26 सितंबर, 2015

 बुंदेलखंड :
दफ़न होते तन और दाल के लिए जान गंवाते लोग 

रवीन्द्र व्यास 
गरीबी के चलते आदिवासी का शव दफनाने को मजबूर होता आदिवासी समाज , दाल की जुगाड़ में उरद की कटी फसल चोरी की,  देखने वाले को   मौत के घाट उतार  ,दिया । बुंदेलखंड में सूखी फसल और कर्ज का बोझ - चार किसानो ने मौत को गले लगाया , किस्मत से एक बच गया ।  बुंदेलखंड इलाके की ये तस्वीरें बताती हैं की यहां की पीर को समझने का कोई प्रयास नहीं करता है या समझ कर जानबूझ कर इसे अनदेखा किया जाता है ।     
 सागर जिले  के कुडारी  गाँव में एक आदिवासी के शव को परिजनों ने इसलिए दफना दिया, क्योंकि उनके पास दाह संस्कार के लिए लकड़ियों के लिए पैसा नहीं था।  थोना आदिवासी (50) उसका परिवार जंगल में लकड़ियां बीनकर अपना जीवन चलाता था  । इसके पास अपने ही अंतिम संस्कार के लिए लकड़ियाँ नहीं जुड़ पाई , और ना ही लकड़ियाँ खरीदने को पैसा थे । क्योंकि जो पैसा इस आदिवासी  परिवार के पास था ,  वह थोना के इलाज में खर्च हो गया । और इलाज के दौरान ही ४ सितम्बर को उसकी मौत हो गई । सागर से महज ८ किमी की दूरी पर बसे  इस गाँव  के लिए ४ सितम्बर का दिन वह  दुर्भाग्य शाली दिन था जब थोना आदिवासी को दफ़नाना पड़ा । 
 थोना की पत्नी सुमंत्रा बताती है  कि उसके पति की चार सितम्बर को सरकारी अस्पताल में इलाज  के दौरान मौत हो गई थी। मौत के बाद उनके लिए थोना का अंतिम संस्कार करना बड़ी समस्या बन गई। क्योंकि उनके पास इतनी रकम नहीं थी कि वे लकड़ियां खरीदकर अंतिम संस्कार कर सकें। यही कारण था कि थोना को जमीन में दफना दिया गया।
  अपनी सामन्य जीवन शैली  के कारण अलग पहचान बनाने वाले इस आदिवासी परिवार की शायद हकीकत ही  सामने  ना आ पाती  यदि  यह मामला  भाजपा) के विधायक हरवंश सिंह राठौर  के सामने  नहीं पहुंचा होता । उन्होंने ने थोना की तेरहवी के लिए 20 हजार रुपये की आर्थिक सहायता  देकर मानव कल्याण का काम तो किया ।  २१ सितम्बर को जब सागर के पत्रकार उनके पास गए तो उन्होंने बातों ही बातों थोना आदिवासी के दफ़नाने की बात भी बता दी । मीडिया को जानकारी लगते ही यह खबर अखबारों की सुर्खिया बनी । मीडिया के बात करने पर ही कलेक्टर ने मामले की जांच के आदेश दिए । 
 यहां यह उल्लेखनीय है की सरकार  “राज्य में गरीब के अंतिम संस्कार के लिए दो हजार रुपये की आर्थिक सहायता  देती है ।   ग्रामीण इलाकों में यह राशि पंचायत और शहरी इलाके में नगरीय निकाय द्वारा मुहैया कराई जाती है। कुडारी में  पंचायत और वहां के लोग भी एक तरह से सामाजिक अपराध के  दोषी ही माने जाएंगे । 
 दाल चोरी की ना खुले पोल तो कर दी ह्त्या 
बुंदेलखंड इलाके गाँवों  की यह परम्परा रही है की आपसी मेल जोल से काम करने और  दूसरे  सुख दुःख में काम आने की । अगर पडोसी सूखी रोटी खाता दिख जाए तो पडोसी तत्काल अपने यहां से दाल -सब्जी जो भी उपलब्ध हो उसके यहां पहुंचा देता था । गाँव के खलिहान एक साथ लगते थे सब एक दूसरे के खलिहानों की सुरक्षा करते थे । अनाज की चोरी सबसे अधम कृत्य माना जाता था । आज हालात बदल गए हैं , लोगों के पास अपने खाने को नहीं है वे दूसरो को क्या खिलाये । इस कदर बदत्तर हालात हुए हैं की लोग अब खलिहान से ही दाल चुराने लगे हैं ।  चोरी की पोल ना खुल जाए इस कारण ह्त्या करने से भी नहीं चूक रहे हैं । 
