31 दिसंबर, 2019

बाघों से आबाद होता बुंदेलखंड

 बुंदेलखंड की डायरी 
बाघों से आबाद होता बुंदेलखंड
रवीन्द्र व्यास 

बुन्देलखण्ड के पन्ना टाईगर रिजर्व में    बाघ पुन:स्थापना के एक दशक का सात दिवसीय आयोजन समारोह पूर्वक मनाया गया । यह समारोह  वन विभागजैव-विविधता बोर्ड और डब्ल्यू.डब्ल्यू.एफ. इण्डिया द्वारा 20 से 26 दिसम्बर तक आयोजित किया गया था । एक दशक पहले पन्ना टाईगर रिजर्व बाघ विहीन हो गया था । दुनिया में बाघ पुनःस्थापना का अनोखा प्रयोग हुआ और सफल रहा है ।अब अनेकों देश के वन्यजीव विशेषज्ञ इसको जानने और समझने पन्ना आने लगे हैं ।



                                       1981 में पन्ना नेशनल पार्क को ५४२. ६७ वर्ग किमी में स्थापित किया गया था भारत के जैव विविधिता वाले  पार्को में  इसको सर्वश्रेष्ठ माना गया था |  केन नदी के दोनों और स्थित इस राष्ट्रीय उद्यान को १९९४ में  टाइगर रिजर्व के रूप में मान्यता मिली महज १५ वर्ष में यह टाइगर रिजर्व बाघ विहीन हो गया था इसके पीछे के कई कारण बताये गए थे  एक बड़ा यह बताया गया कि  स्थानीय पारधी समुदाय द्वारा शिकार करना अवैध शिकार के उस दौर में कई मामले भी सामने आये थे दूसरा बड़ा कारण चित्रकूट के जंगलों के डकैत ठोकिया का ठिकाना पन्ना टइगर रिजर्व का बनना ठोकिया गिरोह की टाइगर रिजर्व में मौजूदगी के चलते बाघ संरक्षण में लगे अधिकारी और कर्मचारी पार्क के अंदर जाने से कतराने लगे थे ,जिसका फायदा शिकारियों ने जम कर उठाया मजे की बात यह है कि पन्ना टाइगर रिजर्व २००२_२००३ में  ही टाइगर विहीन हो गया था ,पर उस समय के पार्क संचालक ने एक राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल में खबर चलवाई थी कि पन्ना टाइगर रिजर्व में ३०-३५ बाघ हैं बाद में २००८_२००९ में  पन्ना टाइगर रिजर्व में  आर. श्रीनिवास मूर्ति  को पदस्थ  किया गया 
                         आर श्रीनिवास मूर्ति के सामने  पन्ना टाइगर रिजर्व के संचालक के रूप में अनेकों चुनौतियां थी पार्क कर्मचारियों के बीच समन्वय और सहयोग का अभाव था पार्क के अन्दर शिकार में माहिर पारदी जनजाति की मौजूदगी उन्हें चिंतित किये थी ऐसी विषम परिस्थियों में उनके काँधे पर पन्ना में फिर से बाघ आबाद करने की चुनौती थी श्रीनिवास मूर्ति ने जब बाघ पुनर्स्थापना का प्रस्ताव सरकार को भेजा तो वाइल्ड लाइफ के कई जानकारों को इसकी सफलता पर संदेह था मार्च- 2009 में बाँधवगढ़ और कान्हा टाइगर रिजर्व से 2 बाघिन को पन्ना लाया गया। इन्हें टी-1 और टी-2 नाम दिया गया। बाघ विहीन पन्ना टाइगर रिजर्व में सिर्फ बाघिन लाये जाने पर अनेकों सवाल खड़े हुए बाघिनों के आगमन के गवाह बने पत्रकार साथी और वन्य प्राणी विशेषज्ञ यह कहने से नहीं चूके कि  बिना बाघ के ये बाघिन कैसे बाघों को जन्म देंगी हालांकि पार्क प्रबंधन को यह जानकारी थी एक बाघ अब भी पार्क में है बाद में जब पता चला कि वह बाघ भी पार्क छोड़ कर जा चुका है तब पेंच टाइगर रिजर्व से ६ नवम्बर २००९ को नर  बाघ लाया गयाजिसको  टी-3(पन्ना ) नाम दिया गया नाम तो जरूर पन्ना मिला पर  इस बाघ का पन्ना टाइगर रिजर्व में मन नहीं लगा और वह दस दिन में ही पार्क छोड़ कर दक्षिण दिशा की ओर स्थित पेंच टाइगर रिजर्व की ओर  चल पड़ा। इस दौरान पार्क प्रबंधन उस पर सतत निगाह बनाये रहे 25 दिसम्बर 2009 को  इसे दमोह जिले के तेजगढ़ के जंगलों में  बेहोश कर पन्ना वापस लाया गया  
दूसरी बार फिर टी-३ बाघ पार्क से भाग ना जाए इसके लिए पार्क के कर्मचारियों ने देशी नुस्खा अपनाया  था |   पार्क प्रबंधन ने जानवरों के स्वाभाविक गुण की तरफ ध्यान दिया इसमें पाया गया की जानवर विपरीत लिंगी के मूत्र को उसकी तलाश में एक बड़ा आधार मानते हैं इस बात को ध्यान में रख कर  बाघिन का मूत्र बाघ की  उपस्थिति वाले  क्षेत्र से बाघिन के पास तक   छिड़कवाया गया | पार्क प्रबंधन की यह उक्ति कारगर रही और  टी-बाघ टी-1  बाघिन तक जा पहुंचा  |दो तीन दिन बाद दोनों को साथ घूमता देख पार्क प्रबंधन को राहत की सांस मिली |  
                          
