26 अक्टूबर, 2025

अवैध रेत के तीन ट्रैक्टर पकड़ने और छोड़ने का मामला :: कलेक्टर ने एसडीएम से मांगा स्पष्टीकरण

 अवैध रेत के तीन ट्रैक्टर पकड़ने और छोड़ने का  मामला ::  कलेक्टर ने एसडीएम से मांगा स्पष्टीकरण


छतरपुर //  // २६/१०/२५ ,  कलेक्टर पार्थ जैसवाल ने विगत शनिवार को एसडीएम छतरपुर अखिल राठौर द्वारा रेत के अवैध ट्रैक्टर पकड़े जाने और छोड़ने के मामले में त्वरित संज्ञान लिया है।
कलेक्टर ने एसडीएम को कारण बताओ नोटिस जारी कर तत्काल रूप से लिखित स्पष्टीकरण मांगा है। साथ ही अपर कलेक्टर की अध्यक्षता में जांच टीम गठित कर पूरे मामले की रिपोर्ट मांगी है।

                                                              छतरपुर में एसडीएम अखिल राठौर ने  शनिवार सुबह 7 बजे सिविल लाइन थाना क्षेत्र के पन्ना रोड फोरलेन के पास से  अवैध रेत ले जा रहे  तीन ट्रैक्टरों को पकड़ा | दीपक यादव,  कैलाश यादव और मनोज तिवारी के इन ट्रेक्टरों को  एसडीएम साहब  ने  सिविल लाइन  थाने में खड़ा करवाया था। लेकिन कुछ ही देर बाद   रेत माफिया इन ट्रैक्टरों को थाने से लेकर फरार हो गए |  

इस मामले में सिविल लाइन थाना प्रभारी सतीश सिंह ने बताया कि हमें इस मामले में बाद में जानकारी हुई थी कि प्रातः एसडीएम और तहसीलदार द्वारा तीन ट्रेक्टर को थाने में खड़ा कराया गया था | चूँकि इस मामले में पकड़ने या जप्ती का कोई डोकूयमेन्ट उनके द्वारा थाने में उपलब्ध नहीं कराया गया था | बाद में उनके पटवारी थाने आये और ट्रेक्टर को रिलीज़ कराया था | थाने में किसी प्रकार की सुचना नहीं दी गई थी कि थाने में क्यों और किसलिए रखे गए हैं | 

मामला सोशल मीडिया में आने के बाद अचानक सुर्ख़ियों में आया और २४ घंटे बाद  कलेक्टर ने एक प्रेस विज्ञप्ति में बताया कि शनिवार को एसडीएम छतरपुर अखिल राठौर द्वारा रेत के अवैध ट्रैक्टर पकड़े जाने और छोड़ने के मामले में त्वरित संज्ञान लिया है।कलेक्टर ने एसडीएम को कारण बताओ नोटिस जारी कर तत्काल रूप से लिखित स्पष्टीकरण मांगा है। साथ ही अपर कलेक्टर की अध्यक्षता में जांच टीम गठित कर पूरे मामले की रिपोर्ट मांगी है।

कलेक्टर द्वारा जांच टीम गठित करने के ३५ मिनट बाद  एसडीएम अखिल राठौर का जनसम्पर्क कार्यालय से स्पष्टीकरण का  वीडियो जारी होता है |  एसडीएम इसमें स्पष्ट करते हैं कि अवैध रेट परिवहन पर निरंतर कार्यवाही जारी है | कल भी ट्रैक्टर पकडे गए थे | उन पर विधि सांगत माइनिंग की कार्यवाही की जा रही है | और प्रशासन द्वारा संयुक्त कार्यवाही करते हुए दो यादव और तिवारी के ट्रेक्टरों को ोरचारोड थाने में खड़ा कराया गया है | आगे टीम बनाकर हम कठोर कार्यवाही कर रहे हैं | हमारा उन सब अवैध उत्खनन परिवहन करने वाले लोगों से कहना है कि इस तरह का बिजनेस छोड़ दें नहीं तो उन पर भरी से भारी कार्यवाही की जायेगी | 

 एसडीएम अखिल राठौर के नेतृत्व में की गई है कार्यवाही कई सवालों के घेरे में है और इन्हीं सवालों ने उनके खिलाफ जांच भी खड़ी करवा दी, इस पूरी घटनाक्रम में रेत माफियाओं और प्रशासनिक गठजोड़ की बात भी सामने आई है, तो वही कहा यह भी जा रहा है की राजनीतिक दबाव और सरपरस्ती के कारण इन ट्रैक्टरों को सिविल लाइन थाने से छोड़ा गया था, लेकिन अब डैमेज कंट्रोल के लिए उन्हें ओरछा रोड थाने में रखवाया गया है, सवाल यह भी है कि अगर ओरछा रोड थाने में ही ट्रैक्टर खड़े करवाने थे तो फिर उन्हें सिविल लाइन थाने क्यों ले जाया गया ,और वहां काफी देर तक ट्रैक्टर खड़े क्यों रहे , फिलहाल इस मामले की लीपापोती जारी है, कलेक्टर छतरपुर की जांच में क्या सामने आता है यह देखना भी दिलचस्प होगा
 शहर में प्रतिदिन सैकड़ों की संख्या में ट्रैक्टर अवैध रूप से रेत का परिवहन करते हैं। आरोप है कि यह गोरखधंधा प्रशासन की कथित सांठगांठ से चलता है और इन पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती। ये ट्रैक्टर आसपास के नदी-नालों से रेत लाकर सटई रोड, देरी रोड, महोबा रोड और गायत्री मंदिर के पास खड़े किए जाते हैं।

