28 जनवरी, 2020

माँ का शव घर ले जाने से पुत्र का इंकार

कलयुग के  पूत


छतरपुर / / 28 जनवरी 2020 / नगर के दर्शना वृद्ध सेवाश्रम में रहने वाली फूलवती चौरसिया पत्नी स्व राम गोपाल चौरसिया (८३) का अंतिम संस्कार वृद्धाश्रम समिति के लोगों को करना पड़ा  | इसके पीछे समिति के लोग बताते हैं कि फूलवती के पुत्र ने अपनी माँ की मृत देह को घर ले जाने से इंकार कर दिया था | दाह  क्रिया के मौके पर पुत्र तो पहुंचा तो जरूर पर बेगानो की तरह |


             वृद्धाश्रम के प्रबंधक दिनेश वैद्द्य ने बताया कि 14 फरवरी 2017 को फूलवती ने जनसुनवाई में तत्कालीन कलेक्टर रमेश भंडारी को एक  आवेदन पत्र  दिया था | पत्र में उसने अपने बेटे बहु के द्वारा साथ ना रखने का आरोप लगाया था | इस आवेदन पर कलेकटर ने फूलवती को वृद्धाश्रम में रखने के निर्देश दिए थे | तभी से वह वृद्धाश्रम में रह रही थी | उसने बतया था की उसके तीन पुत्र थे एक खत्म हो गया था , दो में एक हराम खिलावन के पास वह रहती थी ,पर वह रखना नहीं चाहता | दुसरा पुत्र शिवकुमार कुछ करता धरता नहीं है उसकी पत्नी भी उसे छोड़ कर भाग गई है |

                         दिनेश ने बताया की २७ को जब फूलवती की मृत्यु हुई तो इसकी सूचना उसके पुत्र राम खिलावांन को दी गई | उसके पुत्र ने अपनी माँ के शव को लेने से इंकार कर दिया | ऐसी दशा में समिति ने स्वयं ही फूलवती के अंतिम संस्कार की व्यवस्था की और समिति के हेमंत बबेले ने एक पुत्र की तरह सारी रश्म अदा की | हालांकि अंतिम संस्कार के मौके पर फूलवती का पुत्र रामखिलावन पहुँच अवश्य गया था | दिनेश ने फूलवती के शव को पुत्र द्वारा ना लिए जाने के कारण के सम्बन्ध में बताया की राम खिलावांन को उसकी पत्नी ने धमकी दी थी की यदि शव घर पार लाये तो में आत्म ह्त्या कर लूंगी | संभवतः इसी वजह से वह बाद में  फोन नहीं उठा रहा था | बाद में उसके नौगांव स्थित वेयर हाउस के अधिकारियों से जब संपर्क किया गया तब कही जा कर वह आया था |

                         रामखिलावन ने इस मसले पर कहा की वह दाह क्रिया में पहुंच गया था | दो बच्चो के पिता राम खिलावन ने माँ के शव को घर ना ले जाने और पत्नी की धमकी के सम्बन्ध में कहा की वह पहुंच गया था |

                       

23 जनवरी, 2020

अंग्रेजी मीडिया मुझे बदनाम करने में लगा है० विवेक अग्निहोत्री

एक संवाद विवेक अग्निहोत्री के साथ_

//रवीन्द्र व्यास//
खजुराहो में  तीन-दिवसीय खजुराहो लिटरेचर फेस्टिवल (केएलएफ 2020)   सफलतापूर्वक संपन्न हो गया। भारतीय संस्कृति , भारत और भारतीयता के नाम यह   सम्मेलन  खजुराहो में लोकनीति द्वारा आयोजित किया गया था | सम्मलेन में भाग लेने आये जाने माने  फिल्म निर्माता ,निर्देशक और लेखक विवेक अग्निहोत्री ने भाषा से  चर्चा में भारतीय धर्म ,लोक धर्म और आधुनिक पीढ़ी के भटकाव पर चिंता जताई |  

  फिल्मकार विवेक अग्निहोत्री ने एक सवाल के जबाब में कहा कि  नई जनरेशन जो है वह  कला साहित्य इन सब से दूर होती  जा रही  है|   मेन कारण यह है कि हम लोग बातें चाहे जितनी करें पर सभी की आकांक्षा यही रहती  है कि बच्चा कान्वेंट में जाए|  हमें लगता है कि हम लोग मॉडर्न हो रहे हैं हम मॉडल नहीं हो रहे हैं बल्कि और पिछड़ रहे हैं अपनी पहचान को अपने अस्तित्व को छोड़ो रहे हैं ,ओढ़ा  हुआ व्यक्तित्व कभी जीवन में खुशी नहीं दे सकता | जो अपनी जड़ों  को ही नहीं  पहचानता उसमें फल नहीं लग सकते ,ऐसा मेरा सोचना है ऐसा मेरा अनुमान है |  मैं भोपाल में पड़ा मुझे कभी खजुराहो के बारे में नहीं पढ़ाया नहीं गया मुझे कभी भोपाल मांडू या ग्वालियर के बारे में पढ़ा या नहीं गया , पढ़ाया गया बड़ी बड़ी चीज  रोमन एंपायर अकबर के बारे में, जब आपको लोकल हिस्ट्री ही नहीं पता आप कुछ भी पढ़ ले तो उससे आपको कोई फायदा नहीं होने वाला|   नई जनरेशन को सही दिशा देने का  दायित्व हमारा ,परिवार  समाज का भी है मीडिया का भी है सरकार का भी है कि सबका कलेक्टिव दाइत्व  है कि उसको संस्कृति और साहित्य से अवगत कराएं |
ण। 
 
