25 अगस्त, 2019

चारपाई पर शव लेकर पहुंचे अस्पताल

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चारपाई पर शव 

छतरपुर । २५ अगस्त १९ से 100 किमी दूर बक्स्वाहा में बदहाल व्यवस्था का नजारा देखने को मिला |  बक्स्वाहा स्वास्थ्य केंद्र तक शव लाने के लिए  गाँव वाले कई किमी पैदल चलकर चारपाई पर शव लेकर 8 किमी पैदल चले  आये | 
बक्स्वाहा से ८किमी दूर  सुनवाहा गांव में आकाशीय बिजली गिरने से हल्ले साहू (४०) की मौत हो गई  थी । मृतक के भाई छोटेलाल साहू ने बताया कि  भाई का पोस्टमार्टम कराने के लिए बक्स्वाहा ले जाना था , हमने डायल 100 पर फोन भी किया जब काफी समय तक नहीं आई गाडी तो हम लोग मजबूरन शव को लेकर आये | पहले टेक्टर से लाने का प्रयास किया पर कुछ दूर बाद वह ट्रेक्टर नहीं आगे बढ़ पाया तब हम लोग  चारपाइ पर रख कर   बक्स्वाहा लेकर आये |  
                            बक्स्वाहा के तहसीलदार कारन सिंह कौरव ने मीडिया को 
बताया की मामले की जानकारी मिली है , सोमवार को कलेक्टर साब के पास मीटिंग है उनके सामने यह बात रखी जायेगी की एक शव वाहन की व्यवस्था की जाए | 

दुनिया के बेहतरीन हीरे हैं बन्दर हीरा खदान में

बुंदेलखंड की डायरी 
दुनिया के बेहतरीन हीरे हैं बन्दर हीरा खदान में 
रवींद्र व्यास 

सरकार अगले महीने मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड की  वन क्षेत्र में स्थित बन्दर हीरा खदान सहित 13 खनिज ब्लॉकों की नीलामी करेगा बुंदेलखंड की   लगभग 34.20 मिलियन कैरेट हीरे के  भंडार  वाली इस खदान की खोज  ऑस्ट्रेलियन कम्पनी रिओ टिंटो ने लगभग 20  वर्ष पहले की थी काल का पहिया कुछ ऐसा घूमा कि देश की सियासी और ब्यूरो क्रेसी की तिकड़मों से त्रस्त हो कर रिओ टिंटो का इस खदान से मोह भंग  हो गया |  रिओ टिंटो के खदान छोड़ने के बाद हालांकि  पर्यावरण मंत्रालय से भी स्वीकृति मिल गई थी अब बक्स्वाहा ब्लाक की इस हीरा खदान  को अगले महीने 60 हजार करोड़ से ज्यादा में  नीलाम किया जाएगा | इस खदान से निकलने वाले हीरे दुनिया के बेहतरीन हीरों में से एक माने जाते हैं 


 रियो टिंटो एक्सप्लोरेशन लिमिटेड द्वारा छतरपुर जिले की   बक्स्वाहा की हीरा खदान की  खोज के बाद इसका नाम बन्दर हीरा खदान दिया गया |   364.00 हेक्टेयर वाली बन्दर हीरा खदान में सरकार ने   34.20 मिलियन कैरेट हीरा  भण्डार का आंकलन  किया  है। जिनका अनुमानित खनिज संसाधन मूल्य लगभग रूपये 60  हजार करोड रखा गया  है। रिओ टिंटो  कंपनी ने 2200  करोड़ की  इस परियोजना को  2016 के  साल के अंत तक बंद करने और किसी तीसरे पक्ष को देने का विचार करने का कहकर  देश की निवेश नीति पर सवालिया निशान लगादिया  था । रियो टिंटो के इस कदम के पीछे माना जा रहा था  की पिछले कुछ समय से इस हीरा खदानको लेने के लिए देश के कई बड़े उद्योगिक घराने लगे थे । इन उद्योग पतियों  की ऊँचीराजनीतिक पहुँच भी मानी जाती है । अब इस खदान के लिए देश के कई नामी उद्योगपतियों ने अपनी दिलचस्पी दिखाई है जिनमे  एंसल ग्रुपरूंगटाआडानीफ्यूरावेदांता समूह तथा एनएमडीसी  जैसे ग्रुप ने  इस हीरा खदान में  गहरी रूचि दिखाई है | 20 अगस्त  को इन व्यापारिक समूहों ने पन्ना में बन्दर प्रोजेक्ट से निकले हीरों को देखा और परखा भी सरकार ने  हीरों के 11 बाक्स  में कुल  3333 नग  वजन 1708. 02  कैरेट के हीरे  प्रदर्शित किए गए हीरा देखने के बाद ये लोग छतरपुर जिले की बन्दर हीरा खदान को देखने भी गए |
पर्यावरण विनाश में विकाश की नई इबारत देखते अधिकारी



