06 जनवरी, 2020

प्रकृति के प्रहार से लुप्त होते देशी पान

बुंदेलखंड की डायरी 
 प्रकृति के प्रहार से लुप्त होते देशी  पान  
रवीन्द्र व्यास 
 बुंदेलखंड में  दिसंबर जाते जाते और नव वर्ष के आगमन पर प्रकृति का कुछ ऐसा कहर बरपा कि  नाजुक पान की  ८० फीसदी  फसल तबाह हो गई | लोग नव वर्ष का जश्न मना रहे थे और बुंदेलखंड के पान किसान अपनी दुर्दशा पर आंशू बहा रहे थे | | पान की नाजुक फसल देश दुनिया में हो रहे जलवायु परिवर्तन की मार झेलने में  सक्षम नहीं मानी जाती | इस बार बारिश और ओलों ने फसल तबाह की है , प्रकृति की मार का यह सिलसिला  बीते  दो दशकों से भी ज्यादा समय से चला आ रहा है | कभी पानी तो कभी सूखा तो कभी कीटों का आघात | हालात ये हो गए हैं कि बुंदेलखंड में नई पीढ़ी तो अब पान की उस  फसल से तौबा करने लगी है जो देश की साहित्य और  संस्कृति में रची बसी है | 
बुंदेलखंड का यह इलाका समशीतोष्ण जलवायु  लिए जाना जाता  है जो पान की फसल के लिए सर्वाधिक अनुकूल होता है ।  पिछले दो तीन दशकों में मौसम में भी बड़ा परिवर्तन आया है । जिसका परिणाम ये हुआ की जम कर सर्दी और  तीव्र गर्मी का प्रकोप यहाँ  रहने लगा ।  मौसम का यह परिवर्तन  पान की फसल के लिए अनुकूल नहीं रहा  जिस कारण हर साल पान फसल किसी ना किसी रूप में बर्बाद होती रही और यहां के लोगों  बर्बाद करती रही । इस साल लोग जब नव वर्ष का जश्न मनाने में व्यस्त थे तब बुंदेलखंड के पान किसान  अपनी बर्बादी पर आंशू बहा रहे थे लगातार ठण्ड ,बारिश और फिर ओलों की मार ने कुछ ऐसा कहर बरपाया कि पान की ८० फीसदी  फसल नष्ट हो गई |  सरकारी तौर पर इनके सर्वेक्षण का काम शुरू हो चुका है |  
पानी और ओलों के बाद जो 20 फीसदी फसल बची है वह भी शायद बाद में नहीं बच पाएगी  ऐसा  पान किसान मान कर चल रहे हैं इसके पीछे वे वजह बताते हैं कि  जब मौसम में अचानक उतार चढ़ाव होता है तो पान में  काली  रोग  लग जाता है इस रोग में   पान का चिकना हिस्सा काला हो जाता है और उसके उलट हिस्से पर सफ़ेद फफूंद सी जम जाती है ।यह रोग पान के पत्तों तक सीमित नहीं रहता  है बल्कि यह  पान की बेलों पर  लग जाता है ,  जिसके चलते पान के पत्ते झड़ने लगते  हैं    
 बुंदेलखंड इलाके के छतरपुर, पन्ना  , टीकमगढ़ ,महोबा , ललितपुर  में देशी पान की खेती होती है |  इन जिलों     के  लगभग २० हजार से ज्यादा लोग पान की खेती पर आश्रित रहते है\  छतरपुर जिले के ही गढ़ी मलहरा ,महराजपुर ,बारीगढ़ ,पिपट ,नागर ,गुलगंज  एसे गाँव हें ९०% लोग सिर्फ पान की खेती पर  आश्रित  रहते थे | आज हालात ये हो गई है कि पान फसलों का रकबा जो बुंदेलखंड में कभी २४५० हेक्टेयर हुआ करता था आज सिमट कर 250 हेक्टेयर ही रह गया है | 