  फ़िल्मी दुनिया की व्यस्तता के बावजूद सामाजिक जागरूकता  के लिए सतत कार्य करने के सवाल पर अग्निहोत्री जी ने बताया कि  जो फ्रीडम मूवमेंट आया था उसमें बहुत वॉलिंटियर ने काम किया देश के लिए बहुत काम किया|  अब हम लोग धीरे-धीरे अपने में ही सीमित होते जा रहे हैं ,अपने लिए ही काम करते हैं, देश जाए  भाड़ में ||  बातें खूब करते हैं सोशल मीडिया में लिख दी  दो चार बातें प्रदूषण मत करो पेड़ मत काटो और हमारी जिम्मेदारी खत्म |  मैंने यह सोचा कि मैं क्या कर सकता हूं कोई धन्ना सेठ तो हूं नहीं कि उनको पैसे दे पाऊं पूरी दुनिया में घूमता हूं देखता हूं समझता हूं वह कहानी मैं लोगों को सुना सकता हूं |  इसलिए मैंने जगह जगह जाकर लोगों को कॉलेज में यूनिवर्सिटी में स्कूल में यूथ को अपने स्टोरी से प्रेरणा मिल सके  और उनको भी आप अपने समाज और देश के प्रति गर्व हो सके और भारत के पुनर्निर्माण में अपना योगदान दे सकें |   इसमें अपना छोटा सा हिस्सा प्ले कर सकूं इसलिए ये सब करता हूँ |  इसलिए मैंने एक किताब भी लिखी  इस तरह की फिल्में भी बनाई आप देखिए कि मैं लेख लिखता रहता हूं वीडियो बनाता रहता हूं और उसी दिशा में सारे कार्य हैं | 


 इन दिनों वालीवुड पर ये आरोप लगते हैं कि  हिन्दू विरोधी मानसिकता से फिल्मे बनाई जा रही हैं ?  फिल्मों में हिंदुत्व के विरुद्ध  लगातार किए जा रहे हमले के पीछे के कारणों के संबंध में उन्होंने कहा कि हमारी उपेक्षा का परिणाम है , लोग आप का मजाक उड़ाते रहे ,आपने उस पर ध्यान नहीं दिया उसका कोई जवाब नहीं दिया और आप अपने में ही मशगूल रहे|  आप अपना ही काम करते रहे इसलिए भी धीरे-धीरे यह  जो लोग हैं जिनका कार्य ही यह है जिनको पैसे ही इसी  बात के मिलते  हैं कि वह केवल समाज को तोडे ,|   गलत प्रचार करते रहे हम सहन करते रहे सुनते रहे लेकिन लेकिन अब जो नई जनरेशन हैं वह जागरूक हो गई है इस बात पर वह सवाल खड़े करने लगी है इस बात पर इतने साल से कोई नहीं बोला अब सवाल उठने लगे हैं कि यह गलत हो रहा है यह बात आपने भी नोटिस की होगी बहुत अच्छा परिवर्तन है धीरे-धीरे हालात सुधरेंगे अभी मैं अकेला हूं।  सारा बॉलीवुड एक तरफ मैं अकेला लड़ाई लड़ रहा हूं धीरे धीरे और नए लोग जुड़ते जाएंगे और नए लोगों को प्रेरणा मिलेगी वह सामने आते रहेंगे | 

 अकेले क्यों हैं के सवाल पर उन्होंने कहा के अंग्रेजी मीडिया किसी भी तरह से मुझे बदनाम करने में मेरा बुरा करने में लगा रहता है लेकिन देश का जो रीजनल मीडिया है जो असली मेहनत करने वाले लोग हैं जिनके पास करोड़ों की प्रॉपर्टी नहीं है उन लोगों में मेरा बड़ा प्रेम का रिश्ता है  वह में मेरी बात भी समझते हैं|  फिल्म ताशकंद फाइल को बनाने के पीछे अपने मकसद को उन्होंने स्पष्ट किया कि मेरा मकसद था 1  भारत के नागरिकों को जो मौलिक अधिकार जो होना चाहिए कि हर सच वह जाने हमें हर सच पता चले हमें पता ही नहीं चला देश  के  पीएम की मृत्यु का सच ही पता ना चला तो आप छोटे-मोटे सच के बारे में भूल ही जाइए उसके खिलाफ आवाज उठाने की एक छोटी सी मुहिम थी इसी तरह हमने कश्मीर फाइल भी बनाई उसका सच भी सबके सामने  आया बहुत सारी चीजें हैं जो इस देश में | 

 खजुराहो आए फिल्म निर्माता निर्देशक और लेखक विवेक अग्निहोत्री ने खजुराहो लिट्रेटचेर फेस्टिवल में अपने  विचार व्यक्त करते हुए देश के मौजूदा हालातों के साथ ,धर्म ,अध्यात्म, खजुराहो के मंदिर ,काश्मीर के हिन्दुओं के उत्पीड़न,,राष्ट्र पुनर्निर्माण ,भविष्य के अखंड भारत के बारे में विस्तार से अपने विचार व्यक्त किये थे | 

