18 नवंबर, 2015

घर से गायब हुआ लडक़ा मिला मंदिर मे
15 वर्षीय किशोर ने मां काली के मंदिर मे चढाई जीभ

 रवीन्द्र  व्यास 

पन्ना // बुंदेलखंड इलाके अब भी अंध विश्वास के अभिशाप से मुक्त नहीं हो पाया है । मंगल वार की सुबह पन्ना जिले की अजयगढ़ तहसील देवरा भापतपुरा गाँव में माँ काली देवी मंदिर में एक बालक ने अपनी जीभ चढ़ा दी । यह बालक दो दिनो से घर से गायब था । लडके का पता तब चला  जब उसने मंदिर में जीभ चढ़ा दी । 
                                                        मंदिर के पुजारी शंकर रैकवार  ने  फोन कर हरप्रसाद पटेल को बताया की उनके लड़के राजू (१५) ने आज मंदिर में जीभ चढ़ा दी है । पुजारी की बात सुन पूरा परिवार सकते में आ गया । घटना की खबर जैसे ही  भापतपुर गाँव  मे पहुंची तो  मंदिर मे पूजा अर्चना का  दौर शुरू हो गया  पुजारी शंकर के अनुसार  राजू ने ब्लेड से जीभ काटी और माता के चरणो में अर्पित कर दी ।  बालकगाँव वालो को बताया की यह सब   अपनी   इच्छा   से  किया है       अबोध बालक  के इस  कदम की चर्चा  पुरे पन्ना जिले में फ़ैल गई । , बच्चे की हालत  ठीक बताई जा रही है  अजयगढ़ के स्वास्थ्य केंद्र में प्राथमिक उपचार किया गया । 
                   छतरपुर जिला के राजनगर के मूल  निवासी  हर प्रसाद पटेल   पिछले  काफी समय से इन्द्रपुरी कालोनी पन्ना  में रह रहा है ।  सोमवार की सुबह लगभग 8 बजे अपने घरवालो को बगैर बताये  उसका बेटा राजू गायब हो गया ।  शाम तक वह घर नही लौटा  तोपरिजन  ने  रिश्तेदारो मे खोजबीन की  , मंगलवार को इसकी शिकायत कोतवाली पुलिस मे दी,जिस पर पुलिस ने गुम इंसान के तहत मामला कायम किया। मंगलवार की दोपहर उन्हें जीभ चढ़ाने की सूचना मिली । लडक़े के पिता केअनुसार  मां काली की कृपा से ही मेरे दो पुत्र हुये औरइस मंदिर मे हम लोगो का हमेशा आना बना रहता हैहो सकता है इसी  कारण बच्चे का मनआस्था की ओर बढने लगा हो और जिसके चलते उसने मां के चरणो मे जीभ समर्पित कर दीहो,। 

             

16 नवंबर, 2015

पानी के  फसाद में युवक की ह्त्या 

छतरपुर  / 16 नव 15 / से 90 किमी दूर चंदला थाना इलाके में सिचाई  के पानी के विवाद में एक युवक की देर रात गोली मार कर ह्त्या कर दी गई । पुलिस  ने ह्त्या का मामला दर्ज कर फरार आरोपियों  की तलाश शुरू कर दी है ।
                                     लवकुशनगर एस डी ओ पी एम पी पौराणिक ने बताया की ग्वाल भाटा गाँव में  खेत पर सिचाई को लेकर  प्रकाश राजपूत का  अपने ही चचेरे भाई  राम सजीवन और रामेश्वर राजपूत से विवाद हुआ था । इन लोगों के बीच विवाद इतना बड़ा की  राम सजीवन और रामेश्वर ने प्रकाश(३२) को भरतल  बंदूक  से गोली मार दी । गोली लगने से प्रकाश की मौत हो गई । चंदला थाना पुलिस ने माला दर्ज कर आरोपियों की तलाश शुरू कर दी है । 

Tikamgarh_Nivdi_Murdar For 5 Rs

पांच रुपये के लिए ले ली जान


  रवीन्द्र व्यास 
टीकमगढ़ //- बुंदेलखंड इलाके के   टीकमगढ जिले के निवाडी में पाँच रुपये  केलिए  , एकव्यक्ति की ह्त्या कर दी  और उसके परिवार के तीन लोगो को  गंभीर रूप से घायल कर दिया घायलों को इलाज के लिए झांसी रेफर किया गया है   पुलिस ने एक आरोपी को  तो गिरफ्तारकर लिया  जब की  पांच अब भी फरार हैं
                                                 
