09 दिसंबर, 2019

बरसाती नदी में बदलती केन नदी

बुंदेलखंड की डायरी 
 बरसाती नदी में बदल रही केन नदी 

रवीन्द्र व्यास 

रंग ,गंध,स्वाद हीन जल ही निर्मलता की वह कसौटी ही जिसकी चाहत हर व्यक्ति को रहती है  | ये जल ही जो मानव  सभ्यताओं के विकाश में अपना योगदान देता है जल विहीन क्षेत्र में  जीव  के अस्तित्व की कल्पना नहीं की जा सकती है सरोवर के तट और कल कल बहती सदा नीरा नदी की धार मन को शान्ति ही नहीं एक नई ऊर्जा भी प्रदान करती है |  बुंदेलखंड की  केन नदी सरकार के कागजो में अब भी सदा नीरा है यह नदी  एशिया की उन नदियों में शुमार है जो  गैर  प्रदूषित  मानी जाती है |   बुंदेलखंड के पन्ना,छतरपुर और बांदा जिले  की जीवन दायनी  केन नदी का अपना एक अलग इतिहास और पौराणिक महत्व हैइसके उद्गम स्थल से लेकर इसके तटवर्ती  इलाकों में    धर्म और अध्यात्म की  जहाँ  अविरल धारा प्रवाहित होती रहती   है ,वही  इसके तटों पर बिखरी पुरातात्विक  संरचनाये अपने अतीत की कहानी खुद बयां करती हैं |

                                                        
  विंध्य पर्वत श्रंखलाओं से बहने वाली केन नदी का उद्गम कटनी जिले की रीठी  तहसील के समीप अहिरगुवां  और ममार गाँव के मध्य  कैमूर की पहाड़ियों  जंगलो  के  एक खेत की मेड से माना जाता  है केन नदी  के उद्गम स्थल पर  बिखरी पड़ी पुरातात्विक धरोहर  इसकी अतीत की भव्यता के  स्वयं प्रमाण हैं दरअसल इसके केन नाम को लेकर भी कई तरह की किवदंतियां हैं , | लोग मानते हैं कि इसका प्राचीनतम नाम कर्णावती था कर्णावती क्यों था इसके पीछे भी एक अलग कथा है कहते हैं कि नदी किनारे एक प्रेमी युगल  पूर्णिमा की रात मिला करते थे   | समाज के कुछ लोगों को यह अच्छा नहीं लगा और उन्होंने युवक की ह्त्या कर वही एक खेत की मेढ़ में उसे दफ़न कर दिया इस घटना से व्याकुल युवक की प्रेयसी कर्णावती   ने भगवान से प्रार्थना कर प्रेमी  को देखने की इक्षा व्यक्त की  थी उसकी प्रार्थना पर हुई  जबरदस्त  बारिश के बाद खेत की  उस मेढ़  से मिट्टी बह गई और  युवक का शव  दिखने लगा प्रेमी का शव देखते ही  युवती ने अपने प्राण त्याग दिये जिस जगह युवक का शव था वहां  से एक जल धारा फूटने लगी थी  जिसने नदी का रूप ले लिया |  नदी का नाम कर्णवती फिर कन्या और  कन्या का अपभ्रंश किनिया,कयन और फिर केन हो गया।


 पहाड़ो को चीरकर प्रवाहित होती केन नदी 
                   केन के यह प्रबल वेग का ही प्रताप है कि यह अपनी राह में आने वाले सात पहाड़ो को चीरकर निरंतर प्रवाहित होती है हालांकि उद्गम स्थल से कुछ दूरी पर ऐसा लगता है जैसे यह छोटी छोटी पहाड़ियों में विलीन हो गई हो पर आगे यह फिर निरन्तर बढ़ती दिखती है |  नदी की विशालता तब और बाद जाती है जब इसमें छोटी  बड़ी २३ नदियाँ समाहित हो जाती हैं स्थानीय लोग इसे गंगा की तरह पूजते हैं इसके उद्गम स्थल और पहाड़ो के  बीच दरारों को लेकर भी कई तरह की किवदंतियां हैं लोग मानते हैं की इन दरारों की गहराई का अबतक पता नहीं चल सका है इन्ही दराररो में अंतिम क्रिया कर्म के बाद अस्थियां और राख विसर्जन का कार्य भी ग्राम वासी करते हैं ऐसे लोगों की मान्यता है कि पहाड़ों के बीच बहती नदी में से वह गंगा में पहुँच जाती है एक और किवदंती यह भी है की मुग़ल शासको ने जब इस इलाके में कत्ले आम मचाया था लोगों को मारकर इन्ही दरारों में फेंका था |  
 बुंदेलखंड जीवन रेखा है केन  
                                                    समुद्र तल से 550 मीटर ऊंचाई से बहने वाली केन नदी  बेसिन का कुल जलग्रहण क्षेत्र 28058 है
वर्ग किमीजिसमें से 24472 वर्ग किमी मध्य प्रदेश और शेष में स्थित है 3586 वर्ग किमी उत्तर प्रदेश में है ।४२७ किमी का सफर तय कर  उत्तरप्रदेश के बांदा जिले के चिल्ला घाट  में यमुना नदी में समाहित हो जाती है केन नदी | अपने इस सफर के दौरान केन नदी मानव सभ्यताओं के विकाश की कहानी लिखती है थलचर और जलचर जीवों के जीवन का आधार बनी केन नदी में जैव विविधिता की दृष्टि से सबसे समृद्ध नदियों में से एक मानी जाती है नदी में 12 से 20 प्रकार की मछलियों की प्रजाति ,दुर्लभ होते जा रहे कछुआ और  घड़ियालो को  आश्रय मिलता है नदी के तटों पर आधा सैकड़ा से ज्यादा वृक्षों की प्रजातियां देखने को मिलती हैं नदी के तटवर्ती इलाकों में लगभग सौ प्रजातियों के पक्षियों का कलरव अब सिमटता जा रहा है केन में पाई जाने वाली महाशिरा नामक मछली भी अब दुर्लभ होती जा रही है |