पन्ना कलेक्टर कर्मवीर शर्मा ने मीडिया  को बताया  कि पडोसी जिले में प्रारंभ होने वाले प्रोजेक्ट से शासन को जो राजस्व मिलेगा उससे क्षेत्र का विकास होगा। उन्होंने कहा कि इस प्रोजेक्ट के प्रारंभ होने से पन्ना जिले के विकास के नये मार्ग प्रशस्त होंगे। इससे पर्यटन बढावा मिलेगा। उन्होंने कहा कि जिले में डायमण्ड पार्क की स्थापना होने से स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलने के साथ-साथ व्यवसायियों को आना जाना प्रारंभ हो जाएगा। जिससे क्षेत्र के लोगों की आर्थिक स्थिति में सुधार के साथ जिले का विकास होगा। इसके लिए मेरे द्वारा निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। जिले के ऐतिहासिक पुरातात्विक एवं आकर्षक प्राकृतिक स्थलों का चयन कर उनकी जानकारी एवं छायाचित्र सहित पुस्तिका का प्रकाशन किया जा रहा है। इसे प्रदेश के साथ-साथ प्रदेश से बाहर के पर्यटन स्थलों मेें भेजकर पर्यटकों को आकर्षित किया जाएगा।

प्रदेश शासन के खनिज सचिव नरेन्द्र सिंह परमार मानते हैं  कि यह छतरपुर ही नही पन्ना जिले के विकास के लिए भी प्रभावी पहल है। जिले में  डायमण्ड पार्क की स्थापना किए जाने के लिए मेरे द्वारा पूरे प्रयास किए जाएंगे। अभी तक हीरों के आभूषणों को खरीदने के लिए जयपुर आदि शहरों में जाते हैं। डायमण्ड पार्क बन जाने पर दुनियाभर के लोग हीरे के आभूषण खरीदने के लिए पन्ना आएंगे। नीलामी की प्रक्रिया के तहत 05 अक्टूबर  2019 को प्रीबिड सम्मेलन का आयोजन भोपाल में किया गया है |
दूसरी तरफ छतरपुर कलेक्टर मोहित बुन्दस भी इस योजना को क्षेत्र के विकाश  के लिए  एक बड़ा कदम मानते हैं वे कहते हैं की जोभी कम्पनी यहां कार्य करेगी उसे किसी भी तरह की परेशानी नहीं होने दी जायेगी चाहे भूमि सम्बन्धी हो अथवा वन सम्बन्धी इससे छतरपुर और बक्स्वाहा का नाम पूरे विश्व में होगा स्थानीय लोगों को रोजगार के नए अवसर मिलेंगे |

