30 नवंबर, 2025

BKD_State_राज्य बनने का सपना और सांसदों की नींद की कहानी

 :बुंदेलखंड डायरी: 

"राज्य बनने का सपना और सांसदों की नींद की कहानी

जो बुंदेलखंड का नहींवो किसी काम का नहीं

रवीन्द्र व्यास 

बुंदेलखंड  वह क्षेत्र जहां सौ वर्षों से संघर्ष की आग जल रही है, लेकिन आज भी संसद की परिक्रमा करने वाले सांसद ठंडे बस्ते में बैठे हुए हैं। यहां पीने के पानी की भट्टी सुलगती है, जमीन मेहनत के अभाव में बंजर हो रही है, और खदानों की  मिट्टी में मजदूरों के खून की धारा बह रही है।  संसद में खड़े वे नौ जनप्रतिनिधि? उनके लिए बुंदेलखंड का हित नहीं, अपने परिवार के हित के टिकट से बड़ा कोई मसला नहीं।2008 में राहुल गांधी ने सूखे बुंदेलखंड में दलितों की झोपड़ी में रात बिताई थी, देश को जागने का नाटक भी खूब चला । मायावती ने 2011 में विधानसभा में राजनीति का तमाशा लगा राज्य निर्माण की वकालत की। फिर नरेंद्र मोदी, राजनाथ सिंह और उमा भारती ने तीन साल में राज्य बनाने का वादा कर बुंदेलखंडियों के सपनों को हवा दी। लेकिन अब ये सपने मुंगेरीलाल के हसीन सपने हो गए ?

 सांसदों की यह राजनीतिक कवायद  देखिए  उनका  या तो मुद्दे से मोहभंग हैं या फिर राजनीति के  खेल में इतने उलझे हैं कि बुंदेलखंड की भूख-प्यास उनकी तालिका से बाहर है।जब बुंदेलखंड निर्माण मोर्चा ने इन नौ सांसदों का सामूहिक पुतला कचहरी पर फूंका, तो एक भयावह सच दिल को झकझोर गया , जो बुंदेलखंड के हित के लिए नहीं खड़ा, वह रोटी के भूखे के बराबर भी नहीं। पर पुलिस नाम की चौकीदारी वाले लोग आए और ऐसा लगा जैसे सांसदों के हित में उठी आवाज दबाना हो। लेकिन बुंदेलखंड के वीर योद्धा पीछे नहीं हटे। कफन बांधकर,  आर-पार की लड़ाई के इरादे से तैयार होकर संघर्ष को नया आयाम दिया।

फतेहपुर में बुंदेलखंड राष्ट्र समिति ने सांसदों के सरकारी आवासों पर घेराव की योजना बनाई है, क्योंकि अब जन जागरण का दौर समाप्त हो चुका है। जन आक्रोश का समय है, और जनप्रतिनिधि या तो इस जनाग्रह की आग में जलेंगे या राजनीति से विदा लेंगे। 1955 से चली आ रही यह मांग आखिर कब पूरे देश के नक्शे पर बुंदेलखंड का नाम लिखेगी? तीन बड़े क्षेत्रीय आंदोलन झारखंड, उत्तराखंड और तेलंगाना को बताया जाता है कि उनका नेतृत्व, जन एकता और स्पष्ट आवाज़ ही सफलता का मूल मंत्र था। लेकिन बुंदेलखंड में नेतृत्व कमजोर पड़ा, चुप्पी हावी हुई और शासक अपनी राजनीति के मोहरे गढ़ते रहे।

राजनीतिक बेईमानी की बात छोड़िए ,उत्तर प्रदेश के  बुंदेलखंड की असली कहानी तो उस खदान की साफ उजली धूल में दबी है, जहां देश की सबसे बड़ी पत्थर मंडी चलती है। खदानों में 300-400 फीट गहराई तक जाने वाली अवैध खनन, यहां के माफियाओं की सत्ता का जोर  रहा है। रोज लाखों की आय  पर मजदूरों की जान की कीमत तय  20 से 22 लाख रुपया। हैवी ब्लास्टिंग के धमाके गांव-शहर हिला रहे हैं, खेत सूख रहे हैं, किसान परेशान हैं, और अफसर-नेता ठंडी चाय पीते हुए अफसरशाही के खेल में मशगूल।एसटीएफ की छापेमारी और नाराज़गी एक दिन की बहार हैं, वरना खदान माफिया सरकार के नियमों को सिर्फ दिखावे के लिए मानते हैं। नियम कानून का मज़ाक उड़ाते हुए बड़े पत्थर खेतों पर गिराते हैं, और सरकारी तंत्र में बैठे लोग सबसे बड़ा भ्रष्टाचार सृजित कर रहे हैं। ओवरलोडिंग के चलते ट्रकों की कतारें चलती हैं, जो न सिर्फ सड़कें उजाड़ती हैं बल्कि सरकार को करोड़ों का राजस्व नुकसान पहुंचाती हैं। पर राजस्व खाते की समझ रखने वाली राजनीति के लिए यह कोई खबर नहीं।

