नापने का प्रयाश किया था पर दोनों ही लोग विफल रहे|
१९७७ में  जिला प्रशासन ने यहाँ तीन पम्प लगा कर इसको खाली कराने का प्रयाश किया था ,सात दिन तक चले इस प्रयाश में कुंड का पानी एक इंच भी कम नहीं हुआ था | 
 डिस्कवरी चेनल वालों ने भी इसका रहस्य जानने का  प्रयास किया था |- दिन के प्रयाश केबाद भी उनके गोताखोर इसकी तह नहीं जान पाए | डिस्कवरी चेनल वालों ने  यहाँ के पूर्व जनपदसदस्य प  रामकृपाल शर्मा को  बताया था  की इसके अन्दर कई गुफाएं हें , नीचे दो कुंड हें एकसे तेजी से पानी निकलता है और दूसरे में तेजी से जाता है जिसके कारण तेज बहाव रहता है |

सेटेलाइट सर्वे 

सेटेलाइट  सर्वे में बुंदेलखंड इलाके में जिस पाताल गंगा का पता चला है , उसका रहष्य भी इसी भीम कुण्ड से जुड़ा बताया जा रहा है । इस कुण्ड से एक नदी के जुड़े होने की बात कही जा रही है ,  
भूवैज्ञानिक मानते हैं की  भूकंप और सुनामी  के कारण उठने वाली लहरों का असर इस कुंड में भीदेखने को सिर्फ इस कारण मिलता है , क्योंकि  जब भी भूकंप आते हें उसका असर टेक्टोनिकप्लेट्स पर पड़ता है जिस कारण यहाँ भी लहरे उठती हें |
 संसद में भीम कुण्ड 
  
भीम कुण्ड के अथाह जल को देखते हुए  दमोह के सांसद प्रहलाद पटेल ने इसे संसद में उठाया था । उन्होंने इस भीम कुण्ड से आसपास और बक्स्वाहा में पेयजल सप्लाई की योजना बनाने का अनुरोध सरकार से किया था । 

जरुरत है बुंदेलखंड की इस जल सरचना के बेहतर इस्तेमाल और उसके  सही उपयोग की दिशा में छतरपुर जिला प्रशासन के प्रयास की । 

15 फ़रवरी, 2016

परम्परागत खेती से बदली गाँव की तस्वीर 
रवीन्द्र व्यास 
 सूखा की त्रासदी के बीच  बुंदेलखंड  के  सूखा  ग्रस्त  टीकमगढ़  जिला का एक  गाँव अपनी परम्पराओ को अपनाकर
 सूखा का डट कर मुकाबला कर रहा है । कल तक जिस गाँव से पलायन का  तांता लगता था , गाँव वीरान और बेजार 
हो जाता था ,आज उस गाँव से रोजगार की तलाश में होने वाला पलायन रुक गया है । गाँव के दलित पड़े लिखे नौजवान
 भी सरकारी नौकरी नहीं खेती करना ज्यादा बेहतर मानने लगे हैं । गाँव में यह परिवर्तन  यू ही नहीं आया बल्कि  इसके
 लिए गाँव वालों ने बुंदेलखंड की खेती की  प्राचीन परम्पराओ को अपनाया है । 


       जब हम  टीकमगढ़ जिले के   गयाजीत पुरा  गाँव में पहुंचे  तो  ऐसा लगा मानो बुंदेलखंड के मीलो लम्बे वीराने में 
आशा की एक किरण मिल गई हो ।  बुन्देलखंडियो के जुझारूपन  और  विपरीत परिस्थितियों में भी संघर्ष की क्षमता 
अदभुत मानी जाती है । इस गाँव में भी यही सब कुछ देखने और समझने को मिला । यह गाँव भी आम बुंदेलखंड के गाँवों
 की तरह  छोटा सा गाँव है , ज्यादातर किसान  एक दो एकड़ में अपनी खेती कर अपने और अपने परिवार की जिंदगी की 
गाडी खींचते थे ।  मौसम के मिजाज का असर इस गाँव में भी अन्य गाँवों की ही तरह हुआ ।  प्रकृति के प्रकोप को सहते 
सहते इस गाँव के किसान भी अपनी किस्मत को कोसने लगे थे । परदेश में मजदूरी भी की पर अपने गाँव और खेत की डोर 
से सदैव बंधे रहे ।