बुंदेलखंड का हीरा किस व्यापारिक घराने के होगा अनकूल
 ग्रहों की चाल और ज्योतिष में भरोषा करने वाले ज्ञानी मानते है की हीरा एक रत्न है जो नीलम जैसेरत्न की तरह हर किसी  के अनकूल नहीं होता । यह शुभ और अशुभ फल देता है ।  जिसकेकारण आपको आर्थिक ,मानसिक और शारीरिक  नुक्सान  और परिस्थितियां प्रतिकूल हो जाती हैं। शायद रियो टिंटो के साथ भी ऐसा ही हो गया ,उनकी गृह दशा हिंदुस्तानी हीरे के अनकूल नहीं थी जिस कारण २०  वर्ष के लम्बे संघर्ष के बाद भी उन्हें हीरा खोदने का स्थाई अधिकार नहीं मिल पाया ।
   बुंदेलखंड की इस धरा में  हीरा सिर्फ पन्ना और छतरपुर जिला भर में ही नहीं हैं बल्कि हीराभंडारो की खोज टीकमगढ़ और दमोह जिलो में भी हो चुकी है । कीमती खनिज संपदा से भर पूरइस इलाके  के लोगों को सपने दिखा कर बहलाया जाता है । पर लोग नहीं समझ पाते की सुबहहोते ही सपने टूट ही जाते हैं । और फिर  यहाँ के लोग को  अभावो और बदनसीबी में जीने कीवास्तिकता को स्वीकारना पड़ता  है । पिछले दो  दशक से ज्यादा समय से लोगो को  हीरा चकाचौन्ध में भ्रमित किया जाता  रहा  ।
दरअसल सागर के एक भूगर्भ शास्त्री  डॉ स्थापक की रिपोर्ट पर  आस्ट्रेलिया की प्रमुख कंपनी रियो टिंटो ने(रियो टिंटो एक्सप्लोरेशन इंडिया प्रा.ली.) ने २००४ से इस जिले के बक्सवाहा इलाके में हीरा खोजने का काम शुरू किया था । कम्पनी को इस एरिया में ८ किम्बरलाईट रोक्स (चट्टान ) का समूह मिला कम्पनी ने इस प्रोजेक्ट का नाम "बन्दर परियोजना" दिया  था |   33   करोड़ की लागतके हीरा सेम्पल प्रोसेसिंग प्लांट का उदुघाटन  मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री शिव राज सिंह चौहान ने२७ अक्तूबर2009  को किया था |  इस आधुनिक प्लांट को रियो टिंटो ने ऐसे ही नही लगाया था ।। ,कम्पनी  को जो प्रारंभिक रिपोर्ट मिली थी  उसके मुताबिक यहाँ ३७ मिलियन टन हीरा के भंडारहै ,। हीरे की गुणवत्ता को  भी दुनिया   के हीरा से बेहतर बतया गया था  । ,कम्पनी को भरोषा था   की यहाँ का हीरा पन्ना हीरा खदान से ७ गुना ज्यादा मूल्यवान होगा यहाँ की उत्पादन क्षमता  भी पन्ना से २० गुना ज्यादा होगी । और  यह एरिया विश्व के १० शीर्ष हीरा उत्पादकक्षेत्रो में  शामिल हो जाएगा  । लोगों को खुद मुख्य मंत्री ने भरोषा दिलाया था की इस  परियोजनाके कारण स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा बुंदेलखंड की किस्मत हीरा की तरह चमकनेलगेगी । 2016 का वह साल भी आया जब  कंपनी ने २२०० करोड़ की  इस परियोजना को  साल के अंत तक बंद करने का एलान कर दिया |
सामाजिक संघर्ष
दरअसल  रियो टिंटो को 26 मई 2006 को हीरे की तलाश के लिए  सर्वे लायसेंस की अनुमति मध्यप्रदेश सरकार ने जारी की थी। कंपनी को  बकस्वाहा ईलाके की भूमि पर यह सर्वे करना था जिसमें अधिकाँश . भूमि वन परिक्षेत्र की थी। । प्लांट स्थापना के बाद रियोटिन्टो ने 5 अप्रेल 2012 को 954 हे. राजस्व भूमि को अधिकृत करने के लिये कलेक्टर छतरपुर को आवेदन दिया था । अब सरकार ने  364 हेक्टेयर में हीरा खदान के लिए नीलामी की स्वीकृति प्रदान की है |   