भयानक हालात के बावजूद जनता में संघर्ष की आग बुझनी नहीं चाहिए, पर सवाल उठता है कि इतने वर्षों की लड़ाई में क्यों अभी तक बुंदेलखंड राज्य का नक्शा नहीं बना? क्या सांसदों की प्राथमिकता परिवार की राजनैतिक विरासत संजोने की है, या क्षेत्र के विकास की? जब तक सांसद अपनी कुर्सी बचाने के लिए सांसद नहीं बनेंगे, तब तक बुंदेलखंड की जनता की पीड़ा कौन सुनेगा?साइकिल यात्राएं, जन आंदोलनों के बीच शासन और प्रमाणीकरण की राजनीति बुंदेलखंड की आवाज को दबाने में लगी है। सांसदों के आवासों पर चिपकाए गए जो बुंदेलखंड का नहीं, वो किसी काम का नहीं स्टिकर भी एक तख्ती बनकर रह गई है। असली सवाल यह है कि क्या कोई बुंदेलखंड प्रेमी वादे से आगे उठकर अपनी जिम्मेदारी समझेगा? या फिर राजनीति की चासनी में फंसकर क्षेत्र की आवाज दबाए रखेगा?बुंदेलखंड की जनता अब केवल रग-रग बुंदेली गीतों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों से संतुष्ट नहीं है, बल्कि जमीन, पानी, और सत्ता से जुड़े हक की लड़ाई लड़ रही है। जनता की उम्मीदें सिर पर कफन बांधने वाले नायकों को इस क्षेत्र का सम्मान दिलाने की प्रतीक्षा कर रही हैं। क्या आज का बुंदेलखंड कल तक अपने अस्तित्व और अधिकारों के लिए संसद का दरवाजा खटखटाएगा, यह केवल समय ही बताएगा।

18 नवंबर, 2025

मिटानी होगी मानवता की दुश्मन बनती कट्टरता

 

मिटानी होगी मानवता की दुश्मन बनती कट्टरता



'ऑपरेशन सिंदूर' के बाद कुछ समय तक शांत दिखने वाला पाकिस्तान एक बार फिर आतंक की राह पर लौट आया है। हाल ही में हुए 'दिल्ली ब्लास्ट' ने यह स्पष्ट कर दिया है कि तुर्किये, कतर समेत कुछ कट्टरपंथी देशों के सहयोग से भारत के खिलाफ नया छद्म युद्ध छेड़ा जा चुका है। इन देशों ने भारत की बढ़ती संप्रभुता, समृद्धि और वैश्विक साख को चोट पहुँचाने के लिए आतंकवाद का जाल दोबारा बुनना शुरू कर दिया है।

इस्लाम की मूल आत्मा शांति और मानवता है, लेकिन कुछ मुल्लाओं ने अल्लाह के इस पवित्र धर्म को अपने स्वार्थ और सत्ता के हवाले कर दिया है। कुरान की मनमानी व्याख्याओं के जरिये मासूमों को 72 हूरों और जन्नत के नाम पर बरगलाया जा रहा है। नतीजा यह कि धर्म का वस्त्र ओढ़े आतंक के सौदागर मानवता के सीने पर बारूद बिछा रहे हैं।

पाकिस्तान की आईएसआई लंबे समय से हनीट्रैप और साइबर घुसपैठ जैसे अभियानों के जरिए भारत के खिलाफ साजिशें रचती रही है। रावलपिंडी स्थित फातिमा जिन्ना महिला विश्वविद्यालय को हनीट्रैप केंद्रमें तब्दील किया जाना इसका ज्वलंत उदाहरण है। सूत्र बताते हैं कि वहाँ तीन-चरणीय प्रशिक्षण प्रणाली के तहत महिलाएँ सोशल मीडिया प्रोफाइल बनाने, भावनात्मक जाल बुनने और अंततः गोपनीय सूचनाएँ हथियाने के गुर सीखती हैं।

'ऑपरेशन सिंदूर' के बाद जैश-ए-मोहम्मद ने अपने महिला विंग को पुनर्जीवित कर जमात-उल-मोमिनातके नाम से नया रूप दिया है। मसूद अजहर की बहन सादिया अजहर और उसकी सहयोगी अफीरा बीबी इस संगठन की अगुवाई कर रही हैं। यह विंग तीन भागों में बंटा है पहला, गरीब और उत्पीड़ित महिलाओं को शामिल करने वाला; दूसरा, शिक्षित मुस्लिम युवाओं को कट्टरपंथ की राह पर मोड़ने वाला; और तीसरा, आईएसआई के हनीट्रैप अभियानों में सहयोग देने वाला।

रिपोर्टों के अनुसार 8 अक्टूबर 2025 को बहावलपुर में आयोजित बैठक में भारत के खिलाफ दर्जनों योजनाओं को अंतिम रूप दिया गया। इनमें धार्मिक चंदे की आड़ में फंड जुटाना, महिला आतंकियों की भर्ती, ‘गजवा-ए-हिंदकी पुनर्संरचना, और भारत में मीरजाफरों की फौज तैयार करना प्रमुख हैं। इन प्रयासों में लखनऊ, हैदराबाद, अलीगढ़, मेरठ, भोपाल और प्रयागराज सहित देश के कई मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों में स्लीपर सेल सक्रिय हो चुके हैं।

यह तथ्य चिंताजनक है कि इस्लामी सहयोग संगठन (OIC) जैसे संस्थानों को भी अब कुछ देशों ने मानवता और विश्वशांति के बजाय कट्टर एजेंडे का औजार बना लिया है। यही कारण है कि आज आतंक का यह नेटवर्क चार महाद्वीपों तक फैला दिखाई देता है।

कट्टरता की यह बेल अब धर्म, राष्ट्र और मानवता की सीमाओं को लांघ चुकी है। इसे मिटाना अब केवल किसी एक देश का नहीं, बल्कि पूरी मानव सभ्यता का नैतिक दायित्व है। अन्यथा यह आग जल्द ही पूरे विश्व को अपने लपेटे में ले लेगी। बारूद के ढेर पर बैठी दुनिया को चेतना ही मानवता की रक्षा का एकमात्र रास्ता है।

 

