20 जनवरी, 2020

पन्ना की जहरीली हो रही गंगा

बुंदेलखंड की डायरी
(रवीन्द्र व्यास)  
लगभग 10-11 लाख की आबादी वाला पन्ना जिला  देश वा बुन्देलखण्ड के उन जिलों में से एक है जो कई-कई मायनों में  अपनी अनोखी विरासत के लिए जाना जाता है ।  इसी नगर  में एक नदी बहती है किलकिला , जिसके अतीत की कहानी कम दिलचस्प नहीं है । लगभग चार।   सौ साल पहले यह एक  एसी जहरीली नदी थी कि जिसके ऊपर से निकलने में परिंदे भी डरते थे । किलकिला नदी का उदगम भी इसी जिले से होता है और विलीन भी इसी जिले में होती है । 
 दुनिया भर में फैले प्रणामी सम्प्रदाय के लोगों के लिए किलकिला नदी गंगा की तरह पूज्य है । इसके पीछे मान्यता है कि चार शताब्दी पूर्व इस जहरीली नदी को जहर मुक्त प्राणनाथ जी ने किया था । अब फिर इस नदी को जहरीली बनाने में लोग जुटे हैं । इसमें मिलने वाले गटर पन्ना की इस गंगा को मैला करने में कोई कसर नहीं छोड़ते  इतना ही नहीं बड़ी देवी मंदिर के पुल से रानी बाग़ तक लगभग दो सौ एकड़ में नदी किनारे सब्जियों की फसल लहलहा रही है | जहरीले पानी से सिंचित यही सब्जियां पन्ना के लोगों के घरों, होटलो ,विवाह घरों  में पहुँच रही हैं | कृषि वैज्ञानिक जहरीले पानी से सिंचित  सब्जियों को सेहत के लिए हानिकारक मानते हैं | 
एन जी टी के निर्देशों की अनदेखी 
2016 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने प्रदेश सरकार को निर्देशित किया था कि सीवर के पानी से प्रदेश में कहा कहाँ सब्जियों का उत्पादन किया जा रहा है इसका पता लगाए | चूँकि किसी भी तरह के दूषित जल से सिचाई कर उगाई जाने वाली सब्जियां लोगों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं इस लिए ऐसी सब्जियों के उत्पादन पर ना सिर्फ रोक लगाए बल्कि उगाई गई सब्जियों को नष्ट किया जाए | 

 किंवदंतियों की किलकिला:-
                   पन्ना जिले के बहेरा के समीप  छापर टेक पहाड़ी   से निकलने वाली गंगा बेसिन की  यह किलकिला नदी पन्ना टाइगर रिजर्व से होती हुई  सलैया भापतपुर के मध्य  केन नदी में विलीन हो जाती है । जिले में ४५ किमी  बहने वाली यह नदी  केन नदी में मिलने से   पहले (किमी पूर्व ) यह  अपना नाम भी बदल लेती है । वहां लोग इसे माहौर नदी  नाम से जानते हैं । एक नदी के दो नाम  प्रायः कहीं सुनने में नहीं मिलते । सदियों से प्रवाहित हो रही इस  नदी को लेकर तरह तरह की किवदंतियाँ भी यहां खूब प्रचलित हैं । कहते हैं की जब घोड़ा इस नदी का पानी पी लेता तो घुड़सवार और घुड़ सवार के पीने पर घोड़ा मर जाता था । स्वामी लाल दास ने अपने एक लेख में लिखा है की किलकिला नदी को कुढ़िया नदी भी कहते हैं क्योंकि इस जल के उपयोग करने से  कोढ़ हो जाता था ।  एक और किवदंती यह भी है की यह नदी इतनी विषैली थी की  जब कोई पक्षी इसके ऊपर से निकलता था तो वह मर जाता था । 
388 वर्ष पूर्व नदी का जल बना अमृत :                                             मान्यता है की  किकिला के इस विषैले जल को अमृत बनाया  निजानन्द सम्प्रदाय के प्राणनाथ जी ने । संवत 1684 में वे इसी किलकिला नदी के तट पर आये थे । यहाँ जब उन्हें  स्नान करने की इक्षा हुई तो स्थानीय आदिवासियों ने उन्हें  नदी में स्नान करने से  रोका था । कहते हैं तब  उनके अंगूठे के स्पर्श मात्र से यह विषाक्त जल अमृत हो गया था  ।  वह स्थान आज भी अमराई घाट के नाम  से जाना जाता है ।  यह  स्थान  निजानन्द  सम्प्रदाय में  पवित्र स्थल माना जाता है । प्राण नाथ  यही बस गए  उनका प्राणनाथ  मंदिर   निजानन्द सम्प्रदाय के लोगों के लिए किसी तीर्थ स्थल से कम नहीं है और किलकिला नदी उनके लिए गंगा की तरह पूज्यनीय है । इस सम्प्रदाय को मानने वाले दुनिया भर में फैले लोग  इस नदी का जल ले जाते हैं  । आज भी इस सम्प्रदाय से जुड़े लोगों की मृत्यु  के बाद उनकी अस्थियो को  नदी किनारे बने मुक्ति धाम में ही दफ़नाया  जाता  हैं ।  मान्यता है की इससे जीव को मुक्ति मिलती है । 
          पन्ना की इस  किलकिला नदी के उद्धार के लिए नगर पालिका के तत्कालीन अध्यक्ष ब्रजेंद्र सिंह बुंदेला ने प्रयास किये थे ।  उनके जाने के बाद  इस ओर कोई प्रशासनिक प्रयास नहीं हुए ।   कुछ स्वयं सेवी संघठनो ने नदी को जीवंत बनाने का प्रयास अवश्य किया । नदी की जलकुम्भी साफ़ की  खूब प्रचार प्रसार भी किया  पर नदी के हाल आज भी जस के तस बने हुए हैं । नदी में आज भी नगर की गन्दी नालियों का पानी मिल रहा है ।  जगह जगह कीचड़ के कारण आज यह दम तोड़ती नदी बन कर रह गई है  
                               देश में संस्कृतियों और नगरों का विकाश भले ही सरोवरों और नदियों के तट पर हुआ हो किन्तु आज के दौर  की संस्कृति ने  सरोवरों और नदियों को मारने का सिलसिला शुरू कर दिया है  । कहते हैं कि  गौण राजवंश द्वारा   किलकिला नदी के तट पर  पन्ना नगर बसाया गया था । 13 वी सदी में महाराज छत्रसाल ने पन्ना पर अपना अधिकार जमा कर अपनी रियासत की स्थापना   की थी । उनके समय नदी तालाबों के साथ साहित्य और सनातन संस्कृति के विकास में कई तरह के काम हुए । आज उसी किलकिला नदी को समाप्त करने का सिलसिला जाने अनजाने में जारी है   । मजे की बात यह है कि मध्यप्रदेश सरकार नदी पुनर्जीवित करने का अभियान चला रही है । एसे समय में किलकिला नदी के किलिंग अभियान पर सरकार और जनता का मौन समझ से परे है । 
रवीन्द्र व्यास    




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