नशे की लत में डूबा बचपन
अभिषेक व्यास
राष्ट्र का भविष्य कहे जाने वाले बच्चों में नशा़खोरी की लत इस तेज़ी से बढ़ रही है कि दस वर्ष की आयु में प्रवेश करते ही ज़्यादातर बच्चे विभिन्न प्रकार के नशीले और मादक पदार्थों का सेवन करने लगते हैं। .
संयुक्त राष्ट्र संघ के नारकोटिक्स नियंत्रण बोर्ड की वर्ष 2009 की रिपोर्ट में बताया गया है कि दस से ग्यारह वर्ष की आयु के 37 प्रतिशत स्कूली विद्यार्थी विभिन्न प्रकार के मादक पदार्थों का सेवन करने लगते हैं और वे नशा़खोरी की आदत के शिकार हो जाते हैं. सबसे ज़्यादा चिता की बात है अति ग़रीब और ग़रीब वर्ग के बच्चों की, जो सबसे ज़्यादा नशे की गिरफ़्त में आ रहे हैं.
संयुक्त राष्ट्र संघ के नारकोटिक्स नियंत्रण बोर्ड की वर्ष 2009 की रिपोर्ट में बताया गया है कि दस से ग्यारह वर्ष की आयु के 37 प्रतिशत स्कूली विद्यार्थी विभिन्न प्रकार के मादक पदार्थों का सेवन करने लगते हैं और वे नशा़खोरी की आदत के शिकार हो जाते हैं.
अब यह बात किसी से छुपी नहीं है कि ये बच्चे तंबाखू, गुटखा से लेकर गांजा, अ़फीम, चरस, हेरोईन जैसे घातक मादक पदार्थो का सेवन करते हैं. इन बच्चों के माता-पिता और वयस्क परिवारजन रोजी-रोटी की जुगाड़ में व्यस्त रहते हैं और वे बच्चों पर कोई ध्यान नहीं देते हैं. यहां तक कि दस वर्ष की उम्र में ही बच्चे भी स्कूल छोड़कर कचरा बीनने, होटलों, ढाबों में मज़दूरी करने या बाज़ार में फेरी लगाकर सामान बेचने का काम करने लगते हैं और वे अपनी कमाई से मादक पदार्थ खरीदने में सक्षम हो जाते हैं.
बच्चों में नशा़खोरी की लत का अध्ययन करने वालों का कहना है कि ज़्यादातर बच्चों को नशे की लत उनके वयस्क या हमउम्र नशा़खोरों के ज़रिए ही लगती है. परिवार की उपेक्षा के कारण ये भोले-भाले बच्चे नशा कराने वाले को ही अपना मित्र और सच्चा हमदर्द मान लेते हैं और नशे की आदत में पड़कर हर तरह के शोषण का शिकार हो जाते हैं.
नशे की गिरफ़्त में आए बच्चे जब मनचाहा नशा नहीं कर पाते हैं तो वे ख़ून में बढ़ती मादक पदार्थो की मांग को पूरा करने के लिए शरीर के लिए घातक पदार्थों का भी सेवन करने लगते हैं, जैसे कि बोन फिक्स, क्यूफिक्स और आयोडेक्स. कई बच्चे तो पेट्रोल और केरोसिन भी पीकर नशे की प्यास बुझाते हैं.
नशे के ग़ुलाम ये बच्चे या तो बेमौत मर जाते हैं या फिर अपराध की अंधी दुनिया में प्रवेश कर समाज और देश के लिए विकट समस्या बन जाते हैं. सरकार और समाज बच्चों को नशे की आदत से बचाने के जो भी उपाय कर रही हैं, वे पर्याप्त और प्रभावी नहीं हैं. इसलिए ज़रूरी है कि देश के भविष्य को पतन के रास्ते से बचाने के लिए परिवार से उपेक्षित, ग़रीब, अशिक्षित और बाल मज़दूरी करने वाले बच्चों को नशे से बचाने के लिए गंभीरता से प्रभावी और कारगर उपाय किए जाने चाहिए.नशे की लत में डूबा बचपन
संयुक्त राष्ट्र संघ के नारकोटिक्स नियंत्रण बोर्ड की वर्ष 2009 की रिपोर्ट में बताया गया है कि दस से ग्यारह वर्ष की आयु के 37 प्रतिशत स्कूली विद्यार्थी विभिन्न प्रकार के मादक पदार्थों का सेवन करने लगते हैं और वे नशा़खोरी की आदत के शिकार हो जाते हैं. सबसे ज़्यादा चिता की बात है अति ग़रीब और ग़रीब वर्ग के बच्चों की, जो सबसे ज़्यादा नशे की गिरफ़्त में आ रहे हैं.
