26 फ़रवरी, 2017

लोक मे बची रहे बुंदेलखंड की लोकसंस्कृति

 बुंदेलखंड की डायरी 


रवीन्द्र व्यास 

 बसंत ऋतू के आस पास  बुंदेलखंड इलाके में  बुन्देली  सस्कृति के रंग घरों से निकल कर मंचों पर बिखरने लगते हैं । आधुनिकता की दौड़ में और हम कहीं ना कही अपने सांस्कृतिक मूल्यों ,परम्पराओं और तो और भाषा को ही भूलते जा रहे हैं ।  लोकसंस्कृति  को बचाने और नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से अवगत कराने के लिए छतरपुर जिले के एक छोटे से गाँव बसारी में पिछले २० साल से  बुन्देली उत्सव होता  आ रहा है । बगैर किसी राजकीय सहयोग के सिर्फ लोगों के आर्थिक सहयोग से होने वाला यह  आयोजन  भी दरअसल राजनैतिक दुराग्रहों का शिकार है ।२१ वे बुन्देली उत्सव के आयोजन के दौरान १७ फरवरी से २१ फरवरी तक यह  गाँव उल्लास और उमंग से सराबोर रहा । ऐसा भी नहीं है की बुन्देली लोकसंस्कृति  पर आयोजन सिर्फ इसी गाँव में होते हो , ऐसे आयोजन पन्ना , दमोह , टीकमगढ़ जिले में भी होते हैं । 

                                           
                                            ये बुन्देली उत्सव के आयोजन का ही फल है की इस छोटे से गाँव में एक विशाल स्टेडियम बन गया । इस मैदान पर  आयोजन के दौरान जब छोटे छोटे बच्चों को गिल्ली डंडा खेलते हुए लोग देखते हैं तो लोगो को अपने अतीत की बरबस याद आ ही जाती है ।  अब तू ये खेल किसी गाँव की गली में भले देखने को मिल जाए  शहरों से तो गायब हो चुका है । बच्चे मोबाइल  और कम्यूटर के खेल में व्यस्त हैं । बुंदेलखंड की मनमोहक चित्रकारी , महिलाओं की कुश्ती प्रतियोगिता , कबड्डी , बालीबाल , घोड़ो का नाच , रस्सा कसी , बुन्देली व्यंजन प्रतियोगिता बरबस ही लोगों का ध्यान अपनी और खीँचती है । चौपड़ पहले बुंदेलखंड के प्रिय खेंलों में से एक होता था , गाँव गाँव में चौपड़ के फड् जमते थे, हालात बदले अब खेल को जानने और समझने वाले कम लोग ही बचे हैं ।  यहां इस खेल की प्रतियोगिता देखते ही बनती थी । जब लोग पांसे फेंक कर जयकारा लगाते थे । 

                                              मंचीय कार्यक्रमो में गीत संगीत की महफिले सजी , जिनकी भी प्रतियोगिता हुई और कलाकर अपना श्रेष्ठतम प्रदर्शन के लिए लालायित दिखे  ।  बुंदेलखंड के अंचल में अब सीमित और लुप्त होते जा रहे  बधाई नृत्य , कछयाई , दीवारी , अहिरयाई  , कहरवा , बनरे , लमटेरा , सैर , ख्याल ,दादरा , गोटें , कार्तिक गीत , आल्हा ,बिलवारी ,काडरा , रावला ,सोहरे ,ढिमरयाई , राई और फाग की लय और  ताल, एक अलग ही रंग जमाते हैं ।  अपने आप में अनोखी इन प्रस्तुतियों को देखने सुनने और समझने का मौका यहाँ मिलता है । हम जिन बैलो को छोड़ कर मशीनी युग में जी रहे हैं उन बैलो की बैल गाडी दौड़ प्रतियोगिता भी किसानों को बैलो से लगाव और प्रकृति से जुड़े रहने का सन्देश देती है  । इस बार डोंडा (नोका ) दौड़ प्रतियोगिता का भी आयोजन हुआ । बुंदेलखंड की सांस्कृतिक विरासत को लिपि वद्ध करने के लिए हर वर्ष की तरह बुन्देली वसंत पत्रिका का विमोचन भी हुआ । बुंदेलखंड की विरासत को सहेजने और समृद्ध करने वालों का सम्मान भी हुआ । यहां बुन्देली में बनी १४ फिल्मो का पहली बार प्रदर्शन भी किया गया ।

                                          पूर्व विधायक शंकर प्रताप सिंह बुंदेला ,  २० साल पहले  शुरू किये गए इस  आयोजन के सम्बन्ध में बताते  हैं कि  , इस दौर में हम अपनी , बोली ,भाषा ,संस्कृति को भूलते जा रहे हैं , बुंदेलखंड की यह वाणी और संस्कृति बची रहे इसी लिए  यह शुरुआत की थी । आज   पाश्चात्य संस्कृति इतनी हॉबी होती जा रही है कि लोगों का  खान-पान और रहन-सहन बदल गया है, लोक संस्कृति भूलते जा रहे हैं , बुन्देली बोलने में लोगों को शर्म आने लगी है ।लोग अपने बच्चों को बुंदेलखंडी बोलने पर डांटने लगे हैं , यहां तक की मजदूरी करके लौटे लोग भी बुन्देली छोड़ एक अजीब तरह की हिंदी बोलने लगते हैं । 
              शंकर प्रताप सिंह बुंदेला  के विचारों से सहमत  छतरपुर के प्रमुख साहित्यकार सुरेंद्र शर्मा शिरीष , प्रो बहादुर सिंह परमार , डॉ. हरी सिंह घोष ,के. एल पटेल सहित अनेको साहित्यकार,समाज सेवी बुंदेलखंड की लोकसंस्कृति को बचाने के इस अभियान में जुटे हैं ।  श्री बुंदेला    भले ही इसे गैर राजनैतिक मानकर कार्य करते हैं , अपने इस आयोजन में सभी राजनैतिक दलों के लोगों को जोड़ने का प्रयास भी करते हैं मुख्य अतिथि भी  बनाते हैं , पर सियासत करने वाले इसमें भी राजनैतिक रंग देने से नहीं चूकते । 
                     