 मनव जीवन ,दुर्लभ वन्य जीवों के जीवन का आधार बनी केन नदी सिर्फ जीवो के जीवन में ही रंग नहीं भरती बल्कि वह पाषाण को भी जीवंत बना देती है केन नदी के पण्डवन और रनेह फाल जैसे झरने देखने हजारों  की संख्या में सैलानी पहुँचते हैं |  इस नदी में पाया जाने वाला शजर पत्थर अपनी अनोखी विशेषताओं के कारण दुनिया भर में मशहूर है । शजर पत्थर पन्ना जिले के अजयगढ़ से लेकर उत्तर प्रदेश में बांदा के कनवारा गांव तक केन नदी में  पाया जाता है।  शजर पत्थर को  तराशने पर उस पर झाड़ियोंपेड़-पौधोंपशु-पक्षियोंमानव आदि के विभिन्न तरह की  चित्रकारी नजर आती  हैं।  दुनिया भर में सिर्फ केन नदी में ही  इस तरह का पत्थर  पाया जाता है । पत्थर में पाईं जाने वाली इस प्राकृतिक चित्रकारी को ईरान सहित दुनिया के कई देशों में खूब पसंद किया जाता है । केन का यह एक एक पत्थर भी अनेकों  लोगों के जीवन का एक बडा आधार है ।
  केन की सहायक नदियां 
केन नदी के उदगम से लेकर यमुना नदी में मिलने तक मिढ़ासनव्यारमा,,सोनारश्यामरी  ,केल बन्ने ,उर्मिल कुटनेचंद्रावल  आदि सहित  23 छोटी बढी नदियां मिलती हैं । गंगा बेसिन की इस नदी और इसकी सहायक नदियों पर बने बांधो ने केन नदी की अविरल धारा को प्रभावित किया है । अकेले केन नदी पर गंगऊ और बरियारपुर बांध ने नदी जल के प्रवाह को बाधित किया हो एसा नहीं हैइसकी सहायक नदियों पर बने बांधो ने भी  केन नदी में जल की आवक पर विराम लगा दिया है ।  
            2017 -2018 में साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डेम्स रिवर्स एन्ड पीयूपिल(सैन्डरप )  के सदस्यों ने ३३ दिनों तक केन नदी के किनारे किनारे पदयात्रा  की थी |   सैन्डरप ने यात्रा के बाद अपनी रिपोर्ट में केन की दशा को लेकर गंभीर चिंता जताई थी |  उन्होंने माना था की केन बुंदेलखंड की जीवन रेखा है जिसके सहारे हजारों लोगों का जीवन बनता है ,  केन का अपना एक समृद्ध इतिहास है जैव विविधिता के लिए अपना विशेष स्थान रखने वाली केन नदी की जैव विविधिता संकट में बताई थी ,  केन नदी में  जो कभी अविरल प्रवाहित होती थी अब धीरे धीरे बरसाती नदी में बदल रही है ,  इसके अत्याधिक भूजल दोहन से आस पास के इलाकों में भू जल स्तर में कमी आई है परम्परागत जल श्रोत सूखते जा रहे हैं |  प्रदूषण मुक्त रहने वाली इस नदी में प्रदूषण  भी धीरे धीरे बढ़ने लगा है नदी में गंदे नाले मिलाये जा रहे हैं केन और सहायक नदियों पर निर्मित और निर्माणाधीन योजनाएं और परियोजनाएं केन नदी को प्रभावित कर रही हैं अत्याधिक रेत के उत्खनन से केन नदी का अस्तित्व ही संकट में आ गया है |  इस नदी पर बनने वाली केन बेतवा नदी जोड़ो योजना पर भी सवालिया निशान लगाए गए |  
     दरअसल विकाश की अंधी दौड़ में हम इतनी तेजी से  दौड़ लगा रहें कि  हमें इस बात की परवाह ही नहीं है कि आने वाली पीढ़ी को हम कैसा  देश सौंपेंगे | धन सबसे बड़ा धर्म बन चुका है , जंगल की जगह कंक्रीट के जंगल उगा रहे हैं ,| शायद  अब सोचने लगे हैं कि  ऑक्सीजन के सिलेंडर तो मिल ही जाएंगे , पानी की जगह  एच २ ओ से काम चल जाएगा , नहाने की जगह खुसबूदार स्प्रे डाल  लेंगे ,टॉयलेट पेपर तो बाजार में मिलने ही लगा है | इस लिए नदियों ,तालाबों से जो कुछ कमा सको जल्दी कमा लो | 






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