30 अक्टूबर, 2013

कोई भी ज्ञानी या मूर्ख नहीं होता ;;भाई जी

(लखन लाल असाटी)
छतरपुर, । भगवान राम ने किसी के अंदर कोई परिवर्तन करने की जगह उसके स्वभाव को जस का तस स्वीकार कर लिया, यही राम राज्य बनाने की कला है। जो व्यक्ति जैसा है, उसमें जो गुण है उसे स्वीकार कर लीजिए। यह कथा युग तुलसी रामकिंकर जी के कृपा पात्र मैथिलीशरण भाई जी ने बुन्देलखण्ड परिवार द्वारा कल्याण मंडपम् में आयोजित सप्त दिवसीय रामकथा के पहले दिन क ही। प्रांरभ में कथा प्रसंग से परिचय कराते हुए वरिष्ठ पत्रकार व संपादक विनीत खरे ने साकेतवासी नारायणदास अग्रवाल बड़े भैया को स्मरण कर उनके प्रयासों को सतत जारी रखने के लिए कथा आयोजक जयनारायण अग्रवाल जय भैया व कथा रसिक श्रोताओं का स्वागत किया। रामकथा सुनने अपर आयुक्त वाणिज्यकर व पूर्व कलेक्टर राजेश बहुगुणा, जिला जज उपभोक्ता फोरम पी.के.श्रीवास्तव, ए.डी.जे. कृष्ण मूर्ति मिश्रा प्रमुख रूप से उपस्थित थे।

            ''हरि अनंत हरि कथा अनंता। कहहिं सुनहि बहुबिधि सब संता।। 
प्रसंग पर कथा कहते हुए भाई जी ने कहा कि जब अनेक रंगो को मिलाकर एक सुंदर चित्र की रचना हो सकती है तो अलग -अलग स्वभाव व वृत्तियों के लोगों को मिलाकर सुंदर समाज और संसार की रचना क्यों नहीं की जा सकती है। रामराज्य बनाने की यही तो कला है जो जैसा है उसे स्वीकार कर लें। भगवान राम ने हनुमान, सुग्रीव, विभीषण सभी को जैसा का तैसा स्वीकार कर लिया उनके अंदर परिवर्तन का प्रयास नहीं किया। समाज में कोई छोट बड़ा नहीं है, सब भगवान के ही स्वरूप हैं।भाई जी ने कहा कि संसार में जो भेद दिखाई देता है उसे भेद नहीं पूरक भेद मानिए। अर्थात सभी एक दूसरे के पूरक  हैं। समुद्र  का जल खारा है परन्तु जब वह थोड़ा ऊपर उठकर बादल बनकर फिर नीचे बरसता है तो मीठा हो जाता है। यदि आप भी समाज का कल्याण करना चाहते हैं तो अपने आपसे थोड़ा ऊपर उठना सीखिए।