देखना ये है कि  छतरपुर जिले के इस सर्वाधिक पिछड़े क्षेत्र बक्स्वाहा और बुंदेलखंड की तक़दीर और तस्वीर हीरा परियोजना से कितनी  बदलती है | हालांकि बन्दर हीरा  खनन  परियोजना को पर्यावरण प्रेमी जहां इसे पर्यावरण संतुलन के विनाश का आधार बता रहे हैं वही  हर कीमत पर विकाश चाहने वाले  लोग  इस परियोजना को बुंदेलखंड के लिए एक  आवश्यक परियोजना मानते हैं । वे तर्क देते हैं कि  यह परियोजना ऐसे इलाके में लग रही थी जिसका अधिकाँश क्षेत्र बंजर है अथवा कम उपजवाला है । 81 हजार की आबादी वाले इस विकाश खंड की आधी से ज्यादा आबादी बेरोजगारी और बेकारी की शिकार है |  ऐसे इलाके में जब यह योजना शुरू होगी तो  स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर तो बढ़ेंगे ही  साथ ही आस पास काकारोबार भी बढ़ेगा ।

18 अगस्त, 2019

बुन्देलखण्ड में समाप्त होता भू जल


बुंदेलखंड की डायरी
बुंदेलखंड में समाप्त होता भू जल 
रवीन्द्र व्यास
सूखे रेगिस्तान सहित देश के अधिकाँश इलाके के लोग पानी से परेशान हैं तो बुंदेलखंड के लोग पानी के लिए परेशान हैं फिलहाल बुंदेलखंड इलाके में औसत से आधा पानी ही इंद्र देव ने दिया  है ऊपर से घटते  भूजल ने भविष्य के लिए बड़ी चेतावनी दे डाली है बुंदेलखंड में पानी के हालात जानने के बावजूद जल प्रबंधन से उदासीन तंत्र  भविष्य के लिए गंभीर संकट निर्मित करने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है यह वह समय है जब छोटे से प्रयास से  भविष्य की एक मजबूत नीव रखी जा सकती है 
                                           विपदाओं से संघर्ष का दूसरा नाम है बुंदेलखंड  सदियों तक यहाँ की वीरता की कहानिया  खूब सुनी जाती रही हैं |    बुन्देलखण्ड के लोगों का प्रकृति से जुड़ाव भी सदियों तक रहा है इसी की चलते यहाँ की सीमा का निर्धारण भी नदियाँ करती हैं विपदाओं से हार ना मानने वाले बुंदेलखंडी जल के महत्व को बहुत पहले समझ चुके थे इसी के चलते  यहां हजारों की संख्या में तालाबों और कुओं का जाल बिछाया गया तालाब नदियों और कुओं को पूजने की परम्परा शुरू हुई पर अतीत की धरोहर धरासाई होती गई जल की बून्द बून्द को तरशने लगे बुंदेलखड के लोग |  आज हालात कुछ इस तरह गंभीर हो गए कि बुंदेलखंड के 13 _14 जिलों में भूमिगत जल पाताल की तरफ बढ़ रहा है | भूजल वैज्ञानिको की माने तो बुंदेलखंड के जिलों में 75 से 65  फीसदी भूजल का दोहन हो चुका है  मात्र 25 से 35 फीसदी ही भूजल बचा है भूजल विशेषज्ञों की माने तो भूजल के अत्याधिक दोहन से अनेक तरह की प्राकृतिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है भूजल स्तर में कमी के कारण जमीन की नमी समाप्त होती है परिणामतः हरे भरे  वृक्ष भी सूखने लगते हैं वर्षा का चक्र अनियमित हो जाना बारिश में कमी के कारण जल स्तर और कम होता जाता है जो आने वाले समय के लिए और कठिन स्थितियां निर्मित कर देता है इन हालातो में खेती पर गंभीर संकट उत्पन्न होता है जिसके चलते किसान आत्म ह्त्या तक को मजबूर होता है वही संम्पन्न वर्ग यहां से पलायन में ही अपनी भलाई समझता है |   
