25 अक्टूबर, 2016
24 अक्टूबर, 2016
RSS कोई तो मेरे मुन्ना (सुरेश यादव )से मिला दे
रवीन्द्र व्यास
छतरपुर /
कोई तो मेरे मुन्ना (सुरेश यादव ) से हमें मिला दे , ये दर्द भरी आवाज है सुरेश यादव के माता पिता की । सुरेश यादव के माता पिता को अपने पुत्र के साथ बालाघाट जिले की बैहर थाना पुलिस ने बर्बर अत्याचार की खबर गांव वालों ने टी वी पर देख दी थी । और मामला देश में सुर्खियों में छाया रहा । छतरपुर से ५० किमी दूर ५०० की आबादी वाले टौरिया टेक गाँव के रहने वाले सुरेश का परिवार गरीबी और अभावों में जीने को विवश है । जिले में आर एस एस की नर्सरी के रूप में विख्यात इस गाँव के सुरेश यादव सहित तीन नोजवान संघ के पूर्ण कालिक प्रचारक का दायित्व निभा रहे हैं ।
उन्होंने बताया की हम लोग तो ऐसे ही जी रहें है, सुरेश के दोनों भाई किसानी करते हैं , जमींन पूंछने पर उन्होंने बताया की तीन साढ़े तीन एकड़ जमींन है, इतने में परिवार के गुजारे के सवाल पर कहने लगे दोनों भाई मजदूरी कर लेते हैं । यहाँ नहीं मिली तो बाहर चले जाते हैं । माता किशोरी बाई रोते हुए बताने लगी की 9 -10 साल हो गए घर छोड़े हुए अब जब से बेटा के साथ मारपीट की खबर मिली है दिल में चैन नहीं है । ना कोई हमें अपने बेटे के पास ले जाता है और ना ही कोई बताता है । इसी दौरान भगीरथ की बड़ी बेटी रामवती ससुराल से मायके अपने पिता से मिलने आ गई , परिवार को सपने में हर रोज देखने की बात कह कर लिपट कर रोने लगी । 
सुरेश के चचेरे भाई लोकेन्द्र सिंह यादव ने बताया की बचपन से ही सुरेश शाखा में जाता था । शाखा के हर कार्यक्रम में बाद चढ़ कर हिस्सा लेता था । संघ के प्रचारक के तौर पर उन्होंने लवकुशनगर , टीकमगढ़ ,और नरसिंह पुर में अच्छा काम करने के बाद बालाघाट जिला में गए थे । हम उनसे मिलने जबलपुर गए थे , पर उनकी हालात इतनी गंभीर थी की हमें उनसे मिलने ही नहीं दिया डाक्टरो ने । लोकेन्द्र बताने लगे की गाँव में वर्षो से शाखा लगती चली आ रही है , इसका बच्चो में एक अलग प्रभाव देखने को मिलता है खेल के साथ , बच्चो को देश दुनिया और समाज की जानकारी के साथ अनुशासन का पाठ भी मिलता है । इस गाँव से ही सुरेश भैया सहित तीन आर एस एस के प्रचारक हो गए हैं । भाइयन यादव सागर जिले में है जब की हिसाबी पाल पवई (पन्ना ) में संघ के प्रचारक के तौर पर काम कर रहे हैं । वे कहते हैं की दोषी पुलिस वालों को सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए ।
16 अक्टूबर, 2016
Bundelkhand Dayri_RLY_
रवीन्द्र व्यास