संयुक्त राष्ट्र संघ के नारकोटिक्स नियंत्रण बोर्ड की वर्ष 2009 की रिपोर्ट में बताया गया है कि दस से ग्यारह वर्ष की आयु के 37 प्रतिशत स्कूली विद्यार्थी विभिन्न प्रकार के मादक पदार्थों का सेवन करने लगते हैं और वे नशा़खोरी की आदत के शिकार हो जाते हैं.
अब यह बात किसी से छुपी नहीं है कि ये बच्चे तंबाखू, गुटखा से लेकर गांजा, अ़फीम, चरस, हेरोईन जैसे घातक मादक पदार्थो का सेवन करते हैं. इन बच्चों के माता-पिता और वयस्क परिवारजन रोजी-रोटी की जुगाड़ में व्यस्त रहते हैं और वे बच्चों पर कोई ध्यान नहीं देते हैं. यहां तक कि दस वर्ष की उम्र में ही बच्चे भी स्कूल छोड़कर कचरा बीनने, होटलों, ढाबों में मज़दूरी करने या बाज़ार में फेरी लगाकर सामान बेचने का काम करने लगते हैं और वे अपनी कमाई से मादक पदार्थ खरीदने में सक्षम हो जाते हैं.
बच्चों में नशा़खोरी की लत का अध्ययन करने वालों का कहना है कि ज़्यादातर बच्चों को नशे की लत उनके वयस्क या हमउम्र नशा़खोरों के ज़रिए ही लगती है. परिवार की उपेक्षा के कारण ये भोले-भाले बच्चे नशा कराने वाले को ही अपना मित्र और सच्चा हमदर्द मान लेते हैं और नशे की आदत में पड़कर हर तरह के शोषण का शिकार हो जाते हैं.
नशे की गिरफ़्त में आए बच्चे जब मनचाहा नशा नहीं कर पाते हैं तो वे ख़ून में बढ़ती मादक पदार्थो की मांग को पूरा करने के लिए शरीर के लिए घातक पदार्थों का भी सेवन करने लगते हैं, जैसे कि बोन फिक्स, क्यूफिक्स और आयोडेक्स. कई बच्चे तो पेट्रोल और केरोसिन भी पीकर नशे की प्यास बुझाते हैं.
नशे के ग़ुलाम ये बच्चे या तो बेमौत मर जाते हैं या फिर अपराध की अंधी दुनिया में प्रवेश कर समाज और देश के लिए विकट समस्या बन जाते हैं. सरकार और समाज बच्चों को नशे की आदत से बचाने के जो भी उपाय कर रही हैं, वे पर्याप्त और प्रभावी नहीं हैं. इसलिए ज़रूरी है कि देश के भविष्य को पतन के रास्ते से बचाने के लिए परिवार से उपेक्षित, ग़रीब, अशिक्षित और बाल मज़दूरी करने वाले बच्चों को नशे से बचाने के लिए गंभीरता से प्रभावी और कारगर उपाय किए जाने चाहिए.नशे की लत में डूबा बचपन
राष्ट्र का भविष्य कहे जाने वाले बच्चों में नशा़खोरी की लत इस तेज़ी से बढ़ रही है कि दस वर्ष की आयु में प्रवेश करते ही ज़्यादातर बच्चे विभिन्न प्रकार के नशीले और मादक पदार्थों का सेवन करने लगते हैं.
संयुक्त राष्ट्र संघ के नारकोटिक्स नियंत्रण बोर्ड की वर्ष 2009 की रिपोर्ट में बताया गया है कि दस से ग्यारह वर्ष की आयु के 37 प्रतिशत स्कूली विद्यार्थी विभिन्न प्रकार के मादक पदार्थों का सेवन करने लगते हैं और वे नशा़खोरी की आदत के शिकार हो जाते हैं. सबसे ज़्यादा चिंता की बात है अति ग़रीब और ग़रीब वर्ग के बच्चों की, जो सबसे ज़्यादा नशे की गिरफ़्त में आ रहे हैं.
संयुक्त राष्ट्र संघ के नारकोटिक्स नियंत्रण बोर्ड की वर्ष 2009 की रिपोर्ट में बताया गया है कि दस से ग्यारह वर्ष की आयु के 37 प्रतिशत स्कूली विद्यार्थी विभिन्न प्रकार के मादक पदार्थों का सेवन करने लगते हैं और वे नशा़खोरी की आदत के शिकार हो जाते हैं.
