31 दिसंबर, 2019

बाघों से आबाद होता बुंदेलखंड

 बुंदेलखंड की डायरी 
बाघों से आबाद होता बुंदेलखंड
रवीन्द्र व्यास 

बुन्देलखण्ड के पन्ना टाईगर रिजर्व में    बाघ पुन:स्थापना के एक दशक का सात दिवसीय आयोजन समारोह पूर्वक मनाया गया । यह समारोह  वन विभागजैव-विविधता बोर्ड और डब्ल्यू.डब्ल्यू.एफ. इण्डिया द्वारा 20 से 26 दिसम्बर तक आयोजित किया गया था । एक दशक पहले पन्ना टाईगर रिजर्व बाघ विहीन हो गया था । दुनिया में बाघ पुनःस्थापना का अनोखा प्रयोग हुआ और सफल रहा है ।अब अनेकों देश के वन्यजीव विशेषज्ञ इसको जानने और समझने पन्ना आने लगे हैं ।



                                       1981 में पन्ना नेशनल पार्क को ५४२. ६७ वर्ग किमी में स्थापित किया गया था भारत के जैव विविधिता वाले  पार्को में  इसको सर्वश्रेष्ठ माना गया था |  केन नदी के दोनों और स्थित इस राष्ट्रीय उद्यान को १९९४ में  टाइगर रिजर्व के रूप में मान्यता मिली महज १५ वर्ष में यह टाइगर रिजर्व बाघ विहीन हो गया था इसके पीछे के कई कारण बताये गए थे  एक बड़ा यह बताया गया कि  स्थानीय पारधी समुदाय द्वारा शिकार करना अवैध शिकार के उस दौर में कई मामले भी सामने आये थे दूसरा बड़ा कारण चित्रकूट के जंगलों के डकैत ठोकिया का ठिकाना पन्ना टइगर रिजर्व का बनना ठोकिया गिरोह की टाइगर रिजर्व में मौजूदगी के चलते बाघ संरक्षण में लगे अधिकारी और कर्मचारी पार्क के अंदर जाने से कतराने लगे थे ,जिसका फायदा शिकारियों ने जम कर उठाया मजे की बात यह है कि पन्ना टाइगर रिजर्व २००२_२००३ में  ही टाइगर विहीन हो गया था ,पर उस समय के पार्क संचालक ने एक राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल में खबर चलवाई थी कि पन्ना टाइगर रिजर्व में ३०-३५ बाघ हैं बाद में २००८_२००९ में  पन्ना टाइगर रिजर्व में  आर. श्रीनिवास मूर्ति  को पदस्थ  किया गया 
                         आर श्रीनिवास मूर्ति के सामने  पन्ना टाइगर रिजर्व के संचालक के रूप में अनेकों चुनौतियां थी पार्क कर्मचारियों के बीच समन्वय और सहयोग का अभाव था पार्क के अन्दर शिकार में माहिर पारदी जनजाति की मौजूदगी उन्हें चिंतित किये थी ऐसी विषम परिस्थियों में उनके काँधे पर पन्ना में फिर से बाघ आबाद करने की चुनौती थी श्रीनिवास मूर्ति ने जब बाघ पुनर्स्थापना का प्रस्ताव सरकार को भेजा तो वाइल्ड लाइफ के कई जानकारों को इसकी सफलता पर संदेह था मार्च- 2009 में बाँधवगढ़ और कान्हा टाइगर रिजर्व से 2 बाघिन को पन्ना लाया गया। इन्हें टी-1 और टी-2 नाम दिया गया। बाघ विहीन पन्ना टाइगर रिजर्व में सिर्फ बाघिन लाये जाने पर अनेकों सवाल खड़े हुए बाघिनों के आगमन के गवाह बने पत्रकार साथी और वन्य प्राणी विशेषज्ञ यह कहने से नहीं चूके कि  बिना बाघ के ये बाघिन कैसे बाघों को जन्म देंगी हालांकि पार्क प्रबंधन को यह जानकारी थी एक बाघ अब भी पार्क में है बाद में जब पता चला कि वह बाघ भी पार्क छोड़ कर जा चुका है तब पेंच टाइगर रिजर्व से ६ नवम्बर २००९ को नर  बाघ लाया गयाजिसको  टी-3(पन्ना ) नाम दिया गया नाम तो जरूर पन्ना मिला पर  इस बाघ का पन्ना टाइगर रिजर्व में मन नहीं लगा और वह दस दिन में ही पार्क छोड़ कर दक्षिण दिशा की ओर स्थित पेंच टाइगर रिजर्व की ओर  चल पड़ा। इस दौरान पार्क प्रबंधन उस पर सतत निगाह बनाये रहे 25 दिसम्बर 2009 को  इसे दमोह जिले के तेजगढ़ के जंगलों में  बेहोश कर पन्ना वापस लाया गया  
दूसरी बार फिर टी-३ बाघ पार्क से भाग ना जाए इसके लिए पार्क के कर्मचारियों ने देशी नुस्खा अपनाया  था |   पार्क प्रबंधन ने जानवरों के स्वाभाविक गुण की तरफ ध्यान दिया इसमें पाया गया की जानवर विपरीत लिंगी के मूत्र को उसकी तलाश में एक बड़ा आधार मानते हैं इस बात को ध्यान में रख कर  बाघिन का मूत्र बाघ की  उपस्थिति वाले  क्षेत्र से बाघिन के पास तक   छिड़कवाया गया | पार्क प्रबंधन की यह उक्ति कारगर रही और  टी-बाघ टी-1  बाघिन तक जा पहुंचा  |दो तीन दिन बाद दोनों को साथ घूमता देख पार्क प्रबंधन को राहत की सांस मिली |  
                          