  निवाडी कस्वे के चोपरा मुह्हले के  दिनेश यादव ने बताया की अपनी बेटियों को दस रु देकर  कुरकुरे  लेने भेजा था जब काफी देर तक नहीं आई तो हमने जाकर देखा  तो ये वहीँ कुरकुरे खा रही थी हमने पूंछा की  कितने के लिए तो बताया की पांच रु के हमने कहा की तुम्हे दिए तो दस थे किराना दुकान दार   सत्येन्द्र यादव बोला की दस के दिए हैं इस पर वह जब बहस करने लगा  तो हम वापस गए   अन्धेरा होने पर  सत्येन्द्र , जितेंद्र , राजेन्द्र  और इनके साथ कुछ और थे घर पर आये थे दरवाजा खुलवाकर इन्होने हमारे भाई परमानंद को  मार दिया हम लोगों को भी  घायल कर दिया ,जिसमे  हम और हमारी पत्नी और पुत्र घायल हो गए
                                 निवाडी    एस.डी..पीके.आर. सिजोरिया- ने बताया  की परमानंद यादव   दिनेश यादव  उसकी पत्नी और पुत्र  को  गम्भीर चोंटे आयी तीनो को  ईलाजके लिये  निवाड़ी अस्पताल भेजा  गया जहा  परमानंद की मौत हो गई पुलिस ने सत्येन्द्र यादव को गिरफ्तार कर लिया है  बाकी आरोपी  पकड़ लिए  जाएंगे उन्होंने बतया कीसत्येन्द्र किराना दुकान चलाता है वहां दिनेश और सत्येन्द्र के बीच कुछ विवाद हुआ था  
इस घटना के बाद से मुहल्ले में तनाव के  हालत  हैं कोई और  बवाल ना  हो  इसके लियेमोहल्ले में  पुलिस बल तैनात किया गया है।  सूखा ग्रस्त बुंदेलखंड इलाके में किसान और औरआम आदमी परेशान है उसके लिए  एक एक पैसा कीमती है   इन हालातो में जिस पांच रु मेंमात्र एक कप चाय आती है  उसके पीछे एक को मौत के घाट  उतार दिया  गया , तीन लोगजिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं   बुंदेलखंड इलाके की इस दशा के लिए किसे जिम्मेदार ठहरायाजाए   तीन दिन पहले ही छतरपुर जिले में एक बालक ने दस रु के लिए आत्म ह्त्या कर ली थी।

15 नवंबर, 2015

BUndelkhand_ Panna_Kilkila Rivar


  मैली होती  पन्ना की गंगा 
(रवीन्द्र व्यास)  
बुंदेलखंड _ का पन्ना जिला  अतीत की यादों को संजोय ऐसा जिला है जो मध्य प्रदेश में सबसे उपेक्षित है । इसी नगर  में एक नदी बहती है किलकिला , जिसका उदगम भी इसी जिले से होता है और विलीन भी इसी जिले में होती है ।  दुनिया भर में फैले प्रणामी सम्प्रदाय के लोगों के लिए किलकिला नदी गंगा की तरह पूज्य है । कुछ माह पहले इस नदी पर समाज सेवियों का बड़ा तामझाम दिखा  नदी बचाने की मुहीम शुरू की । नदी की जलकुम्भी भी साफ़ की  फोटो भी खिचाई पर उसके बाद ना तो इसमें मिलने वाले गटर रोके गए  और ना ही गंदगी साफ़ हुई । 
                                                       पन्ना जिले के बहेरा के समीप  छापर टेक पहाड़ी   से निकलने वाली यह किलकिला नदी पन्ना टाइगर रिजर्व से होती हुई  सलैया भापत पुर के मध्य  केन नदी में विलीन हो जाती है । जिले में ४५ किमी  बहने वाली यह नदी  केन नदी  पहले (5 किमी पूर्व ) यह  अपना नाम भी बदल लेती है । वहां लोग इसे माहौर नदी  नाम से जानते हैं । एक नदी के दो नाम  प्रायः कहीं सुनने में नहीं मिलते । सदियों से बाह रही इस  नदी को लेकर तरह तरह की किवदंतियाँ भी यहां खूब प्रचलित हैं । कहते हैं की जब घोड़ा इस नदी का पानी पी लेता तो घुड़सवार , और घुड़ सवार के पीने पर घोड़ा मर जाता था । स्वामी लाल दास ने अपने एक लेख में लिखा है की किलकिला नदी को कुढ़िया नदी भी कहते हैं , क्योंकि इस जल के उपयोग करने से  कोढ़ हो जाता था ।  एक और किवदंती यह भी है की यह नदी इतनी विषैली थी की  जब कोई पक्षी इसके ऊपर से निकलता था तो वह मर जाता था । 
   
388 वर्ष पूर्व नदी का जल बना अमृत :                                             