बुंदेलखंड रेलवे सुविधाओं के मामले में भी सबसे निचली पायदान पर खड़ा नजर आता है ।जबकि किसी भी राष्ट्र के बेहतर विकाश के लिए परिवहन तंत्र एक महत्व पूर्ण कारक माना जाता है । बेहतर सड़कों और रेलवे लाइनों को उसकी धमनिया माना जाता है । इनका बेहतर तंत्र जितना विकशित होगा वह राष्ट्र प्रगति पथ पर उतनी ही तीव्रता से आगे बढेगा । यह बात प. जवाहर लाल नेहरू भी कहते रहे किन्तु खुद उनकी ही पार्टी के लोग इस मसले पर गंभीर नहीं रहे । अटल जी के शासन काल में इस दिशा में काम शुरू हुए , प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना और स्वर्णिम चतुर्भुज जैसी योजनाओ की शुरुआत हुई । उन्ही के काल में २० सितंबर 1998 को ललितपुर सिंगरौली रेलवे लाइन का शिलान्यास खजुराहों में किया गया था । लगभग छह संसदीय सीटो को प्रभावित करने वाली यह रेल परियोजना लगभग हर चुनाव में मुख्य मुद्दा रही है । मंगलवार की शाम सवा चार बजे ललितपुर से खजुराहो रेल योजना का शुभारम्भ रेल मंत्री सुरेश प्रभु करेंगे । हालांकि यह छड़ भी स्वप्न के अधूरे भाग के पूर्ण होने के समान होगा ।
बुंदेलखंड और बघेलखंड को जोड़ने वाली इस रेल परियोजना के शिलान्यास मौके पर तत्कालीन प्रधान मंत्री अटल बिहारी बाजपेई ने ही योजना की मांग और विलम्ब पर चुटकी लेते हुए कहा था की यह मांग काफी समय से की जाती रही है , शायद इसका शिलान्यास हमारे हाथो ही लिखा था । उन्होंने दुःख भी जताया था की देश में रेल लाइन का जाल फैला है किन्तु कई लोगों ने रेल तक नहीं देखी । तत्कालीन रेल मंत्री नितीश कुमार ने इस मौके पर उमा भारती के प्रयासों को सराहा था । तत्कालीन केंद्रीय मानव संसाधन राज्य मंत्री और क्षेत्रीय सांसद उमा भारती ने सबका आभार जताते हुए कहा था इससे क्षेत्र के विकाश की एक नई इबारत लिखी जायेगी ।उमा भारती का १९९८ में व्यक्त किया गया यह विश्वास अब जमीनी धरातल पर साकार रूप लेगा हालांकि पूर्ण साकार रूप तभी मिलेगा जब यह लाइन सतना से जुड़ जायेगी । वही इसी मंच पर उपस्थित मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्य मंत्री दिग्विजव सिंह जब बोलने के लिए खड़े हुए थे तो लोगों ने मुख्य मंत्री नीचे आओ के नारे लगाए । लोग दरअसल इस बात से नाराज थे की दिग्विजय ने इस शिलान्यास कार्यक्रम को रुकवाने का प्रयास किया था , और चुनाव आयोग को पत्र लिखा था ।
उस समय 925 करोड़ रु की इस योजना से 541 किमी लंबी रेल लाइन बिछाई जाना थी । तीन चरणों की इस योजना में प्रथम चरण में ललितपुर से खजुराहो होते हुए सतना 282.7 किमी लाइन बिछाई जाना थी । दूसरे चरण में महोबा से खजुराहो 64 .48 किमी और तीसरे चरण में रीवा से सीधी 191.61 किमी रेलवे लाइन का निर्माण होना था ।
शिलान्यास के बाद हालात बदले और लोकसभा चुनाव में उमाभारती ने खजुराहो को छोड़ भोपाल से चुनाव लड़ा और जीता । खजुराहो से कांग्रेस के सत्यव्रत चतुर्वेदी सांसद चुने गए । सासद सत्यव्रत संसद में इस रेल परियोजना की धीमी रफ़्तार पर आक्रोश व्यक्त करते रहे । 1998 से लेकर 2001 तक इस योजना के लिए बजट के नाम पर सिर्फ खाना पूर्ति होती रही । 