देशी बनाम महोबिया पान ::  बुंदेलखंड का देशी पान जिसे महोबिया पान भी कहते हैं अपने  खास  स्वाद और तासीर के लिए जाना जाता है | दुनिया का यही एक मात्र पान ऐसा है जो मुंह में जा कर घुल जाता है | करारेपन के कारण ही यह पान यदि जमीं पर पटक दिया जाए तो टुकड़े टुकड़े हो जाता है | इसके स्वाद में भी लवंग का स्वाद मिलता है | पर  इसके इस स्वाद और तासीर को बरकरार रखने के लिए पान किसानो को खासी मशक्कत करनी पड़ती है | पान  की फसल के लिये  बुंदेलखंड में उर्वरकों का उपयोग नहीं किया जाता बल्कि  सरसों ,तिल,नीम या अरंडी की खली का प्रयोग किया जाता है,|  खली को चूर्ण करके मिटटी के पात्र में भिगो दिया जाता है तथा 10_15  दिन बाद उसे घोल बनाकर बेल की जडों पर दिया जाता है। इसे  और पौष्टिक बनाने के लिये उस घोल में गेंहू , चावल और चने के आटे का प्रयोग भी करते हैं।
                     पान का जहाँ बरेजा बनाया जाता है उस जमीन में नमी को पहले देख लिया जाता है | पान के बरेजों में जूता चप्पल पहन कर जाना वर्जित होता है | बेलों को पानी देने की पहले एक विशेष विधि अपनाई जाती है जिसमे बड़े मटके नुमा लुटिया को कंधे पर रख कर इस तरह से पानी दिया जाता था मानो उस बेल को जल अर्पण कर रहे हों | इसके पीछे पान का धार्मिक महत्व और बेल को नागबेल मानना मुख्य कारण माना जाता है | 
पान खेती का बुंदेलखंड में अतीत 
 बुंदेलखंड इलाके में महोबा ,ललितपुर ,  ( उ प्र )    मध्य प्रदेश के  छतरपुर जिला के महराजपुर गढ़ी मलहरा लवकुश नगर बारीगढ़ दिदवारा पिपट और पनागर, टीकमगढ़ ,पन्ना में  देशी (महोबिया ) पान के नाम से विख्यात  पान की खेती  छतरपुर जिले में कैसे शुरू हुई इसका भी अपना एक अलग इतिहास है । कहते हैं कि  1707 ई में महराज छत्रसाल  ने  महराजपुर  नगर  बसाया था , यहां लोग बस भी गए थे | महराजपुर के लोगों के सामने एक समस्या आई कि रोजगार तो कुछ है नहीं कया करेंगे ,तब महराज छत्रसाल ने   यहां के लोगों को रोजगार के साधन के लिए ,पान की  खेती  शुरू कराई थी । पान की खेती के  गुर और ज्ञान के लिए महोबा के पान किसानो का सहारा लिया गया था  । तभी से यह खेती इस जिले  साथपन्ना दमोह सागर और टीकमगढ़ जिले तक फैली । पर मुख्य तौर से देशी पान की खेती महोबा और छतरपुर जिले में ही होती है । रियासत काल में जिस पान की खेती को  राजा का संरक्षण मिलता था । जिसका परिणाम यह  था की यहां का पान देश ही  नहीं दुनिया  अनेको मुस्लिम देशों में जाता था । 
                                        देश आजाद हुआ  आजादी के बाद पान पर  कर भी लगने लगा था । मध्य प्रदेश में पान की कोई बड़ी मंडी नहीं है किन्तु उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद अलीगढ रामपुर मेरठ बदायूँ सहारनपुरमुजफ्फर नगर  आदि स्थानो पर  वहां की सरकार  मंडी टैक्स लगा दिया था ।  जिसे  बाद में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन  मुख्य मंत्री कमलापति त्रिपाठी ने समाप्त किया था ।  उत्तर प्रदेश से निपटने के बाद मध्य प्रदेश सरकार ने भी पान पर मंडी टैक्स ठोक   दिया ।  मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्य मंत्री  मोतीलाल वोरा ने समाप्त किया ।   मध्य प्रदेश में मंडी टैक्स के पहले पान किसानो से सेल टैक्स भी वसूला जाता था जिसे  तत्कालीन मुख्य मंत्री प्रकाशचंद्र सेठी  ने  समाप्त किया था । 
भारत की धर्म और संस्कृति में पान 
पान भारत की धर्म और संस्कृति का एक महत्वपूर्ण घटक माना जाता है | जन्म से लेकर मृत्यु तक के तमाम संस्कारों में पान बगैर पूजन अधूरा माना जाता है | कथा,पूजा में पान का उपयोग होता है | बुंदेलखंड में तो दशहरे का पान तो इतना विख्यात है कि रावण दहन के बाद दशहरा मिलने आने जाने वालों का स्वागत पान से ही किया जाता है | इस दिन अगर पान ना खिलाया जाए अथवा ना खाया जाए तो लोग बुरा मानने लगते हैं | 