20 जनवरी, 2020

पन्ना की जहरीली हो रही गंगा

बुंदेलखंड की डायरी
(रवीन्द्र व्यास)  
लगभग 10-11 लाख की आबादी वाला पन्ना जिला  देश वा बुन्देलखण्ड के उन जिलों में से एक है जो कई-कई मायनों में  अपनी अनोखी विरासत के लिए जाना जाता है ।  इसी नगर  में एक नदी बहती है किलकिला , जिसके अतीत की कहानी कम दिलचस्प नहीं है । लगभग चार।   सौ साल पहले यह एक  एसी जहरीली नदी थी कि जिसके ऊपर से निकलने में परिंदे भी डरते थे । किलकिला नदी का उदगम भी इसी जिले से होता है और विलीन भी इसी जिले में होती है । 
 दुनिया भर में फैले प्रणामी सम्प्रदाय के लोगों के लिए किलकिला नदी गंगा की तरह पूज्य है । इसके पीछे मान्यता है कि चार शताब्दी पूर्व इस जहरीली नदी को जहर मुक्त प्राणनाथ जी ने किया था । अब फिर इस नदी को जहरीली बनाने में लोग जुटे हैं । इसमें मिलने वाले गटर पन्ना की इस गंगा को मैला करने में कोई कसर नहीं छोड़ते  इतना ही नहीं बड़ी देवी मंदिर के पुल से रानी बाग़ तक लगभग दो सौ एकड़ में नदी किनारे सब्जियों की फसल लहलहा रही है | जहरीले पानी से सिंचित यही सब्जियां पन्ना के लोगों के घरों, होटलो ,विवाह घरों  में पहुँच रही हैं | कृषि वैज्ञानिक जहरीले पानी से सिंचित  सब्जियों को सेहत के लिए हानिकारक मानते हैं | 
एन जी टी के निर्देशों की अनदेखी 
2016 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने प्रदेश सरकार को निर्देशित किया था कि सीवर के पानी से प्रदेश में कहा कहाँ सब्जियों का उत्पादन किया जा रहा है इसका पता लगाए | चूँकि किसी भी तरह के दूषित जल से सिचाई कर उगाई जाने वाली सब्जियां लोगों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं इस लिए ऐसी सब्जियों के उत्पादन पर ना सिर्फ रोक लगाए बल्कि उगाई गई सब्जियों को नष्ट किया जाए | 

 किंवदंतियों की किलकिला:-
                   पन्ना जिले के बहेरा के समीप  छापर टेक पहाड़ी   से निकलने वाली गंगा बेसिन की  यह किलकिला नदी पन्ना टाइगर रिजर्व से होती हुई  सलैया भापतपुर के मध्य  केन नदी में विलीन हो जाती है । जिले में ४५ किमी  बहने वाली यह नदी  केन नदी में मिलने से   पहले (किमी पूर्व ) यह  अपना नाम भी बदल लेती है । वहां लोग इसे माहौर नदी  नाम से जानते हैं । एक नदी के दो नाम  प्रायः कहीं सुनने में नहीं मिलते । सदियों से प्रवाहित हो रही इस  नदी को लेकर तरह तरह की किवदंतियाँ भी यहां खूब प्रचलित हैं । कहते हैं की जब घोड़ा इस नदी का पानी पी लेता तो घुड़सवार और घुड़ सवार के पीने पर घोड़ा मर जाता था । स्वामी लाल दास ने अपने एक लेख में लिखा है की किलकिला नदी को कुढ़िया नदी भी कहते हैं क्योंकि इस जल के उपयोग करने से  कोढ़ हो जाता था ।  एक और किवदंती यह भी है की यह नदी इतनी विषैली थी की  जब कोई पक्षी इसके ऊपर से निकलता था तो वह मर जाता था । 
388 वर्ष पूर्व नदी का जल बना अमृत :                                             मान्यता है की  किकिला के इस विषैले जल को अमृत बनाया  निजानन्द सम्प्रदाय के प्राणनाथ जी ने । संवत 1684 में वे इसी किलकिला नदी के तट पर आये थे । यहाँ जब उन्हें  स्नान करने की इक्षा हुई तो स्थानीय आदिवासियों ने उन्हें  नदी में स्नान करने से  रोका था । कहते हैं तब  उनके अंगूठे के स्पर्श मात्र से यह विषाक्त जल अमृत हो गया था  ।  वह स्थान आज भी अमराई घाट के नाम  से जाना जाता है ।  यह  स्थान  निजानन्द  सम्प्रदाय में  पवित्र स्थल माना जाता है । प्राण नाथ  यही बस गए  उनका प्राणनाथ  मंदिर   निजानन्द सम्प्रदाय के लोगों के लिए किसी तीर्थ स्थल से कम नहीं है और किलकिला नदी उनके लिए गंगा की तरह पूज्यनीय है । इस सम्प्रदाय को मानने वाले दुनिया भर में फैले लोग  इस नदी का जल ले जाते हैं  । आज भी इस सम्प्रदाय से जुड़े लोगों की मृत्यु  के बाद उनकी अस्थियो को  नदी किनारे बने मुक्ति धाम में ही दफ़नाया  जाता  हैं ।  मान्यता है की इससे जीव को मुक्ति मिलती है । 
          पन्ना की इस  किलकिला नदी के उद्धार के लिए नगर पालिका के तत्कालीन अध्यक्ष ब्रजेंद्र सिंह बुंदेला ने प्रयास किये थे ।  उनके जाने के बाद  इस ओर कोई प्रशासनिक प्रयास नहीं हुए ।   कुछ स्वयं सेवी संघठनो ने नदी को जीवंत बनाने का प्रयास अवश्य किया । नदी की जलकुम्भी साफ़ की  खूब प्रचार प्रसार भी किया  पर नदी के हाल आज भी जस के तस बने हुए हैं । नदी में आज भी नगर की गन्दी नालियों का पानी मिल रहा है ।  जगह जगह कीचड़ के कारण आज यह दम तोड़ती नदी बन कर रह गई है  
                               देश में संस्कृतियों और नगरों का विकाश भले ही सरोवरों और नदियों के तट पर हुआ हो किन्तु आज के दौर  की संस्कृति ने  सरोवरों और नदियों को मारने का सिलसिला शुरू कर दिया है  । कहते हैं कि  गौण राजवंश द्वारा   किलकिला नदी के तट पर  पन्ना नगर बसाया गया था । 13 वी सदी में महाराज छत्रसाल ने पन्ना पर अपना अधिकार जमा कर अपनी रियासत की स्थापना   की थी । उनके समय नदी तालाबों के साथ साहित्य और सनातन संस्कृति के विकास में कई तरह के काम हुए । आज उसी किलकिला नदी को समाप्त करने का सिलसिला जाने अनजाने में जारी है   । मजे की बात यह है कि मध्यप्रदेश सरकार नदी पुनर्जीवित करने का अभियान चला रही है । एसे समय में किलकिला नदी के किलिंग अभियान पर सरकार और जनता का मौन समझ से परे है । 
रवीन्द्र व्यास    