पन्ना के टाइगर रिजर्व में बाघ पुनः स्थापना के एक दशक और  पन्ना टी-3 वॉक का समारोह 20 से 26 दिसंबर तक मनाया गया । इस समारोह  में देशभर के 50 से अधिक वन्य-प्राणी विशेषज्ञ और बाघ प्रेमियों ने हिस्सा लिया। असल में  टी _,बाघ के कारण ही आज पन्ना टाईगर रिजर्व में  में  बाघों का कुनबा बडा  हैंआज इनकी संख्या 55 बताई जा रही है ।   ये अलग बात है कि एक बाघ के लिए 50 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्रफल आवश्यक माना जाता है । इस हिसाब से 55 बाघों के लिए 2750 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र की जरूरत हैजबकि पन्ना टाईगर रिजर्व का क्षेत्रफल 542 वर्ग किलोमीटर ही है । अब इतने बाघों को सँभालने की बड़ी जिम्मेदारी पार्क प्रबंधन के कन्धों पर है 

बाघ दुनिया में सर्वाधिक  संकटग्रस्त प्राणी माना जाता है दुनिया भर में इनकी  संख्या लगभग ६ हजार के लगभग मानी जाती है ,अकेले भारत में ही  ३ हजार के लगभग बाघ पाए जाते हैं जिनमे सर्वाधिक मध्य प्रदेश में पाए जाते हैं बाघ की आठ  प्रजातियों में से तीन अब  विलुप्त हो चुकी हैं। भारत में  रायल बंगाल टाइगर उत्‍तर पूर्वी क्षेत्रों को छोड़कर देश भर में पाया जाता है |  पड़ोसी देश नेपाल, भूटान और  बांग्लादेश में भी  बाघ की ये प्रजाति पाई जाती है । आज  विश्व भर  में बाघों की संख्या लगातार  कम होती  जा रही है एक समय ऐसा भी आया था जब मध्य प्रदेश से टाइगर स्टेट का दर्जा भी छिन गया था  ऐसे समय में  पन्ना में बाघ पुन: स्थापना कर और उनका कुनबा बड़ा कर टाइगर स्टेट का गौरव वापस दिला कर एक महत्व पूर्ण उपलब्धि हासिल की है 
 दरअसल बाघ और बुंदेलखंड का सदियों पुराना नाता है इस बात के गवाह बुंदेलखंड के राजा महराजाओं के महलों में लगे शिकार करते चित्र हैं जो बताते हैं कि बुंदेलखंड के जंगल बाघों के प्राकृतिक और पसंदीदा  आवास थे इसके पीछे उनके भोजन के लिए जीवों की पर्याप्त संख्या  और प्राकृतिक जल श्रोतों की संख्या महत्वपूर्ण कारक थी समय के जंगल सिमट गए लालसा ने देश के राष्ट्रीय पशु बाघ को अपने ही घर से बेघर कर दिया था | पन्ना टाइगर रिजर्व में  बाघ पुनर्स्थापना के चलते कहा जा सकता है कि  बुंदेलखंड अब फिर से बाघों से आबाद हो रहा है | बाघों को फिर से बुंदेलखंड में आबाद करने में तत्कालीन फील्ड डायरेक्टर आर श्रीनिवास मूर्ति के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता |      

