26 सितंबर, 2015

 बुंदेलखंड :
दफ़न होते तन और दाल के लिए जान गंवाते लोग 

रवीन्द्र व्यास 
गरीबी के चलते आदिवासी का शव दफनाने को मजबूर होता आदिवासी समाज , दाल की जुगाड़ में उरद की कटी फसल चोरी की,  देखने वाले को   मौत के घाट उतार  ,दिया । बुंदेलखंड में सूखी फसल और कर्ज का बोझ - चार किसानो ने मौत को गले लगाया , किस्मत से एक बच गया ।  बुंदेलखंड इलाके की ये तस्वीरें बताती हैं की यहां की पीर को समझने का कोई प्रयास नहीं करता है या समझ कर जानबूझ कर इसे अनदेखा किया जाता है ।     
 सागर जिले  के कुडारी  गाँव में एक आदिवासी के शव को परिजनों ने इसलिए दफना दिया, क्योंकि उनके पास दाह संस्कार के लिए लकड़ियों के लिए पैसा नहीं था।  थोना आदिवासी (50) उसका परिवार जंगल में लकड़ियां बीनकर अपना जीवन चलाता था  । इसके पास अपने ही अंतिम संस्कार के लिए लकड़ियाँ नहीं जुड़ पाई , और ना ही लकड़ियाँ खरीदने को पैसा थे । क्योंकि जो पैसा इस आदिवासी  परिवार के पास था ,  वह थोना के इलाज में खर्च हो गया । और इलाज के दौरान ही ४ सितम्बर को उसकी मौत हो गई । सागर से महज ८ किमी की दूरी पर बसे  इस गाँव  के लिए ४ सितम्बर का दिन वह  दुर्भाग्य शाली दिन था जब थोना आदिवासी को दफ़नाना पड़ा । 
 थोना की पत्नी सुमंत्रा बताती है  कि उसके पति की चार सितम्बर को सरकारी अस्पताल में इलाज  के दौरान मौत हो गई थी। मौत के बाद उनके लिए थोना का अंतिम संस्कार करना बड़ी समस्या बन गई। क्योंकि उनके पास इतनी रकम नहीं थी कि वे लकड़ियां खरीदकर अंतिम संस्कार कर सकें। यही कारण था कि थोना को जमीन में दफना दिया गया।
  अपनी सामन्य जीवन शैली  के कारण अलग पहचान बनाने वाले इस आदिवासी परिवार की शायद हकीकत ही  सामने  ना आ पाती  यदि  यह मामला  भाजपा) के विधायक हरवंश सिंह राठौर  के सामने  नहीं पहुंचा होता । उन्होंने ने थोना की तेरहवी के लिए 20 हजार रुपये की आर्थिक सहायता  देकर मानव कल्याण का काम तो किया ।  २१ सितम्बर को जब सागर के पत्रकार उनके पास गए तो उन्होंने बातों ही बातों थोना आदिवासी के दफ़नाने की बात भी बता दी । मीडिया को जानकारी लगते ही यह खबर अखबारों की सुर्खिया बनी । मीडिया के बात करने पर ही कलेक्टर ने मामले की जांच के आदेश दिए । 
 यहां यह उल्लेखनीय है की सरकार  “राज्य में गरीब के अंतिम संस्कार के लिए दो हजार रुपये की आर्थिक सहायता  देती है ।   ग्रामीण इलाकों में यह राशि पंचायत और शहरी इलाके में नगरीय निकाय द्वारा मुहैया कराई जाती है। कुडारी में  पंचायत और वहां के लोग भी एक तरह से सामाजिक अपराध के  दोषी ही माने जाएंगे । 
 दाल चोरी की ना खुले पोल तो कर दी ह्त्या 
बुंदेलखंड इलाके गाँवों  की यह परम्परा रही है की आपसी मेल जोल से काम करने और  दूसरे  सुख दुःख में काम आने की । अगर पडोसी सूखी रोटी खाता दिख जाए तो पडोसी तत्काल अपने यहां से दाल -सब्जी जो भी उपलब्ध हो उसके यहां पहुंचा देता था । गाँव के खलिहान एक साथ लगते थे सब एक दूसरे के खलिहानों की सुरक्षा करते थे । अनाज की चोरी सबसे अधम कृत्य माना जाता था । आज हालात बदल गए हैं , लोगों के पास अपने खाने को नहीं है वे दूसरो को क्या खिलाये । इस कदर बदत्तर हालात हुए हैं की लोग अब खलिहान से ही दाल चुराने लगे हैं ।  चोरी की पोल ना खुल जाए इस कारण ह्त्या करने से भी नहीं चूक रहे हैं । 
