17 फ़रवरी, 2020

बुंदेली लोक संस्कृति को बचाने का जतन बुंदेली उत्सव


बुंदेलखंड की डायरी 
 बुंदेली लोक संस्कृति को बचाने का जतन बुंदेली उत्सव 
रवीन्द्र व्यास

 वसंत ऋतू को ऋतुओं  का राजा ऐसे ही नहीं कहा जाता है , इस समय वायु मंडल के पांचो तत्व(अग्नि ,जल,वायु,धरा और गगन ) अपने  मन मोहक स्वरुप में होते हैं | प्रकृति मानो अपना नवश्रृंगार कर रही हो ऐसी अदभुत ऋतू में  बुंदेलखंड इलाके में बुन्देली सांस्कृतिक के रंग घरों से निकल कर मंचों पर बिखरने लगते हैं । बुंदेली लोक कला और संस्कृति के रंग ,बुंदेलखंड के कई जिलों में मंच पर देखने को मिल जाते हैं ,पर उनमे से छतरपुर जिले के बसारी गाँव के  बुंदेली उत्सव के रंग कुछ अलग ही हैं |  बुंदेली उत्सव के साथ ही साथ खजुराहो में खजुराहो नृत्य समारोह २० फरवरी से शुरू होगा , वही इस बार ओरछा में  ६ मार्च से तीन दिवसीय नमस्ते ओरछा फेस्टिवल शुरू होगा |
                                                      आधुनिकता की दौड़ में और हम कहीं ना कही अपने सांस्कृतिक मूल्यों ,परम्पराओं और तो और भाषा को ही भूलते जा रहे हैं । लोकसंस्कृति को बचाने और नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से अवगत कराने के लिए छतरपुर जिले के एक छोटे से गाँव बसारी में पिछले  23  वर्ष  से बुन्देली उत्सव होता आ रहा है ।२४  वे बुन्देली उत्सव के आयोजन के दौरान १७ फरवरी से २२  फरवरी तक चलेगा | 16 फरवरी को  बुन्देली उत्सव का  शुभारंभ   मप्र के राजस्व एवं परिवहन मंत्री गोविंद सिंह राजपूत ने  किया । शुभारम्भ मौके पर बुंदेली उत्सव में बिखरी बुंदेली संस्कृति से वे इतने प्रभावित हुए कि खुद भी अपने को गीत सुनाने से नहीं रोक पाए | श्री राजपूत ने कहा कि   हमारी कला, संस्कृति, रीतिरिवाज, बोली, खेल, गायन और नृत्य आज देश भर में चर्चित हो रहे हैं। उन्होंने फिल्मों में लिए गए कई बुन्देली गीतों को मंच से गाकर सुनाया और कहा कि यह हमारे लिए गर्व की बात है कि हमारे शब्द और संस्कृति दुनिया का ध्यान खींच रहे हैं। उन्होंने कहा कि उनके सागर जिले की राई लोक नृत्य की टीम को जापान में नृत्य प्रतियोगिता में जब प्रथम पुरस्कार मिला तब दुनिया ने माना कि हमारा लोक नृत्य, हमारी संस्कृति कितनी अनूठी है। उन्होंने  बुन्देली विकास संस्थान एवं पूर्व विधायक मुन्नाराजा के कार्यो की प्रशंसा करते हुए कहा कि  ये उनके ही   प्रयासों   का नतीजा है कि उन्होंने इस अनूठे आयोजन को देश भर में पहुंचाकर बुन्देलखण्ड की कला और संस्कृति को विस्तार दिया है। उन्होंने कहा कि हमें गर्व है कि हम बुन्देलखण्डी हैं।
बुंदेली उत्सव के आयोजन के चलते  इस छोटे से गाँव में एक विशाल स्टेडियम बन गया । इस मैदान पर आयोजन के दौरान जब छोटे छोटे बच्चों को गिल्ली डंडा खेलते हुए लोग देखते हैं तो लोगो को अपने अतीत की बरबस याद आ ही जाती है । अब तो  ये खेल किसी गाँव की गली में भले देखने को मिल जाए शहरों से तो गायब हो चुका है । बच्चे मोबाइल और कम्यूटर के खेल में व्यस्त हैं । बुंदेलखंड की मनमोहक चित्रकारी , महिलाओं की कुश्ती प्रतियोगिता , कबड्डी , बालीबाल , घोड़ो का नाच , रस्सा कसी , बुन्देली व्यंजन प्रतियोगिता बरबस ही लोगों का ध्यान अपनी और खीँचती है । चौपड़ पहले बुंदेलखंड के प्रिय खेंलों में से एक होता था , गाँव गाँव में चौपड़ के फड् जमते थे, हालात बदले अब खेल को जानने और समझने वाले कम लोग ही बचे हैं । यहां इस खेल की प्रतियोगिता देखते ही बनती थी । जब लोग पांसे फेंक कर जयकारा लगाते थे ।

मंचीय कार्यक्रमो में  लोक विधाओं  की महफिले  ना सिर्फ सजेंगी बल्कि उनकी  प्रतियोगिता भी होगी | यहां के मंच पर   बुंदेलखंड के अंचल में अब सीमित और लुप्त होते जा रहे बधाई नृत्य , कछयाई , दीवारी , अहिरयाई , कहरवा , बनरे , लमटेरा , सैर , ख्याल ,दादरा , गोटें , कार्तिक गीत , आल्हा ,बिलवारी ,काडरा , रावला ,सोहरे ,ढिमरयाई , राई और फाग की लय और ताल, एक अलग ही रंग जमाते हैं । अपने आप में अनोखी इन प्रस्तुतियों को देखने सुनने और समझने का मौका यहाँ मिलता है । हम जिन बैलो को छोड़ कर मशीनी युग में जी रहे हैं उन बैलो की बैल गाडी दौड़ प्रतियोगिता भी किसानों को बैलो से लगाव और प्रकृति से जुड़े रहने का सन्देश देती है । इस बार डोंडा (नोका ) दौड़ प्रतियोगिता का भी आयोजन 17 को  हुआ । बुंदेलखंड की सांस्कृतिक विरासत को लिपि वद्ध करने के लिए हर वर्ष की तरह बुन्देली वसंत पत्रिका का विमोचन भी मंत्री जी ने किया  । बुंदेलखंड की विरासत को सहेजने और समृद्ध करने वालों का सम्मान भी हुआ । यहां बुन्देली में बनी  फिल्मो का प्रदर्शन भी पिछले ३-४ वर्षो से किया जा रहा है  ।

