12 फ़रवरी, 2017

चुनाव मे बुंदेलखंड की भूख और गरीबी से नहीं किसी को सरोकार

  बुंदेलखंड की डायरी 


रवीन्द्र व्यास 




सियासत के गलियारे से लेकर अपराध के गठजोड़ तक  बुंदेलखंड इन दिनों चर्चा में है । दो राज्यों में बटे बुंदेलखंड के उत्तर प्रदेश  वाले इलाके में चुनावी चर्चा जोरों पर है । इस चुनावी शोर में पार्टियों के मुद्दे  में टेक्स के नाम पर  जनता की गाडी कमाई से की गई लूट को मुफ्त लुटाने का शोर भी खूब हो रहा है । बुंदेलखंड की तक़दीर और तस्वीर बदलने  के लिए बुंदेलखंड विकाश बोर्ड बनवाएगी, बुंदेलखंड में सिचाई के लिए अलग फंड बनाएगी  बीजेपी जब की सपा कहती है की इतना पानी देंगें की बुंदेलखंड के किसान दो फसल आसानी से ले सकें । पर राजनैतिक दलों के राजनैतिक स्वांग  में बुंदेलखंड के असल मुद्दे दफ़न हो कर  रह गए । 


23 फरवरी को उत्तर प्रदेश के चौथे चरण का मतदान होगा । इसमें बुंदेलखंड के जालौन ,झाँसी ,ललितपुर ,महोबा ,हमीरपुर ,बांदा ,और चित्रकूट की 19 विधान सभा सीट के लिए मतदान होगा । 9 फरवरी को नाम वापसी के बाद से इन सीटों पर चुनावी प्रचार ने जोर पकड़ना शुरू कर दिया है । सपा और कांग्रेस के गठबंधन के कारण इस बार सभी 19 सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिल रहा है ।2012 के चुनाव में यहां  4 पर कांग्रेस 1 पर बीजेपी और 7 -7  सीटों पर बसपा और सपा का कब्जा है । 2014 के लोकसभा चुनाव में यहां की चारों लोकसभा सीटों पर कमल खिला था । 2014 की स्थिति देख कर इस बीजेपी उत्साहित होकर चुनावी रण में जूझ रही है । दूसरी तरफ सपा और कांग्रेस के गठबंधन के कारण सपा और कांग्रेस को उम्मीद है की इस बार बुंदेलखंड की 19 में से 14 सीटों पर उनका कब्जा होगा । बुंदेलखंड  बीएसपी का गढ़ माना जाता है , यही कारण है कि  बी एस पी ने इसे अलग राज्य बनाने पर अपनी सहमति दी है और मायावती के शासन काल में इसका विधान सभा से प्रस्ताव भी पारित हुआ था । आर एल डी ने भी  प्रथक बुंदेलखंड राज्य की माग का समर्थन किया है । बीएसपी अखिलेश राज के आतंक की   व  मायावती शासन काल की भयावह  कानून और व्यवस्था की   कहानी लोगों को बता रही है । बीएसपी का बामसेफ नेटवर्क भी सक्रियता से बीएसपी के पक्ष में माहौल बनाने में जुटा है ।  