 ऐसी ही एक दुखद घटना   टीकमगढ़  जिले खिरिया पुलिस चौकी के  कुमरऊ खिरिया  गाँव में    घटी  ।  सोमवार 21 सितंबर को गाँव के  चौकीदार सुखनंदन राय (50)  की ह्त्या  उसी के खेत में कर दी गई । ह्त्या का मामला जब खुला तो  टीकमगढ़ के अनेको समाजशास्त्री  सोचने पर मजबूर हो गए ।  पुलिस के  सामने ह्त्या की  जो कहानी सामने आई वह काम चौंकाने वाली नहीं थी ।   सुखनंदन राय  अपने खेत से उड़द की फसल काट  रहा था ,  उसने गांव के तीन लड़को को   खेत से उड़द दाल  की कटी हुई फसल  को चुराते हुए  देख लिया  था। उसने उन  लड़कों से कहा  कि वह उनके माता-पिता से कहेगा और पुलिस को भी बताएगा। इस बात  से नाराज लड़के  सुखनंदन की  पत्नी के जाने का इन्तजार  करते रहे , और उसके जाते ही  तीनो लड़कों ने सुखनंदन की गला घोंट कर ह्त्या कर दी । चौकी प्रभारी लखन शर्मा ने  गनेश  अहिरवार (25) एवं एक 15 साल का नाबालिग है तथा एक 14 साल का नाबालिग के विरूद्ध धारा 302, 34 के तहत मामला दर्ज किया  है।  तीन में से पकड़े गए एक लड़के ने  पूछताछ  घटना को कबूल कर लिया।  
          दरअसल इस साल भी पिछले साल की तरह बुंदेलखंड में अकाल के हालात हैं । किसान  खरीफ फसल की बदहाल दशा देख कर चिंतित है । इन्ही हालातों के चलते  पहले टीकमगढ़ जिले के तीन किसानो ने आत्म ह्त्या की जिसमे से एक को बचा लिया गया । वहीँ सागर जिले में एक किसान ने आत्म ह्त्या की । बुंदेलखंड में पहले ओला गिरने से रबी कीफसल खराब हुई। अब मॉनसून में महज 51 फीसदी बारिश होने से दलहन के खेत सूख रहे हैं। यहां बीते 6 साल से लगातारसूखा पड़ रहा है। पूरे बुंदेलखंड में गैरसरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस साल सदमें और आत्महत्या करने से 365 किसानोंकी मौत  हो चुकी है । उस पर भी मध्य प्रदेश  सरकार ने बुंदेलखंड के कुछ इलाकों को ही सूखा ग्रस्त घोषित कर किसानो के जख्मो पर नमक लगाने का काम किया है । 
              एक सामजिक संस्था सोशल मीडिया फाउंडेशन  बुंदेलखंड की बदहाली के पीछे मुख्य वजह मानती है  इस इलाके के कमजोर राजनैतिक नेतृत्व को ।  सवाल सहज ही खड़े होते हैं क्या  प्रदेश का शासन तंत्र इतना कमजोर  हो गया है की  उनके आधीन काम करने वाले नौकर शाह सरकार की योजनाओ का लाभ भी जनता को ना दें , और जिला का मुखिया सबकुछ जानने के बाद भी कहे  मामले की जांच की जायेगी । जो चीजें स्वयं प्रमाणित हैं की  आदिवाशी परिवार को आर्थिक सहायता नहीं मिली  तो उसे मजबूरन  शव  दफ़नाना पड़ा ,?  फसलों के हालात और लगातर प्रकृति के प्रकोप का सामना करते किसान के बच्चे जब दाल की जुगाड़ में ह्त्या करने लगें  तो इसे मानव समाज क्या कहेगा , और किसे दोष देगा ।  