15 दिसंबर, 2019

पानी की पहरेदारी करती सेना

बुंदेलखंड की डायरी 
पानी की पहरेदारी करती सेना 




रवीन्द्र व्यास
   मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में पानी की सुरक्षा के लिए अबतक पुलिस ही पहरेदारी करती थी अब हालात ऐसे हो गए हैं कि  सेना के जवान पहरेदारी कर रहे हैं हाल ही में सागर जिले के चितोरा एनीकट बाँध  का पानी गाँव वाले चुरा ना लें इसलिए सेना के जवान पहरेदारी कर रहे हैं |यह हाल तब हैं जब कि सागर जिले में औसत से  593 मिमी अधिक वर्षा हुई है औसत से ज्यादा पानी बरसने  के कारण  बुवाई का रकबा  तीन लाख से बढ़कर 3.5 लाख हेक्टेयर होगया । पर पानी पर पहरा लगा है |   बुंदेलखंड अंचल में पानी को लेकर अब तक लोगों को पुलिस का ही पहरा देखने को मिलता था २०१६ से टीकमगढ़ नगर प्यास बुझाने वाली जामुनी नदी पर गर्मियों के दिनों में सुरक्षा गार्ड लगाए जाते हैं ,इसी साल मई महीने में बांदा में केन नदी के पानी की सुरक्षा के लिए पुलिस जवान तैनात किये गए थे|   
 सागर छावनी के लगभग हजार सेना के जवानो के लिए पानी की व्यवस्था हेतु चितौरा में बेबस नदी पर एक एनीकट बाँध बनाया गया थाइस एनीकट में राजघाट बाँध के ओवर फ्लो  का पानी भी आकर मिलता है  | इसके लिए 1995 में नगर निगम सागर और सैन्य अधिकारियों के बीच एक अनुबंध 2045 तक के लिए हुआ था सेना को रोजाना 16 लाख गैलन पानी लगता है ,जिसकी आपूर्ति इसी एनीकट बाँध से होती है |      सेना के जवान और छावनी से लगे हुए  12 गांवों के लोग  चितौरा स्टॉप डेम के जल से अपनी प्यास बुझाते हैं |बीती गर्मियों में पानी की समस्या का सामना  कर चुकी सैन्य छावनी दिसम्बर महीने से ही सतर्क हो गई और उसने इसकी पहरेदारी शुरू कर दी |  दर्जन भर  सेना के जवानों को स्टॉपडैम की सुरक्षा के लिए तैनात किया गया है।

