21 सितंबर, 2014

जन से दूर जन सुनवाई


रवीन्द्र व्यास 
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मुख्य मंत्री द्धारा हर जिले में मंगलवार को जन समस्याओं के निपटारे के लिए शुरू किये गए जन सुनवाई शिविर अब सिर्फ रस्म अदायगी के तौर पर रह गए हैं /  जन से दूर होते जन सुनवाई शिवरो में अब विभाग प्रमुख नहीं बल्कि उनके अधीनस्थ औपचारिकता पूर्ण करते हैं / 
इसी दूरी  का नतीजा है की  पिछले दिनों छतरपुर के जिला पंचायत कार्यालय के सामने एक ग्रामीण युवक भ्रष्टाचार के विरुद्ध आमरण अनशन पर बैठने को मजबूर हुआ गौरगांय निवासी समाजसेवी महेश रिछारिया पिछले कई महीनो से सरकार के जन सुनवाई समारोह में शामिल हो कर गांव की पंचायत में व्याप्त भ्रस्टाचार की जांच की मांग करता रहा /
महेश को भरोषा था की मुख्य मंत्री द्धारा आम नागरिको की सुनवाई के लिए शुरू की गई जन सुनवाई योजना से उसे न्याय मिल जायेगा और सरकार के धन की वसूली हो जाएगी / इसलिए उसने कलेक्टर को सरपंच द्धारा किये गए गोलमाल के सारे दस्तावेज दिए/ हर कागजी शिकायती आवेदन की तरह इसकी भी वही दशा हुई जो औरों की होती है/ मजबूर और हताश होकर महेश ने कुछ समय पहले जन सुनवाई के आवेदनो को अपने शरीर पर लगाकर प्रदर्शन किया / बेशरम तंत्र पर इस तरह के प्रदर्शनों का कोई असर नहीं होता ,लिहाजा इसका भी असर नहीं हुआ / अंत में मजबूर होकर उसने आमरण अनशन किया /
                     देखा जाए तो यह केवल छतरपुर जिले भर की कथा नहीं है ,की जन सुनवाई के आवेदनो पर गंभीरता से कार्यवाही नहीं होती / मध्य प्रदेश और खासकर बुंदेलखंड इलाके के जिलो में अधिकारियों का रवैया कुछ इसी तरह का है / पीड़ित लोग  जन सुनवाई शिवरो में एक  आशा और विशवास के साथ पहुँचते हैं / क्योंकि उन्हें ये विशवास है की मुख्य मंत्री शिवराज सिंह द्धारा उनकी समस्याओं के निराकरण के लिए शुरू किये गए  हैं ये शिविर / इसमें यदि अपनी समस्या बताएँगे तो अधिकारी उनकी बात जरूर सुनेगे / भोले -भाले लोगो को शायद ये पता नहीं है की ये प्रशासन तंत्र है , जो अपनी मर्जी से चलता है , और महेश जैसे जुझारू लोगों को आमरण अनशन के लिए मजबूर करता है / 

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