प्रो. जेपी शाक्य
विभागाध्यक्ष,
दर्शनशास्त्र, महाराजा महाविद्यालय
महामति प्राणनाथ आत्म के
धनी, बहुमुखी प्रतिभा
के धनी, उच्च
कोटि के साहित्यकार,
नीतिकार, कलाकार, विश्व कवि,
प्रख्यात संगीतकार, गंभीर चिंतक,
समाज सुधारक, प्रणामी
धर्म के प्रणेता,
धर्म समन्वयक एवं
उच्च कोटि के
दार्शनिक थे। सामाजिक
एवं धार्मिक सद्भाव
के वे ध्वजवाहक
थे। दार्शनिक और
नैतिक क्षेत्र में
वे समस्त जीवों
के परमधाम के
पथ प्रदर्शक थे।
महामति प्राणनाथ ने हामी
और सामी दोनों
प्रचलित परम्पराओं की समन्वित
मान्यताओं को कुलजमस्वरूप
या तारतमवाणी में
अवतरित किया है।
कुलजमस्वरूप में कुल
चौदह ग्रन्थ-श्रीरास,
प्रकाश, शट्रूती, कलश, सनंध,
खुलासा, खिलवत, परिक्रमा, सागर,
सिनगार, सिन्धी, मारफतसागर, किरन्तन
और क्यामतनामा हैं।
गुजराती से हिन्दी
में रूपांतरण होने
से प्रकाश और
कलश हिन्दुस्तानी दो
ग्रन्थ और जोड़े
गये ।
प्रणामी वंाडमय में कवि
हृदय संतों की
परम्परा रही है।
प्रणामी परम्परा में महामति
प्राणनाथ की रचनाएं
स्वयं श्रेष्ठ काव्य
परम्परा में प्रणित
है। महामति प्राणनाथ
के पश्चात् करूणासखी
(करूणावती) नवरंग स्वामी, लालदास,
अहदीमुकुन्दस्वामी, सनेहसखी, महाराज छत्रसाल,
स्वामीवृजभूषण, बख्शी, हंसराज, ब्रह्ममुनि
ज्ञानदास, युगलदास, चैतनदास, आदि
प्रमुख हैं।
प्रणामी धर्म मूलत:
श्रीकृष्ण भक्ति पर आधारित
है। भगवान श्रीकृष्ण
का 11 वर्ष 52 दिन
का पवित्र स्वरूप
प्रणामी धर्म में
पूज्य व आराध्य
है। श्री राज
जी के साथ
श्री श्यामा जी
ही ब्रह्मात्माओं के
लिए सर्वस्व है।
ब्रजरास, महारास तथा जागनीरास
भक्तों के लिए
अखण्ड सुख का
प्रदाता है। संसार
के सभी धर्मो
की एकता प्रणाली
धर्म में देखने
को मिलती है।
वस्तुत: प्राणनाथ जी का
समन्वयवादी दृष्टिकोण ही सर्वधर्म
समन्वय की अवधारणा
विकसित करने में
सहायक सिद्ध हुआ
है। धर्म समन्वय
की भाव भूमि
पर प्रतिष्ठित है,
प्रणामी धर्म। प्रणामी धर्म
एक ऐसा विश्वधर्म
है जहां समस्त
धर्म अपनी पूरी
प्रतिष्ठा के साथ
संयुक्त हो जाते
हैं और अपने
सिद्धंातों से आगे
मानव को परमधाम
तक ले जाता
है। जीवात्मा
परमात्मा का दर्शन
कर अखण्ड सुख
का अनुभव करती
है। प्रणामी धर्म
विश्व हितकर धर्म
है इनमें न
केवल मानव कल्याण
का भाव है
बल्कि पशु पक्षियों
एवं वनस्पति जगत
तक महा करूणा
का प्रसार होता
है। संपूर्ण चर
अचर जगत यहाँ
अखण्ड सुख प्राप्ति
का मार्ग पा
सकता है। सर्वजन
हिताय-सर्वजन सुखाय
को अवधारणा यहाँ
साकार हो उठती
है। विश्वकल्याणार्थ प्रणामी
धर्म युग-युगोकं
तक संसार में
प्रतिष्ठित रहेगा और मनवता
का पथ प्रदर्शन
करता रहेगा।
प्रणामी धर्म की
मान्यता है कि
-
साहेब आये इन
जिमी, कारज करने तीन।
सबका झगड़ा मेंटने,
या दुनिया या दीन।।
आज के दिन
प्रत्येक प्रणामी धनुयायी अपने
जीवन के सबसे
बडे उत्सव के
रूप में मनाते
है और पन्ना
धाम आगमन पर
अपने जीवन को
धन्य मानते है।
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