                                             70 हजार वर्ग किमी में फैले बुंदेलखंड ( यूपी और एमपी ) की  औसत वर्षा 800 से 1100 मिमी की होती थी |  2000 से वर्षा के औसत में जो गिरावट का दौर शुरू हुआ वह जारी है कभी अत्याधिक तो कभी अलप वर्षा ने किसानो और मजदूरों को दाने दाने के लिए मोहताज बनाया |  अनियमित वर्षा चक्र के कारण सूखा की निरंतरता बढ़ गई जब जब सूखा के हालात बने अधिकारियों के खजाने भरे नेताओं ने  इलाके को सूखा ग्रस्त घोषित कराने का काम कर जनता पर बड़ा भारी अहसान जताया दूसरी तरफ सूखा की निरंतरता बरकरार रहे इसके जतन जरूर  प्रशासन और राज तंत्र ने की |  बुंदेलखंड की कल कल बहती नदियों की  धाराओं से खिलवाड़ किया गया नदियों की रेत  निकालने के लिए  नदियों का सीना ही छलनी किया जाने लगा जैव विविधिता के पर्याय बुंदेलखंड के पहाड़ों  को  खोद कर  अकूत धन तो कमाया गया जंगलों को साफ़ किया गया  , अब तो  पन्ना  टाइगर रिजर्व का वन क्षेत्र भी सुरक्षित नहीं है वहा से हाल ही 600 से ज्यादा  सागौन के वृक्ष कट गए |  जल स्तर बढ़ाने के लिए सरकार ने स्टाप  डेम जरूर बनवाये पर उनमे से कितने  उपयोगी हो पाते हैं इसकी गवाही वे खुद दे देते हैं |  शहरी  और बड़े ग्रामीण क्षेत्रो के तालाब  अतिक्रमण की चपेट में हैं 
                                                            जल है तो कल है यह  कथन बुंदेलखंड ही देश दुनिया के लिए शासत्व सत्य है इसी कारण देश के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी  अपने राष्ट्रीय सम्बोधनों में  जल संकट से मुक्ति की बात करते हैं |   मोदी जी  ने 30 जून 2019 को ‘मन की बात’ कार्यक्रम में देशवासियों से जल संकट से मुक्ति के लिए जागरूकता अभियान चलाने का अनुरोध किया है। इस अभियान को  जल संचयजल संरक्षण और जल संवर्धन पर और  पानी के कुशल उपयोग पर केन्द्रित रखा गया है । तीन चरणों में संचालित होने वाला  यह अभियान देश के 36 राज्यों के 255 जिलों के 1,593 विकासखंडों में संचालित होगा। 
 गौरतलब है कि 1,593 विकासखंडों में से 1,186 विकासखंड,  भूजल के  अतिदोहित श्रेणी में और 313 विकासखंड क्रिटिकल श्रेणी में और  94 विकासखंडों में पानी की उपलब्धता बेहद कम है। 
 जल संचयजल संरक्षण जल संवर्धन और  पानी के कुशल उपयोग पर केन्द्रित प्रधान मंत्री के इस कार्यक्रम को बुंदेलखंड में कितना महत्व दिया जा रहा है ,यह सब जमीनी स्तर पर देखा और समझा जा सकता है देश के प्रधान मंत्री भले ही जल की समस्या को लेकर चिंतित हों पर प्रशासन तंत्र राजनैतिक तंत्र और जनतंत्र इस गंभीर मसले पर कतई चिंतित नजर नहीं आता विधायक और सांसद निधि से स्थानीय नगर पालिकाओं की सौन्दर्यीकरण योजनाओं से जल को जमीन में जाने से रोकने के लिए तमाम तरह की धन राशि व्यय की जाती है |  दूसरी तरफ  भूजल वृद्धि की किसी भी योजना पर धन राशि व्यय करना जन सेवक शायद  उचित नहीं मानते प्रधान मंत्री की बात को ही मानते हुए  बुंदेलखंड के सांसद और विधायक जन भागीदारी योजना बनाकर शहरी क्षेत्रो में वाटर हार्वेस्टिंग योजना और कुओं और बावड़ियों  को छत के पानी से जोड़ने का अभियान चलाये तो एक बड़ा और सकारत्मक बदलाव देखने को मिल सकता है |  
   