पूर्व विधायक शंकर प्रताप सिंह बुंदेला , 23  साल पहले शुरू किये गए इस आयोजन के सम्बन्ध में बताते हैं कि , इस दौर में हम अपनी , बोली ,भाषा ,संस्कृति को भूलते जा रहे हैं , बुंदेलखंड की यह वाणी और संस्कृति बची रहे इसी लिए यह शुरुआत की थी । आज पाश्चात्य संस्कृति इतनी हॉबी होती जा रही है कि लोगों का खान-पान और रहन-सहन बदल गया है, लोक संस्कृति भूलते जा रहे हैं , बुन्देली बोलने में लोगों को शर्म आने लगी है ।लोग अपने बच्चों को बुंदेलखंडी बोलने पर डांटने लगे हैं , यहां तक की मजदूरी करके लौटे लोग भी बुन्देली छोड़ एक अजीब तरह की हिंदी बोलने लगते हैं ।

शंकर प्रताप सिंह बुंदेला के विचारों से सहमत छतरपुर के प्रमुख साहित्यकार सुरेंद्र शर्मा शिरीष , प्रो बहादुर सिंह परमार , ,के. एल पटेल सहित अनेको साहित्यकार,समाज सेवी बुंदेलखंड की लोकसंस्कृति को बचाने के इस अभियान में जुटे हैं । श्री बुंदेला भले ही इसे गैर राजनैतिक मानकर कार्य करते हैं , अपने इस आयोजन में सभी राजनैतिक दलों के लोगों को जोड़ने का प्रयास भी करते हैं मुख्य अतिथि भी बनाते हैं , पर सियासत करने वाले इसमें भी राजनैतिक रंग देने से नहीं चूकते ।

श्री बुंदेला ने जब यह कार्यक्रम शुरू किया था उस समय प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी । शुरुआत के पांच साल तो सरकार और लोगों के सहयोग से ठीक ठाक चले । यह वह दौर था जब सांस्कृतिक विरासत को बचाने के इस अभियान की एक मजबूत नीव बन चुकी थी । सरकार बदली सियासत का और लोगों का मिजाज भी बदल गया । सरकार ने सहयोग पर विराम लगा दिया , सियासत से हित साधने वाले अनेकों लोगों ने मुंह मोड़ लिया । यहां तक की इस आयोजन के समांनातर छतरपुर में एक आयोजन भी उन्ही दिनों सरकार ने कराया , एक ही साल हुआ ।

देखा जाए तो लोकसंस्कृति किसी बैशाखी की मुहताज ७० -८० के दशक तक नहीं रही । लोकसंस्कृति और लोक परंपराएं बुंदेलखंड के लोगों की जीवन की एक शैली थी और है। पर बीते  तीन_चार  दशकों में जिस तेजी से जन रंजन के माध्यमो का विस्तार हुआ उसने देश की तमाम लोकसंस्कृतियो पर आघात पहुंचाया है । हालांकि लोकसंस्कृति के कोई लिखित मापदंड नहीं होते पर इसमें परम्पराओ की जड़ें इतनी गहरी होती हैं की इसको बदलने में सादिया बीत जाती थी । आधुनिकता की जीवन शैली और पाश्चात्य सभ्यता का अंधानुकरण लोगों को अपनी परम्पराओं से अलग कर देता है । ऐसी दशा में वे न घर के रहते ना घाट के । जिस बुन्देली भाषा के बोलने में आज के बुन्देलखण्ड के नव् धनाड्य वर्ग को शर्म आती है , असल में आम जन मानस में यह बात बैठा दी गयी  है कि  रीती रिवाज , लोक गीत , बोली वगैरह गवारुपन है , पाश्चात्य सभ्यता अपनाना ,विलायती शब्दों का प्रयोग आधुनिकता है |   देश के जाने माने साहित्यकार प बनारसी दास चतुर्वेदी ने मधुकर पत्रिका में लिखा था कि बुन्देली भाषा इतनी मधुर और समृद्ध है कि इसके सामने बृज की भाषा कही नहीं लगती ।