 कुछ समय पहले इन गाँव वालों को जैविक खेती का फंडा  एक एन जी ओ वालो ने समझाया था । जैविक खेती की जगह 
जब उन्हें बताया गया की यह तो आज की भाषा है ,  हमारे समाज में खेती की जो पुरातन परम्परा है वह यही है । जिसमे
 किसी रासायनिक खाद का प्रयोग नहीं होता । जैविक बनाम  परम्परागत खेती का  यह समीकरण भी गाँव वालों को तब 
समझ में आया जब उन्हें बतया गया डीएवीपी और यूरिया खाद लेने जाने में होने वाली परेशानी  और खाद के साथ मिलते
 कर्ज के तोहफे से इससे मुक्ति मिल सकती है । कुछ को समझ आया कुछ को नहीं  भी आया । जब गाँव के कुछेक किसानों 
ने इसे अपनाया उन्हें फायदा मिला तो  अब गाँव में एक बड़ा परिवर्तन आया है । गाँव के अधिकाँश किसानो ने   फसल 
,भूमि  ,जल और खाद के प्रबंधन को समझा और  जैविक खेती को अपनाया ।  अब वे अपने खेत की हर जगह का उपयोग,
 कर अच्छा लाभ कमा रहे । सूखे के इस दौर में भी उनके चेहरे पर ख़ुशी है । 


                       सूखे बुंदेलखंड में   खेतो में अपनी फसल को निहारते  नन्द राम  के चेहरे की ख़ुशी देख कर मन में यही 
विचार आया काश बुंदेलखंड और देश का हर किसान ऐसा ही खुश हाल हो जाए । नन्द राम के पास भी मात्र  दो एकड़ की खेती
 है  , जिसके बल पर वो अपने  परिवार की गाडी खींचते थे । कभी मजदूरी कर के तो कभी कर्ज लेकर । आज सूखे के इस साल
 में जब बुंदेलखंड का किसान हाहाकार कर रहा है , किसानो के चेहरे  से मुस्कान गायब हो गई है । , इस दौर में भी  नन्द राम
 के चेहरे पर मुस्कान है ।  नन्द राम ने  अपने खेत की हर जगह का उपयोग फसल के लिए किया । यहां तक की पपीता के 
पेड़ों के  नीचे ,मिर्च , हल्दी , अदरक , अरबी , रतालू  जैसी नगदी फसल लगाकर भूमि का ज्यादा से ज्यादा उपयोग फसल पाने 
के लिए किया । वहीँ उन्होंने कम लाभ वाली गेंहू जैसी फसल से तौबा कर ली ।  जिस दो एकड़ के खेत से नन्द राम सिर्फ हजार
 रु साल में बचा पाते थे  आज वह उसी जगह से हर  साल पचास हजार का शुद्ध मुनाफ़ा कमा रहा है । 


यह मुस्कान  सिर्फ नन्द राम तक सीमित नहीं है , बल्कि इस गाँव के अधिकाँश किसानो के  चेहरों पर ख़ुशी और  संतोष की
 झलक देखने को मिलती है ।   फसल प्रबंधन के साथ गाँव के इन किसानो ने रासायनिक खाद से भी तौबा कर ली है । अब ये 
अपनी बनाई जैविक खाद का उपयोग खेतों में करते हैं ।   ये जैविक खाद भी ये खुद अपने खेतों पर बनाते हैं । इसका नाम इन 
लोगो ने " जीव अमृत" रखा है । इसमें  दस किलो गोबर १० किलो गाय का मूत्र ,  किलो गुड , किलो बेसन एक की में 
सड़ा देते हैं ,१५ दिन में सड़  ाता है ,१५ दिन होने के बाद इसमें २००लीटर पानी का एवरेज बना  उसमे मिलाकर एक 
मटका में छेद कर रखते हैं  उस मटके को वहां लगाते हैं  जहां  फसल के लिए पानी जाता है पानी में एक एक बून्द कर 
गिरता है और पूरीफसल में फ़ैल जाता है ।