23 सितंबर, 2015

नशे की लत में डूबा बचपन
अभिषेक व्यास 
राष्ट्र का भविष्य कहे जाने वाले बच्चों में नशा़खोरी की लत इस तेज़ी से बढ़ रही है कि दस वर्ष की आयु में प्रवेश करते ही ज़्यादातर बच्चे विभिन्न प्रकार के नशीले और मादक पदार्थों का सेवन करने लगते हैं। .
संयुक्त राष्ट्र संघ के नारकोटिक्स नियंत्रण बोर्ड की वर्ष 2009 की रिपोर्ट में बताया गया है कि दस से ग्यारह वर्ष की आयु के 37 प्रतिशत स्कूली विद्यार्थी विभिन्न प्रकार के मादक पदार्थों का सेवन करने लगते हैं और वे नशा़खोरी की आदत के शिकार हो जाते हैं. सबसे ज़्यादा चिता की बात है अति ग़रीब और ग़रीब वर्ग के बच्चों की, जो सबसे ज़्यादा नशे की गिरफ़्त में आ रहे हैं.
संयुक्त राष्ट्र संघ के नारकोटिक्स नियंत्रण बोर्ड की वर्ष 2009 की रिपोर्ट में बताया गया है कि दस से ग्यारह वर्ष की आयु के 37 प्रतिशत स्कूली विद्यार्थी विभिन्न प्रकार के मादक पदार्थों का सेवन करने लगते हैं और वे नशा़खोरी की आदत के शिकार हो जाते हैं.
अब यह बात किसी से छुपी नहीं है कि ये बच्चे तंबाखू, गुटखा से लेकर गांजा, अ़फीम, चरस, हेरोईन जैसे घातक मादक पदार्थो का सेवन करते हैं. इन बच्चों के माता-पिता और वयस्क परिवारजन रोजी-रोटी की जुगाड़ में व्यस्त रहते हैं और वे बच्चों पर कोई ध्यान नहीं देते हैं. यहां तक कि दस वर्ष की उम्र में ही बच्चे भी स्कूल छोड़कर कचरा बीनने, होटलों, ढाबों में मज़दूरी करने या बाज़ार में फेरी लगाकर सामान बेचने का काम करने लगते हैं और वे अपनी कमाई से मादक पदार्थ खरीदने में सक्षम हो जाते हैं.
बच्चों में नशा़खोरी की लत का अध्ययन करने वालों का कहना है कि ज़्यादातर बच्चों को नशे की लत उनके वयस्क या हमउम्र नशा़खोरों के ज़रिए ही लगती है. परिवार की उपेक्षा के कारण ये भोले-भाले बच्चे नशा कराने वाले को ही अपना मित्र और सच्चा हमदर्द मान लेते हैं और नशे की आदत में पड़कर हर तरह के शोषण का शिकार हो जाते हैं.
नशे की गिरफ़्त में आए बच्चे जब मनचाहा नशा नहीं कर पाते हैं तो वे ख़ून में बढ़ती मादक पदार्थो की मांग को पूरा करने के लिए शरीर के लिए घातक पदार्थों का भी सेवन करने लगते हैं, जैसे कि बोन फिक्स, क्यूफिक्स और आयोडेक्स. कई बच्चे तो पेट्रोल और केरोसिन भी पीकर नशे की प्यास बुझाते हैं.
नशे के ग़ुलाम ये बच्चे या तो बेमौत मर जाते हैं या फिर अपराध की अंधी दुनिया में प्रवेश कर समाज और देश के लिए विकट समस्या बन जाते हैं. सरकार और समाज बच्चों को नशे की आदत से बचाने के जो भी उपाय कर रही हैं, वे पर्याप्त और प्रभावी नहीं हैं. इसलिए ज़रूरी है कि देश के भविष्य को पतन के रास्ते से बचाने के लिए परिवार से उपेक्षित, ग़रीब, अशिक्षित और बाल मज़दूरी करने वाले बच्चों को नशे से बचाने के लिए गंभीरता से प्रभावी और कारगर उपाय किए जाने चाहिए.नशे की लत में डूबा बचपन