मान्यता है की  किकिला के इस विषैले जल को अमृत बनाया  निजानन्द सम्प्रदाय के प्राणनाथ जी ने । संवत 1684 में वे इसी किलकिला नदी के तट पर आये थे । यहाँ जब उन्हें  स्नान करने की इक्षा हुई तो स्थानीय आदिवासियों ने उन्हें इससे रोका था । उनके अंगूठे के स्पर्श मात्र से यह विषाक्त जल अमृत हो गया ।  वह स्थान आज भी अमराई घाट के नाम  से जाना जाता है ।  यह  स्थान  निजानन्द  सम्प्रदाय में  पवित्र स्थल माना जाता है । प्राण नाथ  यही बस गए  उनका प्राणनाथ  मंदिर   निजानन्द सम्प्रदाय के लोगों के लिए किसी तीर्थ स्थल से कम नहीं है , और किलकिला नदी उनके लिए गंगा की तरह पूज्यनीय है । इस सम्प्रदाय को मानने वाले दुनिया भर में फैले लोग  इस नदी का जल ले जाते हैं  । आज भी इस सम्प्रदाय से जुड़े लोगों की मृत्यु  के बाद उनकी अस्थियो को  नदी किनारे बने मुक्ति धाम में ही दफ़नाया  जाता  हैं ।  मान्यता है की इससे जीव को मुक्ति मिलती है । 
        
                          पन्ना की इस  किलकिला नदी के उद्धार के लिए नगर पालिका के तत्कालीन अध्यक्ष ब्रजेंद्र सिंह बुंदेला ने प्रयास किये थे ।  उनके जाने के बाद  इस ओर कोई प्रशासनिक प्रयास नहीं हुए ।  इस वर्ष कुछ स्वयं सेवी संघठनो ने नदी को जीवंत बनाने का प्रयास अवश्य किया । नदी की जलकुम्भी साफ़ की  खूब प्रचार प्रसार भी किया  पर नदी के हाल आज भी जस के तस बने हुए हैं । नदी में आज भी नगर की गन्दी नालियों का पानी मिल रहा है ।  जगह जगह कीचड़ के कारण आज यह दम तोड़ती नदी बन कर रह गई है । पिछले दिनों हमें मिले एक स्वयं सेवी संघटन के कर्ता  धर्ता  ने जरूर बतया था की  इस नदी के कायाकल्प के लिए  राजेन्द्र सिंह आएंगे , उनके नेतृत्व में इस नदी को साफ़ सुथरा किया जाएगा । 
 
                                            देश में संस्कृतियों और नगरों का विकाश भले ही सरोवरों और नदियों के तट पर हुआ हो किन्तु आज के दौर में बोतल बंद पानी की संस्कृति ने वीराने में भी नगर बसा दिए और सरोवरों और नदियों को मारने का सिलसिला शुरू कर दिया । किलकिला नदी जिसके तट पर ही पन्ना नगर  की संस्कृति रची बसी है उसे ही समाप्त करने का सिलसिला जाने अनजाने बदस्तूर जारी है ।