16 नवंबर, 2025

ओरछा : परंपरा का उत्सव, आस्था का संगम

 बुंदेलखंड की डायरी 


 ओरछा : परंपरा का उत्सव, आस्था का संगम





श्री राम-जानकी विवाह महोत्सव: बुंदेलखंड की सांस्कृतिक चेतना का अनूठा प्रतीक

 

रवीन्द्र व्यास 

 

बुंदेलखंड की धरती सदियों से आस्था, वीरता और लोकजीवन की समृद्ध परंपराओं की साक्षी रही है। यहां की मिट्टी में भक्ति घुली है और परंपराएं जीवंत हैं। इन्हीं में एक पावन परंपरा है  ओरछा और उसके आसपास मनाया जाने वाला श्री राम-जानकी विवाह महोत्सव, जो लगभग पांच शताब्दियों से इस क्षेत्र में धर्म, संस्कृति और सामाजिक एकता का प्रतीक बनकर हर वर्ष नई ऊर्जा का संचार करता है।

 

ओरछा को बुंदेलखंड की अयोध्या कहा जाता है। यहां के रामराजा मंदिर में भगवान राम को राजा के रूप में पूजा जाता है । यह भारतवर्ष का एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहां देवता को "राजा" का दर्जा प्राप्त है और उन्हें प्रतिदिन राजसी गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाता है। यही परंपरा ओरछा को सिर्फ धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक विचारधारा का केंद्र बनाती है।


ऐतिहासिक परंपरा और लोक विश्वास 

 

इतिहासकार बताते हैं कि ओरछा में राम-जानकी विवाह उत्सव की शुरुआत बुंदेला  शासन के दौरान हुई थी। पांच सौ वर्षों से चली आ रही यह परंपरा हर युग में समयानुकूल रूप ग्रहण करती रही है, पर इसका मूल भाव आस्था और सामाजिक एकता  आज भी अक्षुण्ण है।बुंदेलखंड के लोगों के लिए यह आयोजन केवल धार्मिक श्रद्धा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अस्मिता से जुड़ा पर्व है। इस दौरान बुंदेली लोकगीतों, पारंपरिक नृत्यों और रीति-रिवाजों के माध्यम से लोक संस्कृति सजीव हो उठती है। विवाह की प्रत्येक रस्म  जैसे मंडप पूजन, हल्दी, तिलक, बारात, पांव पखराई या धनुष यज्ञ  न केवल धार्मिक अर्थ रखती है, बल्कि एक सामाजिक संवाद का माध्यम भी है, जहां लोग जाति, वर्ग और गांवों की सीमाओं से परे मिल बैठते हैं।

 

आधुनिकता के दौर में स्थायी परंपरा 

 

डिजिटल और तकनीकी युग में जब पारंपरिक धार्मिक आयोजन धीरे-धीरे सीमित हो रहे हैं, तब ओरछा और बिजावर जैसे स्थानों की यह परंपरा स्थिरता और जड़ता के बजाय नवजीवन का उदाहरण पेश करती है। इस वर्ष भी ओरछा में विवाह पंचमी पर तीन दिवसीय भव्य आयोजन की तैयारियां जोर-शोर से हो रही हैं।मंदिर प्रशासन ने पारंपरिक आमंत्रण की परंपरा को बनाए रखते हुए डिजिटल कार्ड तैयार किए हैं, जिन्हें सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से शेयर किया जा रहा है। साधु-संतों, जनप्रतिनिधियों, प्रदेश के मंत्रियों, और देश के प्रमुख धार्मिक संस्थानों को आमंत्रण भेजा गया है। यह न केवल आस्था का विस्तार है, बल्कि परंपरा का आधुनिक रूपांतरण भी है। जब परंपरा अपने मूल भाव को खोए बिना समय की रफ्तार से चलना सीख लेती है, तभी वह सजीव रहती है , ओरछा इसका सशक्त उदाहरण है।

23 नवम्बर को गणेश पूजन और भट्टी पूजन होगा।24 नवम्बर को मंडप की रस्म और पंगत का आयोजन रहेगा।25 नवम्बर को विवाह पंचमी पर भगवान श्रीराम की वर यात्रा निकलेगी और जनकपुर में श्री राम-जानकी का विवाह संपन्न होगा।26 नवम्बर की सुबह ‘राम कलेवा’ के साथ तीन दिवसीय आयोजन का समापन होगा ।

 

लोक जीवन की ऊर्जा और सामाजिक समरसता

 

श्रीराम-जानकी विवाह महोत्सव की   सामाजिक भूमिका भी है। यह आयोजन स्थानीय समाज को जोड़ने का अवसर देता है। भंडारे में हर वर्ग के लोग एक साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण करते हैं, जिससे सामाजिक समरसता की भावना प्रबल होती है। मंदिर समितियों, स्थानीय संगठनों और प्रशासन की संयुक्त भागीदारी इस आयोजन को सशक्त बनाती है।

 

ओरछा, बिजावर और ललितपुर  तीनों स्थानों पर यह पर्व क्षेत्रीय सहभागिता का उत्सव बन जाता है। यहां राम और सीता केवल देवी-देवता नहीं, बल्कि परिवार, प्रेम, सम्मान और मर्यादा के प्रतीक हैं। इनके विवाह की पुनःअभिव्यक्ति समाज को यह संदेश देती है कि परंपरा केवल अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक मूल्यों की अभिव्यक्ति है।

 

125 वर्ष पुरानी बिजावर की परंपरा'


 