गाँव वाले ये देख कर हैरान है कि  सेना के लोग स्टॉप डेम और उसके  आसपास के इलाकों में  गश्त के लिए तैनात किया गया  हैं सेना के ये जवान  गाँव वालों को  पानी लेने से रोकते हैं,|   सेना के जवानो पर गाँव वालों ने  पानी के  पंप और पानी के पाइप जब्त करने के भी आरोप लगाए  हैं।  गांव के किसान इस  डेम केपानी से अपनी फसलों की सिंचाई की मांग कर रहे हैं |    इस साल सेना की  सख्ती के कारणकिसान डेम के आस पास के नालों का पानी भी नहीं ले पा रहा है 
   1995 में सागर नगरनिगम  सेना  की जल समस्या के समाधान के लिए चितौरा  डेम को सेना को सौंप दिया था बीती गर्मियों में सेना को पानी के लिए खासी समस्या का सामना करना पड़ा था संभवतः इस समस्या ने निजात पाने के लिए सेना के अधिकारियों ने अभी से पानी पर पहरेदारी शुरू करा दी है  | सागर नगर निगम के अधिकारी भी मानते हैं कि  सेना को चितोरा स्टॉप डैम से पानी लेने की अनुमति दी है,| विवाद बढ़ता देख  अब वे कहते हैं  कि  ग्रामीणों को नहरों और बांध से पानी लेने से नहीं रोकना चाहिए |
दूसरी तरफ   गाँव के किसान कहते हैं कि हमारे जीवन का केवल एक ही मुख्य सहारा है खेती अब पानी नहीं मिलेगा तो हम क्या करेंगे इस बाँध से सुल्तानपुर,अगराचितहरी ,बेरखेरी,गोसरा,सल्लया सहित 12 गाँवों की 14 -15 सौ हेक्टेयर फसल प्रभावित होती है किसान यदि बाँध और इसमें मिलने वाले नालों के पानी का उपयोग करने का प्रयास करता है तो उसके पम्प और पाइप जप्त कर लिए जाते हैं ,मारपीट करते हैं | 
          इस मामले को लेकर सियासत भी तेज हो गई है भाजपा विधायक प्रदीप लारिया कहते हैं कि  यदि सेना दावा कर रही है कि यह उनका पानी हैतो किसानों कीसिंचाई के लिए प्रशासन ने क्या व्यवस्था की है |  टकराव को रोकने के लिए प्रशासन को पहल करना चाहिए              
   इस मामले में सैन्य अधिकारी मानते हैं की पानी के लिए पेट्रोलिंग कोई पहली बार नहीं हो रही है कई सालों से पेट्रोलिंग स्थानीय प्रशासन की जानकारी में होती आ रही है मई जून में पानी की समस्या ना हो इसलिए १०-१२ जवानो को पेट्रोलिंग पर लगाया गया है पिछले एक माह के दौरान सेना ने चार पम्प जप्त करने और दूसरे दिन लौटाने की बात सेना के अधिकारी कहते हैं जब की किसान आरोप लगाते हैं की उनके १०-१५ पम्प जप्त कर लिए हैं |                
दरअसल बुंदेलखंड के मध्य प्रदेश इलाके की अधिकांश भूमि लाल दुर्मुट किस्म की है जो पानी ज्यादा चाहती है ऐसे हालात में किसानो को पानी की जरुरत ज्यादा होती है अब वह पानी सिचाई के लिए है अथवा पीने के पानी के लिए इससे उसे सरोकार नहीं रहता ,और यही विवाद का बड़ा कारण बनता है | 2016 में टीकमगढ़ नगर की पेयजल समस्या के निदान के लिए जामुनी नदी पर बने एनीकट पर सुरक्षा दल नगर पालिका को तैनात करना पड़ा था यहां दोहरी समस्या थी ,नदी उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले से आती थी ,और पानी चोरी करने वाले भी अधिकाँश किसान उत्तर प्रदेश के ही होते थे इसी साल मई जून में  बुंदेलखड के बांदा में केन नदी पर बांदा प्रशासन को पुलिस बल तैनात करना पड़ा असल में नगर के पेयजल सप्लाई के लिए बनाये गए सम्प वेळ तक पहुँचने वाला पानी खनिज माफियाओं और किसानो के कारण पहुँच ही नहीं पा रहा था |   
                                  असल में      मध्यप्रदेश में गहराते जल संकट से कानून-व्यवस्था बिगडऩे की संभावना के बीच राज्य सरकार ने एडवायजरी जारी की है। इसके तहत भयंकर जलसंकट वाले क्षेत्रों में पानी के स्रोतों पर पुलिस का पहरा रहेगा। शहरी क्षेत्रों में पुलिस की निगरानी में टेंकरों से पानी का वितरण कराया जाएगा। इस संबंध में सभी कलेक्टर एवं पुलिस अधीक्षकों को पानी की व्यवस्था पर बल लगाए जाने के निर्देश दिए गए हैं।
अप्रैल से जून के बीच पानी को लेकर प्रदेश में अपराधिक मामले सामने आते हैं। इन्हीं घटनाओं को देखते हुए गृह विभाग की ओर से जल आपूर्ति वाले विभाग एवं पुलिस को एडवायजरी जारी की गई हैजिसमें पुलिस को जल संकट वाले क्षेत्रों में विशेष निगरानी बरतने को कहा गया है।            
अतीत में   बुन्देलखण्ड में जल के महत्व को यहां के राज तंत्र ने बड़ी ही अच्छी तरह से समझ लिया था |  जल संचय एवं जल दोहन की ऐसी वैज्ञानिक विधी बनाई गई थी कि  तालाबकुएँबावड़ियाँ और खेतों के निचले हिस्से में  बंधियाओं तक  का निर्माण कर जल संचय किया जाता था । अब विकाश की दौड़ में  बुंदेलखंड में जल को लेकर जद्दोजहद एक स्थाई नियति बनती जा रही है इसमें प्रशासन और आम आदमी की बेरुखी भविष्य के खतरे की तरफ साफ़ संकेत दे रही है फिर भी प्यास लगने पर कुआँ खोदने की कहावत चरितार्थ करने में सब जुटे हैं |       

09 दिसंबर, 2019

बरसाती नदी में बदलती केन नदी

बुंदेलखंड की डायरी 
 बरसाती नदी में बदल रही केन नदी 

रवीन्द्र व्यास 

रंग ,गंध,स्वाद हीन जल ही निर्मलता की वह कसौटी ही जिसकी चाहत हर व्यक्ति को रहती है  | ये जल ही जो मानव  सभ्यताओं के विकाश में अपना योगदान देता है जल विहीन क्षेत्र में  जीव  के अस्तित्व की कल्पना नहीं की जा सकती है सरोवर के तट और कल कल बहती सदा नीरा नदी की धार मन को शान्ति ही नहीं एक नई ऊर्जा भी प्रदान करती है |  बुंदेलखंड की  केन नदी सरकार के कागजो में अब भी सदा नीरा है यह नदी  एशिया की उन नदियों में शुमार है जो  गैर  प्रदूषित  मानी जाती है |   बुंदेलखंड के पन्ना,छतरपुर और बांदा जिले  की जीवन दायनी  केन नदी का अपना एक अलग इतिहास और पौराणिक महत्व हैइसके उद्गम स्थल से लेकर इसके तटवर्ती  इलाकों में    धर्म और अध्यात्म की  जहाँ  अविरल धारा प्रवाहित होती रहती   है ,वही  इसके तटों पर बिखरी पुरातात्विक  संरचनाये अपने अतीत की कहानी खुद बयां करती हैं |