2002 रेलवे के बजट सत्र में बोलते हुए सांसद चतुर्वेदी ने रेल मंत्री और प्रधान मंत्री पर चुटकी लेते हुए कहा की खजुराहो में जाकर ललितपुर - सिंगरौली रेल लाइन का शिलान्यास तीन चार साल पहले आप लोग करके आये थे , आपको बधाई की इस बार उस काम के लिए ३० करोड़ रु दिए हैं , हालांकि यह रकम भी अपर्याप्त है । वैसे तो पिछले कुछ सालों से 5 करोड़ रु ही दिए जाते रहे हैं । अब लगता है की आपकी नीयत उस परियोजना को पूर्ण करने की है , आप इस योजना को जल्द पूर्ण कराये तो बुंदेलखंड की जनता भी आपकी आभारी रहेगी । २००२ से २००४ तक इस योजना के नाम पर सिर्फ 108 करोड़ का ही बजट मिल पाया ।
रेलवे परियोजना के कार्यों में अस्थिरता का दौर चलता रहा और जो काम प्रथम चरण में होना था वह दूसरे चरण में पहुंच गया । दूसरे चरण का का काम प्रथम चरण में शुरू हुआ और खजुराहो से महोबा रेलवे लाइन का उदघाटन 26 दिसंबर 08 को तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने किया । और विश्व विख्यात पर्यटक स्थल खजुराहो रेल मानचित्र से जुड़ पाया ।
ललितपुर से खजुराहो तक 166 किमी का निर्माण कार्य पूर्ण होने और तमाम तरह के तकनीकी परीक्षण के बाद अब वह घडी आई है जब छतरपुर और खजुराहो के लोग रेल से ललितपुर _ और महोबा की और जा सकेंगे । 18 अक्टूबर को उमा भारती ललितपुर से हरी झंडी दिखा कर रेल रवाना करेंगी और उसी से वे आएँगी छतरपुर के रेलवे स्टेशन पर एक सभा करेंगी और खजुराहो में शाम सवा चार बजे वे रेल मंत्री सुरेश प्रभु के साथ उदघाटन समारोह में मौजूद रहेंगी ।
दरअसल रेलवे की इस परियोजना के सर्वेक्षण का काम ब्रितानी शासन काल में भी हुआ था । ब्रितानी हुकूमत सिंगरौली से कोयला परिवहन के लिए इस परियोजना का नक्शा तैयार किया था । 1997 में जनता पार्टी के शासन काल में सांसद लक्ष्मी नारायण नायक ने इस मुद्दे को संसद में उठाया । उनकी इस मांग पर सर्वेक्षण कार्य भी हुआ , तब तक सरकार बदल गई और कांग्रेस शासन काल लागू हो गया < जिसमे इस मांग पर कोई सहमति ही नहीं बनी । १९८० से १९८५ के दौर में कपूरचंद घुवारा के नेतृत्व में पद यात्रा और जेल भरो आंदोलन का दौर चला , लोगों ने लालितपुर में जाकर गिरफ्तारियां दी । उस समय के तत्कालीन विधायक कपूर चंद्र घुवारा , सत्यव्रत चतुर्वेदी ,शंकर प्रताप सिंह बुंदेला ने विधान सभा में सर्व सम्मत प्रस्ताव ललितपुर सिंगरौली रेलवे लाइन के लिए पास कराया था । इसी प्रस्ताव पर तत्कालीन मुख्य मंत्री अर्जुन सिंह ने रीवा - सतना रेलवे लाइन स्वीकृत करा ली थी ।