छतरपुर जिले के बिजावर में यह आयोजन सवा सौ वर्षों से निरंतर प्रचलित है। महारानी कंचन कुँवर द्वारा आरंभ की गई यह रस्म आज भी उसी श्रद्धा से निभाई जाती है। हर वर्ष अयोध्या धाम जाकर देवताओं और ऋषि-मुनियों को हल्दी चावल देकर आमंत्रित किया जाता है। इस धार्मिक संवाद की सरल परंतु गहन परंपरा समर्पण, शुचिता और प्रतीकात्मक धार्मिक सम्बन्ध को अभिव्यक्त करती है।हाल के वर्षों में विधायक राजेश शुक्ला और तहसीलदार अभिनव शर्मा जैसे स्थानीय नेतृत्व ने इस आयोजन को प्रशासनिक सहयोग देकर इसकी गरिमा बढ़ाई है। यहां भी मंडप स्थापना, मायना, द्वारचार, धनुष यज्ञ, पांव पखराई जैसी रस्में वैदिक विधि से संपन्न होती हैं। 

 

पर्यटन और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव


 ओरछा में मनाए जाने वाले धार्मिक आयोजनों ने न केवल भक्तों को आकर्षित किया है, बल्कि धार्मिक पर्यटन को भी नई दिशा दी है। विवाह पंचमी महोत्सव के दौरान हजारों श्रद्धालु ओरछा पहुंचते हैं। इससे स्थानीय व्यापार, हस्तशिल्प, भोजन, परिवहन और आवास सेवाएं सक्रिय हो जाती हैं। ओरछा किला, जहांगीर महल, राय प्रवीण महल और बेतवा तट जैसे स्थल पर्यटकों के लिए आकर्षण के केंद्र बनते हैं।यह धार्मिक आयोजन अप्रत्यक्ष रूप से क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को गति देता है, जो वर्तमान ग्रामीण भारत के लिए अत्यंत सकारात्मक संकेत है। परंपरा और अर्थनीति का यह संतुलन दिखाता है कि संस्कृति केवल अतीत का अवशेष नहीं, बल्कि भविष्य की संभावनाओं का आधार भी बन सकती है।

 

आध्यात्मिकता और प्रशासनिक अनुशासन का संगम 


रामराजा मंदिर की सबसे विशिष्ट विशेषता है  राजसी गार्ड ऑफ ऑनर। हर दिन भगवान श्रीराम को औपचारिक सैनिक सम्मान मिलता है। यह नियम बताता है कि धार्मिकता और प्रशासनिक अनुशासन बुंदेलखंड की परंपरा में परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। यही समन्वय समाज के संगठन और अनुशासन का आदर्श प्रस्तुत करता है।आज जब राजनीति और सार्वजनिक जीवन में मूल्यों का क्षरण देखा जा रहा है, तब ओरछा का यह दृश्य  जहां भक्त और सैनिक एक साथ श्रद्धा अर्पित करते हैं  यह संदेश देता है कि धर्म यदि व्यवस्था के साथ संतुलित रहे, तो समाज सशक्त और स्थिर रहता है।

 

सांस्कृतिक चेतना का पुनर्जागरण

 

श्रीराम-जानकी विवाह उत्सव केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि बुंदेलखंड के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक है। यह त्योहार लोककलाओं, बुंदेली संगीत, लोकभाषा और सामुदायिकता की पुनःस्थापना करता है। महिलाओं द्वारा गाए जाने वाले मंगलगीत न केवल भजन हैं, बल्कि लोकसंस्कृति के जीवंत दस्तावेज़ हैं।यहां धर्म और संस्कृति एक-दूसरे में घुल-मिल जाते हैं, जहाँ पूजा और उत्सव के बीच कोई सीमा नहीं रहती। श्रद्धालु जब बारात में शामिल होकर राजा रामचंद्र की जयका उद्घोष करते हैं, तो वह केवल भक्ति का प्रदर्शन नहीं, बल्कि अपनी पहचान और परंपरा के प्रति सामूहिक अभिव्यक्ति होती है।संतुलन और निरंतरता का संदेश समाज में परंपराओं की प्रासंगिकता तभी बनी रहती है, जब वे बदलते समय के साथ तालमेल बिठा सकें। ओरछा का यह आयोजन इस संतुलन की मिसाल है। इसमें धार्मिकता का अनुशासन है, सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का विस्तार है और सामाजिक एकता की भावना है।

 

  ओरछा की गलियों से लेकर बिजावर के मंदिरों तक, श्री राम-जानकी विवाह महोत्सव हर वर्ष यह स्मरण कराता है कि परंपरा किसी जाती या क्षेत्र की नहीं, बल्कि संस्कृति की आत्मा है। यह उत्सव इतिहास, अध्यात्म और सामाजिक चेतना का ऐसा संगम है, जिसमें भक्ति और जीवनदर्शन एकाकार हो जाते हैं।पांच सौ वर्षों से चली आ रही यह परंपरा न केवल बुंदेलखंड के लोकजीवन को आलोकित करती है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक एकता का भी सशक्त प्रमाण है। जब पूरा नगर दुल्हन की तरह सजता है, बारात निकलती है, भजन गूंजते हैं और भक्त भावविभोर होकर नृत्य करते हैं तो यह केवल उत्सव नहीं, बल्कि उस विश्वास की अभिव्यक्ति है जिसने भारत की आत्मा को सदियों से जीवित रखा है।

14 नवंबर, 2025

डबल एम फैक्टर की अजब कहानी — बिहार में नीतीश की मुस्कान और तेजस्वी की मायूसी

 डबल एम फैक्टर की अजब कहानी बिहार में नीतीश की मुस्कान और तेजस्वी की मायूसी




आतंक का केंद्र बना विश्वविद्यालय: जांच के घेरे में शिक्षा का केंद्र

 आतंक का केंद्र बना विश्वविद्यालय: जांच के घेरे में शिक्षा का केंद्र

रवीन्द्र व्यास 

दिल्ली के समीप फरीदाबाद में स्थित

अल-फलाह विश्वविद्यालय  अचानक राष्ट्रीय सुर्खियों में आ गया है।
10 नवंबर को दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले के पास हुए बम धमाके की जांच जब आगे बढ़ी, तब पुलिस और केंद्रीय एजेंसियों की रडार पर ये विश्वविद्यालय आ गया। ट्रस्ट द्वारा संचालित यह संस्थान, जहाँ अब तक शिक्षा और चिकित्सा की उन्नत सुविधाओं इसकी पहचान थीं, अब सुरक्षा एजेंसियों के सख्त घेरे में है।

कैसे जुड़ा विश्वविद्यालय हमले से?