10 फ़रवरी, 2020

चले थे नायक बनने, बन गए खलनायक

बुंदेलखंड की डायरी 
चले थे नायक बनने, बन गए खलनायक 
रवीन्द्र व्यास 
बुंदेलखंड ,इलाके में जो ना हो जाए वह थोड़ा है , ऐसा ही कुछ  नजारा पिछले दिनों छतरपुर जिले में देखने को मिला |  प्रशासनिक षड्यंत्र का ऐसा खेल लोगों को देखने को मिला जिसकी मिसाल देश प्रदेश में कहीं देखने को नहीं मिलती | छतरपुर  तहसील के एसडीएम ने ऐसा  जबरदस्त कारनामा कर दिखाया  जो किसी फ़िल्मी पटकथा से कम नहीं था | जिसमे  नायक  नजर आने वाला अधिकारी खलनायक  बन जाता है |  
             इस जीवन्त  कथा में  शहर के दबंग माने जाने वाले एसडीएम  अनिल सबकाले अपनी दबंगई के चलते नियम और कानून को दरकिनार कर, आदेश जारी करते रहे  हैं |   फ़िल्मी खलनायक की तरह उनका  अपना एक गिरोह भी बन जाता  हैं ,| उनके इस काकस मण्डली में   ठेकेदार , जन सेवक  , शिक्षा  कारोबारी , भूमि कारोबारी  और  सामाजिक प्रतिष्ठा बनाने और बिगाड़ने  वाले पत्रकार भी होते हैं |   अपना यह  किरदार इतनी सफाई से  निभाते  हैं कि  लोगों को लगता है कि वाह क्या काम किया है | असल में उनके अधिकाँश कार्यक्रमों के पीछे वसूली का एक अभियान होता है | और  लोगों से वसूली के लिए  अपना एक अलग विश्वस्त आदमी हमेशा अपने साथ रखते हैं | उसे रेस्ट हाउस में रखा जाता है और स्वयं सर्किट हाउस में  अपना स्थाई बसेरा बना लेते हैं |  लोगो से बातचीत की हर रिकॉर्डिंग अपने  मोबाइल में कर लेते हैं  |  खलनायकी का जो इतना बेहतर किरदार निभा रहा हो भला वह पाने ख़ास लोगों को लाभ से क्यों वंचित करे | लिहाजा  उसने  अपने  ख़ास  मित्र  पुष्पेंद्र गौतम  जोकि श्री कृष्णा विश्वविद्यालय के संचालक सदस्य हैं   को लाभ  पहुंचाने के लिए  एक ऐसा  अनैतिक आदेश जारी करते हैं जो उनके गले की फांस बन जाता है | पुष्पेंद्र गौतम के विरोधी और खजुराहो विश्व विद्यालय के प्रमुख अभय सिंह भदौरिया  को फ़साने के लिए  वे  अपने ही ऊपर हमले  की  फ़िल्मी कथा तैयार करते हैं और हमला करवाते हैं |                         खलनायकी के इस किरदार में वे  भी फ़िल्मी खलनायकों की तरह एक चूक कर जाते हैं ,नतीजतन उनके सारे षड्यंत्र का पर्दा फास वर्दी वाले कर देते हैं |  7  फरवरी २०२० को पुलिस कप्तान तिलक सिंह ,एस डी एम कार्यालय में 5 फरवरी की  सुबह 9 बजे  हवाई फायर , एसडीएम की गाड़ी और चेंबर में  तोड़फोड़ के मामले में  खुलासा कर देते है | पुलिस हमले के  मास्टर माइंड एसडीएम अनिलसपकाले , बीजेपी अल्प संख्यक मोर्चा के प्रदेश मंत्री जावेद अख्तर , श्री कृष्णाविश्विद्यालय के संचालक पुष्पेंद्र सिंह गौतम  अमित सिंह परिहार, अर्जुन श्रीवास और संतोष सोनी  और राजेंद्रसिंह को गिरफ्तार कर लेती है | पुलिस ने आरोपियों के पास से कट्टा ,कारतूस,बेसबाल का बेट,लाठी वगैरह जप्त कर लेती है | न्यायालय में पेश कर पुलिस अनिल सबकाले , पुष्पेंद्र सिंह , जावेद अख्तर और राजेंद्र सिंह को तीन दिन के पुलिस रिमांड पर ले लेती है |  
                      इस मामले में खुद मास्टर माइंड  एसडीएम  अनिल सबकाले पुलिस को  लिखित रिपोर्ट भी करते हैं | पुलिस उनकी रिपोर्ट पर अप क्र ४२/२०२० धारा ३०७,३५३,४२७. ५०६,३४ आईपीसी और सावजनिक संपत्ति निवारण अधिनियम की धारा ३ के तहत मामला भी दर्ज कर लेती है  | वे पुलिस को बताते हैं कि  मुझे ऐसा लग रहा है कि मेंएंटी माफिया के खिलाफ कार्यवाही कर रहा हूँ उसी को दबाने के लिए अज्ञात हमलावरोंने इस तरह की कार्यवाही की है |
विवाद के विश्वविद्यालय :
मामले के  आरोपी पुष्पेंद्र गौतम और उनके भाई ब्रजेन्द्र सिंह गौतम ने मिलकर छतरपुर में कृष्णा विश्वविद्यालय की स्थापना कर  एक बड़ी सौगात छतरपुर जिले को दी थी | अभय सिंह भदौरिया पन्ना रोड पर खजुराहो विश्वविद्यालय की स्थापना करना चाहते थे | अपने इस विश्वविद्यालय के लिए उन्होंने  पन्ना रोड पर कदारी गाँव के पास एक भूमि क्रय की थी | खजुराहो यूनिवसिटी के संचालक अभय सिंह भदौरिया ने 30 जनवरी को  पत्रकार वार्ता कर  छतरपुर एसडीएम अनिल सपकाले के  कारनामो का खुलाशा किया था | उन्होंने सबकाले  पर   एक करोड़ रुपए मांगने और  राशि नहीं  देने पर  भूमि शासकीय घोषित करने की धमकी देने का आरोप लगाया था |   जिस भूमि को एसडीएम शासकीय बताया  उसी भूमि का फोरलेन के तहत 20 लाख का मुआवजा सरकार ने   अभय सिंह भदौरिया  को  दिया। भदौरिया के अनुसार खसरा क्र  336/1 कि भूमि मैंने शरद अग्रवाल से खरीदी थी जिसमें 14 लाख रुपए रजिस्ट्री खर्च किया गया है एवं लगभग 6 लाख रुपए ड्रायवर्सन के लिए चालान से राशि जमा की गई है और एसडीएम ने ही  भूमि का डायवर्सन किया । यही नहीं अपर कलेक्टर न्यायालय द्वारा आदेश दिनांक 14.10.2019 को 336/1 ग्राम कदारी की भूमि को भू स्वामी की जमीन मानते हुए अभय सिंह भदौरिया के पक्ष में फैसला किया गया है। इसके अलावा हाईकोर्ट द्वारा सीमांकन पर आगामी आदेश तक के लिए स्टे दिया गया था। दिलचस्प ये है कि  यह 336 खसरा की जमीन 6 बार खरीदी बेंची  गई और 6 बार नामांतरण भी  किया गया। फोरलेन के मुआवजे में  लोगों को लाखों रुपए की राशि मुआवजे के रूप में दी गई |                
एसडीएम के रूप में अनिल सबकाले ने २५ जनवरी को एक आदेश राजस्व प्रकरण क्र ७०/अ -६-अ /२०१९-२० जारी कर  क़दारी पटवारी हल्का की 13 एकड़ शासकीय जमीन  अपने नाम कराने और  अवैधानिक खरीद बिक्री करने पर  रामनाथ चौबे ,अभय सिंह भदौरिया सहित 13 लोगों पर अपराध धारा 420 ,467 ,468 ,469 ,470 ,471  के तहत मामला दर्ज करने के निर्देश सिविल लाइन थाना पुलिस को दिए थे |  भदौरिया द्वारा 30 जनवरी को पत्रकार वार्ता करने पर  एसडीएम ने 30 जनवरी को पात्र क्र 49 के द्वारा एसपी ,कलेक्टर को पत्र लिख कर  जमीन क्रय विक्रय मामले में कार्यवाही  करने की अपील की गई थी | इसी मामले में भदौरिया ने जिला न्यायालय में जमानत का आवेदन दिया था , | एसडीएम पर हमले वाले दिन ५ जनवरी को ही उसके जमानत की तारीख लगी थी \। इस मामले में ।कमिश्नर के निर्देश पर अब  इस मामले की जांच भी फिर से की जा रही है| 
 सबकाले की जांच और बेचैन राजस्व अधिकारी                        
  अनिल सबकाले हमले  मामले में पुलिस को प्रारम्भिक तौर पर ही षड्यंत्र नजर आने लगा था |  यही कारण है की सीएसपी उमेश शुक्ला ने मीडिया को दिए अपने बयान में अप्रत्यक्ष तौर पर इसका इशारा भी कर दिया था | एडिशनल एसपी जयराज कुबेर ने अपने जांच का सिलसिला भी भूमि और विश्वविद्यालय की कड़ी के साथ ही आगे बढ़ाया | जब उन्होंने मोबाइल की रिकार्डिंग  ली तो सारी कड़ियाँ खुद बा खुद खुलती चली गई | पुलिस के हाथ लगे कृष्णा विश्वविद्यालय के पुष्पेंद्र गौतम , और बीजेपी नेता जावेद अख्तर ने हमले की सारी कथा उजागर कर दी |  जिसमे पैसो के लेनदेन के साथ  अपने व्यावसायिक प्रतिद्वंदी भदौरिया को सबक सिखाने की बात कही गई बहरहाल  अनिल सपकाले की  गिरफ्तारी  के बादसागर  कमिश्नर आनंद शर्मा ने उन्हें निलंबित कर   उनकेकार्यकाल की  जांच के आदेश जारी किए हैं। बीते  रविवार को अपर कलेक्टर प्रेम सिंह चौहान एवं एडीशनल एसपी जयराज कुबेर ने एसडीएम कार्यालय में  अनिल सपकाले के द्वारा  जारी किए गए आदेशों  की फाइलों को जब्त किया। 
प्रशासनिक अराजकता दरअसल बुंदेलखंड इलाके में पिछले कुछ वर्षों के दौरान पद के दुरपयोग के अनेकों मामले देखने को मिले हैं | जिसके चलते कई छूट भाइये कर्मचारी अधिकारी लोकायुक्त की भेंट भी चढ़े | बड़े स्तर पर  अपने पद के दुरपयोग के कई मामले सामने आते रहते हैं , पर हालात तब और कष्ट प्रद हो जाते हैं जब बेबस लोगों की कोई सुनने वाला नहीं होता | इस मामले में भी ऐसा ही कुछ हुआ है | अगर किसी अधीनस्थ  अधिकारी की गैरजिम्मेदाराना हरकतों को उसके वरिष्ठ अधिकारी नजरअंदाज नहीं करते तो शायद  हमले की यह फ़िल्मी पटकथा नहीं देखने को मिलती ।