संस्कृत साहित्य ,पुराणों आदि ग्रंथो में पान के महत्व का वर्णन मिलता है | पान को जहाँ धर्म और ऐश्वर्य का मुख्य साधन माना जाता है वही इसका उपयोग तांत्रिक क्रियाओं में भी देखने को मिलता है | राज दरबार में राजा के हाथ से पान के बीड़ा की प्राप्ति कर उस काल के विद्व्जन अपने आपको बड़ा धन्य मानते थे | पान को लेकर कई गीत कविताये और फ़िल्मी गीत भी लिखे गए हैं |  
औषधीय गुणों से भरपूर पान   
मुख शुद्धि के लिए अधिकांश लोग पान खाते हैं पर यह बहुत कम लोग जानते हैं कि पान औषधीय गुणों से भी भरपूर होता है | पान अपने औषधीय गुणों के कारण पौराणिक काल से ही उपयोग में आता  रहा है। आयुर्वेद ग्रन्थ सुश्रुत संहिता के अनुसार पान गले की खरास एवं खिचखिच को मिटाता है। यह मुंह के दुर्गन्ध को दूर कर पाचन शक्ति को बढ़ाता हैजबकि कुचली ताजी पत्तियों का लेप कटे-फटे व घाव के सड़न को रोकता है। इसे वाट नाशक ,कृमिनाशक ,कफदोष निवारक कामाग्नि उत्तेजक ,क्रान्ति वर्धक माना जाता है | वैज्ञानिको ने भी इसके औषधीय महत्व के गन दोषो को माना है | 
   पान में मुख्य रूप से फास्फोरस ,पौटेशि‍यम,कैल्शियम ,मेग्निश्यम ,कॉपर ,जिंक ,शर्करा ,कीनोलिक योगिक और विटामिन ए बी सी  पाया जाता है | पान फायदा तभी करता है जब इसे बगैर तम्बाखू के खाया जाय | 
 पान की खेती: भारत के अलावा म्यांमार ,श्रीलंका  में पान की खेती प्राचीन काल से ही की जाती रही  है। भारत के  अलग-अलग क्षेत्रों में इसे अलग- अलग नामों से पुकारा जाता है। इसे संस्कृत में नागबल्लीताम्बूल हिन्दी भाषी क्षेत्रों में पान, महराष्ट्र और गुजरात में  नागुरबेली तमिल में बेटटीलई,तेलगू में तमलपाकुकिल्लीकन्नड़ में विलयादेली  नाम से जाना  जाता है। भारत में सर्वाधिक मात्रा में पान की खेती कर्नाटक ,तमिलनाडु ,उड़ीसा ,और बिहार में होती है उसके बाद क्रमशः पश्चिम बंगाल ,असम (पूर्वोत्तर राज्य)आन्ध्रप्रदेश   उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश गुजरात  और राजस्थान में होती है | 
देश में लुप्त होता देशी पान 
   बुंदेलखंड  की मंडी से जाने वाला  पान कभी कभी पांच सौ करोड़ का कारोबार करता था आज हालात दो -तीन करोड़ के सालान कारोबार पर सिमट गई है । 
                 बुंदेलखंड का पान अपने  खास  स्वाद और तासीर के लिए पहंचाने जाने वाला    पान  प्रकृति की मार सरकार की उदासीनता के कारण  समय के साथ -साथ असाधारण होता जा रहा है ।  जिस पान की  फसल और व्यवसाय  से  हजारों लोगों को रोजगार मिलता था  अब  वह आंकड़ा धीरे धीरे सिमटने लगा है । कल तक जो मालिक होते थे आज मजदूरी करने को मजबूर हो रहे   हैं| दरअसल  आजादी के बाद से सरकारों ने  पान की फसलों को लेकर कागजी घोड़े तो खूब दौड़ाये पर जमीनी काम नहीं किया |   परिणाम  ये  हुआ की  पान किसान  जिन  समस्यायों  का पहले सामना  कर रह थे ,,आज भी उन्ही से जूझ रहे  है ।पिछले पच्चीस  वर्षो से बुंदेलखंड इलाके की पान की फसल लगातार किसी ना किसी कारण से खराब होती रही है ।  कभी सूखा रोग तो कभी प्रकृति का प्रकोप तो कभी कीटों का आघात । जरुरत एक बेहतर वैज्ञानिक सुविधा और बेहतर मुआवजे ताकि लुप्त होती देशी पान की फसल बची रहे |  





कोई टिप्पणी नहीं:

विकास की उमंग और चुनौतियों के संघर्ष का बुंदेलखंड

  बुंदेलखंड की डायरी  विकास की उमंग और चुनौतियों के  संघर्ष का  बुंदेलखंड  रवीन्द्र व्यास  दो राज्य में बटे बुंदेलखंड के लिए    2025  में कई...