 इस जीव अमृत ने इन की काया ही पलट दी है । अब इस गाँव के किसान ही कहने लगे हैं की  लागत कम ,पैसा  लगता नहीं , क्योंकि रासायनिक खाद में पैसा लगता  था वह उसी को नहीं होता था , अब इस में कुछ नहीं लगत बढ़िया फायदा हो जाता है
 इस खाद से दुगनी फसल होने लगी है   जैविक खाद के लिए इन लोगों ने शौचालय का भी गजब उपयोग निकाला है ।  गाँव में 
सफाई के साथ  यह शौचालय उन्हें   जैविक खाद भी उपलब्ध करा रहा है । मानव मूत्र को यूरिया की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं
 खेत पर जैविक खाद के लिए  शौचालय अलग से बनाया है । इससे ,मूत्र अलग होता है , मल लग होता है और शौच का पानी 
अलग निकलता है वह सिचाई के लिए उपयोगआता है  मूत्र  यूरिया का काम करता है , और जो मल है वह डीएपी  का काम
 करता है  आता है  मूत्र  यूरिया का काम करता है , और जो मल है वह डीएपी  का काम करता है  रासायनिक खाद की जगह
 जैविक खाद के लिए यह शौचालय  पयोगी  साबित हो रहा है 
    अब इसे गाँव वालों का हौसला ही कहेंगे की जब जिले के दूसरे खेत वीरान पड़े हों तब ये  अपने खेतों में सूखे के साल में धान 
जैसी फसल लगाने का साहस कर रहे हैं । 
                                 गाँव के ही   जय राम अहिरवार बातो बातों में बताने लगे की इस खेती से गाँव के कई लोग 
 जुड़ गए हैं । 60 फीसदी  आदमी ,जिनके पास कम कम मींन  थी परेशान थे , अब उनकी रेशानी भी दूर हो गई ,। पहले 
हम लोग बीज खेत में फेक दिया और जोत दिया  अब इसको बढ़िया लाइन विधि से  लगाने लगे तो इसमें   बीज कम लगता है और उपज ज्यादा होती हैजहां चार पैली धान बोना है वहां  किलो में हो जाती है  बढ़िया , एक एक पौधा
 लगा दिया ,  फसल से३० -४० बाले निकलती हैं  अब सब्जी अच्छी होने लगी है , हमारे पास दो ढाई एकड़ जगह है ,पहले कपड़ा भी नहीं ले पाते थे , अब इसमें क्या हो गया है की बढ़िया फायदा होता है , बचत भीहो ाती है  , बच्चों के स्कूल 
की फ़ीस हो जाती है   नाते रिश्तेदारी में हो आते है कपड़ा हो जातेशादी विवाह बगैरह हो जाते हैं  
                         
 खेती में निरंतरता की पद्धति  लेकर दुनिया भरमें बहश छिड़ी  ,खेती में निरंतरता की पद्धति को अपनाने को लेकर 
तमाम तरह की बातें की जारही हैं  ऐसे समय में   लगता है इस  गाँव के किसानो ने निरंतरता की पद्धत्ति को  सिद्ध करके
 दिखा दिया है  आज जिस सूखे बुंदेलखंड में किसान आत्म ह्त्या करने को मजबूर है , और सरकार  उन का दुःख दूर 
करने में नाकाम है ऐसे में इन लोगों ने अपनी लागत को घटाया हैउत्पादन को पांच गुना तक ढ़ाया  है । वह भी , बुंदेलखंड जैसेइलाके में हां एक फसल हो पाती थी वहां गयाजित पुरा  जैसे गाँव में तीन फस ले रहे हैं  । 
सरकार का कृषि विभाग किसानो को दूर दराज ले जाकर  उनको कृषि की बारीकियां समझाने का कागजी प्रयास करता है ,
यदि आस पास के ऐसे किसानो  को देखा जाए और उनके द्वारा अपनाई गई देशी विधि को समझा जाए तो  एक बड़ा परिवर्तन 
संभव किया जा सकता है । 