                                                        
  विंध्य पर्वत श्रंखलाओं से बहने वाली केन नदी का उद्गम कटनी जिले की रीठी  तहसील के समीप अहिरगुवां  और ममार गाँव के मध्य  कैमूर की पहाड़ियों  जंगलो  के  एक खेत की मेड से माना जाता  है केन नदी  के उद्गम स्थल पर  बिखरी पड़ी पुरातात्विक धरोहर  इसकी अतीत की भव्यता के  स्वयं प्रमाण हैं दरअसल इसके केन नाम को लेकर भी कई तरह की किवदंतियां हैं , | लोग मानते हैं कि इसका प्राचीनतम नाम कर्णावती था कर्णावती क्यों था इसके पीछे भी एक अलग कथा है कहते हैं कि नदी किनारे एक प्रेमी युगल  पूर्णिमा की रात मिला करते थे   | समाज के कुछ लोगों को यह अच्छा नहीं लगा और उन्होंने युवक की ह्त्या कर वही एक खेत की मेढ़ में उसे दफ़न कर दिया इस घटना से व्याकुल युवक की प्रेयसी कर्णावती   ने भगवान से प्रार्थना कर प्रेमी  को देखने की इक्षा व्यक्त की  थी उसकी प्रार्थना पर हुई  जबरदस्त  बारिश के बाद खेत की  उस मेढ़  से मिट्टी बह गई और  युवक का शव  दिखने लगा प्रेमी का शव देखते ही  युवती ने अपने प्राण त्याग दिये जिस जगह युवक का शव था वहां  से एक जल धारा फूटने लगी थी  जिसने नदी का रूप ले लिया |  नदी का नाम कर्णवती फिर कन्या और  कन्या का अपभ्रंश किनिया,कयन और फिर केन हो गया।


 पहाड़ो को चीरकर प्रवाहित होती केन नदी 
                   केन के यह प्रबल वेग का ही प्रताप है कि यह अपनी राह में आने वाले सात पहाड़ो को चीरकर निरंतर प्रवाहित होती है हालांकि उद्गम स्थल से कुछ दूरी पर ऐसा लगता है जैसे यह छोटी छोटी पहाड़ियों में विलीन हो गई हो पर आगे यह फिर निरन्तर बढ़ती दिखती है |  नदी की विशालता तब और बाद जाती है जब इसमें छोटी  बड़ी २३ नदियाँ समाहित हो जाती हैं स्थानीय लोग इसे गंगा की तरह पूजते हैं इसके उद्गम स्थल और पहाड़ो के  बीच दरारों को लेकर भी कई तरह की किवदंतियां हैं लोग मानते हैं की इन दरारों की गहराई का अबतक पता नहीं चल सका है इन्ही दराररो में अंतिम क्रिया कर्म के बाद अस्थियां और राख विसर्जन का कार्य भी ग्राम वासी करते हैं ऐसे लोगों की मान्यता है कि पहाड़ों के बीच बहती नदी में से वह गंगा में पहुँच जाती है एक और किवदंती यह भी है की मुग़ल शासको ने जब इस इलाके में कत्ले आम मचाया था लोगों को मारकर इन्ही दरारों में फेंका था |  
 बुंदेलखंड जीवन रेखा है केन  
                                                    समुद्र तल से 550 मीटर ऊंचाई से बहने वाली केन नदी  बेसिन का कुल जलग्रहण क्षेत्र 28058 है
वर्ग किमीजिसमें से 24472 वर्ग किमी मध्य प्रदेश और शेष में स्थित है 3586 वर्ग किमी उत्तर प्रदेश में है ।४२७ किमी का सफर तय कर  उत्तरप्रदेश के बांदा जिले के चिल्ला घाट  में यमुना नदी में समाहित हो जाती है केन नदी | अपने इस सफर के दौरान केन नदी मानव सभ्यताओं के विकाश की कहानी लिखती है थलचर और जलचर जीवों के जीवन का आधार बनी केन नदी में जैव विविधिता की दृष्टि से सबसे समृद्ध नदियों में से एक मानी जाती है नदी में 12 से 20 प्रकार की मछलियों की प्रजाति ,दुर्लभ होते जा रहे कछुआ और  घड़ियालो को  आश्रय मिलता है नदी के तटों पर आधा सैकड़ा से ज्यादा वृक्षों की प्रजातियां देखने को मिलती हैं नदी के तटवर्ती इलाकों में लगभग सौ प्रजातियों के पक्षियों का कलरव अब सिमटता जा रहा है केन में पाई जाने वाली महाशिरा नामक मछली भी अब दुर्लभ होती जा रही है |