23 अक्टूबर, 2025

दुनिया के देश क्यों खरीद रहे हैं भारत से गोबर

  दुनिया के देश  क्यों खरीद रहे हैं भारत से गोबर

रवीन्द्र व्यास 

भारत आज केवल मसालों, चाय या इंजीनियरिंग उत्पादों का निर्यात नहीं कर रहा, बल्कि अब "गोबर" जैसे पारंपरिक ग्रामीण उत्पाद ने भी वैश्विक बाजार में अपनी पहचान बना ली है। अमेरिका, चीन, सऊदी अरब, ब्राजील, कुवैत और मालदीव जैसे देश भारत से गोबर खरीद रहे हैं। यह बदलाव केवल धार्मिक मान्यता या जिज्ञासा का नहीं, बल्किहरित अर्थव्यवस्थाकी दिशा में बढ़ते वैश्विक कदमों का परिणाम है। देश में आ रहा यह परिवर्तन किसानों और पशुपालकों को एक नया आर्थिक स्रोत उपलब्ध  कराएंगे साथ ही छुट्टा जानवरों की समस्या से भी मुक्ति दिला सकते हैं


भारत में लगभग 30 करोड़ मवेशी हैं जो प्रतिदिन करीब 3 करोड़ टन गोबर उत्पन्न करते हैं। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था, जैविक उर्वरक, बायोगैस और पारंपरिक ईंधन (उपले) की भारी आपूर्ति होती है। यही विशाल उत्पादन आधार भारत को इस क्षेत्र में निर्यात क्षमता देता है |  30–50 रुपये प्रति किलो की दर से इसका निर्यात होता  है, हालांकि गोबर का निर्यात मूल्य  गोबर के प्रकार और प्रसंस्करण (पाउडर, खाद, या उपला) पर निर्भर करता है।

पिछले एक दशक मेंकई देशों ने रासायनिक खादों पर निर्भरता कम करने का निर्णय लिया है। यूरोप, सऊदी अरब और चीन जैसे देशों मेंऑर्गेनिक एग्रीकल्चर सर्टिफिकेशनकड़े हुए हैं। गोबर से बनी खाद पर्यावरण सुरक्षित, कार्बन-न्यूट्रल औरमिट्टी के माइक्रोबियल बैलेंस  को बनाए रखने वाली मानी जाती है।इसलिए विदेशी किसान विशेषकर भारत कागोबर पाउडरऔर लिक्विड मेन्यूर मंगाते हैं।

भारतीय गोबर में मैग्नीशियम, फास्फोरस, और नाइट्रोजन के प्राकृतिक अंश जैसे  सूक्ष्म तत्त्व पाए जाते हैं जो मिट्टी की संरचना को सुधारते हैं  | कुवैत और सऊदी अरब के कृषि वैज्ञानिकों ने पाया कि भारतीय गोबर से बने जैविक खाद नेखजूर की फसलमें न केवल उत्पादन बढ़ाया बल्कि फलों के आकार और मिठास में भी सुधार किया।

रेगिस्तानी और गर्म देशों जैसे सऊदी अरब, कुवैत या यूएई में मिट्टी की उपजाऊ क्षमता सीमित है और जल संसाधन भी कम हैं। वहां के किसान  कम सिंचाई वाली खेतीके साथ जैविक खाद का प्रयोग करना चाहते हैं। भारतीय गोबर उनकी इस जरूरत को सस्ते और व्यवहारिक रूप में पूरा करता है।

रासायनिक उर्वरकों से उत्पादित अनाज और फल में नाइट्रेट की मात्रा बढ़ने से कैंसर व अन्य रोगों का खतरा साबित हुआ है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट में भी रासायनिक खेती के दुष्प्रभाव पर चेतावनी दी गई है। इसलिए अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देशों में भी ऑर्गेनिक फर्टीलिज़ार की मांग लगातार बढ़ रही है, जिसमें भारतीय गोबर एक विश्वसनीय विकल्प बन चुका है।

 दरअसल  भारत का गोबर केवल कृषि उत्पाद नहीं, बल्कि पारंपरिक उपयोग से भी जुड़ा है  दीवार लेपन, पूजा सामग्री, पर्यावरण-अनुकूल उत्पाद (गोबर के दीये, ब्रिक्स, धूप आदि)।

भारत से गए उपले या पाउडर का उपयोग सिंगापुर, मालदीव और नेपाल जैसे देशों में धार्मिक आयोजनों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी किया जाता है।

कुछ देशों में हिंदू समुदाय के मंदिरगोवर्धन पूजायादीपावलीके समय भारत से आयातितगोबर उपलेमंगाते हैं।

आर्थिक और भविष्य की संभावनाएं

भारत में गोबर आधारित स्टार्टअप और बायो फर्टिलाइजर यूनिट्स का विस्तार तेजी से हो रहा है।गोबरधन योजना के तहत देश की कई  ग्राम पंचायतें अपशिष्ट से ऊर्जा और आय अर्जित कर रही हैं।एक अनुमान के मुताबिक़ 2030 तकगोबर निर्यात400 करोड़ रुपये से अधिक हो  सकता है।  जैविक फसल उत्पादन के साथ यहग्रीन ब्रांड इंडियाकी पहचान को और मजबूती देगा।

बुंदेलखंड ही नहीं देश  में एक समय  किसानों के जीवन, आय और खेती  में गौ वंश  गहरा प्रभाव था । यह परंपरा खेतों की उर्वरा शक्ति बढ़ाने का साधन थी, जिसे दुनिया के देश भी मान रहे हैं , पर बुंदेलखंड सहित देश के अनेक क्षेत्रो में किसान अब  गोवंश   को  हानि का कारण मानने लगा है।लेकिन मशीनीकरण और आर्थिक रूप से  गोवंश को हानिप्रद मानकर  किसान ऐसे पशुओं को स्थायी रूप से छोड़ने लगे हैं ।यही खुले में छूटे गोवंश से  आज के दौर में  बुंदेलखंड के ग्रामीण त्रस्त हैं |  

       यही  लाखों अन्ना पशुखेतों में घुसकर फसलों को बर्बाद कर देते हैं। छतरपुर ,टीकमगढ़ , पन्ना ,दमोह झांसी, ललितपुर और बांदा जिलों में ही हर सालहजारों एकड़खेती चौपट होती है