श्री बुंदेला  ने जब यह कार्यक्रम शुरू किया था उस समय प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी । शुरुआत के पांच साल तो सरकार और लोगों के सहयोग से ठीक ठाक चले । यह वह दौर था जब सांस्कृतिक विरासत को बचाने के इस अभियान की एक मजबूत नीव बन चुकी थी । सरकार बदली सियासत का और लोगों का मिजाज भी बदल गया । सरकार ने सहयोग पर विराम लगा दिया , सियासत से हित  साधने वाले अनेकों लोगों ने मुंह मोड़ लिया । यहां तक की इस आयोजन के समांनातर छतरपुर में एक आयोजन भी उन्ही दिनों सरकार ने कराया , एक ही साल हुआ ।
 सांस्कृतिक विरासत को सहजने के इस मंच पर नेताओ का  दोहरा  चरित्र  भी देखने को मिलता है  मंच से नेता जी कार्यक्रम की प्रशंसा में तारीफों के पुल बांधते हैं , पर मंच से उतरते ही सब भूल जाते हैं । हालांकि समाज में बीजेपी यह प्रदर्शित करती है की वह लोक संस्कृति , लोक परम्पराओ की वही एक मात्र संरक्षक है पर उनकी सरकार को इससे सरोकार सिर्फ उन्ही इलाकों में रहता है जहां उनके दल से  जुड़े लोग इस तरह के आयोजन करते हैं ।  


                          देखा जाए तो लोकसंस्कृति किसी बैशाखी की मुहताज ७० -८० के दशक तक नहीं रही । लोकसंस्कृति और लोक परंपराएं बुंदेलखंड के लोगों की जीवन की एक शैली थी और है । पर  बीते दो तीन दशकों में जिस तेजी से जन रंजन के माध्यमो का विस्तार हुआ   उसने देश  की तमाम  लोकसंस्कृतियो  पर आघात पहुंचाया है । हालांकि लोकसंस्कृति के  कोई लिखित मापदंड नहीं होते पर इसमें परम्पराओ की जड़ें इतनी गहरी होती हैं की इसको बदलने में सादिया बीत जाती थी । आधुनिकता की जीवन शैली और पाश्चात्य सभ्यता का अंधानुकरण लोगों को अपनी परम्पराओं से अलग कर देता है । ऐसी दशा में वे न घर के रहते ना घाट के । जिस बुन्देली भाषा के बोलने में आज के बुन्देलखण्ड के नव् धनाड्य वर्ग को शर्म आती है उसके बारे में  देश के जाने माने साहित्यकार प बनारसी दास चतुर्वेदी ने मधुकर पत्रिका में लिखा था कि बुन्देली भाषा  इतनी मधुर और समृद्ध है कि इसके सामने बृज की भाषा कही नहीं लगती ।

19 फ़रवरी, 2017

चुनाव मे फिर याद आया बुंदेलखंड राज्य

बुन्देलखण्ड की डायरी 

रवीन्द्र व्यास  

उत्तर प्रदेश के   बुंदेलखंड इलाके की 19  विधान सभा सीट के मतदान के लिए मात्र 4   दिन  शेष बचे हैं ।  प्रचार का दौर भी चरम पर  पहुंच रहा है , त्रिकोणीय संघर्ष के इस दौर में   हर वो दांव चला जा रहा  है जो किसी भी तरह से उनके लिए लाभ कारी हो । मतदान  के बाद उन सभी वायदों को भुला दिया जाता है । ऐसा ही कुछ बुंदेलखंड राज्य की मांग के साथ हो रहा है । फिर चुनाव में बुंदेलखंड राज्य की मांग ने जोर पकड़ा है । ,मायावती  ने अलग बुंदेलखंड राज्य की बात कह कर और राजनैतिक दलों को भी इस मुद्दे पर बोलने को मजबूर किया है । उमा भारती तो यह कहने से नहीं चूक रही की पिछले 40 साल से में बुंदेलखंड राज्य की मांग का समर्थन कर रही हूँ । 

                                            झाँसी की जन सभा में बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने बुंदेलखंड के लोगों को भरोसा  दिलाया की  प्रदेश में  बसपा सरकार बनने पर हर हाल में अलग राज्य बनवाया जाएगा । इसके लिए केंद्र पर दबाव बनाया जाएगा और जब तक अलग बुंदेलखंड राज्य नहीं बन जाता केंद्र को इसके लिए मजबूर किया जाता रहेगा । उन्होंने लोगों को याद दिलाया कि  बीएसपी सरकार के समय भी इसके लिए प्रयास किये गए थे । वे इसे इस इलाके की गरीबी और पिछड़े पन से निजात दिलाने के लिए अलग राज्य को आवश्यक मानती हैं । 


                       
                    पृथक बुंदेलखंड राज्य के लिए पदयात्रा तक कर चुकी केंद्रीय जलसंसाधन मंत्री ने भी अलग राज्य की मांग पर अपना रुख साफ़ किया है । उमा भारती अपने राजनीति में प्रवेश के साथ ही  अलग बुंदेलखंड राज्य की  मांग करने लगी थी । उस दौर में बीजेपी भी अपने घोषणा पत्र में छोटे राज्यों की वकालत करती थी । वक्त बदला और बीजेपी का देश और प्रदेशो पर कब्जा बढ़ा तो उसने  छोटे राज्य की मांगों को अनसुना कर दिया । उमा भारती पृथक बुंदेलखंड राज्य की मांग पर अडिग रही , उन्होंने लोकसभा चुनाव में भी अलग बुंदेलखंड राज्य की बात कही थी । अब विधान सभा चुनाव के समय भी वे लोगों से कह रही हैं की में पिछले 40 साल से अलग बुंदेलखंड राज्य की मांग का समर्थन करती रही हूँ । अब लोगों को बुंदेलखंड राज्य के लिए प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए । 



