रवींद्र व्यास
छतरपुर / जिले के किसानो के साथ वन विभाग द्वारा किये गए अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध स्वतंत्रता दिवस के दिन एक जन शंखनाद गुंजायमान हुआ | लोगों ने आजादी के बाद से जारी इस अन्याय और अत्याचार के खिलाफ व्यापक जन आंदोलन की हुंकार भरी | जिले के लाखों किसानों के साथ हो रहे इस अन्याय की आवाज भी छतरपुर जिले के किसी जन प्रतिनधि ने नहीं उठाई | रीवा राजदरबार से लेकर आजाद भारत की सरकार द्वारा दिए गए आदेशों और नियमों की विस्तृत जानकारी देकर बैतूल के अधिवक्ता अनिल गर्ग ने छतरपुर वन विभाग द्वारा किये जा रहे इस अन्याय के प्रति लोगों को जागरूक किया |
आजादी के दिन नगर की कल्याण धर्मशाला में ऐसे अनेकों किसान जुटे जो जिले के वन विभाग के आतंक से त्रस्त हैं | वन विभाग से पीड़ित किसानो को उनके वास्तविक अधिकार दिलाये जाने हेतु रूप रेखा तैयार की गई | शाम को अनिल गर्ग ने पत्रकारों को जानकारी देते हुए बताया की छतरपुर जिले में जब हमने यह देखा की यहाँ के किसानो के साथ ऐतिहासिक अन्याय वन विभाग द्वारा आजादी के बाद से ही किया जा रहा है | में यहां के लोगों के इस धैर्य के लिए बारम्बार नमन करता हूँ | 8 फरवरी 1937 के रीवा राजदरबार के आदेश को मानकार वन विभाग ने 1950 में उन सारी जमीनों पर अपना कब्ज़ा बता दिया जिन पर किसान पीढ़ियों से खेती करता चला आ रहा था। इसके अलावा , निस्तार की भूमि ,चरोखर भूमि , और शमशान भूमि पर वन विभाग ने अपना दावा कर दिया | इन जमीनों पर वन विभाग ने ना सिर्फ अपना दवा जताया बल्कि अपने कब्जे में भी ले लिया |
गर्ग ने बताया की वन विभाग ने 70 सालों में अधिसूचित भूमियों की भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा 4से 19 तक की जांच अब तक पूर्ण नहीं की | इसी तरह धारा 34 आ के अनुसार 9 लाख एकड़ अधिसूचित भूमियों के ड़ी नोटिफिकेशन की प्रविष्टि दर्ज किये जाने की प्रक्रिया आज तक निर्धारित नहीं की |
छतरपुर जिले की लगभग 9 लाख एकड़ जमीन वन विभाग अपनी जमींन बता रहा है | 2004 से 2015 के बीच वन व्यवस्थापन के तहत 9 महत्व पूर्ण आदेश जारी हुए | छतरपुर जिले का वन विभाग किसी भी आदेश का पालन नहीं कर रहा है |
26 जनवरी 1950 को देश का संविधान लागू हुआ , कई कानून ,संसद और विधान सभा द्वारा बनाये गए, इनमे कई संसोधन भी किये गए किन्तु पिछले 70 वर्षों से वन विभाग और राजस्व विभाग द्वारा इनकी निरंतर उपेक्षा की जा रही है , जो एक तरह से कानून का अपमान और अवमानना का भी मामला है | 29 मई 2019 को मध्य प्रदेश सरकार ने इस तरह के विवादों को निपटाने के लिए टास्क फ़ोर्स कमेटी का गठन भी किया था | कमेटी ने 15 फरवरी 2020 को अपनी रिपोर्ट शासन को सौंपी थी | पर टास्क फ़ोर्स कमेटी के सुझाव भी नहीं माने गए | अन्याय का असर :
छतरपुर जिले के किसानो के साथ किये गए इस अन्याय का असर ये हुआ की सैकड़ों लोग मालिक से मजदूर बन गए | जिस 9 लाख हेक्टेयर में खेती कर किसान अपने परिवार और देश की प्रगति में सहायक हो सकता था वह वन विभाग से संघर्ष में जुटा रहा | वन विभाग के अन्याय और अत्याचार की कहानी सिर्फ यही समाप्त नहीं हुई , उसने अपनी जमीन पर खेती करने वालों के ट्रैक्टर वगैरह जप्त किये | एक मामला तो ऐसा भी आया जिसमे जप्त टेक्टर की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची और फैसला किसान के हक में हुआ , विभाग को जप्त टेक्टर लौटाना पड़ा | इससे नाराज विभाग ने उसका दूसरा टेक्टर जप्त कर लिया और तभी छोड़ा जब 50 हजार की वसूली कर ली | इस तरह की अनेकों कहानिया अब खुल कर सामने आ रही हैं | बिजावर और किशनगढ़ इलाके में कुछ ऐसे भी मामले सामने आये की वन भूमि में विभाग की मिली भगत से खेती की जा रही है |
अन्याय के विरुद्ध आवाज :
वन विभाग द्वारा किये जा रहे अन्याय के विरुद्ध अब लोग सामूहिक तोर पर जन आंदोलन और न्याययालय का रास्ता अपनाने को मजबूर हो रहे हैं ।|
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