स्वार्थी नहीं उपयोगी बनिए-
भाईजी ने कहा कि वृक्ष के फल, पत्तों का तो व्यक्ति उपयोग करता है सूख जाने पर उसकी लकडिय़ों को भी जलाने में उपयोग में ले लेता है। इसी तरह प्रत्येक व्यक्ति हर तरीके से उपयोगी वस्तु खोजता है, वह चाहता है कि समाज उसके उपयोग में आये। पर जब उसका खुद का उपयोग कोई अन्य व्यक्ति करना चाहे तो वह उसे स्वार्थी बताने लगता है। भाई जी ने कहा कि समाज आपके उपयोग में आये इसके लिये जरूरी है कि आप भीदूसरों के लिए उपयोगी बन जाए। संसार का प्रत्येक व्यक्ति स्वार्थी और परमार्थी दोनो ही है। हम जड़ वस्तुओं से बहुत पाने की आशा रखते हैं पर खुद चैतन्य होकर भी दूसरों को कुछ देना नहीं चाहते।
वर्तमान की चिंता कीजिए
भाई जी ने कहा कि भूत और भविष्य तो वर्तमान काल के ही दो कल्पित नाम हैं। जिसने वर्तमान को पहचान लिया वह तीनों का सही-सही उपयोग कर लेगा। वर्तमान को पहचान लेने से भविष्य आनंदमय होगा तथा भूत के दु:ख चिंतन का मौका नहीं आयेगा।  जो सारे संसार में ईश्वर को देख रहा हो वह क्यों किसी से विरोध करेगा। जो व्यक्ति दूसरों में अज्ञान व अपने आप में ज्ञान देख रहा हो वह अद्वैत नहीं द्वैत देख रहा है।  अपने अंदर ईश्वर दिखे तो खुद को ज्ञानी मानिए, भगवान में ईश्वर दिखे तो प्रेमी और सबमें ईश्वर दिखे तो दास समझिए। 
रिष्यमूक पर्वत के निकट भगवान राम और हनुमान के मिलन प्रसंग की चर्चा करते हुए भाई जी ने कहा कि संसार के लोग अपना परिचय गुणों को जोडक़र देते हैं पर भगवान अपना परिचय गुणों को हटाकर देते हैं। तभी तो हनुमान जी द्वारा परिचय पूछे जाने पर भगवान राम कहते है।
            ''कोसलेस दसरथ के जाए। हम पितु बचन मानि बन आए।।
             नाम राम लछिमन दोउ भाई। संग नारि सुकुमारि सुहाई।।
              इहां हरी निसिचर बैदेही। बिप्र फिरहिं हम खोजत तेही।।
             आपन चरित कहा हम गाई। कहहु बिप्र निज कथा बुझाई।।
            भगवान राम ने अपने किसी भी गुण का बखान नहीं किया। पर हनुमान ने उन्हें पहचान लिया क्योंकि वे सच्चे भक्त हैं जिनकी भक्ति त्रिकाल अबाधित है जो हमेशा अखंड रहती है। भाई जी ने कहा कि जिसने गुण को स्वीकार किया वह गुणाभिमानी हुए बगैर नहीं रहेगा। और अभिमान तो कभी न कभी खंडित होना ही है।
            भाईजी ने रामकथा का विस्तार करते हुए कहा कि हनुमान, शंकर और सती तीनों ने ही राम को एक ही अवस्था में देखा अर्थात सीता हरण के बाद रोते-विलपते हुए। पर शंकर जी और हनुमान जी को कोई भ्रम नहीं हुआ।
            ''संभु समय तेहि रामहि देखा। उपजा हियॅ अति हरषु बिसेषा।।
इसी तरह साधारण मानव के रूप में भी राम लक्ष्मन को देखने के बावजूद हनुमान जी उनसे पूंछ रहे हैं।
की तुम्ह तीनि देव महॅ कोऊ। न नारायन की तुम्ह दोऊ।।
            भाई जी ने कहा कि रोते -विलखते तथा वैभव -एश्वर्य हीन राम को शंकर और हनुमान ने तो पहचान लिया क्योकि जो सत् चित आनंद भगवान के अंदर है वह सच्चे भक्त के अंदर भी है। पर सती को मोह हो गया कि जो निर्गुण ब्रह्म है वह सगुण कैसे हो गया। शंकर जी से रामकथा सुनते हुये पार्वती जी को उस समय बड़ा आश्चर्य हुआ कि नारद जैसे परम ज्ञानी संत को भी मोह हो गया। तो भगवान शंकर ने कहा कि
''बोले बिहसि महेस तब ग्यानी मूढ़ न कोइ।
जेहि जस रघुपति करहिं जब सो तस तेहि छन होइ।।
कोई भी ज्ञानी या मूर्ख नहीं होता यह सब तो भगवान की माया है। भक्तों में माया व्याप्त होती है। परन्तु राक्षसों में यह विकृ ति होती है क्योंकि विकृति तो राक्षस का चरित्र होता है। भगवान के भक्त के जीवन में माया जनित क्लेश तो कभी-कभी ही दिखाई देते है। भगवान तो कृपा के अतिरिक्त कुछ करते ही नहीं क्योंकि भगवान का स्वभाव ही कृपालु है जब हमसे कोई कार्य होता दिखे तो अपने ज्ञान का मान न करें इसे भगवान की कृपा समझे।

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