                                            उमा भारती और मायावती की बातों को बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा के लोग सिर्फ चुनावी स्टंट मानते हैं । मोर्चा के विक्रम सिंह तोमर  उमा भारती को याद दिलाते हैं की लोकसभा चुनाव के समय उन्होंने तीन साल में अलग राज्य बनाने की बात कही थी । तीन साल होने को आ रहे हैं पर इस मसले पर एक कदम भी आगे नहीं बड़ी  । अब फिर चुनाव आया तो ये बुंदेलखंड राज्य की बात करने लगी , और कह रही की इसकी प्रक्रिया शुरू करें , । वे सवाल करते हैं कि  राज्य निर्माण की प्रक्रिया सरकार शुरू करती है या लोग ? लोग तो अपनी मांग रखते हैं मांग के समर्थन में आंदोलन करते हैं ।  


      दरअसल बुंदेलखंड राज्य की मांग करने वाले लोग नेताओं के चुनाव के समय दिए गए बुंदेलखंड राज्य बनाने के बयानों को सिर्फ राजनैतिक जुमले बाजी से ज्यादा कुछ नहीं मानते ।  विक्रम सिंह कहते हैं कि  मायावती  को  भी बुंदेलखंड  अलग राज्य बनाने की याद चुनाव के समय ही आती है । जब उनकी सरकार थी उस समय वे यदि ईमानदारी से  प्रयास करती तो तेलंगाना के पहले ही अलग बुंदेलखंड राज्य बन जाता ।  इस बार इतनी जोर शोर से यह मुद्दा उठने की वजह है मोर्चा के चुनाव मैदान में सीधे उतरना , । अलग राज्य के मुद्दे पर मत बंट ना जाए इस कारण लोगों को भ्रमित करने के लिए अलग बुंदेलखंड राज्य की बात नेता कर रहे हैं । 



                                ये सियासत के ही समीकरण हैं की बुंदेलखंड को दो अलग राज्यों में बाँट दिया गया उत्तर प्रदेश में सात जिले और मध्य प्रदेश के छह जिले । इस सियासी समीकरण के कारण बुन्देलखंड की आवाज ना मध्य प्रदेश में बुलंद हो पाई ना उत्तर प्रदेश में । उत्तर प्रदेश में  सरकार बनाने और बिगाड़ने में बुंदेलखंड का 5 फीसदी से भी कम  योगदान है । 5  फीसदी में से सरकार में  ये आंकड़ा  महज 2  से 3  फीसदी ही रह जाता है । नतीजतन बुंदेलखंड  की आवाज  दब कर रह जाती है । संख्या बल को ध्यान में रख कर बुंदेलखंड के सात जिलों की आवाज  सरकार और सियासत की नजर में कोई बहुत मायने नहीं रखती । यही वो कारण है की चुनाव में बुंदेलखंड के दर्द से किसी भी सियासी दल को कोई बहुत ज्यादा सरोकार नहीं रहता है । 
                                  
                                  बुंदेलखंड  के दर्द का अहसास शायद  फिल्म अभिनेता राजपाल यादव को हो गया । बांदा  में सर्वधर्म समभाव पार्टी प्रत्यासी के पक्ष में चुनावी सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने राजनैतिक दलो से ही सवाल किया जब बुंदेलखंड के पिछड़ेपन का मुद्दा  उनके एजेंडे में प्रमुखता से होता है तो फिर यह पिछड़ा क्यों है ? असल बात ये है की  ये  राजनैतिक दल सिर्फ प्रदर्शन करते हैं करते कुछ नहीं । उन्होंने बुन्देलखण्ड से दस सीटें जितने पर ३०० एकड़ में फिल्म इंडस्ट्रीज बनाने की बात कही । ये बात ठीक वैसी ही है जैसी"  ना नो मन तेल होगा और ना राधा नाचेगी " । 

                   बुन्देलखण्ड राज्य की मांग करने वाले लोग यह बात स्वीकारते तो हैं की दो राज्यों में विभाजित होने के कारण उनकी बात को  राजनैतिक दलों की सरकारों द्धारा अनसुना किया जाता है । चुनाव के समय ही चुनावी शोर में बात उठती है  और समाप्त हो जाती है ।  जिसका परिणाम है की बुंदेलखंड  में विकाश नहीं हुआ । ये अलग बात है कि बुंदेलखंड  राज्य के नाम पर बहुतेरों ने अपनी नेता गिरी चमकाई और मलाई चाटकर निश्चिन्त हो गए । 
                             
                              

12 फ़रवरी, 2017

चुनाव मे बुंदेलखंड की भूख और गरीबी से नहीं किसी को सरोकार

  बुंदेलखंड की डायरी 


रवीन्द्र व्यास 




सियासत के गलियारे से लेकर अपराध के गठजोड़ तक  बुंदेलखंड इन दिनों चर्चा में है । दो राज्यों में बटे बुंदेलखंड के उत्तर प्रदेश  वाले इलाके में चुनावी चर्चा जोरों पर है । इस चुनावी शोर में पार्टियों के मुद्दे  में टेक्स के नाम पर  जनता की गाडी कमाई से की गई लूट को मुफ्त लुटाने का शोर भी खूब हो रहा है । बुंदेलखंड की तक़दीर और तस्वीर बदलने  के लिए बुंदेलखंड विकाश बोर्ड बनवाएगी, बुंदेलखंड में सिचाई के लिए अलग फंड बनाएगी  बीजेपी जब की सपा कहती है की इतना पानी देंगें की बुंदेलखंड के किसान दो फसल आसानी से ले सकें । पर राजनैतिक दलों के राजनैतिक स्वांग  में बुंदेलखंड के असल मुद्दे दफ़न हो कर  रह गए । 


