सामाजिकता से दूर सामाजिक
पंचायते
रवीन्द्र व्यास
बुंदलेखंड में गाँव और
समाज की
पंचायतों का
अपना एक
अलग महत्व
छत्रसाल के
शासन काल
में रहा
है ।
गाँव -गाँव
में छत्रशाली
चबूतरों
पर पंच बैठ कर सामाजिक
और आपसी
संघर्ष का
निपटारा करते
थे ।
पचो के
निर्णय को
राज्य की
मान्यता थी
। और
आज के
दौर में
पंचायत के
फैसले सामाजिकता
से दूर ऐसे हो रहे
हैं की
सभ्य समाज
शर्मिंदा हो
रहा है
।
पिछले दिनों बुंदेलखंड के टीकमगढ
जिले
मे एक महिला को समाज की
पंचायत के
फैसले के
कारण आत्महत्या मजबूर
होना पड़ा
। सामाज
की पंचायत
के फैसले
के कारण
आत्म हत्या
का बुंदेलखंड
इलाके में
यह संभवतः
पहला मामला
है ।
अब तक
के
इस तरह के पंचायती फैसलों
में
पंचायते व्यक्ति
और उसके
परिवार को
सामाजिक दंड देकर अपनी चौधराहट
कायम रखती
थी ।
यह व्यवस्था बुंदेलखंड
के ग्रामीण
ही नहीं
शहरी इलाकों
में भी
कई जगह
देखने को
मिल जाती
है ।
टीकमगढ़ की
इस घटना
के बाद
एक और
घटना छतरपुर
नगर में
सामने आई जिसमे
एक युवक
की शादी
सिर्फ इस
कारण टूट
गई क्योंकि
उसके परिवार
का हुक्का
पानी समाज
के लोगों
ने बंद
कर रखा
था ।
टीकमगढ़ के
कारी बुजरुआ
गाँव की सखी पाल (३८)
के
चरित्र पर पंचायत ने ऊँगली उठाई
थी । उस पर तीन
हजार रु
जुर्माना किया
गया ।
बाद में दंड को अपर्याप्त
मानते हुए महिला
को गाँव
से कुंडेश्वर
( बुंदेलखंड का प्रमुख धर्म स्थल
) तक दंडवत
करते हुए
जाना - आना
होगा, वहां
का प्रसाद
गाँव वालों
को खिलाना
होगा, इसके
बाद भागवत
कराने की
सजा सुना दी । झूठे चरित्र
लांछन ने और इस कठोर
दंड ने
महिला को
मौत को
गले लगाने
पर मजबूर
कर दिया
।
इस मामले
में सती
पाल का
पति राकेश
पाल गाँव
वालो और
समाज के
लोगों को
चीख चीख
कर बताता
रहा की
उसकी पत्नी
चरित्र हीन
नहीं है
। मजदूरी
करने दोनों
साथ साथ
जाते हैं
, पर उसकी
एक नहीं
सुनी गई
और उसे
समाज से
बहिस्कृत कर
दिया गया
। हद
तो तब
हो गई जब उसके ही चाचा ने
27 फरवरी को आयोजित
शादी समारोह में उसे वा उसके
परिवार को
नहीं बुलाया
। पूंछने
पर उसे
जबाब मिला तेरी पत्नी चरित्र
हींन है
।
पुलिस ने
मामले में
सात(पंचो
) लोगो के
विरुद्द आत्म
ह्त्या के
लिए प्रेरित
करने का
मामला दर्ज
किया ।
मामला
दर्ज होते ही सभी आरोपी
फरार हो
गए ।
दूसरी तरफ
समाज ने
फिर पंचायत
जोड़ी और
दोषी पंचो
के
विरुद्ध १२ वर्ष के
लिए
बहिष्कृत करने का फैसला लिया
गया । पंचायत
लगाने वाले
समाज के
मठाधीशों से
प्रशासन के
किसी
तंत्र ने यह जानने की
कोशिश नहीं
की कि समाज की पंचायत
को किसी
को चरित्र
हीन अथवा
किसी को
सजा देने
का अधिकार
किसने प्रदान
कर दिया
? पंचायत
के कथित
फैसले के
बाद
विरोध करने वालो का विरोध
करने का
साहस पंच
प्रमुखों ने
क्यों नहीं
किया ? एक
पंचायत में
इतना बड़ा
हादसा
हो जाने के
बाद दूसरी पंचायत
पुलिस और
प्रशासन के
मौजूदगी में
कैसे लग
गई और
फिर कैसे
उन्होंने दंड
सुना दिया
? इन सवालों
के जबाब
लाचार तंत्र
के पास
नहीं हैं
।
क्या है समाज
पंचायत ?