क्या हम आप कल्पना कर सकते हैं कि जल विहीन इलाके में जीवन कैसा होगा हमें यह भी चेतावनी मिल चुकी है की देश के २१  शहरों में भूजल  खत्म होने की कगार पर  है.|  नीति आयोग की रिपोर्ट कहती है  देश इस समय  इतिहास के सबसे गंभीर जल संकट का सामना कर रहा है.देश में 70 फीसदी पानी  प्रदूषित है इसी के चलते  भारत जल गुणवत्ता सूचकांक में 122 देशों में 120वें पायदान पर है. स्वच्छ पानी के अभाव में  हर साल  दो लाख से ज्यादा लोग जान गंवा रहे हैं.देश की आधी आबादी पानी की किल्लत का सामना कर रही  हैं.|  समग्र जल प्रबंधन सूचकांक  रिपोर्ट बताती है कि  2030 तक देश में पानी की मांग  दोगुनी हो जाएगी.
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने झांसी की चुनावी सभा में  पेयजल समस्या से निपटने  के लिए उत्तर प्रदेश के  बुन्देलखण्ड को 900 करोड़ रूपये की योजनाओ का शिलान्यास किया था । बुंदेलखंड पैकेज  से भी मनमोहन सिंह की सरकार ने करोडो रुपये जल समस्या के निदान के लिए दिए थे योजनाओ की जमीनी हकीकत क्या है यह किसी से छिपा नहीं है दरअसल जल की समस्या आने वाले समय में इतनी विकराल होने वाली है कि जिसकी हम आप कल्पना से ही सिहर उठते हैं यह विषय भी ऐसा नहीं है की इसे सिर्फ सरकार के भरोषे छोड़ दिया जाए जीवन चाहिए तो जल के लिए जल योद्धा बनने को तैयार रहिये |  

11 अगस्त, 2019

Khajuraho_खजुराहो में घटते विदेशी पर्यटक


 बुंदेलखंड की डायरी 
 खजुराहो में घटते पर्यटक 
रवीन्द्र व्यास 

बुंदेलखंड ही नहीं विश्व धरोहर खजुराहो  में पर्यटन कारोबार  चौपट होने से  यहाँ  के  लोगों ने चार दिनों तक  खजुराहो बंद रखा |  चौथे  दिन  मिले आश्वासन पर  रविवार से खजुराहो अपने  यथा स्थिति में लौट आया खजुराहो में पर्यटन कारोबार से जुड़े होटलगाइड ट्रवेल एजेंसी  और स्थानीय  व्यापारी पिछले पांच सालों से विदेशी पर्यटकों की घटती संख्या  को लेकर चिंतित  हैं | 2018 में  तो देशी पर्यटक 2004 के मुकाबले ढाई गुना ज्यादा आये पर विदेशी पर्यटक  2004  से भी कम आये |  खजुराहो के पर्यटन कारोबार से  जुड़े लोग यह नहीं समझ पा रहे कि  आखिर जब आबादी बढ़ रही है देश में अन्य जगह विदेशी पर्यटक बड़ी संख्या में पहुँच रहे हैं तो फिर  खजुराहो से मोह क्यों भंग हुआ इसका उन्हें एक ही रास्ता समझ आया की कनेक्टिविटी का अभाव अपने आंदोलन के दौरान उनकी यही मुख्य मांग भी रही पर इसके अलावा भी बहुत से ऐसे कारण हैं जिनके चलते खजुराहो से विदेशी पर्यटकों ने दूरियां बनाई 
      