08 फ़रवरी, 2016

Bundelkhand Dayri_


बुंदेलखंड की उपेक्षित जल सरचनाये 
रवीन्द्र व्यास 
बुंदेलखंड के उत्तर प्रदेश वाले इलाके के जिलों में प्रदेश सरकार ने सूखा से  स्थाई राहत  का रास्ता तलाशने का प्रयास किया है ।
उत्तर प्रदेश सरकार को शायद समझ आ  गया है की पानी बगैर बुंदेलखंड में जीवन नहीं बचेगा ।  इसी को ध्यान में रख कर सरकार ने  2000  तालाब खुदवाने का फैसला किया है । सरकार के मुख्य सचिव आलोक रंजन की अध्यक्षता में  शुक्रवार को हुई बैठक में यह निर्णय लिया गया ।हालांकि प्राचीन तालाबों और बुंदेलखंड की परम्परागत जल संरचनो की   दशा सुधारने
की कोई योजना नहीं बताई गई है ।   बुंदेलखंड के   लिए  सरकार का यह निर्णय कितना लाभकारी होगा  यह तो  आने वाले समय में पता चलेगा ।  पर फिलहाल  तात्कालिक जरुरत  पानी है  जिसके लिए सरकार  को प्रयास करने  की जरुरत है । 
                                        उत्तर प्रदेश सरकार  जो  २००० तालाब बुंदेलखंड इलाके में बनवाएगी  उसके लिए 50 फीसदीअनुदान देगी । मतलब साफ़ है  तालाबों से जनता की भागीदारी को भी जोड़ा जा रहा है ।  ताकि   जल संकट के प्रति हम जागृत हो , अपनी नदियों, तालाबों के लिए कुछ आस्था का भाव जाग्रत हो । ऐसा ना हो की इन तालाबों को सरकार का तालाब मान ले , और काम निकलने पर उसी का विनाश कर फसल बोने लगें | 

      पानीजिसकेबिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। बुंदेलखंड में एक बड़ा और अहम सवाल बन गया है ? 
जिंदगी से पानी का जुड़ाव कितना है इसकी बानगी लोक कहावतो , भजनो , धर्म ग्रंथो  और फ़िल्मी कथाओ में देखने सुनने को मिल जाती है । बुंदेलखंड में पानी के महत्व को  सदियों पहले पहचान लिया गया था । इसी कारण बुंदेलखंड में गाँव -गाँव में जल संरचनाओं का विकाश और विस्तार किया गया । यह भी ध्यान रखा गया था  कि यदि अपर्याप्त वर्षा हो तब कैसे इस समस्या से निपटा जाए । आज भी बुंदेलखंड की प्राचीन जल प्रबंधन प्रणाली देश में अनोखी मानी जाती है और इसको देखने और समझने देश के जल प्रबंधन से जुड़े लोग आते रहते हैं । ये अलग बात है की हमने अपनी नादानियों और स्वार्थो के चलते इनके विनाश में कोई कसर नहीं छोड़ी ।  
                        बुंदेलखंड की  परम्परागत  जल संरचनाओं में निर्मल बहती नदी ,तालाब , कुए
और बावड़ी ही थे । इसके अलावा  प्राकृतिक  जल श्रोत जो आज भी रहस्य मय हैं । छतरपुर जिले का  भीम कुण्ड कुण्ड , अर्जुन कुण्ड, जोगी दंड पन्ना जिले का बृहस्पति कुण्ड , टाइगर रिजर्व के अंदर का झलरिया महादेव का स्थान रहष्य मई जल श्रोत के केंद्र हैं।छतरपुर जिले में ही एक गाँव है नौगांव ब्लाक में एक गाँव है जोरन । इस गाँव के बारे में कहा जाता है की इस गाँव में कभी 84 कुए और 52 बावड़ी हुआ करती थी ।  आज यह गाँव भी जल संकट से जूझ रहा है ।  

