बुंदेलखंड की डायरी
बालू पर बवाल
रवीन्द्र व्यास
बुंदेलखंड सहित देश दुनिया में बालू को लेकर अजब तरह का बवाल मचा है | बालू वो बला है जिसके बिना अब किसी का आसियान नहीं बन सकता , विकाश की गाथा लिखने वाला निर्माण पथ पूर्ण नहीं हो सकता , आधुनिकता की दौड़ के लिए आवश्यक गाड़ियों के कांच , स्मार्ट फोन की स्क्रीन , फोन और कम्प्यूटर की सिलिकॉन चिप बगैर सिलिका बालू के बन नहीं सकती | अब ऐसी बालू जो बहकर नदी नालों से आती हो उसको हथियाना और बेचना समाज के लोगों का राज धर्म बन गया है | उनके इस राजधर्म में अवरोध पैदा करने वालों को ठिकाने लगाने के लिए भला किसे संकोच होगा , इसी लिए बालू के बवाल में आये दिन गोलिया चलने , बालू में दबाकर मारने की ख़बरें आती रहती हैं | बुंदेलखंड की केन नदी तो इसका जीता जाता उदाहरण है , जहां कथित तौर पर सरकार के सहयोग से इस नदी की ह्त्या की जा रही है | सरकार कोई भी हो इरादे सबके समान हैं सिर्फ माता कर्णावती ( केन नदी ) को धीरे धीरे मौत के आगोश में भेजने वालों के चेहरे बदल जाते हैं |
बुंदेलखंड की केन नदी जिसका प्राचीन नाम कर्णावती था , जिसका अपना एक अलग इतिहास है ,| बुंदेलखंड की इस पवित्र और प्राचीनतम नदी के अस्तित्व को मिटाने का काम निर्बाध गति से चल रहा है | इस नदी का दोष सिर्फ इतना है कि इसने अपने जल से लोगों का कल सवार दिया ,लोगों के लिए आर्थिक समृद्धि के द्धार खोले | जो इसके जल के पुण्य प्रताप से समृद्ध हो गए ,उनकी लालसा और बढ़ गई , वो सिर्फ नदी से पानी ही नहीं चाहते बल्कि नदी अपने साथ लाने वाली बालू और नायब पत्थरों पर भी अपना अधिकार समझते हैं | अपने इस अधिकार के तहत ही वे सैकड़ों मशीने लेकर नदी के सारी बालू को लूट लेना चाहते हैं | जब किनारे नहीं मिलती तो बीच नदी में मशीन लगाकर बालू निकाली जाती है | बालू लूट के इस खेल में जनतंत्र के सारे पहरेदार जुटे हैं , चाहे वे सफ़ेद लिबास में जन सेवक का चोल ओड़ने वाले लोग हों अथवा वे लोग जिन के कंधे पर तंत्र को व्यवस्थित करने की जिम्मेदारी हो | हालात ये हैं कि चौकीदार ही सबसे बड़े लुटेरे हो गए हैं |
पिछले दिनों छतरपुर आये नदी न्यास मंत्री कम्प्यूटर बाबा ने केन नदी में अवैध रेट उत्खनन को एक बड़ा मुद्दा बताया था , उन्होंने इसकी रोकथाम के लिए २हजार साधु सन्यासी तैनात करने की बात भी कही थी | केन के तट पर तो नहीं आये कम्यूटर बाबा अलबत्ता नर्मदा तट पर उन्होंने बड़ा तामझाम फैला कर बालू पर बबाल मचाया | कम्प्यूटर बाबा के बाद आये खनिज मंत्री प्रकाश जैसवाल ने खजुराहो में पत्रकार वार्ता की , इस वार्ता में कंप्यूटर बाबा के सवाल पर मंत्री जी ने कहा की उनके बारे में मैं बहुत ज्यादा नहीं जानता | यह कह कर उन्होंने जिले में हो रहे बालू के अवैध उत्खनन पर एक तरह से चुप्पी साध ली | हालांकि इसके पहले चंदला के पूर्व विधायक आर डी प्रजापति ने छतरपुर कलक्ट्रेट के सामने कई दिनों धरना दिया और बाद में अर्थी निकाल कर और पतला दहन कर अपने आंदोलन की इतिश्री कर ली | उनकी मांग थी की जिले बालू के अवैध उत्खनन और परिवहन पर प्रतिबन्ध लगाया जाए | बजरंग सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष रणवीर पटेरिया ने भी कलेक्टर के नाम ज्ञापन देकर जिले में बालू के अवैध खनन और हो रही हत्याओं को लेकर धारा 144 लगाने की मांग की थी |
दरअसल केन नदी की रेत निर्माण कार्यों के लिए सर्वाधिक उपयुक्त मानी जाती है | केन की बालू की मांग उत्तर प्रदेश के कानपूर ,लखनऊ ,इ लेकर गोरखपुर तक है | इसी के चलते रेत के इस खेल में सत्ता से जुड़े लोग भी सम्मलित हो गए हैं | जो बाकायदा नियमानुसार काम करते हैं | खदान किसी की भी हो ५० फीसदी की हिस्सेदारी इस तंत्र को चाहिए | जिसमे सभी तरह के तंत्र की व्यवस्था की जाती है वह भी नियमानुसार , जो इस तंत्र से अलग चलने का प्रयास करता है उसकी खदान चल नहीं सकती , और प्रशासन को मशीने और डम्पर पकड़ने के मौका मिल जाता है | इस तरह प्रचार भी हो जाता है कि प्रशासन ने बड़ी मात्रा में मशीने और डम्पर पकड़ कर बालू के अवैध कारोबार पर लगाम लगाईं | अब इतनी सुविधाएं भला कहाँ मिलेंगी जहाँ आपको लूटने और नदी के विनाश की पूर्ण आजादी हो | आप चाहे नदी के बीच में मिटटी डाल कर नदी का प्रवाह रोक दें , आपको प्रशासनिक तंत्र का पूर्ण सहयोग मिलेगा | कोई आपसे यह नहीं पूंछेगा कि आप नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के नियमो का कितना पालन करते हैं | छापा मारने के पहले आपको पूर्व सूचना दे दी जायेगी , इसके लिए आपको खनिज विभाग में पिछले पांच वर्षो से तैनात नगर सैनिकों के पास अपने नंबर देने होंगे | सारा कार्य पूर्ण निष्ठां और ईमान दारी से होगा | रही बात केन नदी के अस्तित्व के बचे रहने की तो इसकी चिंता भला तंत्र को करने की जरुरत क्या है | जिसे आने वाले समय में विपत्ति झेलना है वह वर्तमान में बोलने की दशा में नहीं है |
बालू के इस लूट अभियान के चलते केन नदी के विनाश का जो सिलसिला चल रहा है उसकी रोकथाम के लिए कब सार्थक प्रयास होंगे कहा नहीं जा सकता | पर एक बात अवश्य पर्यावरण के जानकार समझाने की कोशिश करते हैं की दुनिया में हर साल ५० अरब टन बालू का उपयोग होता है | आसानी से उपलब्ध होने वाली बालू की यह इतनी बड़ी मात्रा है की यह हमेशा उपलब्ध नहीं रह सकती है | दुनिया भर के अनेक देशो के शोध कर्ता इसके विकल्प की तलाश में जुटे हैं | कई पश्चिमी देशो में तो बालू के उत्खनन पर प्रतिबन्ध ही लगा दिया गया है | यह हालात अपने यहां ना बने इसके लिए जरुरी है की पर्यावरण संरक्षण के नियमो को समझे और उसका पालन करें और करवाए |


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