23 फरवरी को उत्तर प्रदेश के चौथे चरण का मतदान होगा । इसमें बुंदेलखंड के जालौन ,झाँसी ,ललितपुर ,महोबा ,हमीरपुर ,बांदा ,और चित्रकूट की 19 विधान सभा सीट के लिए मतदान होगा । 9 फरवरी को नाम वापसी के बाद से इन सीटों पर चुनावी प्रचार ने जोर पकड़ना शुरू कर दिया है । सपा और कांग्रेस के गठबंधन के कारण इस बार सभी 19 सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिल रहा है ।2012 के चुनाव में यहां  4 पर कांग्रेस 1 पर बीजेपी और 7 -7  सीटों पर बसपा और सपा का कब्जा है । 2014 के लोकसभा चुनाव में यहां की चारों लोकसभा सीटों पर कमल खिला था । 2014 की स्थिति देख कर इस बीजेपी उत्साहित होकर चुनावी रण में जूझ रही है । दूसरी तरफ सपा और कांग्रेस के गठबंधन के कारण सपा और कांग्रेस को उम्मीद है की इस बार बुंदेलखंड की 19 में से 14 सीटों पर उनका कब्जा होगा । बुंदेलखंड  बीएसपी का गढ़ माना जाता है , यही कारण है कि  बी एस पी ने इसे अलग राज्य बनाने पर अपनी सहमति दी है और मायावती के शासन काल में इसका विधान सभा से प्रस्ताव भी पारित हुआ था । आर एल डी ने भी  प्रथक बुंदेलखंड राज्य की माग का समर्थन किया है । बीएसपी अखिलेश राज के आतंक की   व  मायावती शासन काल की भयावह  कानून और व्यवस्था की   कहानी लोगों को बता रही है । बीएसपी का बामसेफ नेटवर्क भी सक्रियता से बीएसपी के पक्ष में माहौल बनाने में जुटा है ।  

                             ,अन्य प्रदेशो की बीजेपी सरकार के मॉडल, केंद्र की एन डी ए बनाम मोदी  सरकार के कामकाज को आधार बनाकर, और विकास  के नाम पर  बीजेपी चुनावी समर में है । इसी के चलते बीजेपी सरकार ने झाँसी _ललितपुर_खजुराहो रेल के शुरुआत की थी  और अब 18 हजार करोड़ की  केन बेतवा लिंक परियोजना को मंजूरी दे दी है । इस परियोजना से उत्तर प्रदेश के बांदा , महोबा और झाँसी जिले की 2.65 लाख हेक्टेयर और छतरपुर ,पन्ना और टीकमगढ़ जिले की 3.69 लाख हेक्टेयर भूमि सिंचित होगी ।   पर शायद उसे भरोसा  है कि  इस बार मोदी की  नोटबंदी उनके मंसूबों पर पानी फेर सकती  है ।  इस कारण आर एस एस के कार्यकर्ताओं को भी वातावरण परिवर्तन के काम में लगाया गया है । सपा अपने कामकाज के आधार पर वोट मांग रही है । साथ ही मोदी  सरकार की  नोटबंदी की असफलताओं और  एम् पी सरकार के विकास  मॉडल की  लूट नीति को भी बताने से  नहीं चूक रही है ।  सपा बुंदेलखंड के लोगों को बता रही है कि  एम् पी की कर व्यवस्था ऐसी है की लोगों से ज्यादा से ज्यादा कर वसूला जा रहा है । यहां तक कि  डीजल पेट्रोल 7  रु   महंगा बेचा जा  रहा है । वे यह भी बताने से नहीं चूक रहे की बीजेपी  देश के पूंजीपतियों के लिए  काम करती है और  उसे आम जन से उसे  कोई सरोकार नहीं है ।  क्या आप ऐसी सरकार चाहेंगे जो मनमाने कर लगाए ? 

                           हर चुनावों की तरह यह चुनाव भी  जात पांत के समीकरण पर लड़ा जा रहा है । यही कारण है की प्रत्याशियों की दिलचस्पी बुंदेलखंड के असल  मुद्दों पर नहीं है ।  बुंदेलखंड से पलायन का दर्द किसी को महशूस नहीं हो रहा है ।  लाखों की संख्या में किसान -मजदूर  पलायन करते हैं अपने और परिवार का पेट पालने के लिए  । नोटबंदी के बाद से उन्हें दिल्ली ,पंजाब ,हरियाणा , जम्मू , गुजरात , में मिलने वाला काम भी बंद हुआ है । परिणामतः बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार हुए हैं , छोटे -छोटे कारोबारियों का कारोबार अव्ररुद्ध हुआ   । हालांकि  अब इसका असर धीरे-  धीरे कम हो रहा है पर जो जख्म मिले हैं उनकी टीस अभी मिटी नहीं है  । गांधी जी का सोचना था कि  गाँव के छोटे -छोटे कुटीर उद्योगों से लोगो को ना सिर्फ़े रोजगार मिलेगा बल्कि लोग आर्थिक तौर पर सम्पन्न होंगे । बुंदेलखंड में इसके ठीक विपरीत हालात बने ।  बुनकरों के चरखे टूट गए , कागज़ का कुटीर उद्योग समाप्ति की कगार पर पहुँच गया , बर्तन और धातु शिल्प कारोबार भी सिमट कर 25 फीसदी ही बचा है । सरकार की रीति  और नीतियों ने भी कुटीर उद्योगों को समाप्त कराने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया । 


                          आज हालात ये हैं कि  बुंदेलखंड में भय ,भूख और भ्रस्टाचार ने हालात को और जटिल बना दिया । भूख और कुपोषण से लोगों की जान चली जाती है पर ये चुनाव का मुद्दा नहीं बन पाते । 

                           महोबा  में एम्स के लिए पांच माह से  तारा पाटकार  उपवास  कर रहे हैं ,शायद  उन्हें भरोसा  है कि आज नहीं तो कल बुंदेलखंड की सोती हुई  जनता जागेगी और एक बड़ा आंदोलन खड़ा  कर अपनी मांग सरकार से मनवाने में कामयाब होगी ।  असल में वे बुंदेलखंड के इस इलाके की बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं से चिंतित हैं । यह बात भी चुनावी चर्चा में कहीं देखने को नहीं मिल रही है ।  

                                                    इसमें दोष किसका माना जाए और किसका नहीं माना जाए ये एक बड़ी बहस का मुद्दा हो सकता है पर हालात बदलने के लिए वैचारिक और सामाजिक परिवर्तन की जरुरत बुंदेलखंड को कहीं ज्यादा है ।  