 ऐसी ही एक दुखद घटना   टीकमगढ़  जिले खिरिया पुलिस चौकी के  कुमरऊ खिरिया  गाँव में    घटी  ।  सोमवार 21 सितंबर को गाँव के  चौकीदार सुखनंदन राय (50)  की ह्त्या  उसी के खेत में कर दी गई । ह्त्या का मामला जब खुला तो  टीकमगढ़ के अनेको समाजशास्त्री  सोचने पर मजबूर हो गए ।  पुलिस के  सामने ह्त्या की  जो कहानी सामने आई वह काम चौंकाने वाली नहीं थी ।   सुखनंदन राय  अपने खेत से उड़द की फसल काट  रहा था ,  उसने गांव के तीन लड़को को   खेत से उड़द दाल  की कटी हुई फसल  को चुराते हुए  देख लिया  था। उसने उन  लड़कों से कहा  कि वह उनके माता-पिता से कहेगा और पुलिस को भी बताएगा। इस बात  से नाराज लड़के  सुखनंदन की  पत्नी के जाने का इन्तजार  करते रहे , और उसके जाते ही  तीनो लड़कों ने सुखनंदन की गला घोंट कर ह्त्या कर दी । चौकी प्रभारी लखन शर्मा ने  गनेश  अहिरवार (25) एवं एक 15 साल का नाबालिग है तथा एक 14 साल का नाबालिग के विरूद्ध धारा 302, 34 के तहत मामला दर्ज किया  है।  तीन में से पकड़े गए एक लड़के ने  पूछताछ  घटना को कबूल कर लिया।  
          दरअसल इस साल भी पिछले साल की तरह बुंदेलखंड में अकाल के हालात हैं । किसान  खरीफ फसल की बदहाल दशा देख कर चिंतित है । इन्ही हालातों के चलते  पहले टीकमगढ़ जिले के तीन किसानो ने आत्म ह्त्या की जिसमे से एक को बचा लिया गया । वहीँ सागर जिले में एक किसान ने आत्म ह्त्या की । बुंदेलखंड में पहले ओला गिरने से रबी कीफसल खराब हुई। अब मॉनसून में महज 51 फीसदी बारिश होने से दलहन के खेत सूख रहे हैं। यहां बीते 6 साल से लगातारसूखा पड़ रहा है। पूरे बुंदेलखंड में गैरसरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस साल सदमें और आत्महत्या करने से 365 किसानोंकी मौत  हो चुकी है । उस पर भी मध्य प्रदेश  सरकार ने बुंदेलखंड के कुछ इलाकों को ही सूखा ग्रस्त घोषित कर किसानो के जख्मो पर नमक लगाने का काम किया है । 
              एक सामजिक संस्था सोशल मीडिया फाउंडेशन  बुंदेलखंड की बदहाली के पीछे मुख्य वजह मानती है  इस इलाके के कमजोर राजनैतिक नेतृत्व को ।  सवाल सहज ही खड़े होते हैं क्या  प्रदेश का शासन तंत्र इतना कमजोर  हो गया है की  उनके आधीन काम करने वाले नौकर शाह सरकार की योजनाओ का लाभ भी जनता को ना दें , और जिला का मुखिया सबकुछ जानने के बाद भी कहे  मामले की जांच की जायेगी । जो चीजें स्वयं प्रमाणित हैं की  आदिवाशी परिवार को आर्थिक सहायता नहीं मिली  तो उसे मजबूरन  शव  दफ़नाना पड़ा ,?  फसलों के हालात और लगातर प्रकृति के प्रकोप का सामना करते किसान के बच्चे जब दाल की जुगाड़ में ह्त्या करने लगें  तो इसे मानव समाज क्या कहेगा , और किसे दोष देगा ।  

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