06 जनवरी, 2020

प्रकृति के प्रहार से लुप्त होते देशी पान

बुंदेलखंड की डायरी 
 प्रकृति के प्रहार से लुप्त होते देशी  पान  
रवीन्द्र व्यास 
 बुंदेलखंड में  दिसंबर जाते जाते और नव वर्ष के आगमन पर प्रकृति का कुछ ऐसा कहर बरपा कि  नाजुक पान की  ८० फीसदी  फसल तबाह हो गई | लोग नव वर्ष का जश्न मना रहे थे और बुंदेलखंड के पान किसान अपनी दुर्दशा पर आंशू बहा रहे थे | | पान की नाजुक फसल देश दुनिया में हो रहे जलवायु परिवर्तन की मार झेलने में  सक्षम नहीं मानी जाती | इस बार बारिश और ओलों ने फसल तबाह की है , प्रकृति की मार का यह सिलसिला  बीते  दो दशकों से भी ज्यादा समय से चला आ रहा है | कभी पानी तो कभी सूखा तो कभी कीटों का आघात | हालात ये हो गए हैं कि बुंदेलखंड में नई पीढ़ी तो अब पान की उस  फसल से तौबा करने लगी है जो देश की साहित्य और  संस्कृति में रची बसी है | 
बुंदेलखंड का यह इलाका समशीतोष्ण जलवायु  लिए जाना जाता  है जो पान की फसल के लिए सर्वाधिक अनुकूल होता है ।  पिछले दो तीन दशकों में मौसम में भी बड़ा परिवर्तन आया है । जिसका परिणाम ये हुआ की जम कर सर्दी और  तीव्र गर्मी का प्रकोप यहाँ  रहने लगा ।  मौसम का यह परिवर्तन  पान की फसल के लिए अनुकूल नहीं रहा  जिस कारण हर साल पान फसल किसी ना किसी रूप में बर्बाद होती रही और यहां के लोगों  बर्बाद करती रही । इस साल लोग जब नव वर्ष का जश्न मनाने में व्यस्त थे तब बुंदेलखंड के पान किसान  अपनी बर्बादी पर आंशू बहा रहे थे लगातार ठण्ड ,बारिश और फिर ओलों की मार ने कुछ ऐसा कहर बरपाया कि पान की ८० फीसदी  फसल नष्ट हो गई |  सरकारी तौर पर इनके सर्वेक्षण का काम शुरू हो चुका है |  
पानी और ओलों के बाद जो 20 फीसदी फसल बची है वह भी शायद बाद में नहीं बच पाएगी  ऐसा  पान किसान मान कर चल रहे हैं इसके पीछे वे वजह बताते हैं कि  जब मौसम में अचानक उतार चढ़ाव होता है तो पान में  काली  रोग  लग जाता है इस रोग में   पान का चिकना हिस्सा काला हो जाता है और उसके उलट हिस्से पर सफ़ेद फफूंद सी जम जाती है ।यह रोग पान के पत्तों तक सीमित नहीं रहता  है बल्कि यह  पान की बेलों पर  लग जाता है ,  जिसके चलते पान के पत्ते झड़ने लगते  हैं    
 बुंदेलखंड इलाके के छतरपुर, पन्ना  , टीकमगढ़ ,महोबा , ललितपुर  में देशी पान की खेती होती है |  इन जिलों     के  लगभग २० हजार से ज्यादा लोग पान की खेती पर आश्रित रहते है\  छतरपुर जिले के ही गढ़ी मलहरा ,महराजपुर ,बारीगढ़ ,पिपट ,नागर ,गुलगंज  एसे गाँव हें ९०% लोग सिर्फ पान की खेती पर  आश्रित  रहते थे | आज हालात ये हो गई है कि पान फसलों का रकबा जो बुंदेलखंड में कभी २४५० हेक्टेयर हुआ करता था आज सिमट कर 250 हेक्टेयर ही रह गया है | 