28 जनवरी, 2020

माँ का शव घर ले जाने से पुत्र का इंकार

कलयुग के  पूत


छतरपुर / / 28 जनवरी 2020 / नगर के दर्शना वृद्ध सेवाश्रम में रहने वाली फूलवती चौरसिया पत्नी स्व राम गोपाल चौरसिया (८३) का अंतिम संस्कार वृद्धाश्रम समिति के लोगों को करना पड़ा  | इसके पीछे समिति के लोग बताते हैं कि फूलवती के पुत्र ने अपनी माँ की मृत देह को घर ले जाने से इंकार कर दिया था | दाह  क्रिया के मौके पर पुत्र तो पहुंचा तो जरूर पर बेगानो की तरह |


             वृद्धाश्रम के प्रबंधक दिनेश वैद्द्य ने बताया कि 14 फरवरी 2017 को फूलवती ने जनसुनवाई में तत्कालीन कलेक्टर रमेश भंडारी को एक  आवेदन पत्र  दिया था | पत्र में उसने अपने बेटे बहु के द्वारा साथ ना रखने का आरोप लगाया था | इस आवेदन पर कलेकटर ने फूलवती को वृद्धाश्रम में रखने के निर्देश दिए थे | तभी से वह वृद्धाश्रम में रह रही थी | उसने बतया था की उसके तीन पुत्र थे एक खत्म हो गया था , दो में एक हराम खिलावन के पास वह रहती थी ,पर वह रखना नहीं चाहता | दुसरा पुत्र शिवकुमार कुछ करता धरता नहीं है उसकी पत्नी भी उसे छोड़ कर भाग गई है |

                         दिनेश ने बताया की २७ को जब फूलवती की मृत्यु हुई तो इसकी सूचना उसके पुत्र राम खिलावांन को दी गई | उसके पुत्र ने अपनी माँ के शव को लेने से इंकार कर दिया | ऐसी दशा में समिति ने स्वयं ही फूलवती के अंतिम संस्कार की व्यवस्था की और समिति के हेमंत बबेले ने एक पुत्र की तरह सारी रश्म अदा की | हालांकि अंतिम संस्कार के मौके पर फूलवती का पुत्र रामखिलावन पहुँच अवश्य गया था | दिनेश ने फूलवती के शव को पुत्र द्वारा ना लिए जाने के कारण के सम्बन्ध में बताया की राम खिलावांन को उसकी पत्नी ने धमकी दी थी की यदि शव घर पार लाये तो में आत्म ह्त्या कर लूंगी | संभवतः इसी वजह से वह बाद में  फोन नहीं उठा रहा था | बाद में उसके नौगांव स्थित वेयर हाउस के अधिकारियों से जब संपर्क किया गया तब कही जा कर वह आया था |

                         रामखिलावन ने इस मसले पर कहा की वह दाह क्रिया में पहुंच गया था | दो बच्चो के पिता राम खिलावन ने माँ के शव को घर ना ले जाने और पत्नी की धमकी के सम्बन्ध में कहा की वह पहुंच गया था |

                       

23 जनवरी, 2020

अंग्रेजी मीडिया मुझे बदनाम करने में लगा है० विवेक अग्निहोत्री

एक संवाद विवेक अग्निहोत्री के साथ_

//रवीन्द्र व्यास//
खजुराहो में  तीन-दिवसीय खजुराहो लिटरेचर फेस्टिवल (केएलएफ 2020)   सफलतापूर्वक संपन्न हो गया। भारतीय संस्कृति , भारत और भारतीयता के नाम यह   सम्मेलन  खजुराहो में लोकनीति द्वारा आयोजित किया गया था | सम्मलेन में भाग लेने आये जाने माने  फिल्म निर्माता ,निर्देशक और लेखक विवेक अग्निहोत्री ने भाषा से  चर्चा में भारतीय धर्म ,लोक धर्म और आधुनिक पीढ़ी के भटकाव पर चिंता जताई |  