राष्ट्र का भविष्य कहे जाने वाले बच्चों में नशा़खोरी की लत इस तेज़ी से बढ़ रही है कि दस वर्ष की आयु में प्रवेश करते ही ज़्यादातर बच्चे विभिन्न प्रकार के नशीले और मादक पदार्थों का सेवन करने लगते हैं.
संयुक्त राष्ट्र संघ के नारकोटिक्स नियंत्रण बोर्ड की वर्ष 2009 की रिपोर्ट में बताया गया है कि दस से ग्यारह वर्ष की आयु के 37 प्रतिशत स्कूली विद्यार्थी विभिन्न प्रकार के मादक पदार्थों का सेवन करने लगते हैं और वे नशा़खोरी की आदत के शिकार हो जाते हैं. सबसे ज़्यादा चिंता की बात है अति ग़रीब और ग़रीब वर्ग के बच्चों की, जो सबसे ज़्यादा नशे की गिरफ़्त में आ रहे हैं.
संयुक्त राष्ट्र संघ के नारकोटिक्स नियंत्रण बोर्ड की वर्ष 2009 की रिपोर्ट में बताया गया है कि दस से ग्यारह वर्ष की आयु के 37 प्रतिशत स्कूली विद्यार्थी विभिन्न प्रकार के मादक पदार्थों का सेवन करने लगते हैं और वे नशा़खोरी की आदत के शिकार हो जाते हैं.
अब यह बात किसी से छुपी नहीं है कि ये बच्चे तंबाखू, गुटखा से लेकर गांजा, अ़फीम, चरस, हेरोईन जैसे घातक मादक पदार्थो का सेवन करते हैं. इन बच्चों के माता-पिता और वयस्क परिवारजन रोजी-रोटी की जुगाड़ में व्यस्त रहते हैं और वे बच्चों पर कोई ध्यान नहीं देते हैं. यहां तक कि दस वर्ष की उम्र में ही बच्चे भी स्कूल छोड़कर कचरा बीनने, होटलों, ढाबों में मज़दूरी करने या बाज़ार में फेरी लगाकर सामान बेचने का काम करने लगते हैं और वे अपनी कमाई से मादक पदार्थ खरीदने में सक्षम हो जाते हैं.
बच्चों में नशा़खोरी की लत का अध्ययन करने वालों का कहना है कि ज़्यादातर बच्चों को नशे की लत उनके वयस्क या हमउम्र नशा़खोरों के ज़रिए ही लगती है. परिवार की उपेक्षा के कारण ये भोले-भाले बच्चे नशा कराने वाले को ही अपना मित्र और सच्चा हमदर्द मान लेते हैं और नशे की आदत में पड़कर हर तरह के शोषण का शिकार हो जाते हैं.
नशे की गिरफ़्त में आए बच्चे जब मनचाहा नशा नहीं कर पाते हैं तो वे ख़ून में बढ़ती मादक पदार्थो की मांग को पूरा करने के लिए शरीर के लिए घातक पदार्थों का भी सेवन करने लगते हैं, जैसे कि बोन फिक्स, क्यूफिक्स और आयोडेक्स. कई बच्चे तो पेट्रोल और केरोसिन भी पीकर नशे की प्यास बुझाते हैं.
नशे के ग़ुलाम ये बच्चे या तो बेमौत मर जाते हैं या फिर अपराध की अंधी दुनिया में प्रवेश कर समाज और देश के लिए विकट समस्या बन जाते हैं. सरकार और समाज बच्चों को नशे की आदत से बचाने के जो भी उपाय कर रही हैं, वे पर्याप्त और प्रभावी नहीं हैं. इसलिए ज़रूरी है कि देश के भविष्य को पतन के रास्ते से बचाने के लिए परिवार से उपेक्षित, ग़रीब, अशिक्षित और बाल मज़दूरी करने वाले बच्चों को नशे से बचाने के लिए गंभीरता से प्रभावी और कारगर उपाय किए जाने चाहिए.नशे की लत में डूबा बचपन