कई किसान रातभर खेतों की रखवाली करने को मजबूर हैं, जिससे उनकी श्रम उत्पादकता, स्वास्थ्य और आमदनी प्रभावित हो रही है।कुछ किसानों ने तो इस विपत्ति के कारण खेती ही छोड़ दी है

                                       हालांकि  बुंदेलखंड के लगभग प्रत्येक जिले में गौशालाएँ हैं, लेकिन उनकी क्षमता सीमित है। जबकि खुले में घूमने वाली गायों की संख्या उससे कई गुना अधिक है।इस समस्या से निपटने के लिए कुछ क्षेत्रों में किसानों ने सामूहिक पहल भी की है ,  ललितपुर और महरौनी क्षेत्रों में किसानों ने  गांव में   अन्ना पशुओं को एक स्थान पर चरने की  व्यवस्था की है , जिससे फसलें भी बचीं और गायों को भी भूख से मुक्ति  मिली

            गोवंश के इस अर्थ तंत्र को सही ढंग से एमपी ,यूपी में लागू किया जाए तो  यह किसानों के लिए कुछ अवसर भी लेकर आ सकता है गोबर और मूत्र सेजैविक खादतैयार कर बेचने की व्यवस्था की जा सकती है।यदि इसेसामूहिक चराईबायोगैस संयंत्रऔर जैविक उर्वरक इकाइयोंसे जोड़ा जाएतो यही संकटकिसान आय वृद्धिका साधन भी बन सकता है।  पंचायत स्तर पर गोबरधन क्लस्टरयाबायोगैस इकाइयांस्थापित कर अन्ना पशुओं को संसाधन में बदला जा सकता है।

गोबर बेचकर आय बढ़ा सकते हैं किसान 

 ग्रामीण किसान अब केवल दूध बेचने तक सीमित नहीं हैं वेगोबरसे भी आय बढ़ा सकते हैं। भारत मेंकई राज्य सरकारें, डेयरी बोर्डऔरसेल्फ-हेल्प ग्रुपकिसानों से गोबर खरीदकर खाद, बायोगैस, लकड़ी और अन्य उत्पाद बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं।

राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड नेगुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, राजस्थान, ओडिशाऔरबिहारमें15 कंप्रेस्ड बायोगैस  प्लांटस्थापित करने का निर्णय लिया है।इन प्लांट  के लिए किसानों से सीधेपशुओं का गोबरखरीदा जाएगा। इससे किसान गोबर बेचकर प्रति माहहजारों रुपयेकमा सकते हैं ।गोबर सेवर्मी कंपोस्ट(जैविक खाद) तैयार कर किसान अपने या पड़ोसी खेतों में बेच सकते हैं। कई राज्यों मेंसरकारें और पंचायतेंखुद किसानों से यह खाद खरीदती हैं।कई किसान हर महीने20–30 क्विंटलवर्मी कंपोस्टतैयार कर ₹2–3 लाखतक सालाना आय अर्जित कर रहे हैं ।

मध्य प्रदेश केमऊगंजजिले मेंगोबर से लकड़ी बनाने की यूनिटस्थापित की गई है, जहाँ दो रुपये प्रति किलो के हिसाब से गोबर खरीदा जाता है।100 पशुओं की एक गो शालाएक साल में 7 लाखतक की कमाईकर सकती है। ये लकड़ियाँ अंतिम संस्कार और भट्ठी ईंधन दोनों में प्रयुक्त होती हैं । सीधी जैसे जिलों मेंगोबर से मूर्तियां, गमले, अगरबत्ती स्टैंडऔरसजावटी हस्तशिल्पबनाए जा रहे हैं।प्रशिक्षण के लिए वन विभाग और स्वयं सहायता समूह ग्रामीणों की मदद करते हैं। केवल₹4–5 हजार प्रारंभिक लागतसे कोई भी व्यक्ति यह काम शुरू कर सकता है ।

     आज देश गोबर को कचरे के बजाय आर्थिक संपत्तिमें बदलने की दिशा में  आगे बढ़ रहा है।एक किसानअगर 4–5 दुधारू पशु रखता हैतो औसतन माह में 3000–7000तक शुद्ध आय प्राप्त कर सकता है।सरकार की राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड की  गोबरधन योजना  कीबायोगैस पहलऔरस्थानीय हस्तनिर्मित उत्पादइन सभी से भविष्य मेंग्रामीण आत्मनिर्भरताको नई गति मिलने वाली है। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में गोबर का निर्यात एक नया आय स्रोत बन सकता है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा। यदि भारत सरकार गोबर आधारित उत्पादों के निर्यात को प्रोत्साहन दे, तो यह ग्लोबल ग्रीन ट्रेड में भारत की भूमिका को मजबूत कर सकता है।

 

21 अक्टूबर, 2025

बुंदेलखंड की दिवाली के अनोखे रंग रोशनी से बढ़कर परंपरा का पर्व

 बुंदेलखंड की डायरी 


बुंदेलखंड की दिवाली के अनोखे रंग
  
रोशनी से बढ़कर परंपरा का पर्व 
 
रवीन्द्र व्यास


भारतभर में दीपों का त्योहार दीवाली समृद्धि और रोशनी का प्रतीक माना जाता है, लेकिन बुंदेलखंड में इसका स्वरूप कहीं अधिक गहरा और जीवंत है। यहां दीपावली केवल दीपों की जगमगाहट का नहीं, बल्कि लोक परंपराओं, पशुपालक संस्कृति और सामूहिक आस्था का उत्सव है। बुंदेलखंड के गांवों में दीपों के साथ लठ्ठमार दिवारी, मौनिया नृत्य और धार्मिक अनुष्ठान इस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान बन चुके हैं।लोक कलाएं जो मिट्टी की महक लिए हैंइस क्षेत्र के लोकगीत और नृत्य सदियों से लोगों के श्रम, विश्वास और सामाजिक संदेशों के वाहक रहे हैं। हालांकि आधुनिकता की रफ्तार के साथ गांवों की परंपराएं अब सिमटती जा रही हैं, पर कई स्थानीय कलाकार और संस्थाएँ इन्हें पुनर्जीवित करने में जुटी हैं। 


