06 नवंबर, 2016

Bundelkhand Dayri_Moniya Dance


मोनिया नृत्य और दिवारी गीतों के सीमित होते स्वर
रवींद्र व्यास 

 विन्ध्य पर्वत मालाओंओ से घिरा  बुंदेलखंड का  यह अंचल वैसे  तो  अपने अभावों  औरबदहाली के कारण जाना जाता है   इस बदहाल इलाके में ऐसी  कई परम्परा  और  और लोकसाहित्य है जो  यहाँ की  अपनी एक अलग पहचान बनाता है ।पर काल के गर्त में धीरेधीरे ये परम्पराएं  समाप्त होती जा रहीं हें   ऐसी  ही एक परम्परा है  दिवारी गीत और नृत्य दिवाली के दूसरे  दिन जहां इनके  ये दल हर गली और नुक्कड़ पर दिख जाते थे अब सीमितहोते जा रहे हें 
दिवारी  गीत और नृत्य  मूलतः चरागाही  संस्कृति के गीत ह़े , यही कारण है  की इन गीतोंमें  जीवन  का यथार्थ मिलता है  फिर चाहे  वह सामाजिकता हो,या धार्मिकता , अथवा श्रृंगार  या  जीवन का दर्शन  ये वे  गीत हें जिनमे  सिर्फ  जीवन की वास्तविकता के रंग हें , बनावटी  दुनिया से दूर , सिर्फ चारागाही संस्कृति  का प्रतिबिम्ब  अधिकाँश गीत  निति औरदर्शन के हें  ओज से परिपूर्ण इन गीतों में विविध रसों की अभिव्यक्ति मिलती है 
दिवारी गीत दिवाली  के दूसरे  दिन  उस समय गाये जाते हें जब  मोनिया मौन व्रत रख करगाँवगाँव  में घूमते  हें  दीपावली के पूजन के बाद मध्य रात्रि  में मोनिया -व्रत शुरू हो जाताहै  गाँव के अहीर - गडरिया और पशु पालक तालाब नदी में नहा कर , सज-धज कर मौन व्रतलेते हें  इसी कारण इन्हे मोनिया भी कहा जाता है  
द्वापर युग से यह  परम्परा चली  रही है ,  इसमें  विपत्तियों को दूर करने के लिए ग्वाले मौनरहने  का कठिन व्रत रखते हैं। यह मौन व्रत बारह वर्ष तक रखना पड़ता है। इस दौरान मांस मदिरा का सेवन वर्जित रहता है ।  तेरहवें वर्ष में मथुरा  वृंदावन जाकर  यमुना नदी के तटपर पूजन कर  व्रत तोड़ना पड़ता है।
शुरुआत में पांच मोर पंख लेने पड़ते हैं प्रतिवर्ष पांच-पांच पंख जुड़ते रहते हैं। इस प्रकार उनकेमुट्ठे में बारह वर्ष में साठ मोर पंखों का जोड़ इकट्ठा हो जाता है। परम्परा के अनुसार   पूजनकर पूरे नगर में ढोल,नगड़िया  की थाप पर दीवारी गातेनृत्ये करते हुए हुए अपने गंतव्य कोजाते हैं। इसमें एक गायक ही लोक परम्पराओं के गीत और  भजन गाता है  और उसी पर दलके सदस्य नृत्य करते हैं  
हालांकि मोनिया कोंड़ियों  से गुथे लाल पीले  रंग के जांघिये   और लाल पीले रंग की कुर्ती यासलूका अथवा बनियान  पहनते हें  जिस पर कोड़ियो से सजी  झूमर लगी होती है ,  पाँव मेंभी घुंघरू ,हाथो में मोर पंख  अथवा चाचर के दो डंडे का शस्त्र  लेकर जब वे चलते हें तो एकअलग ही अहशास होता है  मोनियों के इस निराले रूप और उनके गायन और नृत्य  कोदेखने लोग  ठहर जाते हें 
 संस्कृति के जानकार डॉकेएल टेल बताते हैं मौन साधना के पीछे सबसे मुख्य कारण पशुओं को होने वाली पीड़ा को समझना है। वे बताते हैं कि जिस तरह किसान खेती के दौरान बैलों के साथ व्यवहार करता है। उसी प्रकार प्रतिपदा के दिन मौनिया भी मौन रहकर हाव-भाव करते हैं। वे प्यास लगने पर पानी जानवरों की तरह ही पीते हैं। पूरे दिन कुछ भी भोजन नहीं करते हैं। वे कम से कम गांव की परिक्रमा करते हैं।

 दिवारी गीतों का चलन  कब शुरू हुआ इसको लेकर अलग -अलग मान्यताएं हें   कुछ कहतेहें की दिवारी गीतों का चलन 10वी . शत्दी में हुआ  तो कुछ का मानना है की द्वापर मेंकालिया के मर्दन के बाद ग्वालों ने श्री कृष्ण का असली रूप देख लिया था। श्री कृष्ण ने उन्हेंगीता का ज्ञान भी  दिया था। गो पालकों को दिया गया ज्ञान वास्तव में गाय की सेवा के साथशरीर को मजबूत करना था। श्री कृष्ण ने उन्हें समझाया कि इस लोक  उस लोक को तारनेवाली गाय माता की सेवा से  केवल दुख दूर होते हैं बल्कि आर्थिक समृद्धि  का आधार भी यहीहै। इसमें गाय को 13 वर्ष तक मौन चराने की परंपरा है। आज भी यादव (अहीरऔर पाल(गड़रियाजाति के लोग गाय को  सिर्फ मौन चराने का काम करते हैं\
एक और मान्यता है कि  भगवान कृष्ण गोकुल में गोपिकाओं के साथ दिवारी  नृत्य कर रहेथेगोकुलवासी भगवान इंद्र की पूजा करना भूल गए तो नाराज होकर इंद्र ने वहां जबर्दस्तबारिश कीजिससे वहां बाढ़ की स्थिति बन गई। भगवान कृष्ण ने अपनी अंगुली पर गोवर्धनपर्वत उठाकर गोकुल की रक्षा कीतभी से गोवर्धन पूजा  और दिवारी नृत्य की परम्परा चली रही है।
 अब यह परम्परा अब धीरे-धीरे  कम होती जा रही है   गाँव ही सिमट रहे हें गो पालन  घटताजा रहा है ,  गौचर भूमि पर कब्जा हो गया जंगल जा नहीं सकते ऐसे में चरवाहे  भीसिमित होते जा रहे हें  जिसका परिणाम है की  अब पहले की तरह ये दल नहीं दिखते हें हालांकि कुछ लोग इस परम्परा को जीवित बनाए रखने का प्रयास कर रहें हें 


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