 मनव जीवन ,दुर्लभ वन्य जीवों के जीवन का आधार बनी केन नदी सिर्फ जीवो के जीवन में ही रंग नहीं भरती बल्कि वह पाषाण को भी जीवंत बना देती है केन नदी के पण्डवन और रनेह फाल जैसे झरने देखने हजारों  की संख्या में सैलानी पहुँचते हैं |  इस नदी में पाया जाने वाला शजर पत्थर अपनी अनोखी विशेषताओं के कारण दुनिया भर में मशहूर है । शजर पत्थर पन्ना जिले के अजयगढ़ से लेकर उत्तर प्रदेश में बांदा के कनवारा गांव तक केन नदी में  पाया जाता है।  शजर पत्थर को  तराशने पर उस पर झाड़ियोंपेड़-पौधोंपशु-पक्षियोंमानव आदि के विभिन्न तरह की  चित्रकारी नजर आती  हैं।  दुनिया भर में सिर्फ केन नदी में ही  इस तरह का पत्थर  पाया जाता है । पत्थर में पाईं जाने वाली इस प्राकृतिक चित्रकारी को ईरान सहित दुनिया के कई देशों में खूब पसंद किया जाता है । केन का यह एक एक पत्थर भी अनेकों  लोगों के जीवन का एक बडा आधार है ।
  केन की सहायक नदियां 
केन नदी के उदगम से लेकर यमुना नदी में मिलने तक मिढ़ासनव्यारमा,,सोनारश्यामरी  ,केल बन्ने ,उर्मिल कुटनेचंद्रावल  आदि सहित  23 छोटी बढी नदियां मिलती हैं । गंगा बेसिन की इस नदी और इसकी सहायक नदियों पर बने बांधो ने केन नदी की अविरल धारा को प्रभावित किया है । अकेले केन नदी पर गंगऊ और बरियारपुर बांध ने नदी जल के प्रवाह को बाधित किया हो एसा नहीं हैइसकी सहायक नदियों पर बने बांधो ने भी  केन नदी में जल की आवक पर विराम लगा दिया है ।  
            2017 -2018 में साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डेम्स रिवर्स एन्ड पीयूपिल(सैन्डरप )  के सदस्यों ने ३३ दिनों तक केन नदी के किनारे किनारे पदयात्रा  की थी |   सैन्डरप ने यात्रा के बाद अपनी रिपोर्ट में केन की दशा को लेकर गंभीर चिंता जताई थी |  उन्होंने माना था की केन बुंदेलखंड की जीवन रेखा है जिसके सहारे हजारों लोगों का जीवन बनता है ,  केन का अपना एक समृद्ध इतिहास है जैव विविधिता के लिए अपना विशेष स्थान रखने वाली केन नदी की जैव विविधिता संकट में बताई थी ,  केन नदी में  जो कभी अविरल प्रवाहित होती थी अब धीरे धीरे बरसाती नदी में बदल रही है ,  इसके अत्याधिक भूजल दोहन से आस पास के इलाकों में भू जल स्तर में कमी आई है परम्परागत जल श्रोत सूखते जा रहे हैं |  प्रदूषण मुक्त रहने वाली इस नदी में प्रदूषण  भी धीरे धीरे बढ़ने लगा है नदी में गंदे नाले मिलाये जा रहे हैं केन और सहायक नदियों पर निर्मित और निर्माणाधीन योजनाएं और परियोजनाएं केन नदी को प्रभावित कर रही हैं अत्याधिक रेत के उत्खनन से केन नदी का अस्तित्व ही संकट में आ गया है |  इस नदी पर बनने वाली केन बेतवा नदी जोड़ो योजना पर भी सवालिया निशान लगाए गए |  
     दरअसल विकाश की अंधी दौड़ में हम इतनी तेजी से  दौड़ लगा रहें कि  हमें इस बात की परवाह ही नहीं है कि आने वाली पीढ़ी को हम कैसा  देश सौंपेंगे | धन सबसे बड़ा धर्म बन चुका है , जंगल की जगह कंक्रीट के जंगल उगा रहे हैं ,| शायद  अब सोचने लगे हैं कि  ऑक्सीजन के सिलेंडर तो मिल ही जाएंगे , पानी की जगह  एच २ ओ से काम चल जाएगा , नहाने की जगह खुसबूदार स्प्रे डाल  लेंगे ,टॉयलेट पेपर तो बाजार में मिलने ही लगा है | इस लिए नदियों ,तालाबों से जो कुछ कमा सको जल्दी कमा लो | 