ऐसा ही एक जीवित उदाहरण है दिवारी या मौनिया नृत्य जो बुंदेलखंड की चारागाही संस्कृति और लोक आस्था दोनों का संगम है।सरीला: जहां एक पत्थर से शुरू होती है दिवाली की थाप हमीरपुर के सरीला कस्बे में दशहरे पर गाड़ा गया पत्थर दीपावली की रात उखाड़ा जाता है। यही क्षण मौनिया नृत्य के आरंभ का संकेत बनता है। यदुवंशी समुदाय पत्थर की पूजा के बाद इसे निकालता है और फिर पूरी रात मंदिरों के बाहर नृत्य करता है। ढोल-नगाड़ों की थाप और लाठियों की टकराहट के बीच मौन धारण किए नर्तक मोरपंख सजाकर थिरकते हैं। यह दृश्य वीरता और अनुशासन दोनों का मोहक संगम बन जाता है।
लठ्ठमार दिवारी: लोक नृत्य में छिपी गोवर्धन कथा


दीपावली के अगले दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा के मौके पर खेले जाने वाला लठ्ठमार दिवारी नृत्य वास्तव में श्रीकृष्ण की गोवर्धन पर्वत कथा का प्रतीक है। लोककथा के अनुसार, जब श्रीकृष्ण ने इंद्र के कोप से गोकुल की रक्षा के लिए पर्वत उठाया, तब ग्वालों ने उनके सम्मान में यह नृत्य किया था।आज भी यदुवंशी समुदाय के कलाकार बारह वर्षों का मौन व्रत लेकर बारह गांवों में यह नृत्य करते हैं। लाठियों के संग प्रदर्शन केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्मसंयम, साहस और वीरता की धरोहर है। नगाड़ों की थाप और घुंघरुओं की झंकार के साथ यह प्राचीन परंपरा लोगों को अपने गौरवशाली अतीत की याद दिलाती है।

मौनिया नृत्य: 


पशुपालक जीवन की साधनादीपावली की रात पूजा के बाद अहीर, गड़रिया और पाल समुदाय तालाब और नदियों में स्नान कर मौन व्रत लेते हैं। इन्हीं को मौनिया कहा जाता है। लाल-पीली पोशाकें, घुंघरू, और मोरपंखों से सजे हाथ, मौन चेहरे और कदमों की थिरकन , यह सब मिलकर एक ऐसा दृश्य बनाते हैं, जो लोकजीवन की सरलता और गहराई दोनों को उजागर करता है।मौनिया प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा तक गांव-गांव घूमते हैं। वे डोल, नगाड़ा, मंजीरा और मृदंग की थाप पर नृत्य करते हैं, पर स्वयं मौन रहते हैं। लोकसंस्कृति के विद्वान डॉ. के.एल. पटेल बताते हैं कि इस मौन का उद्देश्य पशुओं के मौन दर्द को समझना और उनके श्रम के प्रति संवेदनशील होना है। यह साधना ही मौनियों की आत्मा है।

गीतों में बुना लोक जीवन का दर्शन

दिवारी गीतों में जीवन का दर्शन और लोकनीति समाई हुई है। ये गीत न केवल श्रद्धा या श्रृंगार के हैं, बल्कि समाज के नैतिक मूल्यों और श्रम की गरिमा को भी रेखांकित करते हैं। गायक जब ताल मिलाते हैं, तो श्रोताओं को लगता है जैसे पूरी प्रकृति उनके साथ गा रही हो।इतिहासकार मानते हैं कि दिवारी गीतों की परंपरा लगभग दसवीं सदी के आसपास आरंभ हुई। वहीं एक अन्य लोककथा के अनुसार, द्वापर युग में कालिया मर्दन के बाद जब ग्वालों ने श्रीकृष्ण का असली रूप देखा, तब उन्होंने इसी नृत्य और गीत के माध्यम से उन्हें धन्यवाद दिया। श्रीकृष्ण ने उन्हें सिखाया कि गौसेवा ही मनुष्य और समाज के कल्याण की मूल जड़ है।

बदलते समय में संघर्षरत परंपरा 

बुंदेलखंड के गांव अब तेजी से कस्बों में बदल रहे हैं; पशुपालन घटा है, और साथ में दिवारी की परंपरा भी। छतरपुर के रामजी यादव कहते हैं, पहले गांव में हर गली में मौनिया दल दिख जाते थे, अब बस आयोजन तक सीमित हैं। फिर भी यह परंपरा पूरी तरह लुप्त नहीं हुई है। चरखारी, बिजावर और सागर में स्थानीय आयोजन आज भी मौनिया नृत्य को जीवंत रखने का प्रयास कर रहे हैं। विदेशी पर्यटक भी खजुराहो में इन्हें देखकर मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।

सागर और टीकमगढ़ में घर-घर की दीवाली

सागर जिले के सानौधा गांव में आज भी कुम्हार, माली और पौनी दीपावली से पहले घर-घर जाकर दीये, फूल और रुई पहुंचाते हैं। यह परंपरा पेशेवर सहयोग के साथ सामाजिक एकता की मिसाल भी है। वहीं टीकमगढ़ में लोग अब भी छुई मिट्टी से घरों की पुताई करते हैं और चौखट पर लोहे की कील ठोकते हैं । यह बुराइयों को घर से दूर रखने का प्रतीक है।

सत-असत के संघर्ष की प्रतीक रस्म 

हमीरपुर और बांदा जिले के कुछ गांवों में दीपावली के अगले दिन गाय और सुअर की प्रतीकात्मक लड़ाई कराई जाती है। यह विचित्र लगने वाली रस्म वास्तव में जीवन के दो पहलुओं  पवित्र और अपवित्र, सत्य और असत्य  के संघर्ष का प्रतीक है। इस आयोजन में मौनिया ढोल-नगाड़ों की थाप पर नाचते हैं, और लोकगीतों से धर्म व नीति की व्याख्या करते हैं।