वैदिक काल से
समाज और
गाँव की
पंचायतों का
उल्लेख मिलता
है ।
वैदिक काल
से मध्य
काल तक
इन ग्राम
पंचायतो के अधिकार
और कर्तव्य गाँव और समाज
की व्यवस्था
के लिए
बहुत मह्त्व्
पूर्ण माने
जाते थे
। मनु
ने समाज
पर नियंत्रण
के लिए
सामाजिक पंचायत
की एक
व्यवस्था बनाई
थी ।
जिसमे मुखिया
को न्यायाधीश
के रूप
में माना
गया ।
दरअसल यह
सामाजिक प्रशासन
की एक
व्यवस्था है
जो देश
के
कई राज्यों में अनादि काल
से चली
आ रही
है , इसका
मकसद
सामाजिक व्यवस्थाओ को बनाये रखने
का था
,ताकि सामाजिक
मान्यताये , परम्पराए और मर्यादा
बनी रहे
। इसी
अधर पर
बाद में
ग्रामपंचायत का जन्म हुआ था
।
.अंग्रेजो के शासन
काल में
ग्राम पंचायतो
और उनकी
व्यवस्था छिन्न
-भिन्न
हो गई । पर इस
दौर में
भी सामाजिक , जातीय
और वर्गों
की पंचायतें
अपना अस्तित्व
बनाये रही
, बल्कि ये
और
ज्यादा सबल हो गई । ऐसी सामाजिक पंचायतों
की दंड
प्रणाली और
भी कठोर थी । काफी
समय बाद
अंगेजों को
हिन्दुस्तान की विकेन्द्रित कार्य प्रणाली
का आभाष
हुआ
और उन्होंने 1907 में नगर पालिका
बोर्ड , और
1920 में ग्राम
पंचायत अधिनियम
जरूर
बनाये पर उनमे जातीय अथवा
सामाजिक पंचायतों
का कोई
स्थान नहीं
था
।
देखा जाए तो जिन सामाजिक
जातीय पंचायतो को सामाजिक मर्यादाओं
और परम्परा
का पालन
करना था
वे ही
अपनी मर्यादा
को तार
-तार करने
में जुट
गई । इस तरह से
तुगलकी निर्णय
लेती रहेंगी
तो
वह समय भी दूर नहीं
होगा जब
इनका अस्तित्व
समाप्त हो
जाएगा ।
लोग
भी ऐसी पंचायतों के पंचो
पास जाने
की अपेक्षा प्रशासन
और पुलिस
के पास
जाने में
ही अपनी
भलाई समझेंगे
।
. बुन्देलखण्ड
में पंचायत के तुगलकी
फरमान: का यह कोई
पहला मामला
नही है।
इसके पहले
भी इस
तरह के
मामले सामने
आते रहे
है। यह
स्थिति तब
है जब
की
सरकार द्वारा समाज मे जागरुकता
लाने के
लिये बाकायदा
अलग से
पंचायत न्याय
विभाग की
स्थापना की
गई है।
जिसके लिये
राज्य सरकार
द्वारा हर
साल बडी
रकम के
तौर पर
बजट भी
मुहैया कराया
जाता है।
लेकिन बुन्देलखण्ड
मे आ
रहे पंचायत
के तुगलकी
फरमानो से
नही लगता
कि पंचायत
न्याय विभाग
क्षेत्रो मे
काम कर
रहा है।
आजादी मिले
भले ही
69 साल गुजर
गये हो
लेकिन बुन्देलखण्ड
मे लोग आज भी सामाजिक
कुरुतियों के जाल में उलझे है। इसी की
परिणतीहे आज भी
समाज ऐसे
फरमान सुनाता
है जिसमे
पीडित को
अपनी जान
तक देनी
पडती है।