उमा भारती ने अपने चारो लोक सभा चुनाव् में ललितपुर सिंगरौली रेलवे लाइन को मुद्दा बनाया था । उन्हें भी सफलता तब मिली जब केंद्र में अटल जी की सरकार बन गई । उस समय भी उन्होंने २८ नव 1996 को संसद में उमा भारती इस योजना को जनहितकारी योजना बताते हुए तत्काल स्वीकृति की मांग की । रेल की मांग को लेकर उन्होंने झाँसी सांसद राजेन्द्र अग्निहोत्री , मध्य प्रदेश के संघटन मंत्री कृष्ण मुरारी मोघे और सैकड़ों कार्यकर्ताओं के साथ रेल मंत्रालय में १२ जुलाई १९९६ को धरना भी दिया था । तब कहीं जाकर योजना आयोग के तत्कालीन उपाध्यक्ष मधु दंडवते ने ११ दिसंबर १९९६ को योजना पर अपनी हरी झंडी दे दी \ 1997 _1998 के रेल बजट में उमा भारती के प्रयास से इस योजना को सम्मलित कर लिया गया ।
देखा जाए तो अधिकार और आरजू के इस रेल अभियान में संघर्ष की गाथा भी है , अधिकार की आरजू भी है सियासत के षड्यंत्र भी हैं । इन सबसे निपटने में सात दशक लग गए फिर भी सपना अधूरा है । उम्मीद है की अब रफ्तार वाले प्रधान मंत्री रेल मंत्री के काल में रेल के सपने का अधूरा भाग भी पूर्ण हो जाएगा ।
11 अक्टूबर, 2016
BUndelkhand_Dayri_Paan
बुंदेलखंड में दशहरा का पान
रवीन्द्र व्यास
उत्सव धर्मिता में बुंदेलखंड जैसी मिसाल और कहीं कम ही देखने को मिलती है । परम्पराओं के पर्वो में बुंदेलखंड के लोग शायद अपने कष्टो का निदान तलाश लेते हैं । खेत पर अन्न से परिपूर्ण फसलों के समय जब नवरात्र आते हैं तो बुंदेलखंड कोना कोना ऐसा लगता है मानो किसी धर्म स्थल पर आ गए हों । दशहरा के दिन शुभता की तलाश और रावण दहन के बाद लोगों का एक दूसरे से गले मिलना ,रोरी लगाना और पान का बीड़ा एक दूसरे को खिलाना देख कर यही लगता है मानो शुभता और संस्कृति की यही डोर है जो दुनिया से भारत देश को अलग पहचान दिलाये है । वीरता और विजय के प्रतीक विजयदशमी के दिन बुंदेलखंड में अस्त्र -शस्त्र के पूजन की परम्परा सदियों से चली आ रही है ।
बुंदेलखंड में दशहरा मनाने का भी अपना एक अलग अंदाज है । इस दिन की शुरुआत भी अपने तरह की अनोखी होती है । सुबह से लोग इस प्रयास में रहते हैं की कुछ शुभ दर्शन हो जाए , घर के जेठे {बुजुर्ग } फरमान जारी करते हैं की देखो मछली लेकर आया है , दर्शन कर लो , जाकर देखो कहीं नीलकंठ देख आओ । पूछने पर बताया जाता है की इनके दर्शन शुभ होते हैं साल भर शुभ रहता है । नहाने _ धोने के बाद तैयार हो जाओ पूजन करना है , उठाओ हथियार और उन्हें साफ़ करो उनकी पूजा होनी है । अरे आज दशहरा है सौंप सुपाड़ी , लौंग ,लायची , चूना कत्था पान का कोई इंतजाम हुआ की नहीं । कुछ मिठाई वगैरह बनाई की नहीं ,नहीं तो बाजार से ले आओ ।समी के दर्शन पूजन करना है । ये आवाजे दिन भर सुनने को बुंदेलखंड के घरो में मिलती है । नीलकंठ को भगवन शिव का सबसे प्रिय पक्षी माना जाता है । मान्यता है की भगवान् राम के आराध्य देव भी भगवान् शिव हैं और शिव के प्रिय पक्षी नीलकंठ के दर्शन से हर कार्य में विजयश्री मिलती है । भगवान् राम ने भी रावण वध के पूर्व नीलकंठ के दर्शन करने का उल्लेख मिलता है ।