दीवाली: सिर्फ रोशनी नहीं, जीवन की साधना

बुंदेलखंड की दीपावली केवल उत्सव नहीं, बल्कि संस्कृति का सशक्त दस्तावेज है। यहां दिवारी नृत्य हो या गाय-सुअर की प्रतीकात्मक लड़ाई  हर आयोजन मनुष्य, पशु और प्रकृति के पारस्परिक संबंधों की अनूठी व्याख्या करता है।इस क्षेत्र के लिए दीपावली केवल दीपों की चमक नहीं, बल्कि धरती, श्रम और आस्था के बीच रोशनी फैलाने का माध्यम है। यही कारण है कि बुंदेलखंड में यह पर्व लोकजीवन की आत्मा बनकर हर वर्ष नये अर्थों में झिलमिलाता है।

15 अक्टूबर, 2025

मध्यप्रदेश में 20 से अधिक बच्चों की मौत: डॉक्टर ने माना, कंपनी से 10% कमीशन लेता था

 

मध्यप्रदेश में 20 से अधिक बच्चों की मौत: डॉक्टर ने माना, कंपनी से 10% कमीशन लेता था



भोपाल: मध्यप्रदेश में कोल्ड्रिफ कफ सिरप से हुई 20 से अधिक बच्चों की मौत के मामले में नया खुलासा हुआ है। पुलिस ने जिला अदालत को बताया है कि गिरफ्तार डॉक्टर प्रवीण सोनी ने पूछताछ के दौरान माना कि उसे यह सिरप लिखने पर फार्मा कंपनी से 10% कमीशन मिलता था।

अधिकारियों का कहना है कि डॉक्टर सोनी सहित कई अन्य चिकित्सकों को औषधि से जुड़े संक्रमण और प्रतिकूल प्रभावों की जानकारी पहले से थी, इसके बावजूद उन्होंने मरीजों को यह सिरप देना जारी रखा। अदालत में पेश रिपोर्ट में कहा गया है कि डॉक्टर ने मरीजों या स्वास्थ्य विभाग को संभावित खतरे की कोई सूचना नहीं दी।

पुलिस के अनुसार, यह आचरण "चिकित्सकीय नैतिकता और कर्तव्य का गंभीर उल्लंघन" है। जांच टीम ने बताया कि आरोपी डॉक्टर ने लाभ के लिए मरीजों की सुरक्षा से समझौता किया।

कंपनी पर सख़्त कार्रवाई

मामला सार्वजनिक होने के बाद तमिलनाडु की फार्मा कंपनी श्रीसन फ़ार्मास्यूटिकल्स, जो कोल्ड्रिफ सिरप बनाती थी, को बंद कर दिया गया है। स्वास्थ्य विभाग की जांच में सिरप में 48.6% डाईएथिलीन ग्लाइकॉल (DEG) मिलने की पुष्टि हुई यह वही रासायनिक तत्व है जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई पूर्व विषाक्तता मामलों में दर्ज हुआ है।

कंपनी का लाइसेंस रद्द कर दिया गया है, और कंपनी मालिक जी. रंगनाथन को 11 अक्तूबर को मध्यप्रदेश से गिरफ्तार किया गया।

आर्थिक अनियमितता की जांच

13 अक्तूबर को प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत कंपनी के परिसरों और अधिकारियों के घरों पर छापे मारे। जांच एजेंसियां अब पता लगा रही हैं कि डॉक्टरों और कंपनी के बीच कमीशन नेटवर्क कितने बड़े स्तर पर सक्रिय था।

अधिकारियों के मुताबिक, मामला अब केवल स्वास्थ्य कदाचार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें वित्तीय भ्रष्टाचार और आपराधिक लापरवाही के पहलू भी शामिल हो गए हैं।

परिवारों में आक्रोश, जांच जारी

मृत बच्चों के परिवारों ने दोषियों के खिलाफ कड़ी सज़ा और हत्या के समान अपराध के तहत मुकदमा दर्ज करने की मांग की है। राज्य सरकार ने संबंधित डॉक्टरों के लाइसेंस निलंबित कर दिए हैं और एक विशेष जांच दल (SIT) गठित कर दी है।

जांच अधिकारी का कहना है, “यह मामला एक चेतावनी है कि लाभ के लिए लापरवाही किस तरह जानलेवा साबित हो सकती है।

11 अक्टूबर, 2025

बुंदेलखंड: धरोहरों, विकास और जन आस्था की नई धड़कन

 बुंदेलखंड की डायरी 

बुंदेलखंड: धरोहरों, विकास और जन आस्था की नई धड़कन

रवीन्द्र व्यास 

बुंदेलखंड, देश की वह धरा , जहाँ मिट्टी में इतिहास की गंध है, पत्थरों में आस्था की छाप, और लोगों के चेहरे पर जीवन की जिद है । खुदाई में निकली मूर्तियों की सांस्कृतिक चमक, शहरों में उठते फ्लाईओवरों की रफ्तार, मंदिरों में उमड़ते विश्वास की लहरें और जनजीवन के विकास की आकांक्षाएं सभी एक साथ उमड़ती हुई प्रतीत होने लगी हैं | 

 

दमोह: धरती के गर्भ से उभरा इतिहास

दमोह जिले के तेंदूखेड़ा ब्लॉक के ग्राम दौनी में पठादो की पहाड़ी पर पिछले एक साल से चल रही पुरातात्विक खुदाई ने इतिहास की परतें खोल दी हैं। कलचुरी काल (10वीं-11वीं शताब्दी) की ब्रह्मा, विष्णु, शिव, उमा-महेश्वर, अर्धनारीश्वर, पार्वती और वायुदेव जैसी अद्भुत मूर्तियां मिली हैं। इन प्रतिमाओं की कला और प्रतीकात्मकता इस क्षेत्र के उस गौरवशाली युग की कहानी कहती है जब बुंदेलखंड धार्मिक और सांस्कृतिक उत्कर्ष का केंद्र था।