इसके पहले एक टीकमगढ़
जिले के
बल्देवगढ़ थाना
इलाके के
जटेरा गाँव
में सितम्बर
13 में एक
पंचायत बैठी
। पंचयात
में बाकायदा
एक तांत्रिक
को बुलाया
गया , तांत्रिक
के कहने
पर पंचायत
ने एक
महिला के
भरी पंचायत
में कपडे
उतरवाकर निशाँन
देखे गए
थे ।
जिस पुलिस
को मामले
की जांच
कर दोषियों
को दण्डित
कराना था
उसने राजीनामा
का प्रयास
किया था
।
टीकमगढ़ जिले
में सितम्बर
१३ में
मणिकपुरा गांव
में रैकवार
समाज के एक परिवार का
कुटुंब सहित
मुंडन कराने
का फरमान
जारी हुआ
था ।
इस परिवार
के एक
सदस्य के
ट्रेक्टर के
नीचे गाय
मर गई
थी ।
टीकमगढ़ जिले के स्यावनी
गाँव में
एक दलित
बालिका से
रेप और
गर्भपात का
मामला सुलझाने
के लिए
पंचयात ने
5 हजार का
दंड बलत्कारी
डॉ पर
लगाकर छोड़
दिया था
। लड़की
के पिता
ने जब
पुलिस में
शिकायत की
तो गाँव
की पंचायत
ने हुक्का
पानी बंद
करने की
धमकी दी
थी ।
खैर बाद
में पुलिस
ने डॉ
नकता विश्वास
, उसकी पत्नी
और एक
अन्य आरोपी
को गिरफ्तार
किया था
।
। टीकमगढ
जिले के
निवाड़ी थाना
इलाके के
चुरारा गाँव
में अक्टूबर
१५ में पंचायत केफैसले
के बाद
से एक
परिवार सामाजिक बहिष्कार
की सजा
भुगतने
को मजबूर हुआ । पिछड़े वर्ग के परिवार की नाबालिग
लड़की को वंशकार समाज का लड़का
भगा
कर ले गया था । इसमें
दोष लड़की
वालों का
माना गया
और उसे
समाज से
बहिष्कृत कर
दिया गया
।
ये तो
सिर्फ टीकमगढ़
जिले के
कुछ चद
उदाहरण हैं जो सामाजिक पंचायतों
के
समाज में बढ़ते प्रभाव को
दर्शाते हैं
। पर
यह कहानी
सिर्फ टीकमगढ़
जिले तक
सीमित नहीं
है इस
तरह की पंचायतें
बुंदेलखंड के हर जिले के
गाँवों में
आये दिन
होती रहती
हैं । सामाजिक
पंचायतों का
खौफ इतना
जबरदस्त होता
है की
पीड़ित लोग
इसके फैसले
को स्वीकारने
में ही
अपनी भलाई
समझ लेते
हैं ।
इस तरह
की पंचायतों
की ख़बरें
तब बाहर
आती हैं
जब दंड
सहन शक्ति
के बाहर
हो जाता
है ।
टीकमगढ़ के
कारी बजरुआ सामाजिक
पंचायत की
भनक भी
शायद लोगों
को नहीं
लगती यदि
सखी बाई
आत्म ह्त्या
नहीं करती
।
जिस प्रशासनिक तंत्र
को समाज तरह की कुरीतियाँ
रोकने का
अधिकार है
वह इस
तरह के
मामले से
दूर ही
रहने में
अपनी भलाई
समझता है
। यह
जानते हुए
भी की
इस तरह
की पंचायतो
के माध्यम
से किसी
को दंड
देने का
अधिकार किसी
भी व्यक्ति
अथवा समाज
को नहीं
है ।


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