06 फ़रवरी, 2017

नदी बचाने के लिए जद्दोजहद

बुन्देलखण्ड की डायरी
रवीन्द्र व्यास
देश में जहां एक और जल सहेजने के जतन में आम आदमी जहां चिंतित  है ,वहीँ सरकार वाहवाही लूटने के जतन  में जुटी है । मामला चाहे देश का हो अथवा प्रदेश का कागजी घोड़े तो खूब दौड़ते हैं पर यथार्थ के धरातल पर अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते ।   मध्य प्रदेश  के  मुखिया नर्मदा नदी को बचाने के  लिए अभियान चला रहे हैं।  वही बुन्देलखंड की प्रमुख और एशिया की गैर प्रदूषित केन नदी को बचाने के लिए ग्रामीणों को भूख हड़ताल के लिए मजबूर होना पड़ता  है ।  नदी की रेत निकालने के नाम पर हो रहे  अवैध उत्खनन के कारण नष्ट हो रही केन नदी की जल धारा को लेकर ग्रामीण चिंतित हैं ।

  भूंख हड़ताल पर तीन दिनों तक  बैठे रहे  छतरपुर जिले के हिनौता गाँव के कमल सिंह का कहना है की  बीरा रेत  खदान जो केन  नदी के दुसरे छोर पन्ना जिले की सीमा में आती है।   ये खदान जुगल किशोर कंस्ट्रक्सन के नाम है ।   खदान संचालक ने  नदी के मुख्य धारा में पुल बनाया है जो की अवैध है और इसी पुल के जरिये छतरपुर जिले की सीमा जो हिनौता गाँव में आती है से अवैध उत्खनन कर रेत का परिवहन करते है \ पन्ना प्रशासन द्वारा नदी का जो  सीमांकन कराया गया वह भी सही नही है जिसमे नदी का अधिकांश क्षेत्रफल पन्ना जिले की सीमा में बताया गया है,। 19 जनवरी 17 को पन्ना जिले के अजयगढ़ तहसील के पटवारी ,आर आई और तहसीलदार ने ठेकेदार से मिली भगत कर हिनोता की दस हेक्टेयर भूमि का सीमांकन कर लिया है । अब इस इलाके से अवैध उत्खनन किया जा रहा है । इस मामले में ग्रामीण मुख्य मंत्री से लेकर जिले के आला अधिकारियों तक अपनी फ़रियाद पहुंचा चुके हैं , जब कोई सुनवाई नहीं हुई तो मजबूर होकर गाँव वालों को भूख हड़ताल पर बैठना पड़ा । ग्रामीणों की मांग है की नदी में बना अवैध पुल तोडा जाये और हिनौता गाँव की सीमा में किये गये अवैध उत्खनन के खिलाफ ठेकेदार पर कार्यवाही हो साथ ही दोबारा सीमांकन करवाया जाये । भूख हड़ताल के तीसरे दिन चंदला  और अजयगढ़  तहसीलदार ने इनकी सुध ली और आश्वासन दिया को नदी का पुनः सीमांकन कराया जायेगा ।  तब कहीं जाकर आंदोलन समाप्त हुआ । 
                                 दरअसल केन नदी बंदेलखंड की जीवनदायी नदी है , जो कटनी जिले के रीठी के समीप से निकल कर सात पहाड़ों को चीरती हुई पन्ना ,छतरपुर जिले से होती हुई बांदा के चिल्ला गाँव के  यमुना में विलीन हो जाती है । २५० किमी  के इस सफर में यह  नदी  लोगों को अनमोल जल, रेत का खजान,और  अनमोल कारीगरी के पत्थर  उपलब्ध कराती है । अपने जल से अनेको प्रजातियों के जलचरों के जीवन को सुरक्षित बनाने वाली इस नदी पर पिछले दो दशकों से लुटेरों की ऐसी नजर लगी की वे इसके अस्तित्व को ही समाप्त करने पर आमादा हो गए हैं । पन्ना ,छतरपुर और बांदा जिले को करोड़ों की राजस्व आय देने वाली इस नदी के विनाश में सरकारी चौकीदारों से लेकर जनसेवकों और समाज को जगाने का दावा करने वालों की भूमिका भी कुछ कम नहीं है ।

                                  केन नदी में रेत के राजनैतिक , प्रशासनिक और  माफिया गठजोड़ की कहानी भी गजब की है ।  चन्द लोगों को रेत के सीमित क्षेत्र में  उत्खनन के नाम पर पट्टे मिले हैं , जिसकी आड़ में असीमित क्षेत्र में उत्खनन का कारोबार होता है । इसके अलावा  ,राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण के बल पर रेत के अवैध  उत्खनन का  अधिकार मिल जाता है । जिसमे सबकी बराबर की भागीदारी होती है । सारा धंधा चोर-चोर मौसेरे भाई की तर्ज पर बेधड़क चलता रहता है ।  करोड़ों के इस काले कारोबार में जो अवरोध पैदा करने की कोशिस करता है ,उसे भाई गिरी की तर्ज में समझा दिया जाता है । पिछले कुछ समय से  चंदला विधान सभा क्षेत्र के  बीजेपी विधायक आर डी प्रजापति विधान सभा में  अवैध रेत उत्खनन का मुद्दा उठाते रहे पर सरकार की तरफ से उन्हें कोई संतोषजनक समाधान नहीं मिला । पन्ना जिला कलेक्टर ने जरूर अवैध रेत खनन और परिवहन पर अंकुश लगाने का प्रयास किया । राजस्व, खनिज पुलिस विभाग द्वारा की गई इस संयुक्त कार्यवाही की  अजयगढ तहसील क्षेत्र  में रेत का अवैध परिवहन करते हुए 112वाहन जप्त किए गए हैं। कार्यवाही के दौरान 300 से अधिक वाहनों की जांच की गयी।  भीना, चांदीपाठी तथा चंदौरा रेत खदानों की जांच की गयी। इसमें रेत का अवैध परिवहन करते हुए कई वाहन जप्त किए गए। रेत का अवैध परिवहन करने के लिए केन नदी पर नहरा घाट में अस्थाई पुल का निर्माण किया गया था। इसे राजस्व तथा पुलिस अधिकारियों द्वारा 4 जेसीबी मशीनों से ध्वस्त किया गया । 