गांव के पास स्थित सिद्ध हनुमान मठ आज भी आस्था का जीवंत केंद्र बना हुआ है, जहां लोगों का विश्वास है कि हनुमान जी की मूर्ति का एक पैर पाताल लोक तक जाता है। इस लोककथा और खुदाई में मिले प्रमाण दोनों मिलकर बुंदेलखंड की मिट्टी की गहराई दिखाते हैं जहाँ इतिहास और श्रद्धा एक ही धारा में बहती हैं।

टीकमगढ़: आधुनिकता की ओर एक पुल

धरोहरों के इस अंचल में अब विकास की रफ्तार भी जोड़ ली गई है। टीकमगढ़ शहर को पहला फ्लाईओवर मिलने जा रहा है चकरा तिराहा से सिंधी धर्मशाला तक 1.5 किमी लंबा पुल, जिसकी लागत लगभग 150 करोड़ रुपये होगी। यह परियोजना बुंदेलखंड की शहरी सोच की झलक है जहाँ भीड़भाड़ और पुरानी सड़कों के बीच से निकल कर आधुनिक यातायात व्यवस्था की तस्वीर बन रही है।

ब्रिज कॉर्पोरेशन के इस प्रस्ताव से उम्मीद है कि सिविल लाइन से लेकर बाजार क्षेत्र तक की जाम से त्रस्त जनता को राहत मिलेगी। यह सिर्फ एक फ्लाईओवर नहीं, बल्कि छोटे शहरों की बढ़ती आकांक्षा और आत्मनिर्भर संरचना का प्रतीक बनकर उभर रहा है। 

ओरछा: आस्था और पर्यटन का संगम

ओरछा, जहां श्री राम राजा की नगरी बसी है, अब श्री राम राजा लोक के रूप में नवसृजन की दिशा में बढ़ रही है। पर्यटन विभाग ने इसे पी पी पी  मोड में विकसित करने के लिए डालमिया समूह के साथ समझौता प्रक्रिया शुरू की है।

12 एकड़ में बनने वाले इस परियोजना में म्यूजियम, लाइट एंड साउंड शो और सांस्कृतिक स्थलों का जीर्णोद्धार किया जाएगा। बुंदेला राजवंश के इतिहास से लेकर स्वतंत्रता सेनानियों तक की कथाओं को संग्रहालयों में दर्ज करने की योजना है। यह प्रयास बुंदेलखंड की पहचान को आधुनिक पर्यटन के नक्शे पर नयी ऊंचाई देगा जहाँ विरासत का संवर्धन और आर्थिक जीवंतता, साथ जुड़े हों।

छतरपुर: मेले में झूमती परंपरा

छतरपुर का मेला जलविहार 2025 इस बार फिर बुंदेलखंड की जीवंत आत्मा बनकर लौटा है। नगर पालिका परिषद द्वारा आयोजित यह 10-दिवसीय उत्सव केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि लोक संस्कृति की पुनर्दृष्टि है।

 स्कूलों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से लेकर आल्हा गायन, लोकगीत, भजन, कवि सम्मेलन, राई नृत्य, बैंड नाइट और मुशायरा जैसे आयोजनों से यह मेला बुंदेलखंड की सांगीतिक और काव्य परंपरा को नई ऊर्जा देता है। मेला परिसर में सर्कस, मीना बाजार और लोक व्यंजन  स्थानीय कारीगरों और व्यवसायियों के लिए भी नई उम्मीदें लेकर आए हैं।

यह आयोजन बताता है कि बुंदेलखंड न सिर्फ इतिहास की धरोहर हैबल्कि वह आज भी जीती-जागती संस्कृति में सांस लेता है।

सागर: विश्वास का जल स्रोत

सागर जिले के पास नोनिया-सेसई के जंगल में निकली चमत्कारी बावड़ी  ने पूरे बुंदेलखंड को कौतूहल में डाल दिया है। ग्रामीणों का दावा है कि इस बावड़ी के जल से असाध्य रोग ठीक हो रहे हैं। लोगों की भीड़ पूजा अर्चना और श्रद्धा का माहौल दिखाता है कि आस्था अब भी इस भूमि की जड़ों में बसी है।

वन विभाग के लिए यह अवसर और चुनौती दोनों बन गया है एक तरफ वन संपदा पर दबाव है, तो दूसरी ओर धार्मिक पर्यटन की संभावना। विज्ञान चाहे जो कहे, पर जनविश्वास बुंदेलखंड को उसकी सांस्कृतिक निरंतरता से जोड़े रखता है।

झांसी: शासन और संकल्प का केंद्र

उत्तर प्रदेश के हिस्से में आने वाला झांसी, बुंदेलखंड के प्रशासनिक और राजनीतिक नेतृत्व का प्रमुख केंद्र है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की हालिया समीक्षा बैठक में बिजली चोरी पर अंकुश, महिला सुरक्षा, कचरा निस्तारण, अतिवृष्टि राहत और औद्योगिक निवेश को लेकर महत्वपूर्ण निर्देश दिए गए।

स्थानीय नागरिकों ने सड़क सुधार, बिजली और सफाई पर फोकस की सराहना की, जबकि विपक्षी दल जमीन पर अमल की रफ्तार पर सवाल उठा रहे हैं। विश्लेषकों के अनुसार, योगी सरकार की योजनाओं से बुंदेलखंड का नगरीय ढांचा मजबूत हो सकता है अगर क्रियान्वयन समय पर हो।

खेल, स्वास्थ्य और उद्यमिता को मिल रहा प्रोत्साहन इस क्षेत्र के युवा जनमानस को उत्साहित कर रहा है। टीबी मुक्त झांसी अभियान जैसे कदम इस क्षेत्र को नई सामाजिक दिशा दे रहे हैं।

  अतीत और भविष्य का संगम

अक्टूबर 2025 का बुंदेलखंड एक ऐसी भूमि है जो एक साथ कई कालों में जी रही है | दमोह की खुदाई अतीत की जड़ों को खोज रही है,ओरछा और छतरपुर संस्कृति को आधुनिक पर्यटन में बदल रहे हैं,टीकमगढ़ और झांसी विकास का ढांचा खड़ा कर रहे हैं,जबकि सागर की बावड़ी श्रद्धा की लहर उठाए हुए है।