02 दिसंबर, 2019

Lakshmi Narayan Nayak

नायकजी का परलोक प्रस्थान
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विंध्यप्रदेश का आखिरी प्रकाश स्तंभ
भी तिरोहित हुआ..!
श्रद्धांजलि/जयराम शुक्ल
मध्यप्रदेश में हजम हो जाने के बाद भी हम विंध्यप्रदेश को एक राजनीतिक-सांस्कृतिक इकाई के रूप में देखते और परिभाषित करते आए हैं। मैं इस समूचे भूभाग को दो प्रकाशस्तंभों के आलोक में देखा करता था..ये दो स्तंभ थे यमुनाप्रसाद शास्त्री रीवा और लक्ष्मीनारायण नायक टीकमगढ़। आज दूसरा प्राकाश स्तंभ भी बुझ गया, 103 वर्ष की आयु को इतिहास की जिल्द के हवाले करते हुए नायकजी परलोक प्रस्थान कर गए।
ये दोनों महापुरुष विंध्यप्रदेश के ओर-छोर थे। संसदीय राजनीति में भी दो जिस्म एक जान की भाँति रहे। शास्त्री और नायक मध्यप्रदेश की विधानसभा में साथ-साथ तो रहे ही, 77 में दोनों लोकसभा में एक साथ पहुंचे। यद्यपि वे विंध्य के लौहपुरुष कह़े जाने वाले चंद्रप्रताप तिवारीजी के भी अत्यंत निकट थे। मध्यप्रदेश की विधानसभा में आज भी नायकजी और चंद्रप्रताप तिवारी की युति संसदीय विद्वता की चरमोत्कर्ष मानी जाती है। चंद्रप्रताप जी के कांग्रेस में जाने के बाद समाजवादी राजनीति में नायक और शास्त्री की युति बनी।
नायकजी शास्त्री जी के साथ मिलकर विंध्यक्षेत्र के मुद्दों पर एक साथ लड़े-भिड़े। इन दोनों का बड़ा सपना था विंध्य के ओर-छोर जोड़ने वाली ललितपुर सिंगरौली रेल परियोजना। दोनों की इस साझा माँग की स्वीकृति दी थी तत्कालीन रेलमंत्री मधुदंडवते ने।
80 से 96 तक इस परियोजना की फाइलों में जमी गर्द को अटलबिहारी वाजपेयी ने साफ किया.. पाँच साल और सही पर शास्त्री और नायक का सपना पूरा होगा इस पर पूर्ण विश्वास है।
नायकजी को शास्त्रीजी के सानिध्य में रहकर जाना..दोनों के व्यक्तित्व को एक शब्द में समेटना हो तो बस इतना ही कह सकते हैं शास्त्री जी तेजस्वी थे तो नायकजी तपस्वी। सरलता, सादगी, मधुरता वे शास्त्री जी से श्रेष्ठ थे, उम्र में ज्येष्ठ तो थे ही।
आखिरी बार नायकजी का सानिध्य मिला 27 मार्च 2000 को जब भोपाल में विंध्यप्रदेश के पुनरोदय के संकल्प के लिए भोपाल में अधिवेशन बुलाया गया। तत्कालीन विधानसभाध्यक्ष श्रीयुत श्री निवास तिवारी की पहल पर 10 मार्च 2000 को विधानसभा में विंध्यप्रदेश के पुनरोदय का अशासकीय संकल्प सर्वसम्मति से पारित किया गया।
तिवारी जी ने सदन के बाहर इस संकल्प को पारित कराने और इस उद्देश्य को प्राप्त करने हेतु अधिवेशन बुलाने का जिम्मा मुझे सौंपा गया।
27 मार्च 2000 को यह अधिवेशन भोपाल के 45 बंगले स्थित स्पीकर आवास में आयोजित किया गया।
जब समूचे विंध्यप्रदेश के जनप्रतिनिधियों को इस अधिवेशन में भाग लेने के लिए न्योता गया तब एक संशय सभी के मन में तैर रहा था कि क्या बुंदेलखंड हिस्से के जनप्रतिनिधि साथ देंगे..। लेकिन सुखद आश्चर्य तब देखने को मिला जब बुंदेलखंड के जनप्रतिनिधि अधिवेशन में सबसे बड़ी संख्या में..सबसे पहले पहुँचे..।