                             ,अन्य प्रदेशो की बीजेपी सरकार के मॉडल, केंद्र की एन डी ए बनाम मोदी  सरकार के कामकाज को आधार बनाकर, और विकास  के नाम पर  बीजेपी चुनावी समर में है । इसी के चलते बीजेपी सरकार ने झाँसी _ललितपुर_खजुराहो रेल के शुरुआत की थी  और अब 18 हजार करोड़ की  केन बेतवा लिंक परियोजना को मंजूरी दे दी है । इस परियोजना से उत्तर प्रदेश के बांदा , महोबा और झाँसी जिले की 2.65 लाख हेक्टेयर और छतरपुर ,पन्ना और टीकमगढ़ जिले की 3.69 लाख हेक्टेयर भूमि सिंचित होगी ।   पर शायद उसे भरोसा  है कि  इस बार मोदी की  नोटबंदी उनके मंसूबों पर पानी फेर सकती  है ।  इस कारण आर एस एस के कार्यकर्ताओं को भी वातावरण परिवर्तन के काम में लगाया गया है । सपा अपने कामकाज के आधार पर वोट मांग रही है । साथ ही मोदी  सरकार की  नोटबंदी की असफलताओं और  एम् पी सरकार के विकास  मॉडल की  लूट नीति को भी बताने से  नहीं चूक रही है ।  सपा बुंदेलखंड के लोगों को बता रही है कि  एम् पी की कर व्यवस्था ऐसी है की लोगों से ज्यादा से ज्यादा कर वसूला जा रहा है । यहां तक कि  डीजल पेट्रोल 7  रु   महंगा बेचा जा  रहा है । वे यह भी बताने से नहीं चूक रहे की बीजेपी  देश के पूंजीपतियों के लिए  काम करती है और  उसे आम जन से उसे  कोई सरोकार नहीं है ।  क्या आप ऐसी सरकार चाहेंगे जो मनमाने कर लगाए ? 

                           हर चुनावों की तरह यह चुनाव भी  जात पांत के समीकरण पर लड़ा जा रहा है । यही कारण है की प्रत्याशियों की दिलचस्पी बुंदेलखंड के असल  मुद्दों पर नहीं है ।  बुंदेलखंड से पलायन का दर्द किसी को महशूस नहीं हो रहा है ।  लाखों की संख्या में किसान -मजदूर  पलायन करते हैं अपने और परिवार का पेट पालने के लिए  । नोटबंदी के बाद से उन्हें दिल्ली ,पंजाब ,हरियाणा , जम्मू , गुजरात , में मिलने वाला काम भी बंद हुआ है । परिणामतः बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार हुए हैं , छोटे -छोटे कारोबारियों का कारोबार अव्ररुद्ध हुआ   । हालांकि  अब इसका असर धीरे-  धीरे कम हो रहा है पर जो जख्म मिले हैं उनकी टीस अभी मिटी नहीं है  । गांधी जी का सोचना था कि  गाँव के छोटे -छोटे कुटीर उद्योगों से लोगो को ना सिर्फ़े रोजगार मिलेगा बल्कि लोग आर्थिक तौर पर सम्पन्न होंगे । बुंदेलखंड में इसके ठीक विपरीत हालात बने ।  बुनकरों के चरखे टूट गए , कागज़ का कुटीर उद्योग समाप्ति की कगार पर पहुँच गया , बर्तन और धातु शिल्प कारोबार भी सिमट कर 25 फीसदी ही बचा है । सरकार की रीति  और नीतियों ने भी कुटीर उद्योगों को समाप्त कराने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया । 


                          आज हालात ये हैं कि  बुंदेलखंड में भय ,भूख और भ्रस्टाचार ने हालात को और जटिल बना दिया । भूख और कुपोषण से लोगों की जान चली जाती है पर ये चुनाव का मुद्दा नहीं बन पाते । 

                           महोबा  में एम्स के लिए पांच माह से  तारा पाटकार  उपवास  कर रहे हैं ,शायद  उन्हें भरोसा  है कि आज नहीं तो कल बुंदेलखंड की सोती हुई  जनता जागेगी और एक बड़ा आंदोलन खड़ा  कर अपनी मांग सरकार से मनवाने में कामयाब होगी ।  असल में वे बुंदेलखंड के इस इलाके की बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं से चिंतित हैं । यह बात भी चुनावी चर्चा में कहीं देखने को नहीं मिल रही है ।  

                                                    इसमें दोष किसका माना जाए और किसका नहीं माना जाए ये एक बड़ी बहस का मुद्दा हो सकता है पर हालात बदलने के लिए वैचारिक और सामाजिक परिवर्तन की जरुरत बुंदेलखंड को कहीं ज्यादा है ।  

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