अब यह बात किसी से छुपी नहीं है कि ये बच्चे तंबाखू, गुटखा से लेकर गांजा, अ़फीम, चरस, हेरोईन जैसे घातक मादक पदार्थो का सेवन करते हैं. इन बच्चों के माता-पिता और वयस्क परिवारजन रोजी-रोटी की जुगाड़ में व्यस्त रहते हैं और वे बच्चों पर कोई ध्यान नहीं देते हैं. यहां तक कि दस वर्ष की उम्र में ही बच्चे भी स्कूल छोड़कर कचरा बीनने, होटलों, ढाबों में मज़दूरी करने या बाज़ार में फेरी लगाकर सामान बेचने का काम करने लगते हैं और वे अपनी कमाई से मादक पदार्थ खरीदने में सक्षम हो जाते हैं.
बच्चों में नशा़खोरी की लत का अध्ययन करने वालों का कहना है कि ज़्यादातर बच्चों को नशे की लत उनके वयस्क या हमउम्र नशा़खोरों के ज़रिए ही लगती है. परिवार की उपेक्षा के कारण ये भोले-भाले बच्चे नशा कराने वाले को ही अपना मित्र और सच्चा हमदर्द मान लेते हैं और नशे की आदत में पड़कर हर तरह के शोषण का शिकार हो जाते हैं.
नशे की गिरफ़्त में आए बच्चे जब मनचाहा नशा नहीं कर पाते हैं तो वे ख़ून में बढ़ती मादक पदार्थो की मांग को पूरा करने के लिए शरीर के लिए घातक पदार्थों का भी सेवन करने लगते हैं, जैसे कि बोन फिक्स, क्यूफिक्स और आयोडेक्स. कई बच्चे तो पेट्रोल और केरोसिन भी पीकर नशे की प्यास बुझाते हैं.
नशे के ग़ुलाम ये बच्चे या तो बेमौत मर जाते हैं या फिर अपराध की अंधी दुनिया में प्रवेश कर समाज और देश के लिए विकट समस्या बन जाते हैं. सरकार और समाज बच्चों को नशे की आदत से बचाने के जो भी उपाय कर रही हैं, वे पर्याप्त और प्रभावी नहीं हैं. इसलिए ज़रूरी है कि देश के भविष्य को पतन के रास्ते से बचाने के लिए परिवार से उपेक्षित, ग़रीब, अशिक्षित और बाल मज़दूरी करने वाले बच्चों को नशे से बचाने के लिए गंभीरता से प्रभावी और कारगर उपाय किए जाने चाहिए.नशे की लत में डूबा बचपन
संयुक्त राष्ट्र संघ के नारकोटिक्स नियंत्रण बोर्ड की वर्ष 2009 की रिपोर्ट में बताया गया है कि दस से ग्यारह वर्ष की आयु के 37 प्रतिशत स्कूली विद्यार्थी विभिन्न प्रकार के मादक पदार्थों का सेवन करने लगते हैं और वे नशा़खोरी की आदत के शिकार हो जाते हैं. सबसे ज़्यादा चिंता की बात है अति ग़रीब और ग़रीब वर्ग के बच्चों की, जो सबसे ज़्यादा नशे की गिरफ़्त में आ रहे हैं.
संयुक्त राष्ट्र संघ के नारकोटिक्स नियंत्रण बोर्ड की वर्ष 2009 की रिपोर्ट में बताया गया है कि दस से ग्यारह वर्ष की आयु के 37 प्रतिशत स्कूली विद्यार्थी विभिन्न प्रकार के मादक पदार्थों का सेवन करने लगते हैं और वे नशा़खोरी की आदत के शिकार हो जाते हैं.
अब यह बात किसी से छुपी नहीं है कि ये बच्चे तंबाखू, गुटखा से लेकर गांजा, अ़फीम, चरस, हेरोईन जैसे घातक मादक पदार्थो का सेवन करते हैं. इन बच्चों के माता-पिता और वयस्क परिवारजन रोजी-रोटी की जुगाड़ में व्यस्त रहते हैं और वे बच्चों पर कोई ध्यान नहीं देते हैं. यहां तक कि दस वर्ष की उम्र में ही बच्चे भी स्कूल छोड़कर कचरा बीनने, होटलों, ढाबों में मज़दूरी करने या बाज़ार में फेरी लगाकर सामान बेचने का काम करने लगते हैं और वे अपनी कमाई से मादक पदार्थ खरीदने में सक्षम हो जाते हैं.