                        नेहरा घाट पर केन की धार रोक कर बनाये गए अवैध पल को तो पन्ना जिला प्रशासन ने ध्वस्त कर दिया /किन्तु छतरपुर और बांदा  जिले में कई अवैध  पुल अब भी बने हैं । जो केन के धारा को अवरुद्ध किये हैं । नियम ये कहते हैं की नदी के मूल स्वरुप से कोई छेड़ छाड़ नहीं होगी , इसके बावजूद नदी के बीच में लिफ्टर मशीन से रेत का उत्खनन होता है । जब की नदी जल धारा से तीन मीटर दूर से रेत खनन का नियम है ।  जल धारा को रोककर अपनी परिवहन की बचत के लिए  अस्थाई पुलों का निर्माण कर लिया जाता है । स्वीकृत क्षेत्र से कहीं अधिक के क्षेत्रफल में  रेत  का अवैध उत्खनन होता है । छतरपुर जिले में तो रेट के काले कारोबार का एक और रास्ता रेत माफियाओं ने निकाल है , ये बाढ़ के समय खेत में जमा हुई रेत के खनन और परिवहन की लीज लेते हैं और धड़ल्ले से नदी में खुदाई करते हैं ।

                         दरअसल केन की रेत उत्तर प्रदेश के कई प्रमुख नगरों से होती हुई गोरखपुर तक जाती है । इस साफ़ सुथरी रेत की कीमत भी अच्ची मिलती है, रोजाना लगभग २ हजार से ज्यादा ट्रकों का परिवहन इस रेत को लेकर होता है । केन नदी को मारकर रेत को लूटने का यह सिलसिला बदस्तूर जारी है और यह बात सरकार की जानकारी में भी है । इसी के चलते महोबा की जन सभा में प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने बुंदेलखंड में खनन माफियाओं पर जम कर निशाना साधा था । और इनका सम्बन्ध सपा और बसपा से जोड़ा था । 
  
      देखा जाए तो नदियों से रेत के अवैध और वैध उत्खनन में पर्यावरण संतुलन को दर किनार कर दिया जाता है । उत्खनन कर्ता को सिर्फ अपना लाभ नजर आता है , उसकी इस लालसा के कारण नदी नालो के प्राकृतिक तटबंध  का तो नाश होता ही है , नदी के अंदर से बालू के अत्याधिक दोहन से नदी के प्राकृतिक रूप से प्रवाहित जल में अवरोध उत्पन्न होता है , साथ ही नदी  का ज्यादा पानी जमीन में रिश्ने लगता है । लगभग यही हाल केन नदी पर देखने को मिल रहा है । जिसको बचाने के लिए लोगों को अब और ज्यादा सजग होना होगा ।

31 जनवरी, 2017

बुन्देलखण्ड का बदहाल मेडिकल कॉलेज

बुंदेलखंड की डायरी 

रवीन्द्र व्यास 

बुन्देलखण्ड  के सागर  में पिछले दिनों बीजेपी प्रदेश कार्य समिति  का दो दिवसीय महोत्सव सम्पन्न हुआ था । सरकार के मुखिया से लेकर दल के मुखिया तक आये । सागर में प्रदेश कार्य समिति की बैठक करने के पीछे बीजेपी की एक सोची समझी रणनीति  मानी जा रही है । उत्तर प्रदेश के  चुनावो को देख कर और बुंदेलखंड में बीजेपी के जनाधार को बरकरार रखने  पार्टी ने यह बैठक सागर में  की थी । पर पार्टी जो सन्देश उत्तर प्रदेश वाले बुंदेलखंड इलाके वालो को देना चाहती थी वह नहीं दे पाई । खुद मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड वालो को जो सन्देश दिया वह भी काफी निराशा जनक ही रहा ।  
                        कार्य समिति की बैठक को लेकर  बुंदेलखंड के लोग उत्साहित थे की सरकार वाली पार्टी की प्रदेश कार्य समिति की बैठक होगी , बड़े बड़े नेता आएंगे मंत्री आएंगे । जिनके सामने बुंदेलखंड  के हालात बताएँगे तो शायद कुछ भला हो जाए । कुछ हो ना हो यहां का  मेडिकल कालेज ही असली मेडिकल कालेज जैसी व्यवस्थाओ से समृद्ध हो जाए ।   उत्साहित होकर अपने मेडिकल कालेज और स्वास्थ्य सेवाओ का मुद्दा लेकर मुख्य मंत्री जी से लोगों ने मुलाक़ात भी की , उनसे अनुरोध भी किया की कम से कम मेडिकल कालेज तक चल कर उसकी दशा और दिशा देख लें । इलाके के लोगों ने अपने प्रदेश के मुखिया को लिखित में ज्ञापन भी दिए ,और समाचार पत्रो की कटिंग भी दी ।  भोले भाले बुन्देलखंडियों को नहीं पता था की प्रदेश की दशा और दिशा सुधारने में जुटे व्यक्ति के पास भला सागर के मेडिकल कालेज की समास्या के लिए  कहाँ समय बचता है ।
  शिवराज ने तो बुंदेलखंड के सागर संभाग से ही पांच निर्वाचित जन प्रतिनधियों को अपने मंत्री मंडल में स्थान दिया हुआ है । ये सभी पहुंचे हुए और कद्दावर नेता हैं , चाहे सागर  के भूपेंद्र सिंह हो या गोपाल भार्गव , दमोह के जयन्त मलैया , पन्ना की कुसुम मेहदेले हो अथवा छतरपुर की ललिता यादव ।  ललिता यादव को छोड़ बाकी सभी कबीना मंत्री हैं और सबके सब शिवराज सिंह से वरिष्ट माने जाते हैं , इनमे से कुसुम मेहदेले , भूपेंद्र सिंह और गोपाल भार्गव ऐसे नेता हैं जो मुख्य मंत्री पद के दावेदार भी माने जाते हैं । इन नेताओं के मंत्री मंडल में रहते यदि सागर के मेडिकल कालेज की   दशा और दिशा नहीं सुधर रही है तो दोष किसका माना जाएगा ? बीजेपी ने तो पिछले दो विधान सभा चुनाव बुंदेलखंड मेडिकल कालेज के नाम पर बुंदेलखंड में जीत लिए । २००७ से स्थापित इस मेडिकल कालेज की अवव्यवस्थाओं को लेकर सागर के पत्रकारों , यहां के कुछेक नेताओं ने जम कर प्रयास किये कोर्ट तक गए , किसी तरह मान्यता तो बहाल करा ली  दशा नहीं सुधार पाए ।  इस मेडिकल कॉलेज में ना तो पर्याप्त स्टाफ है ना ही सुविधाएं । इन हालात के कारण छतरपुर , टीकमगढ़ और दमोह के लोग तो ठीक खुद सागर के लोगों को इलाज  लिए भोपाल , जबलपुर ,नागपुर और दिल्ली जाना पड़ता है ।   
हाल ही में मध्य प्रदेश सरकार ने छिंदवाड़ा  मेडिकल कॉलेज के लिए 177 करोड़ रुपये स्वीकृत किए है ।