शाम को रावण दहन के बाद उसी रात या दूसरे दिन या ये कहें कई दिनों तक दशहरा मिलन का कार्यक्रम चलता रहता है । मेल मिलाप के इस दौर में पान खिलाना आवश्यक माना जाता है । बुंदेलखंड की पुरानी रियासतों में इस परम्परा का आज भी राजशी अंदाज में निर्वाहन होता है । छतरपुर रियासत के राज परिवार के वा विधायक विक्रम सिंह उर्फ़ नाती राजा बताते हैं की हमारी रियासत में आजादी के पूर्व 11 जागीरें थी , दशहरा के दूसरे दिन सभी जागीरों के लोग यहां आकर मिलते हैं , एक दूसरे को पान भेंट किया जाता है । यह सब भाईचारे का प्रतीक है ।
राजनगर महाविद्यालय के प्राचार्य और साहित्यकार बहादुर सिंह परमार बुंदेलखंड में दशहरा के पर्व के सम्बन्ध में बताने लगे की यह पर्व वीरता का एक उत्सव है , इसे वीरो का पर्व भी कहते हैं , इस दिन अस्त्र -शस्त्र की पूजा होती है ,और आज भी पुलिस के हथियारों का इस दिन पूजन होता है । पान खिलाने की परम्परा के पीछे बीडा ( पान) उठाने की बात चंदेलो के समय से इस इलाके में चली आ रही है । राज दरबार में पान के बीड़ा रखे जाते थे , युध्द में जाने लिए बीडा उठाया जाता था , जो यह बीड़ा उठाता था यह माना जाता था की वह युध्द भूमि में जाने को तैयार है । दशहरा का पर्व ऋतू परिवर्तन का भी सूचक है वर्षा ऋतू के बाद शरद ऋतू इसी से शुरू होती है , चूँकि वर्षा ऋतू में युध्द नहीं हो पाते थे इस कारण इस समय युध्द के लिए राजाओं की सेना कूच करती थी । पान की इस परम्परा का उल्लेख अनेक समकालीन ग्रंथो में मिलता है ।
बुंदेलखंड के प्रमुख साहित्यकार सुरेंद्र शर्मा शिरीष बताते हैं की बुंदेलखंड में पान का पान का अपना एक अलग महत्व है , धर्म कर्म से लेकर आदर और निरादर तक में इसकी भूमिका है । भगवान् को पान चढ़ाया जाता है , बगैर पान के पूजा अधूरी मानी जाती है । इसी तरह राज दरबार में अपने अतिथि के स्वागत में पान खिलाने की परम्परा रही है । दसहरा में पान एक दूसरे को देना और ख़िलाना सम्मान का सूचक है । बुंदेलखंड में तो एक कहावत है "बीडा उठाना " किसी कार्य को करने के संकल्प लेना ,बीड़ा (पान) उठाकर ही लिया जाता रहा है । पान का पत्ता मान सम्मान का तो प्रतीक है ही साथ ही यह , असत्य पर सत्य का बीड़ा उठाने का संकल्प भी दर्शाता है । यह अलग बात है की आज के में सत्य का बीड़ा सिर्फ दिखावे के लिए रह गया है ।
03 अक्टूबर, 2016
Bundelkhad Dayri_Bundelkhand State
प्रथकता की आग में सुलगता बुन्देलखण्ड
रवीन्द्र व्यास
पृथक बुन्देलखण्ड राज्य निर्माण की मांग को लेकर बुंदेलखंड सुलग रहा है । चुनावी मौसम में इसकी तपन कुछ ज्यादा ही तीव्र हो जाती है । दो राज्यों में बटे हुए बुंदेलखंड को एक अलग राज्य का दर्जा देने की मांग काफी समय से की जा रही है , चुनावी मौसम में हर दल और उसका नेता इसका समर्थन भी करता है । वोट डलने के बाद हर नेता इसे भूल जाता है । फिर वो चाहे उमा भारती हो या मायावती , राहुल गांधी हो या बीजेपी का घोषणा