बच्चों में नशा़खोरी की लत का अध्ययन करने वालों का कहना है कि ज़्यादातर बच्चों को नशे की लत उनके वयस्क या हमउम्र नशा़खोरों के ज़रिए ही लगती है. परिवार की उपेक्षा के कारण ये भोले-भाले बच्चे नशा कराने वाले को ही अपना मित्र और सच्चा हमदर्द मान लेते हैं और नशे की आदत में पड़कर हर तरह के शोषण का शिकार हो जाते हैं.
नशे की गिरफ़्त में आए बच्चे जब मनचाहा नशा नहीं कर पाते हैं तो वे ख़ून में बढ़ती मादक पदार्थो की मांग को पूरा करने के लिए शरीर के लिए घातक पदार्थों का भी सेवन करने लगते हैं, जैसे कि बोन फिक्स, क्यूफिक्स और आयोडेक्स. कई बच्चे तो पेट्रोल और केरोसिन भी पीकर नशे की प्यास बुझाते हैं.
नशे के ग़ुलाम ये बच्चे या तो बेमौत मर जाते हैं या फिर अपराध की अंधी दुनिया में प्रवेश कर समाज और देश के लिए विकट समस्या बन जाते हैं. सरकार और समाज बच्चों को नशे की आदत से बचाने के जो भी उपाय कर रही हैं, वे पर्याप्त और प्रभावी नहीं हैं. इसलिए ज़रूरी है कि देश के भविष्य को पतन के रास्ते से बचाने के लिए परिवार से उपेक्षित, ग़रीब, अशिक्षित और बाल मज़दूरी करने वाले बच्चों को नशे से बचाने के लिए गंभीरता से प्रभावी और कारगर उपाय किए जाने चाहिए.नशे की लत में डूबा बचपन
राष्ट्र का भविष्य कहे जाने वाले बच्चों में नशा़खोरी की लत इस तेज़ी से बढ़ रही है कि दस वर्ष की आयु में प्रवेश करते ही ज़्यादातर बच्चे विभिन्न प्रकार के नशीले और मादक पदार्थों का सेवन करने लगते हैं.
संयुक्त राष्ट्र संघ के नारकोटिक्स नियंत्रण बोर्ड की वर्ष 2009 की रिपोर्ट में बताया गया है कि दस से ग्यारह वर्ष की आयु के 37 प्रतिशत स्कूली विद्यार्थी विभिन्न प्रकार के मादक पदार्थों का सेवन करने लगते हैं और वे नशा़खोरी की आदत के शिकार हो जाते हैं. सबसे ज़्यादा चिंता की बात है अति ग़रीब और ग़रीब वर्ग के बच्चों की, जो सबसे ज़्यादा नशे की गिरफ़्त में आ रहे हैं.
संयुक्त राष्ट्र संघ के नारकोटिक्स नियंत्रण बोर्ड की वर्ष 2009 की रिपोर्ट में बताया गया है कि दस से ग्यारह वर्ष की आयु के 37 प्रतिशत स्कूली विद्यार्थी विभिन्न प्रकार के मादक पदार्थों का सेवन करने लगते हैं और वे नशा़खोरी की आदत के शिकार हो जाते हैं.
अब यह बात किसी से छुपी नहीं है कि ये बच्चे तंबाखू, गुटखा से लेकर गांजा, अ़फीम, चरस, हेरोईन जैसे घातक मादक पदार्थो का सेवन करते हैं. इन बच्चों के माता-पिता और वयस्क परिवारजन रोजी-रोटी की जुगाड़ में व्यस्त रहते हैं और वे बच्चों पर कोई ध्यान नहीं देते हैं. यहां तक कि दस वर्ष की उम्र में ही बच्चे भी स्कूल छोड़कर कचरा बीनने, होटलों, ढाबों में मज़दूरी करने या बाज़ार में फेरी लगाकर सामान बेचने का काम करने लगते हैं और वे अपनी कमाई से मादक पदार्थ खरीदने में सक्षम हो जाते हैं.
बच्चों में नशा़खोरी की लत का अध्ययन करने वालों का कहना है कि ज़्यादातर बच्चों को नशे की लत उनके वयस्क या हमउम्र नशा़खोरों के ज़रिए ही लगती है. परिवार की उपेक्षा के कारण ये भोले-भाले बच्चे नशा कराने वाले को ही अपना मित्र और सच्चा हमदर्द मान लेते हैं और नशे की आदत में पड़कर हर तरह के शोषण का शिकार हो जाते हैं.
नशे की गिरफ़्त में आए बच्चे जब मनचाहा नशा नहीं कर पाते हैं तो वे ख़ून में बढ़ती मादक पदार्थो की मांग को पूरा करने के लिए शरीर के लिए घातक पदार्थों का भी सेवन करने लगते हैं, जैसे कि बोन फिक्स, क्यूफिक्स और आयोडेक्स. कई बच्चे तो पेट्रोल और केरोसिन भी पीकर नशे की प्यास बुझाते हैं.