 इसको  लेकर  मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार  दीपक तिवारी ने फेसबुक के माध्यम से लोगों से अपील की है कि  |  " शिवपुरी, रतलाम, विदिशा और शहडोल वालो आप झांसे में मत आना !
सरकार आपके यहाँ मेडिकल कॉलेज खोल रही है। पर ज़रा, हमारे सागर में पांच साल पहले खुले सरकारी मेडिकल का हाल तो देख लीजिये  कोसते रहोगे ! 
हमारे यहाँ(सागर ) मेडिकल कॉलेज तो है पर उसमे इलाज नहीं होता, क्योंकि डॉक्टर नहीं है, उपकरण नहीं हैं।  ये तीनों न होने के कारण ए     एमसीआई की मान्यता कभी हो जाती है कभी निरस्त हो   जाती है।   सरकार वादे पर वादे घोषणा पर घोषणा कर रही है पर हो कुछ नहीं रहा..... 
हाई कोर्ट में पेटिशन लगाई है पर सरकार कुछ नहीं कर रही या कर सकती। आप लोग भी कहीं इसी रट्टे में न फँस जाएँ, इसलिए सावधान हो जाइए वरना हमारे लोगों की तरह पछतायेंगे । 
असली मेडिकल कॉलेज बनाओ अभियान, सागर !"
  पिछले दो चुनाव मेडिकल कॉलेज के नाम पर जीतने वालों को लोगों के विरोध के चलते फिर से कोई नया मुद्दा तलाशना होगा । 
प्रथक बुंदेलखंड :-
विशाल जनसंख्या वाले उत्तर प्रदेश की राजनैतिक दशा को बदलने के लिए बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व कोई भी कदम उठा सकता है । इसके संकेत उत्तर प्रदेश के बीजेपी नेताओं को काफी पहले से दिए जा चुके हैं । राजनीतिक समीक्षक मानते हैं की उमा भारती बगैर किसी इसारे के बुंदेलखंड राज्य की वकालात नहीं कर सकती हैं । ऐसे में ये अनुमान लगाया गया था की सागर में होने वाले पार्टी कार्यसमिति की बैठक में प्रथक बुंदेलखंड राज्य की मांग का समर्थन दिया जाएगा जिसका लाभ उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके में पार्टी  को होगा । पर मध्य प्रदेश के गृह मंत्री और सागर के निवासी भूपेंद्र सिंह ने यह कह कर  बुंदेलखंड राज्य की मांग पर पानी डाल दिया की वे किसी भी कीमत पर मध्य प्रदेश के हिस्से वाले बुंदेलखंड को प्रथक राज्य नहीं बनने देंगे । साथ ही उन्होंने जोड़ा की यहां के लोग नहीं चाहते की बुंदेलखंड राज्य बने ,।  अगर जरुरत पड़ी तो महाकोशल राज्य जरूर बन सकता है । रीवा , जबलपुर और सागर संभाग को इसमें जोड़ा जा सकता है । 
                                                 भूपेंद्र सिंह के इस बयान को उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार में बीएसपी जम कर बुंदेलखंड इलाके में उपयोग कर रही है और बीजेपी  दोहरे चरित्र को बता रही है । यहाँ यह याद रहे की मायावती ने अपने शासन काल में प्रथक बुंदेलखंड का प्रस्ताव विधान सभा  पास किया था । जिसमे उत्तर प्रदेश के झाँसी , ललितपुर , महोबा , बांदा ,हमीरपुर , चित्रकूट , जालौन को मिलाकर एक राज्य बनाने की बात कही थी । मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके से भी पृथक राज्य की मांग उठती रही है । अब मंत्री जी द्वारा महाकौशल राज्य की बात करके बुंदेलखंड के लोगों की भावनाओ पर जले पर नमक डालने का काम किया है ।

08 नवंबर, 2016

सी एम की सुरक्षा मे चूक

खजुराहो / / ६ /११/१६ आज मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान की सुरक्षा व्यवस्था में भारी लापरवाही देखने को मिली । मुख्य मंत्री के लिए लाइ गई इनोवा गाडी आधे घंटे के लिए सुरक्षा व्यवस्था को धता बताते हुए गायब हो गई । फिर वापस मौके पर आकर खड़ी हो गई । मुख्य मंत्री का वाहन लापता होने की खबर लगते ही सुरक्षा दल में हड़कंप मच गया । एक दूसरी दशा तब देखने को मिली जब अंदर प्रवेश के लिए काटी जाने वाली रशीद बुक लावारिश हालात में टेबल पर रखी मिली । यह हालात तब हैं जब पूरा देश और खासकर देश के पर्यटन स्थल और विमान तल हाई एलर्ट पर हैं ।