  फिल्मकार विवेक अग्निहोत्री ने एक सवाल के जबाब में कहा कि  नई जनरेशन जो है वह  कला साहित्य इन सब से दूर होती  जा रही  है|   मेन कारण यह है कि हम लोग बातें चाहे जितनी करें पर सभी की आकांक्षा यही रहती  है कि बच्चा कान्वेंट में जाए|  हमें लगता है कि हम लोग मॉडर्न हो रहे हैं हम मॉडल नहीं हो रहे हैं बल्कि और पिछड़ रहे हैं अपनी पहचान को अपने अस्तित्व को छोड़ो रहे हैं ,ओढ़ा  हुआ व्यक्तित्व कभी जीवन में खुशी नहीं दे सकता | जो अपनी जड़ों  को ही नहीं  पहचानता उसमें फल नहीं लग सकते ,ऐसा मेरा सोचना है ऐसा मेरा अनुमान है |  मैं भोपाल में पड़ा मुझे कभी खजुराहो के बारे में नहीं पढ़ाया नहीं गया मुझे कभी भोपाल मांडू या ग्वालियर के बारे में पढ़ा या नहीं गया , पढ़ाया गया बड़ी बड़ी चीज  रोमन एंपायर अकबर के बारे में, जब आपको लोकल हिस्ट्री ही नहीं पता आप कुछ भी पढ़ ले तो उससे आपको कोई फायदा नहीं होने वाला|   नई जनरेशन को सही दिशा देने का  दायित्व हमारा ,परिवार  समाज का भी है मीडिया का भी है सरकार का भी है कि सबका कलेक्टिव दाइत्व  है कि उसको संस्कृति और साहित्य से अवगत कराएं |
ण। 
 
  फ़िल्मी दुनिया की व्यस्तता के बावजूद सामाजिक जागरूकता  के लिए सतत कार्य करने के सवाल पर अग्निहोत्री जी ने बताया कि  जो फ्रीडम मूवमेंट आया था उसमें बहुत वॉलिंटियर ने काम किया देश के लिए बहुत काम किया|  अब हम लोग धीरे-धीरे अपने में ही सीमित होते जा रहे हैं ,अपने लिए ही काम करते हैं, देश जाए  भाड़ में ||  बातें खूब करते हैं सोशल मीडिया में लिख दी  दो चार बातें प्रदूषण मत करो पेड़ मत काटो और हमारी जिम्मेदारी खत्म |  मैंने यह सोचा कि मैं क्या कर सकता हूं कोई धन्ना सेठ तो हूं नहीं कि उनको पैसे दे पाऊं पूरी दुनिया में घूमता हूं देखता हूं समझता हूं वह कहानी मैं लोगों को सुना सकता हूं |  इसलिए मैंने जगह जगह जाकर लोगों को कॉलेज में यूनिवर्सिटी में स्कूल में यूथ को अपने स्टोरी से प्रेरणा मिल सके  और उनको भी आप अपने समाज और देश के प्रति गर्व हो सके और भारत के पुनर्निर्माण में अपना योगदान दे सकें |   इसमें अपना छोटा सा हिस्सा प्ले कर सकूं इसलिए ये सब करता हूँ |  इसलिए मैंने एक किताब भी लिखी  इस तरह की फिल्में भी बनाई आप देखिए कि मैं लेख लिखता रहता हूं वीडियो बनाता रहता हूं और उसी दिशा में सारे कार्य हैं | 


 इन दिनों वालीवुड पर ये आरोप लगते हैं कि  हिन्दू विरोधी मानसिकता से फिल्मे बनाई जा रही हैं ?  फिल्मों में हिंदुत्व के विरुद्ध  लगातार किए जा रहे हमले के पीछे के कारणों के संबंध में उन्होंने कहा कि हमारी उपेक्षा का परिणाम है , लोग आप का मजाक उड़ाते रहे ,आपने उस पर ध्यान नहीं दिया उसका कोई जवाब नहीं दिया और आप अपने में ही मशगूल रहे|  आप अपना ही काम करते रहे इसलिए भी धीरे-धीरे यह  जो लोग हैं जिनका कार्य ही यह है जिनको पैसे ही इसी  बात के मिलते  हैं कि वह केवल समाज को तोडे ,|   गलत प्रचार करते रहे हम सहन करते रहे सुनते रहे लेकिन लेकिन अब जो नई जनरेशन हैं वह जागरूक हो गई है इस बात पर वह सवाल खड़े करने लगी है इस बात पर इतने साल से कोई नहीं बोला अब सवाल उठने लगे हैं कि यह गलत हो रहा है यह बात आपने भी नोटिस की होगी बहुत अच्छा परिवर्तन है धीरे-धीरे हालात सुधरेंगे अभी मैं अकेला हूं।  सारा बॉलीवुड एक तरफ मैं अकेला लड़ाई लड़ रहा हूं धीरे धीरे और नए लोग जुड़ते जाएंगे और नए लोगों को प्रेरणा मिलेगी वह सामने आते रहेंगे | 

 अकेले क्यों हैं के सवाल पर उन्होंने कहा के अंग्रेजी मीडिया किसी भी तरह से मुझे बदनाम करने में मेरा बुरा करने में लगा रहता है लेकिन देश का जो रीजनल मीडिया है जो असली मेहनत करने वाले लोग हैं जिनके पास करोड़ों की प्रॉपर्टी नहीं है उन लोगों में मेरा बड़ा प्रेम का रिश्ता है  वह में मेरी बात भी समझते हैं|  फिल्म ताशकंद फाइल को बनाने के पीछे अपने मकसद को उन्होंने स्पष्ट किया कि मेरा मकसद था 1  भारत के नागरिकों को जो मौलिक अधिकार जो होना चाहिए कि हर सच वह जाने हमें हर सच पता चले हमें पता ही नहीं चला देश  के  पीएम की मृत्यु का सच ही पता ना चला तो आप छोटे-मोटे सच के बारे में भूल ही जाइए उसके खिलाफ आवाज उठाने की एक छोटी सी मुहिम थी इसी तरह हमने कश्मीर फाइल भी बनाई उसका सच भी सबके सामने  आया बहुत सारी चीजें हैं जो इस देश में | 

 खजुराहो आए फिल्म निर्माता निर्देशक और लेखक विवेक अग्निहोत्री ने खजुराहो लिट्रेटचेर फेस्टिवल में अपने  विचार व्यक्त करते हुए देश के मौजूदा हालातों के साथ ,धर्म ,अध्यात्म, खजुराहो के मंदिर ,काश्मीर के हिन्दुओं के उत्पीड़न,,राष्ट्र पुनर्निर्माण ,भविष्य के अखंड भारत के बारे में विस्तार से अपने विचार व्यक्त किये थे | 