अल-फलाह विश्वविद्यालय का नाम पुलिस और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की तेजी से बढ़ती पड़ताल में तब आया, जब संस्थान से जुड़े तीन डॉक्टरों की गिरफ़्तारी हुई। इनमें फिजियोलॉजी विभाग के डॉ. मुज़म्मिल शकील, फार्माकोलॉजी विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. शाहीन सईद और जनरल मेडिसिन के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. उमर नबी शामिल हैं। तीनों पर दिल्ली धमाके में संलिप्तता और भारी मात्रा में विस्फोटक सामग्री रखने का आरोप है। जाँच में यह भी सामने आया कि विस्फोटक और हथियार फरीदाबाद के धौज एवं फतेहपुर तगा गांव के कमरों से प्राप्त हुए, जिन्हें डॉक्टरों ने किराए पर ले रखा था।  मालिक भी जांच के दायरे में हैं और इनमें एक विश्वविद्यालय की मस्जिद के इमाम पाए गए।

ट्रस्ट और प्रशासन की प्रतिक्रिया

ट्रस्ट व विश्वविद्यालय प्रशासन ने अपने स्तर से सभी आरोपों का खंडन किया है। मेडिकल साइंसेज कॉलेज की प्राचार्या डॉ. भूपिंदर कौर ने स्पष्ट कहा, “गिरफ्तार लोग हमारे संस्थान में केवल प्रोफेशनल हैसियत से कार्यरत थे, विश्वविद्यालय या कॉलेज की कोई संलिप्तता नहीं पाई गई।इसके अलावा, प्रशासन ने रसायन या विस्फोटक के कथित संबंधों को खारिज करते हुए, हर जांच एजेंसी को पूर्ण सहयोग देने का भरोसा दिया है।

छात्रों में सन्नाटा, भविष्य की चिंता

पूरा परिसर इस समय असहज और तनावपूर्ण माहौल से गुजर रहा है। मेडिकल व पैरा-मेडिकल कोर्स कर रहे सैकड़ों छात्र सशंकित हैं। छात्र मानते हैं कि यदि विश्वविद्यालय की साख खराब होती है तो उसकी डिग्री और रोजगार अवसरों पर भी असर पड़ेगा। कई ने डर के कारण स्थानांतरित होने की बात भी कही है। अस्पताल में मरीजों की संख्या भी काफी घट गई है, जिससे व्यवस्थाओं पर अप्रत्यक्ष आर्थिक दबाव भी देखने को मिल रहा है।

जांच का दायरा और साख की चुनौती

एनआईए, हरियाणा पुलिस, जम्मू-कश्मीर पुलिस और यूपी पुलिस द्वारा संयुक्त जांच का दायरा ट्रस्ट, विश्वविद्यालय और उससे जुड़े कर्मचारियों तक विस्तार किया जा चुका है। अभी तक की जांच किसी संगठित संस्थागत षड्यंत्र के स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं कर पाई है, लेकिन संस्थान सामाजिक और शैक्षिक स्तर पर गहरे संदेहों और बदनामी से जूझ रहा है।

 यह प्रकरण दिखाता है कि  आतंकवाद जैसी घटनाओं की जांच में निजी व सामाजिक संस्थाओं का भी अप्रत्यक्ष दुष्प्रभाव हो सकता है, | एनआईए और हरियाणा पुलिस की संयुक्त जांच अब विश्वविद्यालय, उससे जुड़े कर्मचारियों और ट्रस्ट की वित्तीय गतिविधियों तक विस्तृत हो गई है। जैसे-जैसे नए नाम सामने आ रहे हैं, अल-फलाह विश्वविद्यालय की साख पर और सवाल खड़े होते जा रहे हैं।

कभी शिक्षा और सामाजिक सेवा के नाम से रजिस्टर्ड यह विश्वविद्यालय अब "आतंक के साये में फंसा एक शिक्षण संस्थान" बनकर चर्चा में है। आने वाले दिनों में जांच एजेंसियों की रिपोर्ट तय करेंगी कि यह मामला व्यक्तिगत जिम्मेदारी का है या संस्थागत असावधानी का  लेकिन निश्चित है कि इस घटनाक्रम ने सैकड़ों छात्रों के भविष्य और विश्वविद्यालय की विश्वसनीयता दोनों को गहरे संकट में डाल दिया है।

09 नवंबर, 2025

राजनीति और परंपरा के बीच बुंदेलखंड

 


 बुंदेलखंड की डायरी 








राजनीति और परंपरा के बीच बुंदेलखंड

  सागर से फरीदाबाद तक, जहां आस्था, व्यंग्य और सत्ता आमने-सामने चलते हैं

रवीन्द्र व्यास 

बुंदेलखंड की मिट्टी इस हफ़्ते भी मौन नहीं रही। कहीं नेता खोजे जा रहे हैं, कहीं आस्था की आरती गूंज रही है, और कहीं सिविल ड्रेस में आई कहानी जांच-परख से पहले ही वायरल हो चुकी है। यह वही धरती है जहां लोक रीति और राजनीति, दोनों एक ही छतरी में सिर झुकाकर चलते हैं।