पत्र हो । यही कारण है की बुंदेलखंड राज्य आंदोलन की मांग को लेकर अब लोग नेताओं को घेरने लगे हैं । अक्टूबर माह में झाँसी आये कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को इसी मुद्दे पर बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा के कार्यकर्ताओ ने घेरा था । जिस बुंदेलखंड में आजादी की चिंगारी 1857 से 15 वर्ष पहले केवल हरबोलों की जागरूकता के कारण फैली थी उसी बुंदेलखंड में आजादी के बाद अलग राज्य का आंदोलन टुकड़ों में विभक्त हो गया है , जिसके चलते हर कोई इस मांग को नजरअंदाज कर आगे बढ़ जाता है ।
उत्तर प्रदेश में चुनावी संग्राम शुरू होते ही बुंदेलखंड राज्य की मांग जोर पकड़ती है । उमा भारती ने जब झाँसी से लोकसभा चुनाव लड़ा तो उन्होंने मतदाताओ से वायदा किया था की केंद्र में सरकार बनने के तीन माह के अंदर प्रथक बुंदेलखंड राज्य बनवा दूंगी । उनके चुनाव जीतते ही कहानी बदल गई और कहा जाने लगा की उत्तर प्रदेश वाले बुंदेलखंड क्षेत्र का अलग राज्य बनेगा । यह उन्होंने किस कारण से कहा था ये तो वही जाने पर राजनीतिक जानकार कहते हैं चंद वर्षों के बनवास के बाद अब उमा के तेवर वैसे नहीं रह गए हैं । यही कारण है की ढाई साल बाद भी इस दिशा में कुछ नहीं हुआ । जबकि बीजेपी के अतीत के घोषणा पत्र इस बात के प्रामाणिक दस्तावेज हैं की बीजेपी छोटे राज्यों की पक्षधर रही है । जहां तक उमा भारती की बात है वे व्यक्तिगत तौर पर प्रथक राज्य की पक्षधर रही हैं । 1994 में उन्होंने इस मसले पर सार्थक पहल भी की थी । पर शायद अब मोदी की माया के आगे वे अपने को इस मसले पर और मंत्रियों की तरह बेबस पाती हैं ।
इसी साल जब अक्टूबर माह में राहुलगांधी जब खाट लेकर झांसी आये तो बुंदेलखंड मुक्तिमोर्चा कार्यकर्ताओं ने उन्हें सर्किट हाउस में घेर लिया और बुंदेलखंड राज्य की मांग करने लगे । उन पर आरोप लगाया की जब बसपा सरकार ने अलग बुंदेलखंड राज्य का प्रस्ताव दे दिया था तो फिर क्या वजह है की आपकी तत्कालीन मनमोहन सरकार ने इसे अनदेखा किया जब की तेलंगाना राज्य बना दिया गया । मुक्ति मोर्चा सहित तमाम संघटन अर्शे से देश में राज्य पुनर्घटन आयोग की मांग कर रहे हैं पर उनकी मांग हमेशा अनदेखी की जाती रही है । देखा जाए तो चुनाव के समय उत्तर प्रदेश वाले बुंदेलखंड में हल्ला तो खूब होता है पर जब वोट डलते हैं तो अलग राज्य और सुनहरे सपने पर जाति हावी हो जाती है । यही वो सबसे बड़ी वजह है की प्रथक बुंदेलखंड राज्य की मांग दबकर रह जाती है ।