देशी बनाम महोबिया पान ::  बुंदेलखंड का देशी पान जिसे महोबिया पान भी कहते हैं अपने  खास  स्वाद और तासीर के लिए जाना जाता है | दुनिया का यही एक मात्र पान ऐसा है जो मुंह में जा कर घुल जाता है | करारेपन के कारण ही यह पान यदि जमीं पर पटक दिया जाए तो टुकड़े टुकड़े हो जाता है | इसके स्वाद में भी लवंग का स्वाद मिलता है | पर  इसके इस स्वाद और तासीर को बरकरार रखने के लिए पान किसानो को खासी मशक्कत करनी पड़ती है | पान  की फसल के लिये  बुंदेलखंड में उर्वरकों का उपयोग नहीं किया जाता बल्कि  सरसों ,तिल,नीम या अरंडी की खली का प्रयोग किया जाता है,|  खली को चूर्ण करके मिटटी के पात्र में भिगो दिया जाता है तथा 10_15  दिन बाद उसे घोल बनाकर बेल की जडों पर दिया जाता है। इसे  और पौष्टिक बनाने के लिये उस घोल में गेंहू , चावल और चने के आटे का प्रयोग भी करते हैं।
                     पान का जहाँ बरेजा बनाया जाता है उस जमीन में नमी को पहले देख लिया जाता है | पान के बरेजों में जूता चप्पल पहन कर जाना वर्जित होता है | बेलों को पानी देने की पहले एक विशेष विधि अपनाई जाती है जिसमे बड़े मटके नुमा लुटिया को कंधे पर रख कर इस तरह से पानी दिया जाता था मानो उस बेल को जल अर्पण कर रहे हों | इसके पीछे पान का धार्मिक महत्व और बेल को नागबेल मानना मुख्य कारण माना जाता है | 
पान खेती का बुंदेलखंड में अतीत 
 बुंदेलखंड इलाके में महोबा ,ललितपुर ,  ( उ प्र )    मध्य प्रदेश के  छतरपुर जिला के महराजपुर गढ़ी मलहरा लवकुश नगर बारीगढ़ दिदवारा पिपट और पनागर, टीकमगढ़ ,पन्ना में  देशी (महोबिया ) पान के नाम से विख्यात  पान की खेती  छतरपुर जिले में कैसे शुरू हुई इसका भी अपना एक अलग इतिहास है । कहते हैं कि  1707 ई में महराज छत्रसाल  ने  महराजपुर  नगर  बसाया था , यहां लोग बस भी गए थे | महराजपुर के लोगों के सामने एक समस्या आई कि रोजगार तो कुछ है नहीं कया करेंगे ,तब महराज छत्रसाल ने   यहां के लोगों को रोजगार के साधन के लिए ,पान की  खेती  शुरू कराई थी । पान की खेती के  गुर और ज्ञान के लिए महोबा के पान किसानो का सहारा लिया गया था  । तभी से यह खेती इस जिले  साथपन्ना दमोह सागर और टीकमगढ़ जिले तक फैली । पर मुख्य तौर से देशी पान की खेती महोबा और छतरपुर जिले में ही होती है । रियासत काल में जिस पान की खेती को  राजा का संरक्षण मिलता था । जिसका परिणाम यह  था की यहां का पान देश ही  नहीं दुनिया  अनेको मुस्लिम देशों में जाता था । 
                                        देश आजाद हुआ  आजादी के बाद पान पर  कर भी लगने लगा था । मध्य प्रदेश में पान की कोई बड़ी मंडी नहीं है किन्तु उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद अलीगढ रामपुर मेरठ बदायूँ सहारनपुरमुजफ्फर नगर  आदि स्थानो पर  वहां की सरकार  मंडी टैक्स लगा दिया था ।  जिसे  बाद में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन  मुख्य मंत्री कमलापति त्रिपाठी ने समाप्त किया था ।  उत्तर प्रदेश से निपटने के बाद मध्य प्रदेश सरकार ने भी पान पर मंडी टैक्स ठोक   दिया ।  मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्य मंत्री  मोतीलाल वोरा ने समाप्त किया ।   मध्य प्रदेश में मंडी टैक्स के पहले पान किसानो से सेल टैक्स भी वसूला जाता था जिसे  तत्कालीन मुख्य मंत्री प्रकाशचंद्र सेठी  ने  समाप्त किया था । 
भारत की धर्म और संस्कृति में पान 