सागर: लापता नेता और जनता की खोज अभियान

सागर में कांग्रेस ने विचारधारा की नहीं, बल्कि नेताओं की लोकेशन खोजने की मुहिम शुरू कर दी। शहर की दीवारों पर चिपके पोस्टर पूछ रहे हैं  कहीं देखा है इन्हेंइनमें भाजपा सांसद, विधायक और महापौर के फोटो भी हैं।

जनता मुस्कराई, आखिर किसी ने तो पूछा कि हमारे नेता आख़िर दिखते कहां हैं। मोतीनगर से धर्मश्री तक सड़क चौड़ीकरण के नाम पर हुई बुलडोजर कार्रवाई में गरीबों के घर मिटे, मगर अमीरों की दीवारें टिकी रहीं। विडंबना यह कि पूरा विवाद विधायक के अपने वार्ड से उठा और वे खुद लापता सूची में शामिल पाए गए।

जब कार्यकर्ता धरने के लिए उनके घर पहुंचे, तो विधायक अचानक प्रकट हुए और जनता ने सीख ली  राजनीति में गायब होना भी प्रचार का हिस्सा है। 

दमोह: वीडियो, सस्पेंस और सिविल ड्रेस वाले सज्जन

दमोह का घटनाक्रम किसी राजनीतिक थ्रिलर से कम नहीं। युवक राघवेंद्र का दावा है कि उसे सिविल ड्रेस वाले कुछ लोग उठा ले गए, 15 किलोमीटर दूर वीडियो मिटाओ क्लास हुई, और बाद में पता चला कि वे तो पुलिसकर्मी थे।

असल में सारा विवाद शुरू हुआ था मंत्री जी पर  शराब बिक्री के  आरोप को लेकर ।

इधर राज्य मंत्री धर्मेंद्र सिंह ने फेसबुक पर लाइव होकर वीडियो को फेक बताया, और चेतावनी दी कि सरकार बदनाम करने वालों पर कार्रवाई होगी।

'सरकार को बदनाम करोगे तो पड़ेंगे डंडे'उन्होंने लाइव में कहा कि जो लोग अनर्गल टिप्पणियां कर उन्हें या सरकार को बदनाम करने की कोशिश करेंगे, उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी होगी और डंडे भी पड़ेगे। मंत्री ने आगे कहा कि पुलिस की कार्रवाई फेसबुकिया पर हुई है। मंत्री ने कहा में मेरे पिता और मैं खुद नशा मुक्त हूं। जब भगवती मानव संगठन राजनीतिक दल नहीं था, तब में उसका सदस्य भी रहा था

सोशल मीडिया पर बहस छिड़ी  मंत्री लोग भी तो फेसबुक पर ही बोलते हैं, तो फिर जनता की पोस्ट पर डंडा क्यों?

अब प्रदेश में हर वीडियो खुद खबर बन सकता है  राजनीति अब बयानबाजी से नहीं, कैमरा एंगल से चल रही है।

खजुराहो: जब पूजा और प्रतिबंध आमने-सामने आए

विश्व प्रसिद्ध खजुराहो में  सीजेआई पर जूता फेंकने वाले  अधिवक्ता राकेश किशोर ने श्री मतंगेश्वर महादेव मंदिर में आरती   के बाद कहा  मंदिरों में प्रदर्शन नहीं, दर्शन होने चाहिए।

उन्होंने ASI द्वारा पूजा रोकने को परंपरा पर प्रहार बताया और खंडित मूर्तियों की पुनः प्राणप्रतिष्ठा की वकालत की।उन्होंने  जवारी मंदिर में भगवान विष्णु की खंडित मूर्ति के दर्शन किए और कहा कि ऐसी मूर्तियों की पुनः प्राण-प्रतिष्ठा कर पूजा प्रारंभ की जानी चाहिए, क्योंकि खंडित विग्रहों की पूजा शास्त्र सम्मत नहीं है।

स्थानीय संतों और संगठनों ने खजुराहो बचाओ अभियान के माध्यम से यह संदेश दिया कि यह नगरी केवल स्थापत्य कला नहीं, बल्कि जीवित परंपरा की आत्मा है।

वहीं उन्होंने सैन्य एयरबेस की योजना को सांस्कृतिक खतरा बताते हुए विकल्प स्थल की मांग की।

 

भापेल का फुलेर मेला तालाब में भरा आस्था का जल

 बुंदेलखंड में कार्तिक मास की अपनी अनोखी परम्पराएं हैं  सागर जिले के भापेल गांव की पहाड़ी पर इस बार भी कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर 300 वर्ष पुराना बाबा फूल नाथ का फुलेर मेला सजा।

कहते हैं बाबा ने अपने तपस्थल पर खोदे इस तालाब को आशीर्वाद दिया था कि यह कभी सूखेगा नहीं  और आज भी उसका जल इस कथन को सत्य बनाता है।

मन्नत पूरी होने पर भक्त घंटा चढ़ाते हैं या मुंडन संस्कार करवाते हैं। बुंदेली बरेदी नृत्य, भजन, मिठाई और हस्तशिल्प की गूंज इस मेले को आस्था और लोकजीवन दोनों को  उत्सव बना देती है।

 

पदयात्रा में बढ़ते कदम: बागेश्वर महाराज और जनश्रद्धा

फरीदाबाद से निकली सनातन हिंदू एकता पदयात्रा दिन-ब-दिन भावनाओं का विराट संगम बनती जा रही है। बागेश्वर धाम के पीठाधीश पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री भक्ति और संगठन के सूत्र में लाखों श्रद्धालुओं को जोड़ रहे हैं।