यह वही बुंदेलखंड है जो अपनी धरोहर संभालते हुए, विकास और आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ा रहा है। इतिहास की धूल से उठती मूर्तियाँ और सड़कों पर बनते पुल दोनों मिलकर कह रहे हैं यह क्षेत्र केवल इतिहास नहीं, बल्कि भविष्य की सृष्टि का आधार है।

04 अक्टूबर, 2025

रावण का पुतला हुआ राख , राजनीतिक अहंकार की आग बरक़रार

 बुंदेलखंड की डायरी 

 रावण और राजनीति 

रावण का पुतला हुआ  राख , राजनीतिक अहंकार की आग बरक़रार 

रवीन्द्र व्यास 


बुंदेलखंड के सागर की दशहरा रात हमेशा की तरह रोशनी और जयघोष से भरी थी, लेकिन इस बार शहर की हवा में कुछ अलग बेचैनी थी। मैदान में रावण का पुतला जलने से ठीक पहले, नगर निगम की राजनीति ने खुद एक नया रावण गढ़ लिया था  अहंकार, गुटबाजी और प्रोटोकॉल की राजनीति का रावण।  


कार्यक्रम के निमंत्रण पत्र पर नगर निगम की महापौर संगीता तिवारी का नाम पांचवें नंबर पर छप गया। पहली नज़र में यह मात्र एक त्रुटि  थी, पर सागर की राजनीति जानने वालों के लिए यह संकेत था , गुटों में बंटी बीजेपी का एक और अध्याय खुल रहा था। महापौर ने तुरंत ऐलान किया कि जहाँ उनका अपमान होगा, वहाँ वे नहीं जाएँगी। उन्होंने साफ कहा कि यह केवल नाम नीचे रखने की बात नहीं, महिला प्रतिनिधि एवं सागर की प्रथम नागरिक  की गरिमा का प्रश्न है। 

इस कार्ड विवाद ने जैसे पुराने घावों को फिर से हरा कर दिया। सागर के नगर निगम में महीनों से मेयर और अधिकारियों के बीच खींचतान चल रही थी। महापौर का आरोप था कि निगम आयुक्त राजकुमार खत्री उनकी उपेक्षा करते हैं  मुख्यमंत्री के कार्यक्रमों में उनसे स्वागत नहीं कराया गया, कन्यादान योजना में उन्हें मंच पर बुलाने में देर की गई, और अब दशहरा आयोजन में नाम नीचे डाल दिया गया। 

खत्री ने हमेशा की तरह जवाब दिया  त्रुटि थी, सुधार ली गई। लेकिन सच यही था कि सागर की राजनीति में यह त्रुटि नहीं, प्रवृत्ति बन चुकी थी। 

सागर में बीजेपी की राजनीति पिछले कुछ  वर्षों से आंतरिक खींचतान का मैदान बनी हुई है। महापौर संगीता तिवारी भूपेंद्र सिंह गुट से आती हैं, जबकि विधायक शैलेंद्र जैन और जिलाध्यक्ष श्याम तिवारी दूसरे गुट से। निगम का प्रशासनिक ढांचा इनके बीच रस्साकशी का अखाड़ा बन चुका है। 

जहाँ मेयर इसे एक महिला जनप्रतिनिधि के खिलाफ साजिश मानती हैं, वहीं दूसरा पक्ष इसे प्रोटोकॉल की भूल बताकर टालता है। 

दशहरे के दिन जब लोग प्रतीकात्मक रावण को आग दे रहे थे, तब नगर निगम में बैठी राजनीति अपने भीतर का रावण और भी बड़ा बना रही थी। शहर के बुद्धिजीवी इसे अंदरूनी दहन कह रहे थे। 

कांग्रेस ने मौके का कोई अवसर नहीं छोड़ा। प्रवक्ता आशीष ज्योतिषी ने तंज करते हुए कहा, कार्यक्रम नगर निगम का है, लेकिन कार्ड पर बीजेपी जिलाध्यक्ष का नाम पहले कैसे आया? लगता है नगर निगम अब बीजेपी का मंडल कार्यालय बन गया है।शहर कांग्रेस अध्यक्ष महेश जाटव ने महापौर को सुझाव दिया कि यदि सम्मान नहीं मिल रहा तो उन्हें किसी अन्य दल में जाने या स्वतंत्र प्रतिनिधि के रूप में काम करने पर विचार करना चाहिए। 

इस बीच जैसीनगर से भी राजनीति की एक और चिंगारी उठी। मंत्री गोविंद सिंह राजपूत ने पूर्व मंत्री भूपेंद्र सिंह का नाम लिए बगैर उन  पर सार्वजनिक रूप से हस्तक्षेप के आरोप लगाए। उन्होंने तंज कसा, भैया अपने घर की चिंता करो, हमारे जैसीनगर पर मत बोलो।  

इस सार्वजनिक ठिठोली ने साफ कर दिया कि मध्यप्रदेश के इस राजनीतिक क्षेत्र में हर कोई खुद को राम कहता है, लेकिन अपने भीतर के रावण को जलाने की हिम्मत किसी में नहीं। 

नजर बाग पैलेस की मौन पीड़ा 

राजनीतिक धुएं से दूर, सागर के बीचो बीच खड़ा है नजर बाग पैलेस  एक वीरान, टूटी दीवारों वाला ऐतिहासिक महल, जिसके पत्थर आज भी चुपचाप इतिहास का भार ढो रहे हैं।  2 दिसंबर 1933 का वह दिन जब महात्मा गांधी दमोह से सागर आए थे, यहीं नजर बाग पैलेस में रुके थे। जिस पल उन्होंने यह स्थान चुना, पैलेस सागर के गर्व का प्रतीक बन गया। दीवारों पर बने भित्ति चित्र, झिलमिलाते कांच वाली खिड़कियां और सजीव गलियारों ने उस दौर में आज़ादी की खुशबू महसूस की थी। 