20 जनवरी, 2020

पन्ना की जहरीली हो रही गंगा

बुंदेलखंड की डायरी
(रवीन्द्र व्यास)  
लगभग 10-11 लाख की आबादी वाला पन्ना जिला  देश वा बुन्देलखण्ड के उन जिलों में से एक है जो कई-कई मायनों में  अपनी अनोखी विरासत के लिए जाना जाता है ।  इसी नगर  में एक नदी बहती है किलकिला , जिसके अतीत की कहानी कम दिलचस्प नहीं है । लगभग चार।   सौ साल पहले यह एक  एसी जहरीली नदी थी कि जिसके ऊपर से निकलने में परिंदे भी डरते थे । किलकिला नदी का उदगम भी इसी जिले से होता है और विलीन भी इसी जिले में होती है । 
 दुनिया भर में फैले प्रणामी सम्प्रदाय के लोगों के लिए किलकिला नदी गंगा की तरह पूज्य है । इसके पीछे मान्यता है कि चार शताब्दी पूर्व इस जहरीली नदी को जहर मुक्त प्राणनाथ जी ने किया था । अब फिर इस नदी को जहरीली बनाने में लोग जुटे हैं । इसमें मिलने वाले गटर पन्ना की इस गंगा को मैला करने में कोई कसर नहीं छोड़ते । इतना ही नहीं बड़ी देवी मंदिर के पुल से रानी बाग़ तक लगभग दो सौ एकड़ में नदी किनारे सब्जियों की फसल लहलहा रही है | जहरीले पानी से सिंचित यही सब्जियां पन्ना के लोगों के घरों, होटलो ,विवाह घरों  में पहुँच रही हैं | कृषि वैज्ञानिक जहरीले पानी से सिंचित  सब्जियों को सेहत के लिए हानिकारक मानते हैं | 
एन जी टी के निर्देशों की अनदेखी 
2016 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने प्रदेश सरकार को निर्देशित किया था कि सीवर के पानी से प्रदेश में कहा कहाँ सब्जियों का उत्पादन किया जा रहा है इसका पता लगाए | चूँकि किसी भी तरह के दूषित जल से सिचाई कर उगाई जाने वाली सब्जियां लोगों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं इस लिए ऐसी सब्जियों के उत्पादन पर ना सिर्फ रोक लगाए बल्कि उगाई गई सब्जियों को नष्ट किया जाए | 

 किंवदंतियों की किलकिला:-
                   पन्ना जिले के बहेरा के समीप  छापर टेक पहाड़ी   से निकलने वाली गंगा बेसिन की  यह किलकिला नदी पन्ना टाइगर रिजर्व से होती हुई  सलैया भापतपुर के मध्य  केन नदी में विलीन हो जाती है । जिले में ४५ किमी  बहने वाली यह नदी  केन नदी में मिलने से   पहले (5 किमी पूर्व ) यह  अपना नाम भी बदल लेती है । वहां लोग इसे माहौर नदी  नाम से जानते हैं । एक नदी के दो नाम  प्रायः कहीं सुनने में नहीं मिलते । सदियों से प्रवाहित हो रही इस  नदी को लेकर तरह तरह की किवदंतियाँ भी यहां खूब प्रचलित हैं । कहते हैं की जब घोड़ा इस नदी का पानी पी लेता तो घुड़सवार , और घुड़ सवार के पीने पर घोड़ा मर जाता था । स्वामी लाल दास ने अपने एक लेख में लिखा है की किलकिला नदी को कुढ़िया नदी भी कहते हैं , क्योंकि इस जल के उपयोग करने से  कोढ़ हो जाता था ।  एक और किवदंती यह भी है की यह नदी इतनी विषैली थी की  जब कोई पक्षी इसके ऊपर से निकलता था तो वह मर जाता था । 
388 वर्ष पूर्व नदी का जल बना अमृत :                                             मान्यता है की  किकिला के इस विषैले जल को अमृत बनाया  निजानन्द सम्प्रदाय के प्राणनाथ जी ने । संवत 1684 में वे इसी किलकिला नदी के तट पर आये थे । यहाँ जब उन्हें  स्नान करने की इक्षा हुई तो स्थानीय आदिवासियों ने उन्हें  नदी में स्नान करने से  रोका था । कहते हैं तब  उनके अंगूठे के स्पर्श मात्र से यह विषाक्त जल अमृत हो गया था  ।  वह स्थान आज भी अमराई घाट के नाम  से जाना जाता है ।  यह  स्थान  निजानन्द  सम्प्रदाय में  पवित्र स्थल माना जाता है । प्राण नाथ  यही बस गए  उनका प्राणनाथ  मंदिर   निजानन्द सम्प्रदाय के लोगों के लिए किसी तीर्थ स्थल से कम नहीं है , और किलकिला नदी उनके लिए गंगा की तरह पूज्यनीय है । इस सम्प्रदाय को मानने वाले दुनिया भर में फैले लोग  इस नदी का जल ले जाते हैं  । आज भी इस सम्प्रदाय से जुड़े लोगों की मृत्यु  के बाद उनकी अस्थियो को  नदी किनारे बने मुक्ति धाम में ही दफ़नाया  जाता  हैं ।  मान्यता है की इससे जीव को मुक्ति मिलती है । 
          पन्ना की इस  किलकिला नदी के उद्धार के लिए नगर पालिका के तत्कालीन अध्यक्ष ब्रजेंद्र सिंह बुंदेला ने प्रयास किये थे ।  उनके जाने के बाद  इस ओर कोई प्रशासनिक प्रयास नहीं हुए ।   कुछ स्वयं सेवी संघठनो ने नदी को जीवंत बनाने का प्रयास अवश्य किया । नदी की जलकुम्भी साफ़ की  खूब प्रचार प्रसार भी किया  पर नदी के हाल आज भी जस के तस बने हुए हैं । नदी में आज भी नगर की गन्दी नालियों का पानी मिल रहा है ।  जगह जगह कीचड़ के कारण आज यह दम तोड़ती नदी बन कर रह गई है । 
                               देश में संस्कृतियों और नगरों का विकाश भले ही सरोवरों और नदियों के तट पर हुआ हो किन्तु आज के दौर  की संस्कृति ने  सरोवरों और नदियों को मारने का सिलसिला शुरू कर दिया है  । कहते हैं कि  गौण राजवंश द्वारा   किलकिला नदी के तट पर  पन्ना नगर बसाया गया था । 13 वी सदी में महाराज छत्रसाल ने पन्ना पर अपना अधिकार जमा कर अपनी रियासत की स्थापना   की थी । उनके समय नदी तालाबों के साथ साहित्य और सनातन संस्कृति के विकास में कई तरह के काम हुए । आज उसी किलकिला नदी को समाप्त करने का सिलसिला जाने अनजाने में जारी है   । मजे की बात यह है कि मध्यप्रदेश सरकार नदी पुनर्जीवित करने का अभियान चला रही है । एसे समय में किलकिला नदी के किलिंग अभियान पर सरकार और जनता का मौन समझ से परे है । 
रवीन्द्र व्यास    