इनमें सबके अगुवा नायकजी ही थे। अन्य प्रतिनिधियों में..राजेन्द्र भारती विधायक दतिया, उमेश शुक्ल विधायक छतरपुर, केशरी चौधरी विधायक, मगनलाल गोइल विधायक टीकमगढ़, कैप्टन जयपालसिंह पूर्व विधायक पवई-पन्ना व बड़ी संख्या में अन्य प्रतिनिधि थे..। बघेलखण्ड हिस्से से श्रीयुत के अलावा शिवमोहन सिंह, इंद्रजीत कुमार, सईद अहमद, सबनम मौंसी, पंजाब सिंह, रामप्रताप सिंह सभी विधायक डा. लालता खरे, विश्वभंर दयाल अग्रवाल, विजयनारायण राय समेत अन्य थे..।
इस अधिवेशन में लक्ष्मीनारायण नायकजी के विचार संक्षिप्त किंतु अत्यंत सारगर्भित थे। उन्होंने कहा था-
"मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि मैं और जो मेरे साथी हैं इस पक्ष में रहे हैं कि छोटे राज्य होने चाहिए। बराबर हम लोग उसका प्रयास करते रहे। अभी 16 मार्च को ही हजारों साथी पकड़े गए छोटे राज्यों की मांग की लड़ाई लड़ते हुए। मैंने अखबार में पढ़ा कि तिवारी जी ने 27 मार्च को यहां एक सम्मेलन बुलाया है विंध्यप्रदेश राज्य के लिए, मैं चला आया। मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि मेरा विंध्यप्रदेश से बहुत ही ताल्लुक रहा है। जब मैं कांग्रेस में था तो जीवन भर सहयोग रीवा से ही मिला। जब मैं समाजवादी दल में आया तो तिवारी जी, जोशीजी, शास्त्री जी, और भी साथी जो आज नहीं हैं उनके साथ काम करने को मिला। सबने विंध्यप्रदेश के लिए लड़ाई लड़ी, विंध्यप्रदेश बन गया, विंध्यप्रदेश मिट गया..!
इतना जरूर चाहता हूँ और जो कहना चाहता हूँ कि जो दिक्कतें, परेशानियां, आपकुछ लोग महसूस करते हैं, ऐसे प्रांत की रूपरेखा आप रखें जिसमें जो पीड़ित है, पददलित है, परेशान है, जिनके झोपड़े नहीं हैं , खाने को दाना नहीं है जैसे स्वाराज के बाद ऐसा महसूस हुआ था, हमारा राज्य ऐसा हो गया। अँग्रेजी राज्य चला गया। इसलिए विंध्यप्रदेश बनने के बाद नीचे से लेकर ऊँचे तक सभी साथियों को बड़ी प्रसन्नता हो, खुशहाली हो, परेशानी न हो।"
( पुनरोदय का संघर्ष:विंध्यप्रदेश से)
विंध्यप्रदेश के पुनरोदय की आकांक्षा दिनों दिन प्रबल होती जा रही है। रीवा से लेकर भोपाल तक कई संगठन सक्रिय हैं। युवाओं और छात्रों को अब ऐसा महसूस होने लगा है कि हमारा हक मारा गया। हमें साजिशन पीछे किया गया। श्रीयुत श्रीनिवास तिवारी की पहलपर विधानसभा में पारित हुआ संकल्प अभी भी लोकसभा में जिंदा है। 21 जुलाई 2000 को लोकसभा में रीवा सांसद सुंदरलाल तिवारी ने इस संकल्प की याद दिलाई थी। तब तत्कालीन गृहमंत्री लालकृष्ण अड़वाणी ने इसके परीक्षण की बात कही थी।
विंध्यप्रदेश लक्ष्मीनारायण नायक का सपना था, शास्त्री ने इस हेतु खुद को होम दिया, श्रीयुत श्रीनिवास तिवारी की हर स्वाँस में विंध्यप्रदेश बसा था, जगदीश चंद्र जोशी की आखिरी अभिलाषा विंध्यप्रदेश का पुनरोदय था..।
नायकजी विंध्यप्रदेश की आकांक्षा के प्रबल स्वर थे..। उनकी स्मृतियां यहां की भूमि, नदी-तलाबों, वनप्रांतरों में बसी हैं। वे सुचिता की राजनीति की पराकाष्ठा थे। आइए हम सब नायकजी को नमन करते हुए उनके आदर्शों को आत्मसात करने की ओर बढ़े।

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