पान भारत की धर्म और संस्कृति का एक महत्वपूर्ण घटक माना जाता है | जन्म से लेकर मृत्यु तक के तमाम संस्कारों में पान बगैर पूजन अधूरा माना जाता है | कथा,पूजा में पान का उपयोग होता है | बुंदेलखंड में तो दशहरे का पान तो इतना विख्यात है कि रावण दहन के बाद दशहरा मिलने आने जाने वालों का स्वागत पान से ही किया जाता है | इस दिन अगर पान ना खिलाया जाए अथवा ना खाया जाए तो लोग बुरा मानने लगते हैं | 
संस्कृत साहित्य ,पुराणों आदि ग्रंथो में पान के महत्व का वर्णन मिलता है | पान को जहाँ धर्म और ऐश्वर्य का मुख्य साधन माना जाता है वही इसका उपयोग तांत्रिक क्रियाओं में भी देखने को मिलता है | राज दरबार में राजा के हाथ से पान के बीड़ा की प्राप्ति कर उस काल के विद्व्जन अपने आपको बड़ा धन्य मानते थे | पान को लेकर कई गीत कविताये और फ़िल्मी गीत भी लिखे गए हैं |  
औषधीय गुणों से भरपूर पान   
मुख शुद्धि के लिए अधिकांश लोग पान खाते हैं पर यह बहुत कम लोग जानते हैं कि पान औषधीय गुणों से भी भरपूर होता है | पान अपने औषधीय गुणों के कारण पौराणिक काल से ही उपयोग में आता  रहा है। आयुर्वेद ग्रन्थ सुश्रुत संहिता के अनुसार पान गले की खरास एवं खिचखिच को मिटाता है। यह मुंह के दुर्गन्ध को दूर कर पाचन शक्ति को बढ़ाता हैजबकि कुचली ताजी पत्तियों का लेप कटे-फटे व घाव के सड़न को रोकता है। इसे वाट नाशक ,कृमिनाशक ,कफदोष निवारक कामाग्नि उत्तेजक ,क्रान्ति वर्धक माना जाता है | वैज्ञानिको ने भी इसके औषधीय महत्व के गन दोषो को माना है | 
   पान में मुख्य रूप से फास्फोरस ,पौटेशि‍यम,कैल्शियम ,मेग्निश्यम ,कॉपर ,जिंक ,शर्करा ,कीनोलिक योगिक और विटामिन ए बी सी  पाया जाता है | पान फायदा तभी करता है जब इसे बगैर तम्बाखू के खाया जाय | 
 पान की खेती: भारत के अलावा म्यांमार ,श्रीलंका  में पान की खेती प्राचीन काल से ही की जाती रही  है। भारत के  अलग-अलग क्षेत्रों में इसे अलग- अलग नामों से पुकारा जाता है। इसे संस्कृत में नागबल्लीताम्बूल हिन्दी भाषी क्षेत्रों में पान, महराष्ट्र और गुजरात में  नागुरबेली तमिल में बेटटीलई,तेलगू में तमलपाकुकिल्लीकन्नड़ में विलयादेली  नाम से जाना  जाता है। भारत में सर्वाधिक मात्रा में पान की खेती कर्नाटक ,तमिलनाडु ,उड़ीसा ,और बिहार में होती है उसके बाद क्रमशः पश्चिम बंगाल ,असम (पूर्वोत्तर राज्य)आन्ध्रप्रदेश   उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश गुजरात  और राजस्थान में होती है | 
देश में लुप्त होता देशी पान 
   बुंदेलखंड  की मंडी से जाने वाला  पान कभी कभी पांच सौ करोड़ का कारोबार करता था आज हालात दो -तीन करोड़ के सालान कारोबार पर सिमट गई है । 
                 बुंदेलखंड का पान अपने  खास  स्वाद और तासीर के लिए पहंचाने जाने वाला    पान  प्रकृति की मार सरकार की उदासीनता के कारण  समय के साथ -साथ असाधारण होता जा रहा है ।  जिस पान की  फसल और व्यवसाय  से  हजारों लोगों को रोजगार मिलता था  अब  वह आंकड़ा धीरे धीरे सिमटने लगा है । कल तक जो मालिक होते थे आज मजदूरी करने को मजबूर हो रहे   हैं| दरअसल  आजादी के बाद से सरकारों ने  पान की फसलों को लेकर कागजी घोड़े तो खूब दौड़ाये पर जमीनी काम नहीं किया |   परिणाम  ये  हुआ की  पान किसान  जिन  समस्यायों  का पहले सामना  कर रह थे ,,आज भी उन्ही से जूझ रहे  है ।पिछले पच्चीस  वर्षो से बुंदेलखंड इलाके की पान की फसल लगातार किसी ना किसी कारण से खराब होती रही है ।  कभी सूखा रोग तो कभी प्रकृति का प्रकोप तो कभी कीटों का आघात । जरुरत एक बेहतर वैज्ञानिक सुविधा और बेहतर मुआवजे ताकि लुप्त होती देशी पान की फसल बची रहे |  