वे कहते हैं मेहनत और पुरुषार्थ ही आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित रखेगा। यात्रा में वे घायलों की खुद मरहम-पट्टी करते हैं, युवा कदम मिलाते हैं, और महाराज नगाड़ा बजाकर झूम उठते हैं।

भक्तों के बीच क्रिकेटर शिखर धवन, उमेश यादव, महाबली खली तक शामिल हुए। केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने भी महाराज का आशीर्वाद लिया इस तरह राजनीति और संत समाज बिना आमंत्रण के फिर आमने-सामने आ गए।

अंततः 

सागर नेता ढूंढ रहा है, दमोह सच्चाई, खजुराहो पूजा की स्वतंत्रता, और भापेल लोक सांस्कृतिक संतुलन।

बुंदेलखंड की डायरी बस यही कहती है  यहाँ हर पोल के पीछे एक पोस्टर, हर मंदिर के पीछे एक विवाद, और हर यात्रा के पीछे एक विश्वास खड़ा है।

राजनीति, लोक संस्कृति और श्रद्धा  तीनों मिलकर इस भूभाग को बार-बार उसी सवाल तक ले आती हैं  कहां है असली जागरण, और कौन है वास्तव में लापता’?

01 नवंबर, 2025

खजुराहो एयरबेस: राष्ट्रीय सुरक्षा की नयी ऊंचाई और क्षेत्रीय पहचान की परीक्षा

 

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बुंदेलखंड की डायरी 

खजुराहो एयरबेस: राष्ट्रीय सुरक्षा की नयी ऊंचाई और क्षेत्रीय पहचान की परीक्षा

रवीन्द्र व्यास 

मध्य प्रदेश का खजुराहो अब केवल विश्व धरोहर मंदिरों का नगर नहीं रहेगाबल्कि यह भारतीय वायुसेना की सामरिक शक्ति का नया आधार बनने जा रहा है। रक्षा मंत्रालय ने खजुराहो में देश का सबसे बड़ा एयरबेस स्थापित करने की औपचारिक मंजूरी दे दी है। लगभग 1000 एकड़ भूमि खजुराहो एयरपोर्ट के समीप  चिन्हित की गई हैजहां अब लड़ाकू विमानों और भारी सैन्य परिवहन विमानों के संचालन का केंद्र विकसित होगा।

यह निर्णय केवल रक्षा व्यवस्था को मजबूत नहीं करेगाबल्कि मध्य भारत की भौगोलिक स्थिति को रणनीतिक संतुलन के केंद्र के रूप में परिभाषित करेगा। उत्तर और दक्षिण भारत के बीच स्थित यह क्षेत्र वायुसेना के लिए एक ऐसा कॉरिडोर सिद्ध हो सकता हैजहां से युद्धकालीन या आपातकालीन परिस्थितियों में त्वरित तैनाती आसान हो जाएगी। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसारइस एयरबेस की स्थापना भारत की वायु सुरक्षा परिदृश्य को मध्य और पूर्वी क्षेत्रों में पर्याप्त गहराई और संतुलन प्रदान करेगी।

सुरक्षा के दृष्टिकोण से क्यों चुना गया खजुराहो

रक्षा मंत्रालय द्वारा किए गए विश्लेषण में झांसीग्वालियर और प्रयागराज जैसे वैकल्पिक विकल्पों की तुलना में खजुराहो को सबसे उपयुक्त  पाया गया। इसके पीछे कई वैज्ञानिक और रणनीतिक कारण हैं। बुंदेलखंड का यह इलाका भूकंप की दृष्टि से स्थिर माना जाता है। इसका भूभाग पठारी है और यहां का मौसम सालभर सामान्य रहता हैजिससे उड़ानें प्रभावित नहीं होतीं। धुंधप्रदूषण और घनी आबादी का अभाव इस क्षेत्र को सुरक्षित और उपयुक्त बनाता है।

भौगोलिक दृष्टि से खजुराहो लगभग देश के मध्य में स्थित है। इससे देश के विभिन्न दिशाओं में समान दूरी और आकाशीय पहुँच संभव होती है। यह सामरिक सुविधा वायुसेना को किसी अप्रत्याशित स्थिति में त्वरित प्रतिक्रिया देने की ताकत प्रदान करेगी। सुरक्षा नीति निर्धारकों ने इन सभी पहलुओं पर गहन विचार कर खजुराहो को प्राथमिकता दी।

इसके अलावाहाल में सम्पन्न सैन्य अभियानों के अनुभवों से यह महसूस हुआ कि देश के भीतर सुरक्षित और तेज़ पहुँच वाले एयरबेस की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए। ताजिकिस्तान के आयनी एयरबेस को छोड़ने के बाद भारत की मध्य एशियाई उपस्थिति सीमित हो गई थी। इस पृष्ठभूमि में खजुराहो का नया केंद्र भारतीय वायुसेना के लिए सामरिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण कदम कहा जा सकता है।

एयरबेस से विकास और रोजगार की नई ऊर्जा

खजुराहो एयरबेस का प्रभाव केवल रक्षा तक सीमित नहीं रहेगा। यह बुंदेलखंड जैसी आर्थिक और औद्योगिक दृष्टि से पिछड़े मानी जाने वाली भूमि में विकास की नई लहर लाएगा। यहां सैन्य परिसरप्रशिक्षण विद्यालयविमान रखरखाव इकाइयांईंधन भंडारण केंद्र और बसाहट  क्षेत्र बनने से हजारों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित होंगे।