राष्ट्र का भविष्य कहे जाने वाले बच्चों में नशा़खोरी की लत इस तेज़ी से बढ़ रही है कि दस वर्ष की आयु में प्रवेश करते ही ज़्यादातर बच्चे विभिन्न प्रकार के नशीले और मादक पदार्थों का सेवन करने लगते हैं.
संयुक्त राष्ट्र संघ के नारकोटिक्स नियंत्रण बोर्ड की वर्ष 2009 की रिपोर्ट में बताया गया है कि दस से ग्यारह वर्ष की आयु के 37 प्रतिशत स्कूली विद्यार्थी विभिन्न प्रकार के मादक पदार्थों का सेवन करने लगते हैं और वे नशा़खोरी की आदत के शिकार हो जाते हैं. सबसे ज़्यादा चिंता की बात है अति ग़रीब और ग़रीब वर्ग के बच्चों की, जो सबसे ज़्यादा नशे की गिरफ़्त में आ रहे हैं.
संयुक्त राष्ट्र संघ के नारकोटिक्स नियंत्रण बोर्ड की वर्ष 2009 की रिपोर्ट में बताया गया है कि दस से ग्यारह वर्ष की आयु के 37 प्रतिशत स्कूली विद्यार्थी विभिन्न प्रकार के मादक पदार्थों का सेवन करने लगते हैं और वे नशा़खोरी की आदत के शिकार हो जाते हैं.
अब यह बात किसी से छुपी नहीं है कि ये बच्चे तंबाखू, गुटखा से लेकर गांजा, अ़फीम, चरस, हेरोईन जैसे घातक मादक पदार्थो का सेवन करते हैं. इन बच्चों के माता-पिता और वयस्क परिवारजन रोजी-रोटी की जुगाड़ में व्यस्त रहते हैं और वे बच्चों पर कोई ध्यान नहीं देते हैं. यहां तक कि दस वर्ष की उम्र में ही बच्चे भी स्कूल छोड़कर कचरा बीनने, होटलों, ढाबों में मज़दूरी करने या बाज़ार में फेरी लगाकर सामान बेचने का काम करने लगते हैं और वे अपनी कमाई से मादक पदार्थ खरीदने में सक्षम हो जाते हैं.
बच्चों में नशा़खोरी की लत का अध्ययन करने वालों का कहना है कि ज़्यादातर बच्चों को नशे की लत उनके वयस्क या हमउम्र नशा़खोरों के ज़रिए ही लगती है. परिवार की उपेक्षा के कारण ये भोले-भाले बच्चे नशा कराने वाले को ही अपना मित्र और सच्चा हमदर्द मान लेते हैं और नशे की आदत में पड़कर हर तरह के शोषण का शिकार हो जाते हैं.
नशे की गिरफ़्त में आए बच्चे जब मनचाहा नशा नहीं कर पाते हैं तो वे ख़ून में बढ़ती मादक पदार्थो की मांग को पूरा करने के लिए शरीर के लिए घातक पदार्थों का भी सेवन करने लगते हैं, जैसे कि बोन फिक्स, क्यूफिक्स और आयोडेक्स. कई बच्चे तो पेट्रोल और केरोसिन भी पीकर नशे की प्यास बुझाते हैं.
नशे के ग़ुलाम ये बच्चे या तो बेमौत मर जाते हैं या फिर अपराध की अंधी दुनिया में प्रवेश कर समाज और देश के लिए विकट समस्या बन जाते हैं. सरकार और समाज बच्चों को नशे की आदत से बचाने के जो भी उपाय कर रही हैं, वे पर्याप्त और प्रभावी नहीं हैं. इसलिए ज़रूरी है कि देश के भविष्य को पतन के रास्ते से बचाने के लिए परिवार से उपेक्षित, ग़रीब, अशिक्षित और बाल मज़दूरी करने वाले बच्चों को नशे से बचाने के लिए गंभीरता से प्रभावी और कारगर उपाय किए जाने चाहिए.। 
Social Media Foundation| 