03 जनवरी, 2020

CAA. गांधी की इक्षा को कानूनी जामा पहनाया है:: बी डी शर्मा

 पत्रकार वार्ता की
छतरपुर 03 जनसरकार ने तो केवल वही काम किया हैजिसका आदेश महात्मा गांधी ने 26 सितम्बर 1947 को दिया था। 
गांधी जी की इच्छा को कानूनी जामा पहनाने का काम भाजपा ने किया है  गांधी जी ने कहा था-पाकिस्तान में रहने वाले हिन्दू हर नजरिए से भारत आ सकते हैंयदि वह वहां निवास नहीं करना चाहते। उन्हें नौकरी देनाउनके जीवन को सामान्य बनानाभारत सरकार का कर्तव्य  है। यह बात आज बीजेपी के सांसद बी डी शर्मा ने पत्रकार वार्ता में कही ।
 बीजेपी  नागरिकता संशोधन अधिनियम के समर्थन में जनमानस बनाने के लिए हर जिला में  पत्रकार वार्ता  कर रही है ।
 खजुराहो सांसद एवं भारतीय जनता पार्टी प्रदेश महामंत्री बीडी शर्मा ने कांग्रेस सहित उन सभी दलो   नागरिकता संशोधन के नाम पर देश में आग लगाने का आरोप लगाते हुए कहा कि वे गांधीजी का भी अपमान कर रहे हैं। 
विरोध करने वालो के पास इस बात का क्या जवाब है कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की संख्या 23 प्रतिशत थी जो आज 3.7 प्रतिशत रह गई है  इसी प्रकार बांग्लादेश में 22 प्रतिशत थी जो आज 7.8 प्रतिशत हो गई है। 
ठीक इसी के उलट भारत में मुस्लिमों की संख्या 9.8 प्रतिशत थीजो आज 14 प्रतिशत के ऊपर हो गई है।नये कानून का विरोध करने वाले और देश में अराजकता फैलाने वालो बताये  कि पाकिस्तान और बांग्लादेश आदि के अल्पसंख्यक हिंदूसिखइसाईजैनबौद्धपारसी आदि को आसमान निगल गया या वे जमीन में समां गए।
पाकिस्तान और बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों को स्वभाविक हैया तो मार दिया गयाया धर्म परिवर्तन करा दिया गयाया उन्हें देश छोडक़र भागना पड़ा।
गैर मुसलमानों की बेटियों का अपहरण कर सामूहिक बलात्कार किए गए। पुरूषों को मार दिया गया और बचे-खुचे लोग भारत आ गए हैंउन्हें अब कांग्रेस और वामपंथी जीने का अधिकार देना नहीं चाहते। 
आज नागरिकता संशोधन के नाम पर जो लोग बवाल कर रहे हैंवे भी मुसलमानों के हितचिंतक नहीं हैं। सच तो यह है कि यह वह लोग हैं जिन्होंने मुसलमानों को पीढ़ी दर पीढ़ी डरा कर कभी देश की मुख्य धारा में आने नहीं दिया। नागरिकता संशोधन कानून में बहुत स्पष्ट रूप से नागरिकता देने का प्रावधान हैलेने का नहीं।  कुछ लोग तीन ही देषों का विषय उठा रहे हैंहम उन्हें कहना चाहते हैं कि यह तीनों इस्लामिक देश हैं इसलिए स्वभाविक रूप से वहां धार्मिक आधार पर मुसलमानों का धार्मिक उत्पीडऩ नहीं हो सकता है।  
भारत में पश्चिम बंगाल में 1955 में, 1960 में, 1970 में, 1980 में और 1990 में या फिर 2014 में आए उन सभी शरणार्थियों को नागरिकता दी जाएगी।  कुछ लोग सोषल मीडिया पर पूछ रहे हैंकि घुसपैठियों और शरणार्थियों में फर्क क्या हैसाफ है कि ऐसे लोगों की बुद्धि खराब है या फिर वह स्वार्थों के कारण मुर्खतापूर्ण बातें कर रहे हैं। कुछ लोग कह रहे हैं कि यह बिल मुसलमानों के खिलाफ हैं। हम ऐसे लोगों को चुनौती देते हैं कि वे पूरे कानून में एक लाइन मुसलमानों के खिलाफ ढंूढकर बताएं। देश में बाहर के मुसलमानों को भी नागरिकता देने का प्रावधान है।  मोदी जी के शासनकाल में ही पिछले वर्षों में 566 मुसलमानों को नागरिकता दी गई है।  अदनाम सामी जैसे तमाम नामीग्रामी लोग आज भारत में रहकर गौरव का अनुभव कर रहे हैंलेकिन उसकी पूर्व निर्धारित प्रक्रिया है जिसके तहत वे आवेदन कर सकते हैं।
कांग्रेसीवामपंथी और मायावती जैसे लोग नागरिकता कानून का विरोध करके उस वर्ग पर भी अत्याचार कर रहे हैंजिसे हम अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग कहते हैंक्योंकि भारत आने वाले शरणार्थियों में 70 प्रतिशत से अधिक अनुसूचित जाति और जनजाति के पीडि़त भाई-बहन हैं।
क्यानागरिकता कानून का विरोध करने वाले हिन्दूसिखइसाईजैनबौद्धपारसी आदि की बेटियों और बहनों के साथ पाकिस्तानबांग्लादेश जैसे स्थानों पर किए जा रहे बलात्कारों का अप्रत्यक्ष समर्थन नहीं कर रहे हैंक्याऐसे लोग इन देशों में अल्पसंख्यों के कत्लेआम मंदिरों की तोडफ़ोड़ और संपत्तियों को आग लगाने की आतंकी कार्यवाही का समर्थन नहीं कर रहे?
नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करने वालों को देश को यह बताना चाहिए कि अगर यह पीडि़त शरणार्थी भारत में शरण नहीं लेंगे या भारत इन्हें नागरिकता नहीं देगा तो दुनिया में कौन सा ऐसा देश हैजो इन्हें नागरिकता देने के लिए तैयार होगा  नागरिकता संशोधन अधिनियम के संबंध में कहा 12 दिसम्बर 2019 को विधेयक राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद कानून बना।
अफगानिस्तानबांग्लादेश और पाकिस्तान से धार्मिक प्रताडऩा के कारण आए लोग भारत के नागरिक बन सकेंगे। 
स्वाभाविक हैजिनकी धार्मिक प्रताडऩा हुई हैवह गैर इस्लामिक हैं।
ऐसे सभी लोग जो 31 दिसम्बर 2014 से पूर्व भारत में प्रवेश कर चुके हैं।  पहले यह प्रावधान 11 वर्षों का था और अब वर्षों की निवास अवधि प्रमाणित करनी होगी ।
 शर्मा ने   मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पर आरोप लगाया कि वह    सब कुछ जानकर भी वोटों के लालच में और अपने आकाओं को खुश करने के लिए नागरिकता कानून को मध्यप्रदेश में लागू नहीं करने की बात कह रहे हैं। 
जबकि नागरिकता देना और नहीं देना यह राज्यों का विषय ही नहीं होता। नागरिकता देश की होती हैप्रदेश की नहीं। यह कमलनाथ भी भलिभांति जानते हैंलेकिन दुर्भाग्य से इस मानवीय विषय पर भी वे वोटों की फसल उंगाने का प्रयास कर रहे हैं। 

