राजेश बादल
बात 1985 के फ़रवरी महीने की है ।तारीख़ याद नहीं । मैं उन दिनों नई दुनिया में सह संपादक था ।छुट्टी लेकर छतरपुर आया था । इसी दौरान पता चला कि प्रधानमंत्री राजीव गांधी ज़िले के बिजावर में सभा को संबोधित करने आ रहे हैं । उन दिनों मोबाइल फ़ोन नहीं होते थे ।स्थानीय कॉल तो आसानी से लग जाते थे ,लेकिन दूसरे शहरों के लिए ट्रंक कॉल बुक करना पड़ता था ।यह बातचीत टेलीफ़ोन विभाग के ज़रिए होती थी ।मैंने इंदौर कॉल बुक किया और संपादक अभय छजलानी से की अनुमति ली कि मैं उस सभा को कवर करना चाहता हूं ।ज़ाहिर है अनुमति मिल गई ।
उन दिनों श्री जी एल सोनाने जनसंपर्क अधिकारी थे ।उनकी मदद से पास बनवाया और उन्हीं की गाड़ी से अपने फ़ोटोग्राफ़र वरिष्ठ मित्र ओम प्रकाश अग्रवाल (आर के के नाम से मशहूर ) को लेकर बिजावर जा पहुंचा । सभा कवर की । उन्होंने अपने भाषण में प्रदेशों में साफ़ सुथरी सरकारों पर ज़ोर दिया था ।वे सिद्धांतहीन और गंदी सियासत के घनघोर विरोधी थे ।
सभा के बाद हम सरकारी विश्राम गृह भागे ।वहां वे तनिक देर रुकने वाले थे । मैं अख़बार के लिए साक्षात्कार लेना चाहता था । विश्राम गृह में खानसामे से लेकर कलेक्टर तक सब अच्छी तरह मुझे जानते थे इसलिए एक पर्ची वी आई पी कक्ष क्रमांक एक तक भेजने में कोई मुश्किल नहीं आई ।मैंने चाय की ट्रे ले जा रहे रसोइए की ट्रे में अपने नाम की पर्ची अनुरोध के साथ लिखकर रख दी । बाक़ी का काम श्री सोनाने ने आसान कर दिया । पर्ची देखकर राजीव जी ने कलेक्टर से मेरे बारे में पूछा । उन्होंने सकारात्मक टिप्पणी दी ।फिर भी कहा कि एक बार जन संपर्क अधिकारी से भी पूछ लें ।इसके बाद श्री सोनाने को तलब किया गया । यह उनकी मेहरबानी है कि उन्होंने भी मेरे बारे में अच्छी टिप्पणी कर दी ।उन्होंने प्रधानमंत्री को यह भी बताया कि श्रीमती इंदिरा गांधी शहादत से एक सप्ताह पहले मध्यप्रदेश के भीकनगांव आईं थीं और उस यात्रा का कवरेज़ भी इन्हीं पत्रकार ने किया था ।उन्होंने इंदिरा जी के दो और साक्षात्कारों का हवाला दिया ,जो मैंने किए थे ।इतना सुनते ही राजीव गांधी ने मुझे अंदर बुलाया और बड़े सम्मान से छोटा सा साक्षात्कार दिया ।पैंतीस बरस पहले मेरे लिए यह बहुत बड़ी बात थी । मैंने उन्हें बताया कि इंदिरा जी की करीब आधा दर्जन सभाओं को मैं कवर कर चुका था और तीन या चार बार उन्होंने मुझे संक्षिप्त साक्षात्कार दिए थे । इस पहले साक्षात्कार में उन्होंने राजनीति में मूल्यों और शुचिता की बात कही थी, दल बदल की प्रवृति का विरोध किया था और छोटे राज्यों के गठन पर ज़ोर दिया था ।उनका मानना था कि इससे विकास तेज़ होता है । प्रतिपक्ष में वे अटल बिहारी वाजपेई के प्रशंसक थे । इस सूचना से कि मैं उनकी मां की मध्यप्रदेश की आख़िरी यात्रा को कवर कर चुका हूं, प्रधानमंत्री राजीव गांधी के चेहरे पर मैं संतोष का भाव पढ़ सकता था ।
साक्षात्कार पूरा होते ही मैं और श्री सोनाने छतरपुर भागे । यह दोपहर की बात थी । छतरपुर से भोपाल कार्यालय के विशेष प्रतिनिधि श्री उमेश त्रिवेदी को ट्रंक कॉल लगाया ।उन्होंने उदारता पूर्वक फ़ोन पर पूरी खबर लिखी और कहा कि जल्द से जल्द फोटो कैसे मिल सकते हैं । मैंने कहा ,छुट्टी रद्द करके कैमरे की रील लेकर मैं ही भोपाल आ जाता हूं । लेकिन भोपाल कार्यालय में डार्क रूम नहीं था । भोपाल से इंदौर के बीच उन्हीं दिनों फोटो फेसीमाइल मशीन लगी थी । वह हमारे लिए एक चमत्कार से कम नहीं थी ।फैक्स तो उन दिनों नहीं था ।जब भी भोपाल से कोई फोटो आता ,इसी मशीन में लगा देते । इधर से फोटो लगाते,उधर इंदौर में प्रिंट निकलने लगता था । हमें किसी भी सूरत में 9.30 बजे तक फोटो भोपाल भेज देना था । यह तभी संभव था जब हम हर हाल में एक बजे छतरपुर से निकल जाते तब कहीं बिना रुके रात नौ बजे भोपाल पहुंचते । हम इस उधेड़बुन में थे कि फोटो की रील कैसे धुलेगी ।श्री कमलेश जैमिनी के स्टूडियो में धुलती तो देर हो जाती । क्या करें ?
अचानक हमारे छायाकार ओमप्रकाश अग्रवाल हाथ में फोटो लिए प्रकट हो गए । हम तो दंग थे । ओम प्रकाश जी याने आर के ने कहा कि बिजावर से छतरपुर जीप में बैठे बैठे मैंने आपकी बातें सुन ली थीं ।इसलिए जब आप उमेश जी को खबर लिखा रहे थे तो मैं सीधा अपने डार्क रूम में घुस गया था और इस तरह प्रिंट मेरे सामने थे ।मैंने गले लगकर आर के का एहसान जताया और हमारी जीप सीधे भोपाल दौड़ पड़ी । कुछ समोसे,भजिए और बर्फी पैक करा ली थी क्योंकि रास्ते में रुकना नहीं था । हमारे ड्राइवर साब बड़े सहयोगी थे ।उनके कारण ही हम ठीक साढ़े आठ बजे भोपाल की प्रोफेसर कॉलोनी में नईदुनिया कार्यालय में थे । नौ बजते बजते हम अपना समाचार और फ़ोटो इंदौर पहुंचा चुके थे ।

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