बुन्देलखण्ड राज्य निर्माण को लेकर उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके में दो दर्जन से ज्यादा संघटन संघर्ष कर रहे हैं । यदा कदा ये संघठन मध्य प्रदेश वाले बुंदेलखंड इलाके में आकर अपनी उपस्थिति दर्ज करा जाते हैं । बुंदलेखंड इलाके की बोली ,वाणी , संस्कृति ,साहित्य और संस्कार एक दूसरे के पूरक होने के बावजूद भी लोग अलग अलग राज्यों में विभक्त हैं । ये अलग बात है की अलग अलग राज्यों की राजनैतिक ताशीर दोनों के एकीकरण में सबसे बड़ी वाधा बनी हुई है । मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड वाले लोगों की मानसिकता भी अब बदल रही है । पांच दस वर्ष पहले जो लोग बुंदेलखंड अलग राज्य का विरोध कर रहे थे वे भी अब स्वीकारने लगे हैं की अलग राज्य जरुरी है । मध्य प्रदेश बुंदेलखंड विकाश प्राधिकरण के पूर्व अध्यक्ष सुरेंद्र प्रताप सिंह तो अब खुल कर बुंदेलखंड राज्य की मांग करने लगे हैं । बुंदेलखंड क्षेत्र के लोगों और नेताओं में आये इस परिवर्तन की कुछ वजह भी है । पिछले १२-१३ वर्षों में जिस तरह की सियासत मध्य प्रदेश में हुई है उसने भी लोगों को सोचने को मजबूर कर दिया । आजादी के बाद पहली बार बुंदेलखडं का कोई मुख्य मंत्री बना तो उसे बीजेपी की राजनैतिक कुटिलता ने चलता कर दिया । जबकि व्यापम जैसे आरोपों में घिरे लोग अब भी पद पर शोभायमान हैं । मध्य प्रदेश में विकाश कुछ सीमित जगहों पर तो हुआ किन्तु बुंदेलखंड का विकाश उस हिसाब नहीं हुआ । डायमंड पार्क खुला नहीं , रियो टिंटो अपना कारोबार बंद कर चुकी है , इन्वेस्टर मीट में जितने एम् ओ यू बुंदेलखंड के लिए किये गए एक भी साकार रूप नहीं ले सका , सागर में खोला गया मेडिकल कालेज यथार्थ में कम कागजी ज्यादा है । किसान आत्म ह्त्या को मजबूर और बेरोजगारों को मुख्य मंत्री रोजगार योजना से लोन नहीं मिलता ।
बुन्देलखण्ड मुक्ति मोर्चा के विक्रम प्रताप सिंह राज्य निर्माण के आन्दोलन को गति देने के लिए हर परिवार से एक सदस्य की भागीदारी आवश्यक मानते हैं ।
ई० पू० ३२१ तक वैदिक काल से मौर्यकाल तक का इतिहास वस्तुत: बुंदेलखंड का पौराणिक-इतिहास माना जा सकता है। इसके समस्त आधार पौराणिक ग्रंथ है।
दरअसल बुंदेलखंड का इतिहास बताता है की वैदिक काल से मौर्य काल तक पौराणिक इतिहास है । बुंदेलखंड शब्द मध्य काल में आया , इसके सीमांकन के बारे में कहा जाता है " की चम्बल से लेकर नर्वदा तक और यमुना नदी से लेकर टमस नदी तक का भूभाग बुंदेलखडं है । यह इलाका ऋषि मुनियों का तप स्थल रहा और भगवान् श्री राम ने अपना वनवास यही के चित्रकूट धाम में व्यतीत किया था । तो पांडव भी अपना अज्ञात वास यही काटा था । लगभग 70 वर्ग किमी में फैले इस भूभाग की लगभग ४ करोड़ की आबादी के लिहाज से यह देश का एक बड़ा राज्य होगा । हीरा , सोना , यूरेनियम, लोह अयस्क जैसी अमूल्य खनिज सम्पदा अपने गर्भ में धरे यह इलाका राजनैतिक नक्कारेपन के कारण देश के सबसे बदहाल इलाकों में गिना जाता है । यहाँ की बिजली से महानगर और बड़े नेताओं के इलाके तो रोशन होते हैं पर यहां के लोग खुद अँधेरे में रहने को मजबूर हैं ।
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