10 सितंबर, 2015

पैर में पड़ी चांदी की छड़ के लिए ह्त्या कर काटा पैर




रवीन्द्र व्यास 

 
जिले के  बड़ागांव धसान थाने के ग्राम अंतौरा  में  मातम पसरा  है । गाँव  का  त्रिलोक सिंह   सितम्बर की  शाम अपने खेत पर पानी देने  गया था । जब    त्रिलोक सिंह का कहीं पता नही चला तो उसकी मां कुसुम राजा  की रिपोर्ट पर  पुलिस ने 6 सितम्बर  गुमइंसान कायम किया था । खुद गाँव वाले  जब  सोमवार को त्रिलोक सिंह खो  में लगे तो गांव से करीब  किमी दूर नंदू  आदिवासी के खेत के पास  त्रिलोक सिंह का शव पड़ा मिला  ्रिलोक सिंह का एक पैर शव से कु ही दूरी पड़ा थाजिसे धारदार हथियार से काटा गया था तथा सिर में भी धारदार हथियारों की चोटे थीं   । मिलनसार व्यक्ति  त्रिलोक की मौत के सम्बन्ध में गाँव वाले और परिवार वाले किसी भी रंजिश से इंकार करते हैं । ह्त्या की वजह जो गाँव वालों ने बताई वो हैरान करने वाली है ।  कहते हैं की त्रिलोक सिंह का चार पांच साल पहले  एक्सीडेंट हुआ था । इस दुर्घटना में उसके एक पैर में चांदी की छड़  डाली गई थी । और वह स्वयं यह बात कहता रहता था की एक लाक का माल तो हम लेकर चलते हैं । यही कारण है मृतक की माँ और परिवार के लोग मानते हैं   लगभग एक लाख रु मूल्य की इस छड़ को पाने के लिए ये ह्त्या हुई है । त्रिलोक  के कटे हुए पैर में वह छड़ नहीं मिली ।  
त्रिलोक की माँ कुसुम राजे  बताती हैं की  शुक्रवार को घर से खाना खा कर गए , कि धान में पानी डालने के लिए जा रहे हैं , नंदू सौंर के घर पर मिले कोई रंजिश नहीं थी । पाँव  काटा छोल दिया एक पाँव काट फेक दिया । पाँव में चांदी की छड़ डली थी , एक पैर टूट गया था ,छतरपुर से वापस लौटते समय  बस और जीप के बीच में फंस गए  थे । झाँसी में छड़ डाली गई एक लाख सत्तर हजार  रु लगे थे । जब की त्रिलोक के भतीजे  हाकिम सिंह का कहना है कि  चौथे दिन छापर हार कूची पहार में  उनकी डेड बॉडी पाई गई , उनका एक पैर कटा हुआ था , काटने वाले ने इसी लालच में पैर काटा है , शायद इसी वजह से उनकी ह्त्या की गई उसमे तीन पाँव की चांदी की छड़ डली हुई थी , क्योंकि उनका उनका ४-५ साल पहले एक्सीडेंट हुआ था । 
साजिस -पप्पू उसका नाम है और नंदू सौर  का मकान है दोनों भाई नंदू के और इसके तीनो की साजिस हो सकती है । 
70 _80 हजार की चांदी की दो छड़ें डली थी 