12 नवंबर, 2015

Bundelkahnd _ Diwali Dance



बुंदेलखंडी  दीवारी  नृत्य कर रोमांचित हुए ताइवानी पर्यटक 
रवीन्द्र व्यास                                                
खजुराहो // 12 नव15 _बुंदेलखंड इलाके में  गोवर्धन पूजा  से शुरू  होने वाला दिवाली नृत्य  एक दिन पहले ही शुरू हो गया  यह सब किसी परम्परागत नृत्य  दल ने नहीं किया , बल्कि इसे किया  खजुराहो आये विदेशी पर्यटकों के एक दल ने यह दल शुद्ध भारतीय पोशाक में जब दिवाली नृत्य कर रहा था तो लोग देखते ही रह गए बुंदेलखंड में  रची बसी परम्पराए लोग अब भी जीवंत रक्खे हैं यही कारण है की बुंदेलखंड के  दिवारी नृत्य की  परम्परा  दुनिया भर में अनूठी है   
तायपेई म्यूजिक एन्ड कल्चर आर्गेनाइजर के  प्रमुख जेफ्री वू फाउंडर ने बताया की  विश्व पर्यटन नगरी खजुराहो तायपेई इंडिया म्यूजिक एन्ड कल्चर आर्गेनाइजर के 16 सदस्यीय दल आया है यह दल पास के  गाँव  नहदौरा में पहुंचा  तो लोग समझ ही नहीं पाये यह किस लिए आये हैं जब लोगों ने इन्हे  भारतीय बेषभूषा और  हाथों में मोर के पंख लिए देखा तो कुछ कुछ समझ में आया    ढोलक की थाप  , नगड़िया का तीव्र  संगीत  और मंजीरे की मधुर झंकार के साथ  मोर  पंख  हाथ में लेकर ताइवान के पर्यटको का  दीवाली नृत्य  करना  जिसने भी देखा वह वहीँ ठहर  गया   
  तायपेई म्यूजिक एन्ड कल्चर आर्गेनाइजर के  प्रमुख जेफ्री वू फाउंडर ने बताया की हम लोगों ने  भारतीय ट्रेडिसिनल गाँव का भ्रमण किया  , गाँव में  लोगों ने हमारा  स्वागत  भी परम्परागत तरीके से किया दीपावली के मौके पर  घर घर में बनने वाली मिठाई को भी  हमने देखा  और हमारे कई सदस्यों  ने खुद मिठाई बनाई हमारी एक दो सदस्यों ने  भैस को देख इन्होने उसका  दूध भी निकाला , और  वो मटके में कुछ  घुमा घुमा कर क्रीम भी निकाला ( मथानी चलाई ) उन्होंने बताया की वे लोग भारत को बहुत पसंद करते हैं यहां की परम्पराओ में एक उमंग है एक उत्साह है यहाँ उन्हें लोगों ने गिफ्ट भी दिए  
                        दरअसल  बुंदेलखंड में दीपावली के दिन से चरवाही संस्कृति के दिवाली नृत्य का आगाज होता है जो लोग इस नृत्य को करते हैं वह मौन धारण कर लेते हैं   इस कारण इस नृत्य को करने वालों को मौनिया और नृत्य को मौनिया नृत्य भी कहा जाता है।  मौनिया  दल के सदस्य बताते हैं की   द्वापर युग से यह  परम्परा चली रही हैइसमें  विपत्तियों को दूर करने के लिए ग्वाले मौन रहने  का कठिन व्रत रखते हैं। यह मौन व्रत बारह वर्ष तक रखना पड़ता है। तेरहवें वर्ष में मथुरा वृंदावन जाकर  यमुना नदी के तट पर पूजन कर  व्रत तोड़ना पड़ता है।
शुरुआत में पांच मोर पंख लेने पड़ते हैं प्रतिवर्ष पांच-पांच पंख जुड़ते रहते हैं। इस प्रकार उनके मुट्ठे में बारह वर्ष में साठ मोर पंखों का जोड़ इकट्ठा हो जाता है। परम्परा के अनुसार मौन चराने वाले लोग दीपावली के दिन सरोवर या  नदी पर नहाते हैं ,   पूजन कर पूरे नगर में ढोल नगाड़ों की थाप पर दीवारी गाते, नृत्ये करते हुए हुए अपने गंतव्य को जाते हैं। इस दिन मौनिया श्वेत धोती ही पहनते हैं और मोर पंख के साथसाथ बांसुरी भी लिए रहते हैं। मौनिया बारह वर्षों तक मांस शराब आदि का सेवन नहीं करते हैं।
मौनिया व्रत की शुरुआत सुबह गौ (बछिया) पूजन से होती है। इसके बाद वे गौमाता श्रीकृष्ण भगवान का जयकारा लगाकर मौन धारण कर लेते हैं।  
कई क्षेत्रों में मौनिया व्रत की शुरुआत गौ-क्रीड़ा से करते हैं गौ-क्रीड़ा में गाय को रंग और वस्रों से सजाकर   पूजन करते  है। इसमें एक गायक ही लोक परम्पराओं के गीत और  भजन गाता है  और उसी पर दल के सदस्य नृत्य करते हैं बुंदेलखंड इलाके में दिवारी गीत ग्वालों के गीत हैं , जो गौसेवक बनाम पशुपालन का  और खेती से जुड़े हैं , जिनकी रक्षा में ये शौर्य परक गीत  पर  नृत्य करते हैं   इनके हाथों में मोर पंख , होते हैं , नगड़िया ,ढोलक , मंजीरा , और झांजर इनके प्रमुख वाद्य यंत्र होते हैं  
" लंका के मैदान में, अंगद रोपे  जांग रे
जांग हलाई हले , धरती हल हल जाए रे
 इसके बाद दिन भर मौन  के बाद शाम को गायों को लेकर सभी मौनिया गांव पहुंचते हैं और सामूहिक रुप से व्रत तोड़ते हैं।दूसरे दिन दीवारी गाने वाले सैकड़ों ग्वाले लोग गांव नगर के संभ्रांत लोगों के दरवाजे पर पहुंचकर  लाठियों से दीवारी खेलते हैं। उस समय युद्ध का सा दृश्य आता है। एक आदमी पर एक साथ १८-२० लोग एक साथ लाठी से प्रहार करते हैं, और वह अकेला पटेबाज खिलाड़ी इन सभी के वारों को अपनी एक लाठी से रोक लेता है। इसके बाद फिर लोगों को उसके प्रहारों को झेलना होता है। चट-चटाचट चटकती लाठियों के बीच दीवारी गायक जोर-जोर से दीवारी --गीत  गाते हैं और ढ़ोल बजाकर वीर रस से युक्त ओजपूर्ण नृत्य का प्रदर्शन

Political_bangal _election_बंगाल का फैसला: सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, राजनीतिक चेतावनी भी

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