पन्ना के टाइगर रिजर्व में बाघ पुनः स्थापना के एक दशक और  पन्ना टी-3 वॉक का समारोह 20 से 26 दिसंबर तक मनाया गया । इस समारोह  में देशभर के 50 से अधिक वन्य-प्राणी विशेषज्ञ और बाघ प्रेमियों ने हिस्सा लिया। असल में  टी _,बाघ के कारण ही आज पन्ना टाईगर रिजर्व में  में  बाघों का कुनबा बडा  हैंआज इनकी संख्या 55 बताई जा रही है ।   ये अलग बात है कि एक बाघ के लिए 50 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्रफल आवश्यक माना जाता है । इस हिसाब से 55 बाघों के लिए 2750 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र की जरूरत हैजबकि पन्ना टाईगर रिजर्व का क्षेत्रफल 542 वर्ग किलोमीटर ही है । अब इतने बाघों को सँभालने की बड़ी जिम्मेदारी पार्क प्रबंधन के कन्धों पर है 

बाघ दुनिया में सर्वाधिक  संकटग्रस्त प्राणी माना जाता है दुनिया भर में इनकी  संख्या लगभग ६ हजार के लगभग मानी जाती है ,अकेले भारत में ही  ३ हजार के लगभग बाघ पाए जाते हैं जिनमे सर्वाधिक मध्य प्रदेश में पाए जाते हैं बाघ की आठ  प्रजातियों में से तीन अब  विलुप्त हो चुकी हैं। भारत में  रायल बंगाल टाइगर उत्‍तर पूर्वी क्षेत्रों को छोड़कर देश भर में पाया जाता है |  पड़ोसी देश नेपाल, भूटान और  बांग्लादेश में भी  बाघ की ये प्रजाति पाई जाती है । आज  विश्व भर  में बाघों की संख्या लगातार  कम होती  जा रही है एक समय ऐसा भी आया था जब मध्य प्रदेश से टाइगर स्टेट का दर्जा भी छिन गया था  ऐसे समय में  पन्ना में बाघ पुन: स्थापना कर और उनका कुनबा बड़ा कर टाइगर स्टेट का गौरव वापस दिला कर एक महत्व पूर्ण उपलब्धि हासिल की है 
 दरअसल बाघ और बुंदेलखंड का सदियों पुराना नाता है इस बात के गवाह बुंदेलखंड के राजा महराजाओं के महलों में लगे शिकार करते चित्र हैं जो बताते हैं कि बुंदेलखंड के जंगल बाघों के प्राकृतिक और पसंदीदा  आवास थे इसके पीछे उनके भोजन के लिए जीवों की पर्याप्त संख्या  और प्राकृतिक जल श्रोतों की संख्या महत्वपूर्ण कारक थी समय के जंगल सिमट गए लालसा ने देश के राष्ट्रीय पशु बाघ को अपने ही घर से बेघर कर दिया था | पन्ना टाइगर रिजर्व में  बाघ पुनर्स्थापना के चलते कहा जा सकता है कि  बुंदेलखंड अब फिर से बाघों से आबाद हो रहा है | बाघों को फिर से बुंदेलखंड में आबाद करने में तत्कालीन फील्ड डायरेक्टर आर श्रीनिवास मूर्ति के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता |      

कोई टिप्पणी नहीं:

विकास की उमंग और चुनौतियों के संघर्ष का बुंदेलखंड

  बुंदेलखंड की डायरी  विकास की उमंग और चुनौतियों के  संघर्ष का  बुंदेलखंड  रवीन्द्र व्यास  दो राज्य में बटे बुंदेलखंड के लिए    2025  में कई...