नशे के ग़ुलाम ये बच्चे या तो बेमौत मर जाते हैं या फिर अपराध की अंधी दुनिया में प्रवेश कर समाज और देश के लिए विकट समस्या बन जाते हैं. सरकार और समाज बच्चों को नशे की आदत से बचाने के जो भी उपाय कर रही हैं, वे पर्याप्त और प्रभावी नहीं हैं. इसलिए ज़रूरी है कि देश के भविष्य को पतन के रास्ते से बचाने के लिए परिवार से उपेक्षित, ग़रीब, अशिक्षित और बाल मज़दूरी करने वाले बच्चों को नशे से बचाने के लिए गंभीरता से प्रभावी और कारगर उपाय किए जाने चाहिए.।
संयुक्त राष्ट्र संघ के नारकोटिक्स नियंत्रण बोर्ड की वर्ष 2009 की रिपोर्ट में बताया गया है कि दस से ग्यारह वर्ष की आयु के 37 प्रतिशत स्कूली विद्यार्थी विभिन्न प्रकार के मादक पदार्थों का सेवन करने लगते हैं और वे नशा़खोरी की आदत के शिकार हो जाते हैं. सबसे ज़्यादा चिंता की बात है अति ग़रीब और ग़रीब वर्ग के बच्चों की, जो सबसे ज़्यादा नशे की गिरफ़्त में आ रहे हैं.
संयुक्त राष्ट्र संघ के नारकोटिक्स नियंत्रण बोर्ड की वर्ष 2009 की रिपोर्ट में बताया गया है कि दस से ग्यारह वर्ष की आयु के 37 प्रतिशत स्कूली विद्यार्थी विभिन्न प्रकार के मादक पदार्थों का सेवन करने लगते हैं और वे नशा़खोरी की आदत के शिकार हो जाते हैं.
अब यह बात किसी से छुपी नहीं है कि ये बच्चे तंबाखू, गुटखा से लेकर गांजा, अ़फीम, चरस, हेरोईन जैसे घातक मादक पदार्थो का सेवन करते हैं. इन बच्चों के माता-पिता और वयस्क परिवारजन रोजी-रोटी की जुगाड़ में व्यस्त रहते हैं और वे बच्चों पर कोई ध्यान नहीं देते हैं. यहां तक कि दस वर्ष की उम्र में ही बच्चे भी स्कूल छोड़कर कचरा बीनने, होटलों, ढाबों में मज़दूरी करने या बाज़ार में फेरी लगाकर सामान बेचने का काम करने लगते हैं और वे अपनी कमाई से मादक पदार्थ खरीदने में सक्षम हो जाते हैं.
बच्चों में नशा़खोरी की लत का अध्ययन करने वालों का कहना है कि ज़्यादातर बच्चों को नशे की लत उनके वयस्क या हमउम्र नशा़खोरों के ज़रिए ही लगती है. परिवार की उपेक्षा के कारण ये भोले-भाले बच्चे नशा कराने वाले को ही अपना मित्र और सच्चा हमदर्द मान लेते हैं और नशे की आदत में पड़कर हर तरह के शोषण का शिकार हो जाते हैं.
नशे की गिरफ़्त में आए बच्चे जब मनचाहा नशा नहीं कर पाते हैं तो वे ख़ून में बढ़ती मादक पदार्थो की मांग को पूरा करने के लिए शरीर के लिए घातक पदार्थों का भी सेवन करने लगते हैं, जैसे कि बोन फिक्स, क्यूफिक्स और आयोडेक्स. कई बच्चे तो पेट्रोल और केरोसिन भी पीकर नशे की प्यास बुझाते हैं.
नशे के ग़ुलाम ये बच्चे या तो बेमौत मर जाते हैं या फिर अपराध की अंधी दुनिया में प्रवेश कर समाज और देश के लिए विकट समस्या बन जाते हैं. सरकार और समाज बच्चों को नशे की आदत से बचाने के जो भी उपाय कर रही हैं, वे पर्याप्त और प्रभावी नहीं हैं. इसलिए ज़रूरी है कि देश के भविष्य को पतन के रास्ते से बचाने के लिए परिवार से उपेक्षित, ग़रीब, अशिक्षित और बाल मज़दूरी करने वाले बच्चों को नशे से बचाने के लिए गंभीरता से प्रभावी और कारगर उपाय किए जाने चाहिए.।
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