06 नवंबर, 2016

Bundelkhand Dayri_Moniya Dance


मोनिया नृत्य और दिवारी गीतों के सीमित होते स्वर
रवींद्र व्यास 

 विन्ध्य पर्वत मालाओंओ से घिरा  बुंदेलखंड का  यह अंचल वैसे  तो  अपने अभावों  औरबदहाली के कारण जाना जाता है ।  इस बदहाल इलाके में ऐसी  कई परम्परा  और  और लोकसाहित्य है जो  यहाँ की  अपनी एक अलग पहचान बनाता है ।पर काल के गर्त में धीरे- धीरे ये परम्पराएं  समाप्त होती जा रहीं हें ।  ऐसी  ही एक परम्परा है  दिवारी गीत और नृत्य ।दिवाली के दूसरे  दिन जहां इनके  ये दल हर गली और नुक्कड़ पर दिख जाते थे अब सीमितहोते जा रहे हें ।
दिवारी  गीत और नृत्य  मूलतः चरागाही  संस्कृति के गीत ह़े , यही कारण है  की इन गीतोंमें  जीवन  का यथार्थ मिलता है । फिर चाहे  वह सामाजिकता हो,या धार्मिकता , अथवा श्रृंगार  या  जीवन का दर्शन । ये वे  गीत हें जिनमे  सिर्फ  जीवन की वास्तविकता के रंग हें , बनावटी  दुनिया से दूर , सिर्फ चारागाही संस्कृति  का प्रतिबिम्ब । अधिकाँश गीत  निति औरदर्शन के हें । ओज से परिपूर्ण इन गीतों में विविध रसों की अभिव्यक्ति मिलती है ।
दिवारी गीत दिवाली  के दूसरे  दिन  उस समय गाये जाते हें जब  मोनिया मौन व्रत रख करगाँव- गाँव  में घूमते  हें । दीपावली के पूजन के बाद मध्य रात्रि  में मोनिया -व्रत शुरू हो जाताहै । गाँव के अहीर - गडरिया और पशु पालक तालाब नदी में नहा कर , सज-धज कर मौन व्रतलेते हें । इसी कारण इन्हे मोनिया भी कहा जाता है । 
द्वापर युग से यह  परम्परा चली आ रही है ,  इसमें  विपत्तियों को दूर करने के लिए ग्वाले मौनरहने  का कठिन व्रत रखते हैं। यह मौन व्रत बारह वर्ष तक रखना पड़ता है। इस दौरान मांस मदिरा का सेवन वर्जित रहता है ।  तेरहवें वर्ष में मथुरा व वृंदावन जाकर  यमुना नदी के तटपर पूजन कर  व्रत तोड़ना पड़ता है।
शुरुआत में पांच मोर पंख लेने पड़ते हैं प्रतिवर्ष पांच-पांच पंख जुड़ते रहते हैं। इस प्रकार उनकेमुट्ठे में बारह वर्ष में साठ मोर पंखों का जोड़ इकट्ठा हो जाता है। परम्परा के अनुसार   पूजनकर पूरे नगर में ढोल,नगड़िया  की थाप पर दीवारी गाते, नृत्ये करते हुए हुए अपने गंतव्य कोजाते हैं। इसमें एक गायक ही लोक परम्पराओं के गीत और  भजन गाता है  और उसी पर दलके सदस्य नृत्य करते हैं । 
हालांकि मोनिया कोंड़ियों  से गुथे लाल पीले  रंग के जांघिये   और लाल पीले रंग की कुर्ती यासलूका अथवा बनियान  पहनते हें । जिस पर कोड़ियो से सजी  झूमर लगी होती है ,  पाँव मेंभी घुंघरू ,हाथो में मोर पंख  अथवा चाचर के दो डंडे का शस्त्र  लेकर जब वे चलते हें तो एकअलग ही अहशास होता है । मोनियों के इस निराले रूप और उनके गायन और नृत्य  कोदेखने लोग  ठहर जाते हें ।
 संस्कृति के जानकार डॉ. केएल पटेल बताते हैं मौन साधना के पीछे सबसे मुख्य कारण पशुओं को होने वाली पीड़ा को समझना है। वे बताते हैं कि जिस तरह किसान खेती के दौरान बैलों के साथ व्यवहार करता है। उसी प्रकार प्रतिपदा के दिन मौनिया भी मौन रहकर हाव-भाव करते हैं। वे प्यास लगने पर पानी जानवरों की तरह ही पीते हैं। पूरे दिन कुछ भी भोजन नहीं करते हैं। वे कम से कम 7 गांव की परिक्रमा करते हैं।

 दिवारी गीतों का चलन  कब शुरू हुआ इसको लेकर अलग -अलग मान्यताएं हें ।  कुछ कहतेहें की दिवारी गीतों का चलन 10वी . शत्दी में हुआ । तो कुछ का मानना है की द्वापर मेंकालिया के मर्दन के बाद ग्वालों ने श्री कृष्ण का असली रूप देख लिया था। श्री कृष्ण ने उन्हेंगीता का ज्ञान भी  दिया था। गो पालकों को दिया गया ज्ञान वास्तव में गाय की सेवा के साथशरीर को मजबूत करना था। श्री कृष्ण ने उन्हें समझाया कि इस लोक व उस लोक को तारनेवाली गाय माता की सेवा से न केवल दुख दूर होते हैं बल्कि आर्थिक समृद्धि  का आधार भी यहीहै। इसमें गाय को 13 वर्ष तक मौन चराने की परंपरा है। आज भी यादव (अहीर) और पाल(गड़रिया) जाति के लोग गाय को न सिर्फ मौन चराने का काम करते हैं\
एक और मान्यता है कि  भगवान कृष्ण गोकुल में गोपिकाओं के साथ दिवारी  नृत्य कर रहेथे, गोकुलवासी भगवान इंद्र की पूजा करना भूल गए तो नाराज होकर इंद्र ने वहां जबर्दस्तबारिश की, जिससे वहां बाढ़ की स्थिति बन गई। भगवान कृष्ण ने अपनी अंगुली पर गोवर्धनपर्वत उठाकर गोकुल की रक्षा की, तभी से गोवर्धन पूजा  और दिवारी नृत्य की परम्परा चलीआ रही है।
 अब यह परम्परा अब धीरे-धीरे  कम होती जा रही है ।  गाँव ही सिमट रहे हें गो पालन  घटताजा रहा है ,  गौचर भूमि पर कब्जा हो गया जंगल जा नहीं सकते ऐसे में चरवाहे  भीसिमित होते जा रहे हें । जिसका परिणाम है की  अब पहले की तरह ये दल नहीं दिखते हें ।हालांकि कुछ लोग इस परम्परा को जीवित बनाए रखने का प्रयास कर रहें हें ।


Political_bangal _election_बंगाल का फैसला: सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, राजनीतिक चेतावनी भी

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