 लेकिन अब वही दीवारें दीमक और अंधेरे के कब्जे में हैं। जो खिड़कियां कभी रोशनी का स्वागत करती थीं, अब वहां से धूल झाँकती है। अफसरों की देखरेख खत्म होते ही पैलेस मानो भुला दिया गया। स्मार्ट सिटी मिशन ने सोचा कि सामने एक पार्क बना देने से इतिहास के घाव भर जाएँगे। कुछ समय लोग वहाँ आए, फोटो खिंचवाए, फिर सब शांत हो गया। आज पार्क की लाइट टूटी हैं, बाउंड्री ध्वस्त है और फव्वारे निष्क्रिय। 

पैलेस अब खुद से पूछता है क्या मैं गांधीजी की उपस्थिति की स्मृति के रूप में याद किया जाऊँगा, या केवल एक खंडहर के रूप में गूगल मैप  पर तलाशा जाऊँगा?  यह सवाल केवल एक इमारत का नहीं, बल्कि उस सोच का है जो विकास की भीड़ में धरोहरों की आत्मा भूल जाती है। 

देवरी का बापू मंदिर

इसी सागर जिले की देवरी नगर की एक गली में सुबह के साथ गूंजती है आवाज रघुपति राघव राजा राम…” 

लगभग एक सदी पुराना बापू मंदिर, जो कभी स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा गांधीजी की स्मृति में बनाया गया था, अब इस शहर की जीवित आत्मा बना है। वर्षों की उपेक्षा में मंदिर टूट चुका था, मूर्ति खंडित थी, और दीवारों से गिरती प्लास्टर की परतें सवाल पूछ रही थीं। 

2012 में राजू दीक्षित ने इस मंदिर को पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया। उन्होंने अपने जीवन की सारी आरामदायक संभावनाएँ छोड़ दींपरिवार, नौकरी, निजी सुख सब कुछ भुलाकर कहा, जब तक मैं हूँ, यह मंदिर और गांधीजी की याद जिंदा रहेगी।  वे रोज़ सवेरे गांव से निकलकर मंदिर तक आते हैं, सफाई करते हैं, दीपक जलाते हैं और गांधीजी के नाम का कीर्तन करते हैं। आसपास के बच्चे प्रभात फेरी निकालते हैं, और हर 2 अक्टूबर को यह पुराना मंदिर सजीव हो उठता है  जैसे इतिहास ने फिर से साँस ली हो। 

राजू दीक्षित का यह समर्पण बताता है कि भले राजनीति गांधी को मंच पर रखकर भाषण देते रहे, पर उनके विचार आज भी कुछ आम लोगों के जीवन में साँस ले रहे हैं। 

सागर  का द्वंद्व 

आज का सागर दो चेहरों वाला शहर है। एक तरफ नगर निगम में गुटबाजी और प्रोटोकॉल की राजनीति है, जहाँ कार्ड में नाम ऊपर-नीचे होने पर भी आहत अहंकार सिर उठाता है। दूसरी तरफ बापू मंदिर की वह शांति है, जहाँ कोई व्यक्ति बिना पद और प्रचार के सिर्फ मानवीय मूल्यों को बचाए रखने की लड़ाई लड़ रहा है। 

नजर बाग पैलेस की टूटी दीवारें सत्ता की उपेक्षा का प्रतीक हैं, और बापू का मंदिर नागरिक स्नेह का चिन्ह। दोनों के बीच में खड़ा सागर शहर एक नैतिक सवाल पूछता है  जब बाहर का रावण हर साल जलता है, तो भीतर के रावण कब जलेंगे?  

दशहरे की रात रावण का पुतला राख बन गया, लेकिन राजनीतिक अहंकार की आग नहीं बुझी। 

अब ऐसी ही राज कथा छतरपुर जिला में देखने को मिली जहां बीजेपी के पूर्व विधायक पुष्पेंद्र नाथ पाठक ने पूर्व प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा को जन्मदिन की व्यंग्यात्मक शुभकामना दी। उन्होंने अपने फेसबुक वॉल पर लिखा है कि

 जन्मदिन की शुभकामनाएं मान्यवर!

सच्ची मुस्कान वाली ये आखिरी तस्वीरें हैं आपके साथ श्रीमान विष्णु जी..

प्रदेशाध्यक्ष की घोषणा होने के बाद, खजुराहो से भोपाल जाने के लिए आपका नौगांव होकर निकलना हुआ... तब यह उल्लास और उमंग से स्वागत हुआ था, इसमें आपके निश्छल भाव और हम लोगों की खुशियां बही जा रही थीं..

हालांकि इसके बाद भी अपनी खूब मुलाकातें हुईं, मगर उनमें ये निश्छल मुस्कान नहीं उभर पाई..

क्योंकि..

हर मुलाकात में हमने छतरपुर जिले के संगठन की समस्याओं से आपको अवगत कराया और मात्र एक समाधान भी सुझाया...

लेकिन..

जैसे भारतीय इतिहास में, सनकी सुल्तान मोहम्मद बिन तुगलक ने चमड़े के सिक्के चलवा कर अपने को दर्ज किया...

वैसे ही अपने सुल्तान बनने पर यहां छतरपुर में चमड़े के सिक्के चलवा कर, आपने अपना नाम अमर कर लिया...

हालांकि इस पर, आपकी तरफ से, अपना 1to1 विचार विमर्श लंबित है..कोई 3 वर्षों से..

उम्मीद है अगले जन्मदिन के पूर्व हम आप त्रुटियों को ठीक करने की सहमति बनाने में सफल होंगे..

आपके सुखी, स्वस्थ, समृद्ध और यश-कीर्ति पूर्ण जीवन के लिए अनेकानेक शुभकामनाएं..हार्दिक बधाई...

बिन तुगलक बना कर बधाई देने का ये अंदाज सियासत में ही देखने को मिलता है।अगर इसी अंदाज के साथ उनके अध्यक्ष कार्यकाल में बधाई देने का साहस करते तो बात कुछ और होती।













विकास की उमंग और चुनौतियों के संघर्ष का बुंदेलखंड

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