06 जनवरी, 2020

प्रकृति के प्रहार से लुप्त होते देशी पान

बुंदेलखंड की डायरी 
 प्रकृति के प्रहार से लुप्त होते देशी  पान  
रवीन्द्र व्यास 
 बुंदेलखंड में  दिसंबर जाते जाते और नव वर्ष के आगमन पर प्रकृति का कुछ ऐसा कहर बरपा कि  नाजुक पान की  ८० फीसदी  फसल तबाह हो गई | लोग नव वर्ष का जश्न मना रहे थे और बुंदेलखंड के पान किसान अपनी दुर्दशा पर आंशू बहा रहे थे | | पान की नाजुक फसल देश दुनिया में हो रहे जलवायु परिवर्तन की मार झेलने में  सक्षम नहीं मानी जाती | इस बार बारिश और ओलों ने फसल तबाह की है , प्रकृति की मार का यह सिलसिला  बीते  दो दशकों से भी ज्यादा समय से चला आ रहा है | कभी पानी तो कभी सूखा तो कभी कीटों का आघात | हालात ये हो गए हैं कि बुंदेलखंड में नई पीढ़ी तो अब पान की उस  फसल से तौबा करने लगी है जो देश की साहित्य और  संस्कृति में रची बसी है | 
बुंदेलखंड का यह इलाका समशीतोष्ण जलवायु  लिए जाना जाता  है , जो पान की फसल के लिए सर्वाधिक अनुकूल होता है ।  पिछले दो तीन दशकों में मौसम में भी बड़ा परिवर्तन आया है । जिसका परिणाम ये हुआ की जम कर सर्दी और  तीव्र गर्मी का प्रकोप यहाँ  रहने लगा ।  मौसम का यह परिवर्तन  पान की फसल के लिए अनुकूल नहीं रहा  जिस कारण हर साल पान फसल किसी ना किसी रूप में बर्बाद होती रही और यहां के लोगों  बर्बाद करती रही । इस साल लोग जब नव वर्ष का जश्न मनाने में व्यस्त थे तब बुंदेलखंड के पान किसान  अपनी बर्बादी पर आंशू बहा रहे थे | लगातार ठण्ड ,बारिश और फिर ओलों की मार ने कुछ ऐसा कहर बरपाया कि पान की ८० फीसदी  फसल नष्ट हो गई |  सरकारी तौर पर इनके सर्वेक्षण का काम शुरू हो चुका है |  
पानी और ओलों के बाद जो 20 फीसदी फसल बची है वह भी शायद बाद में नहीं बच पाएगी  ऐसा  पान किसान मान कर चल रहे हैं | इसके पीछे वे वजह बताते हैं कि  जब मौसम में अचानक उतार चढ़ाव होता है तो पान में  काली  रोग  लग जाता है | इस रोग में   पान का चिकना हिस्सा काला हो जाता है और उसके उलट हिस्से पर सफ़ेद फफूंद सी जम जाती है ।यह रोग पान के पत्तों तक सीमित नहीं रहता  है बल्कि यह  पान की बेलों पर  लग जाता है ,  जिसके चलते पान के पत्ते झड़ने लगते  हैं  ।  
 बुंदेलखंड इलाके के छतरपुर, पन्ना  , टीकमगढ़ ,महोबा , ललितपुर  में देशी पान की खेती होती है |  इन जिलों     के  लगभग २० हजार से ज्यादा लोग पान की खेती पर आश्रित रहते है\  छतरपुर जिले के ही गढ़ी मलहरा ,महराजपुर ,बारीगढ़ ,पिपट ,पनागर ,गुलगंज  एसे गाँव हें ९०% लोग सिर्फ पान की खेती पर  आश्रित  रहते थे | आज हालात ये हो गई है कि पान फसलों का रकबा जो बुंदेलखंड में कभी २४५० हेक्टेयर हुआ करता था आज सिमट कर 250 हेक्टेयर ही रह गया है | 

