30 अक्टूबर, 2013

मृत्यु और जीवन एक दूसरी के पूरक हैंooभाईजी


(लखन लाल असाटी)
छतरपुर,  व्यक्ति के जीवन रूपी धारा के दो घाटों का नाम हरिकृपा और हरि इच्छा है। जब भी कुछ अनुकूल घटे तो उसे हरिकृपा और जब प्रतिकूल घटे तो उसे हरिइच्छा मानकर संतोष कर लीजिए। अनुकूल और प्रतिकूल दोनों ही परिस्थितियों में भगवान को नहीं भूलिए।छतरपुर के  कल्याण मण्डपम् में ''हरि अनंत हरि कथा अनंता" पर तीसरे दिन प्रवचन करते हुए मैथिलीशरण भाई जी ने कहा कि जब हम मौसम में 'पतझड़ को सहजता से स्वीकार कर लेते हैं तो जीवन में प्रतिकूलता को क्यों नहीं?
            युगतुलसी पं. राम किंकर प्रवचन माला में उनके शिष्य भाई जी ने कहा कि जब सूर्य उदित हो रहा होता है तो वह सबसे पहले पश्चिम को ही देखता है, जहां उसे अस्त होना है। इसी तरह अस्ताचल सूर्य की नजर पूरब पर होती हैं, जहां अगली सुबह उसका उदय होना तय है। सूर्य के उदय और अस्त होने के उदाहरण को उन्होने मानव जीवन के लिए अत्यंत उपयोगी बताते हुये उन्होनें कहा कि मृत्यु और जीवन एक दूसरी के पूरक हैं। जीवन में जो मिल रहा है उसे हरिकृपा माने और दु:खो को भगवान के चरणों में विलीन कर दें। जीवन में पश्चिम आने का तात्पर्य है कि जीवन में सूर्य के उदय का समय निकट है।
सर्वजन सुखाय-सर्वजन हिताय
भाई जी ने कहा कि हमारी संस्कृति सर्वजन सुखाय-सर्वजन हिताय की रही है। गोस्वामी तुलसीदास जी राम चरित मानस की रचना ' स्वान्त:सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा, अर्थात खुद के सुख के लिए करते हैं। पर सारा संसार आज इसे पढक़र सुख पा रहा है। इसी तरह राजा भगीरथ अपने पितरों के मोक्ष हेतु गंगा जी को पृथ्वी पर  लाये पर आज गंगा जी हम सभी को मोक्ष प्रदान करती हैं। भाई जी ने कहा कि यदि आपका प्रयोजन आपका स्वार्थ आपका सुख वास्तविक और सात्विक है तो इससे आपके साथ-साथ सारे संसार को भी सुख मिलेगा।
           
            भाई जी ने कहा कि छिपाने की वृत्त्ति का नाम कपट है। जो है उसको छिपाने की चेष्टा कपट कहलाती है। और जो नहीं है उसे दिखाने की वृत्ति दंभ है। कपट और दंभ का संयुक्त उपयोग माया का रूप है। माया का अर्थ है कि जो वास्तव में है वह दिखाई न दे।
भ्रम की सृष्टि संध्याकाल में
भाई जी ने कहा कि भ्रम की सृष्टि संध्याकाल में होती है। दिन के प्रकाश में सब स्पष्ट दिखाई देता है रात में अंधकार में कुछ भी नहीं। भाई जी ने नारद मोह की कथा कहते हुए कहा कि नारद जी ने काम को जीत लिया, कामदेव पर गुस्सा न करे क्रोध को भी जीत लिया। उन्होंने इन्द्र को आश्वस्त कर लोभ भी जीत लिया परन्तु इसके बावजूद उन्हें बाद में मोह हो गया। यह माया जन्य विकृति प्रभु की ओर सी आई। क्योकि नारद जी जब तक भगवान के भजन में लीन थे कामदेव ने सारे उपाय कर लिये पर भगवान उनकी रक्षा कर रहे थे। पर बाद में वह यह ध्यान नहीं रख पाये कि उन्होने काम क्रोध लोभ को प्रभु की कृपा से ही जीता है।
            उन्हें यह अभिमान हो गया कि शंकर  जी भी सिर्फ काम को जीत सके थे पर क्रोध नहीं जीत सके थे। इसलिये उन्होंने कामदेव को भष्म कर दिया था। भगवान ने लीला के द्वारा नारद जी के  अभिमान को दूर किया। सच्चा भक्त अपनी प्रशंसा भगवान के चरणों में अर्पित कर देता है। भाई जी ने कहा कि संत का तात्पर्य केवल उसके वेष से नहीं है। साधारण गृहस्थ व्यक्ति भी अच्छा संत हो सकता है। जीवन में भगवान की कृपा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। इसलिये जीवन में अगर कुछ कहने या सपने देखने का अभ्यास करना है तो असली अभ्यास 'भगवान की कृपा  कहने का है।  सपना हमारे चित्त का प्रतिबिम्ब होता है। जब चित्त में भक्ति के संस्कार आ जाते है तो सपने भी वैसे ही दिखने लगते है।

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