बुन्देलखण्ड की डायरी
रवीन्द्र व्यास
उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके की 19 विधान सभा सीट के मतदान के लिए मात्र 4 दिन शेष बचे हैं । प्रचार का दौर भी चरम पर पहुंच रहा है , त्रिकोणीय संघर्ष के इस दौर में हर वो दांव चला जा रहा है जो किसी भी तरह से उनके लिए लाभ कारी हो । मतदान के बाद उन सभी वायदों को भुला दिया जाता है । ऐसा ही कुछ बुंदेलखंड राज्य की मांग के साथ हो रहा है । फिर चुनाव में बुंदेलखंड राज्य की मांग ने जोर पकड़ा है । ,मायावती ने अलग बुंदेलखंड राज्य की बात कह कर और राजनैतिक दलों को भी इस मुद्दे पर बोलने को मजबूर किया है । उमा भारती तो यह कहने से नहीं चूक रही की पिछले 40 साल से में बुंदेलखंड राज्य की मांग का समर्थन कर रही हूँ ।
झाँसी की जन सभा में बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने बुंदेलखंड के लोगों को भरोसा दिलाया की प्रदेश में बसपा सरकार बनने पर हर हाल में अलग राज्य बनवाया जाएगा । इसके लिए केंद्र पर दबाव बनाया जाएगा और जब तक अलग बुंदेलखंड राज्य नहीं बन जाता केंद्र को इसके लिए मजबूर किया जाता रहेगा । उन्होंने लोगों को याद दिलाया कि बीएसपी सरकार के समय भी इसके लिए प्रयास किये गए थे । वे इसे इस इलाके की गरीबी और पिछड़े पन से निजात दिलाने के लिए अलग राज्य को आवश्यक मानती हैं ।
पृथक बुंदेलखंड राज्य के लिए पदयात्रा तक कर चुकी केंद्रीय जलसंसाधन मंत्री ने भी अलग राज्य की मांग पर अपना रुख साफ़ किया है । उमा भारती अपने राजनीति में प्रवेश के साथ ही अलग बुंदेलखंड राज्य की मांग करने लगी थी । उस दौर में बीजेपी भी अपने घोषणा पत्र में छोटे राज्यों की वकालत करती थी । वक्त बदला और बीजेपी का देश और प्रदेशो पर कब्जा बढ़ा तो उसने छोटे राज्य की मांगों को अनसुना कर दिया । उमा भारती पृथक बुंदेलखंड राज्य की मांग पर अडिग रही , उन्होंने लोकसभा चुनाव में भी अलग बुंदेलखंड राज्य की बात कही थी । अब विधान सभा चुनाव के समय भी वे लोगों से कह रही हैं की में पिछले 40 साल से अलग बुंदेलखंड राज्य की मांग का समर्थन करती रही हूँ । अब लोगों को बुंदेलखंड राज्य के लिए प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए ।
उमा भारती और मायावती की बातों को बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा के लोग सिर्फ चुनावी स्टंट मानते हैं । मोर्चा के विक्रम सिंह तोमर उमा भारती को याद दिलाते हैं की लोकसभा चुनाव के समय उन्होंने तीन साल में अलग राज्य बनाने की बात कही थी । तीन साल होने को आ रहे हैं पर इस मसले पर एक कदम भी आगे नहीं बड़ी । अब फिर चुनाव आया तो ये बुंदेलखंड राज्य की बात करने लगी , और कह रही की इसकी प्रक्रिया शुरू करें , । वे सवाल करते हैं कि राज्य निर्माण की प्रक्रिया सरकार शुरू करती है या लोग ? लोग तो अपनी मांग रखते हैं मांग के समर्थन में आंदोलन करते हैं ।
दरअसल बुंदेलखंड राज्य की मांग करने वाले लोग नेताओं के चुनाव के समय दिए गए बुंदेलखंड राज्य बनाने के बयानों को सिर्फ राजनैतिक जुमले बाजी से ज्यादा कुछ नहीं मानते । विक्रम सिंह कहते हैं कि मायावती को भी बुंदेलखंड अलग राज्य बनाने की याद चुनाव के समय ही आती है । जब उनकी सरकार थी उस समय वे यदि ईमानदारी से प्रयास करती तो तेलंगाना के पहले ही अलग बुंदेलखंड राज्य बन जाता । इस बार इतनी जोर शोर से यह मुद्दा उठने की वजह है मोर्चा के चुनाव मैदान में सीधे उतरना , । अलग राज्य के मुद्दे पर मत बंट ना जाए इस कारण लोगों को भ्रमित करने के लिए अलग बुंदेलखंड राज्य की बात नेता कर रहे हैं ।
ये सियासत के ही समीकरण हैं की बुंदेलखंड को दो अलग राज्यों में बाँट दिया गया उत्तर प्रदेश में सात जिले और मध्य प्रदेश के छह जिले । इस सियासी समीकरण के कारण बुन्देलखंड की आवाज ना मध्य प्रदेश में बुलंद हो पाई ना उत्तर प्रदेश में । उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने और बिगाड़ने में बुंदेलखंड का 5 फीसदी से भी कम योगदान है । 5 फीसदी में से सरकार में ये आंकड़ा महज 2 से 3 फीसदी ही रह जाता है । नतीजतन बुंदेलखंड की आवाज दब कर रह जाती है । संख्या बल को ध्यान में रख कर बुंदेलखंड के सात जिलों की आवाज सरकार और सियासत की नजर में कोई बहुत मायने नहीं रखती । यही वो कारण है की चुनाव में बुंदेलखंड के दर्द से किसी भी सियासी दल को कोई बहुत ज्यादा सरोकार नहीं रहता है ।
बुंदेलखंड के दर्द का अहसास शायद फिल्म अभिनेता राजपाल यादव को हो गया । बांदा में सर्वधर्म समभाव पार्टी प्रत्यासी के पक्ष में चुनावी सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने राजनैतिक दलो से ही सवाल किया जब बुंदेलखंड के पिछड़ेपन का मुद्दा उनके एजेंडे में प्रमुखता से होता है तो फिर यह पिछड़ा क्यों है ? असल बात ये है की ये राजनैतिक दल सिर्फ प्रदर्शन करते हैं करते कुछ नहीं । उन्होंने बुन्देलखण्ड से दस सीटें जितने पर ३०० एकड़ में फिल्म इंडस्ट्रीज बनाने की बात कही । ये बात ठीक वैसी ही है जैसी" ना नो मन तेल होगा और ना राधा नाचेगी " ।
बुन्देलखण्ड राज्य की मांग करने वाले लोग यह बात स्वीकारते तो हैं की दो राज्यों में विभाजित होने के कारण उनकी बात को राजनैतिक दलों की सरकारों द्धारा अनसुना किया जाता है । चुनाव के समय ही चुनावी शोर में बात उठती है और समाप्त हो जाती है । जिसका परिणाम है की बुंदेलखंड में विकाश नहीं हुआ । ये अलग बात है कि बुंदेलखंड राज्य के नाम पर बहुतेरों ने अपनी नेता गिरी चमकाई और मलाई चाटकर निश्चिन्त हो गए ।


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