देशी बनाम महोबिया पान ::  बुंदेलखंड का देशी पान जिसे महोबिया पान भी कहते हैं अपने  खास  स्वाद और तासीर के लिए जाना जाता है | दुनिया का यही एक मात्र पान ऐसा है जो मुंह में जा कर घुल जाता है | करारेपन के कारण ही यह पान यदि जमीं पर पटक दिया जाए तो टुकड़े टुकड़े हो जाता है | इसके स्वाद में भी लवंग का स्वाद मिलता है | पर  इसके इस स्वाद और तासीर को बरकरार रखने के लिए पान किसानो को खासी मशक्कत करनी पड़ती है | पान  की फसल के लिये  बुंदेलखंड में उर्वरकों का उपयोग नहीं किया जाता बल्कि  सरसों ,तिल,नीम या अरंडी की खली का प्रयोग किया जाता है,|  खली को चूर्ण करके मिटटी के पात्र में भिगो दिया जाता है तथा 10_15  दिन बाद उसे घोल बनाकर बेल की जडों पर दिया जाता है। इसे  और पौष्टिक बनाने के लिये उस घोल में गेंहू , चावल और चने के आटे का प्रयोग भी करते हैं।
                     पान का जहाँ बरेजा बनाया जाता है उस जमीन में नमी को पहले देख लिया जाता है | पान के बरेजों में जूता चप्पल पहन कर जाना वर्जित होता है | बेलों को पानी देने की पहले एक विशेष विधि अपनाई जाती है जिसमे बड़े मटके नुमा लुटिया को कंधे पर रख कर इस तरह से पानी दिया जाता था मानो उस बेल को जल अर्पण कर रहे हों | इसके पीछे पान का धार्मिक महत्व और बेल को नागबेल मानना मुख्य कारण माना जाता है | 
पान खेती का बुंदेलखंड में अतीत 
 बुंदेलखंड इलाके में महोबा ,ललितपुर ,  ( उ प्र )    मध्य प्रदेश के  छतरपुर जिला के महराजपुर , गढ़ी मलहरा , लवकुश नगर , बारीगढ़ , दिदवारा , पिपट और पनागर, टीकमगढ़ ,पन्ना में  देशी (महोबिया ) पान के नाम से विख्यात  पान की खेती  छतरपुर जिले में कैसे शुरू हुई इसका भी अपना एक अलग इतिहास है । कहते हैं कि  1707 ई में महराज छत्रसाल  ने  महराजपुर  नगर  बसाया था , यहां लोग बस भी गए थे | महराजपुर के लोगों के सामने एक समस्या आई कि रोजगार तो कुछ है नहीं कया करेंगे ,तब महराज छत्रसाल ने   यहां के लोगों को रोजगार के साधन के लिए ,पान की  खेती  शुरू कराई थी । पान की खेती के  गुर और ज्ञान के लिए महोबा के पान किसानो का सहारा लिया गया था  । तभी से यह खेती इस जिले  साथ, पन्ना , दमोह , सागर , और टीकमगढ़ जिले तक फैली । पर मुख्य तौर से देशी पान की खेती महोबा और छतरपुर जिले में ही होती है । रियासत काल में जिस पान की खेती को  राजा का संरक्षण मिलता था । जिसका परिणाम यह  था की यहां का पान देश ही  नहीं दुनिया  अनेको मुस्लिम देशों में जाता था । 
                                        देश आजाद हुआ  आजादी के बाद पान पर  कर भी लगने लगा था । मध्य प्रदेश में पान की कोई बड़ी मंडी नहीं है किन्तु उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद , अलीगढ , रामपुर , मेरठ , बदायूँ , सहारनपुर, मुजफ्फर नगर  आदि स्थानो पर  वहां की सरकार  मंडी टैक्स लगा दिया था ।  जिसे  बाद में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन  मुख्य मंत्री कमलापति त्रिपाठी ने समाप्त किया था ।  उत्तर प्रदेश से निपटने के बाद मध्य प्रदेश सरकार ने भी पान पर मंडी टैक्स ठोक   दिया ।  मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्य मंत्री  मोतीलाल वोरा ने समाप्त किया ।   मध्य प्रदेश में मंडी टैक्स के पहले पान किसानो से सेल टैक्स भी वसूला जाता था , जिसे  तत्कालीन मुख्य मंत्री प्रकाशचंद्र सेठी  ने  समाप्त किया था । 
भारत की धर्म और संस्कृति में पान 
पान भारत की धर्म और संस्कृति का एक महत्वपूर्ण घटक माना जाता है | जन्म से लेकर मृत्यु तक के तमाम संस्कारों में पान बगैर पूजन अधूरा माना जाता है | कथा,पूजा में पान का उपयोग होता है | बुंदेलखंड में तो दशहरे का पान तो इतना विख्यात है कि रावण दहन के बाद दशहरा मिलने आने जाने वालों का स्वागत पान से ही किया जाता है | इस दिन अगर पान ना खिलाया जाए अथवा ना खाया जाए तो लोग बुरा मानने लगते हैं | 
संस्कृत साहित्य ,पुराणों आदि ग्रंथो में पान के महत्व का वर्णन मिलता है | पान को जहाँ धर्म और ऐश्वर्य का मुख्य साधन माना जाता है वही इसका उपयोग तांत्रिक क्रियाओं में भी देखने को मिलता है | राज दरबार में राजा के हाथ से पान के बीड़ा की प्राप्ति कर उस काल के विद्व्जन अपने आपको बड़ा धन्य मानते थे | पान को लेकर कई गीत कविताये और फ़िल्मी गीत भी लिखे गए हैं |  
औषधीय गुणों से भरपूर पान   
मुख शुद्धि के लिए अधिकांश लोग पान खाते हैं पर यह बहुत कम लोग जानते हैं कि पान औषधीय गुणों से भी भरपूर होता है | पान अपने औषधीय गुणों के कारण पौराणिक काल से ही उपयोग में आता  रहा है। आयुर्वेद ग्रन्थ सुश्रुत संहिता के अनुसार पान गले की खरास एवं खिचखिच को मिटाता है। यह मुंह के दुर्गन्ध को दूर कर पाचन शक्ति को बढ़ाता है, जबकि कुचली ताजी पत्तियों का लेप कटे-फटे व घाव के सड़न को रोकता है। इसे वाट नाशक ,कृमिनाशक ,कफदोष निवारक कामाग्नि उत्तेजक ,क्रान्ति वर्धक माना जाता है | वैज्ञानिको ने भी इसके औषधीय महत्व के गन दोषो को माना है | 
   पान में मुख्य रूप से फास्फोरस ,पौटेशि‍यम,कैल्शियम ,मेग्निश्यम ,कॉपर ,जिंक ,शर्करा ,कीनोलिक योगिक और विटामिन ए बी सी  पाया जाता है | पान फायदा तभी करता है जब इसे बगैर तम्बाखू के खाया जाय | 
 पान की खेती: भारत के अलावा म्यांमार ,श्रीलंका  में पान की खेती प्राचीन काल से ही की जाती रही  है। भारत के  अलग-अलग क्षेत्रों में इसे अलग- अलग नामों से पुकारा जाता है। इसे संस्कृत में नागबल्ली, ताम्बूल हिन्दी भाषी क्षेत्रों में पान, महराष्ट्र और गुजरात में  नागुरबेली तमिल में बेटटीलई,तेलगू में तमलपाकु, किल्ली, कन्नड़ में विलयादेली  नाम से जाना  जाता है। भारत में सर्वाधिक मात्रा में पान की खेती कर्नाटक ,तमिलनाडु ,उड़ीसा ,और बिहार में होती है उसके बाद क्रमशः पश्चिम बंगाल ,असम (पूर्वोत्तर राज्य)आन्ध्रप्रदेश   उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश गुजरात  और राजस्थान में होती है | 
देश में लुप्त होता देशी पान 
   बुंदेलखंड  की मंडी से जाने वाला  पान कभी कभी पांच सौ करोड़ का कारोबार करता था , आज हालात दो -तीन करोड़ के सालान कारोबार पर सिमट गई है । 
                 बुंदेलखंड का पान अपने  खास  स्वाद और तासीर के लिए पहंचाने जाने वाला    पान  प्रकृति की मार सरकार की उदासीनता के कारण  समय के साथ -साथ असाधारण होता जा रहा है ।  जिस पान की  फसल और व्यवसाय  से  हजारों लोगों को रोजगार मिलता था  अब  वह आंकड़ा धीरे धीरे सिमटने लगा है । कल तक जो मालिक होते थे आज मजदूरी करने को मजबूर हो रहे   हैं| दरअसल  आजादी के बाद से सरकारों ने  पान की फसलों को लेकर कागजी घोड़े तो खूब दौड़ाये पर जमीनी काम नहीं किया |   परिणाम  ये  हुआ की  पान किसान  जिन  समस्यायों  का पहले सामना  कर रह थे ,,आज भी उन्ही से जूझ रहे  है ।पिछले पच्चीस  वर्षो से बुंदेलखंड इलाके की पान की फसल लगातार किसी ना किसी कारण से खराब होती रही है ।  कभी सूखा रोग , तो कभी प्रकृति का प्रकोप तो कभी कीटों का आघात । जरुरत एक बेहतर वैज्ञानिक सुविधा और बेहतर मुआवजे ताकि लुप्त होती देशी पान की फसल बची रहे |  





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