                    सोमवार दोपहर  बड़ागांव धसान थाना पुलिस मौके पर पहुंची और शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया पुलिस अब दावा कर रही है की आरोपियों की  सरगर्मी से आरोपियों की तला शुरू कर दी है। पर  इस घटना से गांव में सनसनी दशहत फैल गई  है, । पुलिस  त्रिलोक के पैर में लगी  चांदी की छड़ के सम्बंद  में जांच  की बात कह मौन धारण किये हुए है ।  एडीशनल एस पी  टीकमगढ़ राकेश खाक कहते हैं की  बड़ागांव थाना क्षेत्र अंतर्गत घटना घटित हुई थी , उस तारतम्य में थाना बड़ागांव में धारा ३०२ के तहत अपराध पंजीबद्ध किया गया है । शव झाड़ियों में छुपा मिला है । चंडी की छड़ के सवाल पर वह कहते हैं कि प्रकरण इन्वेस्टीगेशन में है इन्वेस्टीगेशन में बहुत सारे तथ्यों पर भी प्रकाश डालना है , और यदि ये बिंदु आये हुए हैं तो उन बिन्दुओं को भी देखा जाएगा की किन कारणों से ह्त्या की गई । 

   टीकमगढ़ जिले में अपराधियों के हौसले  कितने बुलंद हैं इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है की  अपराधी  घरों में ही चोरी नहीं कर रहे हैं बल्कि शरीर के अंदर मज़बूरी वश लगाईं गई कीमती धातु पाने के लिए ह्त्या करने से भी नहीं चूक रहे हैं ।

04 सितंबर, 2015

घायल बाघिन की हुई सर्जरी



/ पन्ना टाइगर रिजर्व में विगत दिनों  दो बाघिनों  के संघर्ष में घायल हुई  पन्ना 234  बाघिन ,की  सर्जरी की गई ।  इलाज के बाद उसे स्वछंद विचरण हेतु छोड़ा गया । पन्ना २३४ बाघिन ९ अगस्त को तब घायल हो गई थी जब उसका   पन्ना 233  से संघर्ष  हुआ था । 
                                    टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक ने अपनी अधिकृत जानकारी में बताया है की  क्षेत्राधिकार हेतु दोनों में  द्वन्द  हुआ था। पन्ना-234 का   जब निरीक्षण किया तो  उसके के गले में तीन घाव पाये गये।  वन्यप्राणी चिकित्सक के द्वारा पन्ना-234 का इलाज किया गया। 01.09.2015 को पन्ना 234 का फोटोग्राफ लिया गया जिसमें पाया गया कि घाव स्वतः ठीक होने की स्थिति में नहीं है। ऐसी स्थिति में  प्रबन्धन ने  निर्णय लिया कि बाघिन को बेहोष कर रेडियो कॉलर हटाने एवं घाव की सर्जरी करने की कार्यवाही की जाये। 
                                          डॉ. ए.बी. श्रीवास्तव, डीन, सेन्टर फार वाइल्डलाइफ फोरेन्सिक एण्ड हेल्थ जबलपुर ने  2.सितम्बर  को बाघिन पन्ना-234 को परिक्षेत्र पन्ना कोर के बीट जरधोवा में बेहोष कर सर्जरी करने की कार्यवाही की । सर्जरी  में लगभग 03 सेन्टीमीटर व्यास का एवं 03 सेन्टीमीटर गहरे घाव में से लगभग 70 मेगेट्स बाहर निकाले गये एवं उसकी ड्रेसिंग करके टॉके लगाये गये। इस सम्पूर्ण सर्जरी लगभग 30 मिनट का समय लगा। सर्जरी उपरांत पन्ना-234 को उसी स्थल पर स्वछंद विचरण हेतु छोड़ा गया।
 यह सम्पूर्ण कार्यवाही  डा0 ए.बी.श्रीवास्तव, डीन सेन्टर फार वाइल्डलाइफ फोरेन्सिक एण्ड हेल्थ जबलपुर एवं उनकी टीम, डा0 संजीव कुमार गुप्ता, वन्यप्राणी चिकित्सक पन्ना टाइगर रिजर्व के द्वारा सम्पन्न किया गया।