स्थानीय व्यापारियोंहोटल व्यवसायियोंट्रांसपोर्ट और निर्माण उद्योगों के लिए यह अवसरों का नया दौर लाएगा। बड़ी मात्रा में आने वाले कर्मियों की उपस्थिति क्षेत्र में सेवाआवासपरिवहन और भोजन आदि से जुड़ी गतिविधियों को बढ़ावा देगी। परिणामस्वरूप स्थानीय बाजारों में नए निवेश और आय प्रवाह की शुरुआत होगी।

राज्य सरकार के अनुसारएयरबेस परियोजना से सड़करेल और हवाई संपर्क को आधुनिक रूप दिया जाएगा। यह बुंदेलखंड को बाकी भारत से और बेहतर रूप से जोड़ेगा। साथ हीरक्षा संबंधी सहायक उद्योग जैसे रेडार उपकरणतकनीकी मरम्मतसंचार व्यवस्था और रक्षा आपूर्ति श्रृंखलाएं इस क्षेत्र की औद्योगिक प्रोफ़ाइल को मजबूत करेंगी।

पर्यटनसंस्कृति और पर्यावरण की चिंता


दूसरी ओरस्थानीय समाज के भीतर इस परियोजना के संभावित दुष्प्रभावों को लेकर चिंताएं भी उभर रही हैं। खजुराहो निवासी सुधीर शर्मा कहते हैं कि  खजुराहो का नाम विश्व सांस्कृतिक धरोहरों की सूची में उसके मंदिरों और कलात्मक परंपरा के कारण दर्ज है। यह नगर अपनी शांतप्राकृतिक और आध्यात्मिक पहचान से अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों को आकर्षित करता है। ऐसे में भारी सैन्य विमानअभ्यासों का शोरऔर लगातार वायु गतिविधियां इस शांति को प्रभावित कर सकती हैं।

पर्यावरणविदों का कहना है कि विमानन क्षेत्र से जुड़ी ईंधन और ध्वनि प्रदूषण की वजह से स्थानीय वन्यजीवों तथा आसपास के प्राकृतिक संतुलन पर दुष्प्रभाव पड़ सकता है। पर्यटन कारोबारी आशंकित हैं कि विदेशी पर्यटकों की संख्या घट सकती है। सामाजिक संस्थाएं चाहती हैं कि सरकार यहां संतुलित नीति अपनाए  ताकि विकास के साथ पारिस्थितिकी और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा भी हो सके।

महिला और युवा संगठनों ने भी सुझाव दिया है कि इस एयरबेस के साथ ऐसे प्रशिक्षण या शोध केंद्र विकसित किए जाएं जो स्थानीय कौशल और परंपराओं को आगे बढ़ाएंजैसे रक्षा उपकरणों में हस्तशिल्प वस्तुओं का प्रयोग या सांस्कृतिक प्रदर्शनी केंद्रजो खजुराहो की पारंपरिक पहचान बनाए रखें। 

राष्ट्रहित और स्थानीय संवेदनशीलता का संतुलन

यह प्रश्न अब केवल विकास का नहींबल्कि पहचान और अस्तित्व का भी है। खजुराहोजो भारत की कलात्मक आत्मा का प्रतीक हैआज राष्ट्र की सुरक्षा और स्थानीय परंपरा के संघर्ष में एक नया अध्याय लिखने जा रहा है। सरकार के लिए चुनौती यही है कि वह इस परियोजना को इस प्रकार क्रियान्वित करें कि न तो राष्ट्रीय सुरक्षा की तैयारी में कोई समझौता होऔर न ही खजुराहो की सांस्कृतिक आत्मा पर बुरा प्रभाव पड़े।

राष्ट्रहित सर्वोपरि है। देश की सीमाएं सुरक्षित होंगीतो ही उसके भीतर संस्कृतिधर्मपर्यटन और पहचान सुरक्षित रह सकेंगे। जैसे शरीर को स्थिर रहने के लिए मजबूत हृदय की आवश्यकता होती हैवैसे ही संस्कृति को बने रहने के लिए सुरक्षित राष्ट्र की जरूरत होती है। खजुराहो एयरबेस इसी दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है  एक ऐसा प्रतीक जो दिखाता है कि आधुनिकता और परंपरा विरोधी नहींबल्कि पूरक हो सकते हैं।

भविष्य का संतुलित दृष्टिकोण

रक्षा मंत्रालय का यह निर्णय भारत की दीर्घकालिक सुरक्षा नीति का हिस्सा हैपरंतु इसका सही लाभ तभी मिलेगा जब इसे पर्यावरणीय दृष्टि से स्थायी और जनहितकारी ढंग से क्रियान्वित किया जाए। पारदर्शी भूमि अधिग्रहणउचित मुआवजास्थानीय लोगों के लिए प्राथमिक रोजगार और सांस्कृतिक संरक्षण योजनाएं इस परियोजना की सफलता के प्रमुख आयाम होंगे। 

यदि इस दिशा में संवेदनशीलता और दूरदर्शिता रखी जाती हैतो खजुराहो केवल प्राचीन संस्कृति का प्रतीक नहीं रहेगाबल्कि यह आधुनिक भारत की रक्षा शक्तिआत्मनिर्भरता और विकासीय संतुलन का उदाहरण भी बनेगा।

 खजुराहो की धरतीजहां कलाअध्यात्म और स्थापत्य की आत्मा बसती हैअब राष्ट्र की सुरक्षा की आत्मा को भी अपना घर देने जा रही है। यह वह संगम है जहां परंपरा और प्रगति एक दूसरे को बल देते हुए भारत की सामूहिक चेतना का नया अध्याय रचेंगे।

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