                                      
                            लगभग एक हजार वर्ष से भी प्राचीन  खजुराहो  के मंदिरो की हजारवीं साल गिरह भी मनाई जा चुकी है पुरातत्व वेत्ता बताते हैं कि  कभी यहां  85  से ज्यादा  मंदिर हुआ करते थे |  1494 इसवीं में इनमे से  अधिकांश मंदिरों   को मुग़ल शासकों ने  ध्वस्त कर दिया गया तो कुछ को खंडित कर दिया गया ।खजुराहो के मंदिरों में पश्चिमी समूह के मंदिर  शिव और विष्णु भगवान के मंदिर हैं।खजुराहो से पांच किलोमीटर दूर दक्षिणी समूह के मंदिर दूल्हादेव मंदिरशिव तथा चतुर्भुज मंदिर विष्णु भगवान को समर्पित हैं। जबकि पूर्वी समूह के मंदिरों में तीन हिंदू तथा तीन जैन मंदिर हैं।
                  बलुआ पत्थर से बने ये मंदिर और मूर्तिया अपनी बेजोड़ पाषाण कला के लिए दुनिया भर में  विख्यात हैं इन मंदिरों के निर्माण की  शिल्पकला देख कर यहां आने वाले पर्यटक मन्त्र मुग्ध हो जाते हैं |   
 प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेन सांग ने 642 ईस्वी में  खजुराहो भ्रमण के दौरान  इस शहर की शिल्प कला  पर मुग्ध हो   कर  इसका नाम चीनी भाषा में ‘चीचीतू’ रखा था।  छतरपुर जिले के गजेटियर  के अनुसार  1021 ईस्वी में मुहम्मद गजनी के साथ अबू रिहान उल बरौनी भी यहां आया था। बरौनी ने इस क्षेत्र को जिझौतिया वंश की राजधानी बताया था।1335 ईस्वी में इस क्षेत्र में  इब्ने बतूता आया और उसने यहाँ  बड़ी संख्या में खजूर के पेड़ देखकर इस जगह को ‘खजूरा’ नाम दिया। बतूता ने अपनी किताब में लिखा कि यहां करीब एक मील लंबी झील है और उसके पास मूर्तियोंवाले सुंदर मंदिर हैं।पुरातन काल में यहां  दूर-दूर से  साधु और योगी यहां आया करते थे। खजुराहो के मंदिर तो आजादी के बाद भी वीराने में पड़े थे यहां आये आगरा निवासी लवानिया ने  इस स्थान को नई पहचान दिलाई थी 
                    
                              यहां आने वाले पर्यटकों के आंकड़े बताते हैं कि  2004 में 63090 , 2005 में 70726 ,2006 में 73843 ,2007 ँमें 84887 ,2008 में 89174 ,2009 में देश में  बड़ी आतंकी कार्यावहियों के कारण 68839 ही पर्यटक आये पर 2010 में 90721, 2011 में 97356 , 2012 में  बीते 16 सालों में 97688   सबसे अधिक विदेशी पर्यटक आए \| 2013 से विदेशी  पर्यटकों की संख्या में जो गिरावट का दौर शुरू हुआ वह अब तक जारी है / 2013 में 89511 और 2018 में सबसे कम 60759  विदेशी पर्यटक आये |  ये अलग बात है कि  भारतीय पर्यटकों की संख्या में हर साल बढ़ोतरी हुई है | 2014 में जहाँ 140466  भारतीय पर्यटक आये वही 2018 में 361594 भारतीय पर्यटक खजुराहो के मंदिर घूमने आये भारतीय पर्यटकों की संख्या में बढ़ोत्तरी रेल सुविधा के विस्तार के कारण मानी जाती है |  खजुराहो के आंदोलन कारियों  की बात माने तो  यहाँ का मुख्य कारोबार विदेशी पर्यटकों के आने जाने पर ही बढ़ता है आम तौर पर भारतीय पर्यटक सुबह आता है और शाम को चला जाता है |  वे विदेशी पर्यटकों की संख्या में कमी की मुख्य वजह  कनेक्टिविटी का अभाव मानते हैं |  जून माह   में १५ दिनों तक खजुराहो में विमान सेवा बंद रही हाल ही में हफ्ते में तीन दिन के लिए शुरू की गई है |  