पहाड़ों पर बने तालाब और कुण्ड यहां के लोगों के लिए किवदंतियों का मानो एक बड़ा खजाना है । चाहे वो अजयगढ़  के पहाड़ पर बने तालाब और कुण्ड हो या कालिंजर के पहाड़ पर बने तालाब और कुण्ड हों ।चित्रकूट की गुप्त गोदावरी ,हनुमान धारा , देवांगना , अनुसुइया ,बांके सिद्ध क्षेत्र ,आदि जल श्रोतो के बड़े केंद्र माने जाते हैं । 
 यहां बहने वाली  प्रमुख नदियों में केन , बेतवा , धसान , उर्मिल , पहुज , रिहंद ,जामनी, सहजाद , खापार ,बन्ने ,केवलारी , केल ,चंद्रावल ,अर्जुन.लहेरी ,बिरमा ,उत्तरी ,रोहणी ,श्यामरी , आदि नदियों पर बने  बाँध भी बुंदेलखंड के वर्षा जल का 10 से 15 फीसदी जल राशि ही संरक्षित कर पाते हैं । 85 फीसदी पानी बह जाता है । देश में अग्रेजो का शासन आया उनके काल में बुंदेलखंड इलाके में  बड़े -बड़े बाँध बनवाए गए । अकेले छतरपुर जिले में अंग्रेज शासकों ने  पांच बाँध बनवाए थे । जिनका जल बुंदेलखंड इलाके में  सिचाई के काम आता है । पर इन बांधों में  खाश बात है बांधों की ऊंचाई  नदी के तट लेबल  से  बहुत ज्यादा ऊँची नहीं रखी गई । नदी पर बने इन बांधों में अतरिक्त जल भंडारण के लिए बाँध के ऊपर लोहे के गेट बनवाए गए जो वर्षा  काल  के बाद खड़े किये जाते थे ।  इन बांधों की संरचना देख कर साफ़ होता है की  बाँध से विस्थापन की समस्या भी ना के बराबर आई होगी ।  आजादी के बाद  देश में कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए बुंदेलखंड में भी बड़े -बड़े बाँध बनवाए  गए , हजारों लोग विस्थापित किये गए ।ज्यादा  लागत के  इन बांधों से सिचाई का रकबा तो बड़ा किन्तु यह उतना फायदे बंद  नहीं रहा जितने की तालाब थे । और आज भी विस्थापन के दर्द से जूझ रहे हैं । विस्थापन से मिले पैसे चार दिन की चांदनी  फिर अन्धेरी रात जैसे रहे ।  अपनी जमीन के ये मालिक कालान्तर में मजदूर बनने को मजबूर हुए । 
                         “सेव वाटर, वाटर  विल सेव अस. कहने वाले प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी ने  28 जून 2015 को “मन की बात” कार्यक्रम में वर्षा जल संग्रह की आवश्यकता को ध्यान में  रखते  हुए मानसून में लोगों से खेत का  पानी खेत मेंगाँव का पानी गाँव  में एवं शहर का पानी शहर में रोकने हेतु , वर्षा जल संग्रह करने की अपील  जनता से की थी । प्रधान मंत्री की यह अपील जनता तो छोडो सरकार के प्रशासन तंत्र में कितनी कारगर रही इसकी मिसाल है इस बार का सूखा और जल त्रासदी । मध्य प्रदेश वाले इलाके मेंबुंदेलखंड पैकेज से  बने 774 स्टॉप डेमो में 90 फीसदी ऐसे स्टॉप डेम हैं जिनमे प्रशासन तंत्र और उसकी जल उपभोक्ता समितियों ने फाटक लगाना ही जरुरी नहीं समझा । यह स्थिति तब बनी जब मौसम विभाग ने इलाके में कम वर्षा की चेतावनी दे दी  थी ।
                    मध्य प्रदेश में एक दशक पहले शुरू किया गया था जलाभिषेक अभियान ।  इस अभियान के एक वर्ष की सफलता से उत्साहित मुख्य मंत्री  सिंह ने कहा था की लोगों ने  संरक्षण की अपनी परम्पराओ से जिस तरह खुद को जोड़ा है ,उसके अदभुत परिणाम दिखने लगे हैं । नई और पुरानी जलसंरचनो में छलकते जल बिंदु हमें विशवास दिला रहें हैं कि हम धरती की प्यास बुझा सकते हैं । मुख्य मंत्री जी का यह विशवास बुंदेलखंड इलाके में ही खंडित  हो गया है ।  बुंदेलखंड इलाके में भी सैकड़ों की संख्या में किसानो के खेत पर तालाब कागजों में दर्शाये गए ,यही तालाब यदि यथार्थ में होते तो शायद मध्य प्रदेश के  बुंदेलखंड इलाके की सूखा में भी इतनी बुरी दुर्दशा ना होती । 
 जल है तो कल है _ जैसे संवेदन शील  मसले पर  विलम्ब से ही सही पर जीवन की चाह में लोगों को जल संरक्षण के लिए लोगों को मजबूर होना ही पडेगा ।      