पाकिस्तानबांग्लादेश आदि स्थानों पर अल्पसंख्यकों के ऊपर जो अत्याचार हुए हैंउनका विषय आज का नहीं हैजो कांग्रेसी और वामपंथी हंगामा कर रहे हैं। वे जरा यह जान लें कि इस विषय पर कबकिसने क्या कहा:-
साल 2005 में यूपीए सरकार में मंत्री विदेश राज्य मंत्री ई. अहमद ने हयूमन राइट्स कमीषन ऑफ पाकिस्तान की रिपोट्र्स का हवाला देते हुए कहा था कि पाकिस्तान में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा हो रही है।
साल 2007 में विदेश राज्यमंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने बताया कि पाकिस्तान से हिंदू भारी संख्या में भारत आ रहे हैं। इसके लिए पूर्ववर्ती और तत्कालीन सरकारों ने राहत भी प्रदान की थी ।
साल 2010 में लोकसभा में विदेश मंत्री एस.एम.कृष्णा ने बताया कि सरकार को पाकिस्तान में हिंदुओं के खिलाफ अत्याचारों की जानकारी है ।
साल 2011 में भी विदेश राज्य मंत्री प्रणीत कौर ने सदन को भरोसा दिलाया कि सरकार हिंदुओं के उत्पीडऩ पर चिंतित है ।
साल 2014 में यूपीए सरकार ने आधिकारिक रूप से बताया कि 1,11,754 पाकिस्तानी नागरिक साल 2013 में वीजा लेकर भारत आये हैंलेकिन बड़ी संख्या मं हिंदू और सिख वीजा की अवधि खत्म होने पर भी भारत में रह रहे हैं। 
ऐसा ही बांग्लादेश में हिंदुओं के उत्पीडऩ की जानकारी भी सरकारों की जानकारी में थी। साल 2003 में विदेश राज्यमंत्री विनोद खन्ना ने बताया कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हिंसा और अत्याचार की खबरें समय-समय पर मिलती रहती हैं।
 असम के मुख्यमंत्री तरूण गोगोई ने प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को 20 अपै्रल, 2012 को एक मेमोरंडन दिया था। उन्होंने बांग्लादेश में धार्मिक आधार पर उत्पीडि़तों को भारतीय बताते हुए कहा कि उन्हें भारत सरकार विदेषियों की तरह बर्ताव न करे। 
 कांग्रेस जिस कानून का विरोध कर रही हैउसके निमित किस महापुरूष ने क्या कहा-12 जुलाई, 1947 की प्रार्थना सभा में महात्मा गांधी ने कहा - जिन लोगों को पाकिस्तान से भगाया गया थाउन्हें पता होना चाहिए कि वे पूरे भारत के नागरिक थे.... उन्हें यह महसूस करना चाहिए कि वे भारत की सेवा करने और उनकी महिमा से जुडऩे के लिए पैदा हुए हैं। 
 27 फरवरी 1950 को कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में जारी बयान पट्टाभि सीतारमैया ने कहा - संघर्ष और पीड़ा का वह सिलसिला जारी है और बार-बार संकट पैदा करता है। वर्तमान में अनिवार्य रूप से पूर्व और पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यकों की रक्षा करने का मुद्दा है। 
15 नवंबर 1947 को एआईसीसी में जे.बी. कृपलानी ने कहा - हमें पाकिस्तान से आने वालों के लिए भारती संघ के सेवा और समझौतों के संदर्भ में केंद्रीय और प्रांतीय नियमों को सहज कर देना चाहिए।
 25 जनवरी 1948 को नेषनल हेराल्ड में जवाहर लाल नेहरू ने कहा - मुझे लगता है कि केंद्रीय राहत कोष का उपयोग करना वांछनीय होगाजिसका उपयोग किसी भी प्रकार की आपातकालीन राहत के लिए किया जा सकता हैलेकिन जिसका उपयोग अब विषेष रूप से पाकिस्तान से शरणार्थियों के राहत और पुनर्वास के लिए किया जाना चाहिएजो भारत आए हैं।
 फरवरी 1948 को सरदार पटेल के भेजे गये पत्र में अबुल कलाम आजाद ने कहा - षिक्षा मंत्रालय पाकिस्तान से पलायन कर दिल्ली आए सरकारी सेवा में कार्यरत अधिकांष शरणार्थी षिक्षकों को अवसर प्रदान करने की कोषिष कर रहा है।
 19 अप्रैल 1950 को उद्योग और आपूर्ति मंत्री पद से इस्तीफे पर संबोधन में श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने कहा- मैं एक बात कहना चाहता हॅू कि बंगाल की समस्या एक प्रांतीय समस्या नहीं है। यह एक अखिल भारतीय मुद्दे को उठाती है और इसके उचित समाधान पर पूरे देश की आर्थिक और राजनीतिक दोनों तरह की शांति और समृद्धि निर्भर करेगी।
इस सबके बावजूद कांग्रेस और अन्य देशद्रोही ताकतें जो कर रही हैं उसके विरूद्ध जनमानस खड़ा हो चुका

रवीन्द्र व्यास 

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