 
खजुराहो पर्यटन को बचाने के लिए अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने को मजबूर लोगों का मानना है कि यहाँ का  80% व्यापार केवल विदेशी पर्यटकों पर निर्भर करता है।  पहलेदिल्लीआगरावाराणसी से खजुराहो के लिए प्रतिदिन तीन अलग-अलग एयरलाइन उड़ानें थींलेकिन अब केवल एयर इंडिया की उड़ान पर्यटकों को ला रही थीवह भी सप्ताह में तीन दिनदिल्ली और वाराणसी से। यहां तक कि ट्रेन कनेक्टिविटी भी अच्छी नहीं थीइसलिए आगरा जाने वाले पर्यटक राजस्थान की यात्रा करना पसंद करते थे। आंदोलन कारियों की मांग थी की खजुराहो में नियमित विमान सेवा हो खजुराहो के लिए बनारस , मुंबई की सुपरफास्ट रेल सेवा शुरू की जाए इसके लिए आंदोलन कारियो को एयर इण्डिया के सीएमडी अश्वनी लोहानी ने भरोषा दिलाया है की 28 अक्टूबर से खजुराहो दिल्ली नियमीत विमान सेवा शुरू हो जायेगी | रेल सेवाओं के विस्तार के लिए डी आर एम् झांसी के नाम खजुराहो के स्टेशन मास्टर को ज्ञापन सौंपा गया है | शनिवार को आंदोलन समाप्त हो गया और खजुराहो में फिर से चहल पहल बढ़ गई | 
          खजुराहो के लोगों की इन जायज मांगों का विदेशी पर्यटकों ने भी भरपूर साथ दिया | उन्होंने ना सिर्फ हस्ताक्षर किये बल्कि धरने पर भी बैठे | 
क्या सिर्फ कनेक्टिविटी ही मुख्य वजह है विदेशी पर्यटकों की घटती संख्या के लिए ? यह अहम सवाल है जिसका जबाब यहाँ के पर्यटन कारोबारी बखूबी जानते हैं पर इस पर मौन रहना ही बेहतर मानते हैं | असल में पिछले कुछ वर्षो में खजुराहो में विदेशी पर्यटकों के साथ धोखा धड़ी ,  उनके हरेशमेंट , मंदिरो के प्लेट फ़ार्म से गिरने , चिकित्सा सुविधा के अभाव और फर्जी गाइडों और लपको की समस्या से दो चार होना पड़ा | पुलिस प्रशासन ने पहले पर्यटक पुलिस का कुछ समय के लिए दिखावा किया था पर बाद में वह भी ठन्डे बस्ते में चला गया | खजुराहो के गाइड नरेंद्र शर्मा मानते हैं की यहाँ आने वाला पर्यटक एक ही दिन में वापस जाने की सोचने लगता है , असल में आस पास की साईट विकसित की जानी चाहिए | वाटर स्पोर्ट्स , जैसे कार्यक्रम आस पास के बांधों में शुरू किये जा सकते हैं | पन्ना नेशनल पार्क की टिकिट दर  ज्यादा हैं उन्हें कम किया जान चाहिए | 
                  
                              

विकास की उमंग और चुनौतियों के संघर्ष का बुंदेलखंड

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