05 फ़रवरी, 2016

रेप की फर्जी रिपोर्ट करने पर महिला को सजा

टीकमगढ़/ बुंदेलखंड इलाके में अपने विरोधी को फ़साने के लिए , बदला लेने के लिए महिलाओ को औजार की तरह किया जाता है इस्तेमाल । ऐसी ही एक महिला ने टीकमगढ कोतवाली में सन 2000 में दो पुलिस आरक्षकों के विरूद्ध बलात्कार का मामला दर्ज कार्या था । जांच में  दुराचार की झूठी रिपोर्ट दर्ज कराने के मामले में विशेष न्यायाधीश जेएस कटारिया ने  महिला को 3 साल की सजा  2 हजार रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई है ।  

महिला की रिपोर्ट पर फंसे थे 2 आरक्षक-      

 8 मार्च 2000 को कोतवाली टीकमगढ़ में पुलिस आरक्षक  अशोक सेन  नेपाल के विरूद्ध  महिला ने रेप की  रिपोर्ट दर्ज कराई थी। पुलिस ने दोनों आरक्षकों के विरूद्ध मामला कायम कर न्यायालय में पेश किया था,।  लेकिन न्यायालय में महिला  अपने पूर्व के दिए हुए बयानों से पलट गई और उसने अशोक सेन  नेपाल को पहचानने से ही इंकार कर दिया। इस पर न्यायालय ने आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया और फरियादी महिला के विरूद्ध कार्रवाई के लिए लिखा था।
विशेष न्यायाधीश ने सुनाई सजा-  

न्यायालय के आदेश पर  कोतवाली  पुलिस ने महिला  के विरूद्ध धारा 182, 211 के तहत परिवाद न्यायालय में प्रस्तुत किया था। जिस पर विद्वान विशेष न्यायाधीश जेएस कटारिया ने महिला मिथिलेश को झूठी गवाही देने तथा मिथ्या रिपोर्ट करने पर धारा 211 आईपीसी में 3 साल के कठोर कारावास और 2 हजार रुपये के अर्थदंड से दंडित किया है।

विकास की उमंग और चुनौतियों के संघर्ष का बुंदेलखंड

  बुंदेलखंड की डायरी  विकास की उमंग और चुनौतियों के  संघर्ष का  बुंदेलखंड  रवीन्द्र व्यास  दो राज्य में बटे बुंदेलखंड के लिए    2025  में कई...