31 दिसंबर, 2020

Farmar _Soside_मेरे अंग बेच कर कर्ज चुका ले सरकार


 

मरने के बाद मेरा शरीर शासन को दे दें ,मेरा एक एक अंग बेच कर कर्जा  चुका लें 

रवींद्र व्यास
छतरपुर। // ३१ दिसंबर २० //   मेरी तीन  पुत्री और एक पुत्र हैं किसी की उम्र 16 वर्ष से ज्यादा नहीं है | मेरी परिवार से प्रार्थना है कि मेरे मरने के उपरान्त मेरा शरीर शासन के सुपुर्द कर दे , जिससे मेरे शरीर का एक एक अंग वो  बेच सके ,जिससे शासन का कर्जा चुक सके | यह अंतिम पत्र उस किसान का है जिसने बिजली विभाग द्वारा की गई कुर्की और बेइज्जती से त्रस्त होकर लिखा और खेत पर जा कर आत्म हत्या कर ली | जिला प्रशासन ने मृतक के परिजनों को 25 हजार की आर्थिक सहायता दी है l अपने दूसरे प्रेस नोट में प्रशासन ने यह सिद्ध करने का जतन भी किया है कि मृतक के नाम कोई जमीन नहीं है l

   छतरपुर से 17 किमी दूर मातगुवां में किसान मुनेंद्र राजपूत { 35} ने दोपहर करीब 1:00 बजे अपने खेत पर लगे आम के पेड़ पर फांसी का फंदा डालकर  कर आत्महत्या कर ली |  आत्म ह्त्या के पहले अपने लिखे पत्र में मृतक ने ना सिर्फ अंग बेचकर कर्जा चुकाने की बात लिखी है बल्कि मीडिया की कार्य प्रणाली पर भी प्रश्न चिन्ह लगाया है | उसने लिखा है कि एक प्रार्थना मीडिया वालों से है कि आप शासन की अच्छाइया तो बहुत टी वी और मीडिया में दिखाते हैं एक गरीब की चिट्ठी को मीडिया टी वी में दिखाने की कृपा करें सभी मीडिया वालों को मेरा अंतिम नमस्कार  - राम राम | कर्ज ना चुका सकने का कारण भी उसने लिखा है कि मेरी एक भैंस करेंट लगने से मर गई ,तीन भैंस चोरी हो गई , आषाढ़ में ( खरीफ फसल ) खेती में कुछ नहीं मिला ,लाकडाउन में कोई काम नहीं ना ही चक्की चली इस कारण हम बिल नहीं दे सके | 


मृतक के भाई लोकेन्द्र राजपूत ने बताया मेरे भाई ने आत्म ह्त्या की है , बिजली बिल साल भर से ना भरने के कारण बिजली विभाग ने कुर्की वारंट जारी कर  सोमवार को चक्की और मोटरसाइकिल जप्त कर ली गाँव में बेइज्जती की और जलील किया | वो निवेदन करते रहे की कुछ समय दे दो पर उनकी एक नहीं सुनी |  असल में साल भर से नुक्सान था खरीफ की फसल हुई नहीं थी , गुजारा करने के लिए चक्की चलाते थे , बिजली वाले साल भर से एवरेज बिल दे रहे थीं हजार चार हजार का ,रीडिंग से भी नहीं दे रहे थे | ज्यादा बिल और फसल ना होने से उनके पास देने के लिए कुछ भी नहीं था | ऐसे में उनने खेत पर पेड़ से फ़ासी लगाकर बुधवार को आत्म ह्त्या कर ली | 

                       मातगुवां  पुलिस ने  किसान द्वारा आत्महत्या के मामले में मर्ग कायम कर विवेचना शुरू कर दी गई है | उन्होंने  सुसाइड नोट मिलने की बात को भी स्वीकार किया है। बिजावर के क्षेत्रीय विधायक राजेश शुक्ला ने घटना को दुखद बताते हुए मुख्य मंत्री से बात करने की बात कही है ,उन्होंने दोषियों के विरुद्ध कार्यवाही करने और पीड़ित परिवार को आर्थिक सहयोग दिये जाने के लिए मुख्य मंत्री से बात करने की बात कही है l
 मृतक के नाम कृषि भूमि नहीं है

कलेक्टर छतरपुर शीलेन्द्र सिंह ने बताया कि ग्राम मातगुवां के मृतक मुनेन्द्र राजपूत के परिजनों को 25 हजार रूपए की आर्थिक सहायता दी गई है। मृतक की मां श्रीमती हरबाई के नाम 5 एचपी विद्युत कनेक्शन स्वीकृत है जिस पर 88 हजार 508 रूपए का भुगतान 3 वर्षों से लंबित है। बकाया राशि वसूली के लिए अक्टूबर एवं नवम्बर माह में नोटिस जारी किए गए तथा दिसम्बर में आर.आर.सी. जारी की गई। मृतक मुनेन्द्र राजपूत के नाम स कोई जमीन नहीं है। इनके पिता धनश्याम के नाम 2 हेक्टेयर जमीन है।
मृतक मुनेन्द्र और इनके भाई लोकेन्द्र राजपूत की पत्नियों के नाम संयुक्त रूप से 0.027 हेक्टेयर भूमि है, किन्तु इन्हें पीएम किसान का लाभ नहीं मिल रहा है। मृतक मुनेन्द्र का नाम पीएम आवास सूची में नाम था परंतु इनका पक्का आवास होने के कारण अपात्र होने से उन्हंे लाभ नहीं मिला। मृतक के पिता धनश्याम द्वारा अक्टूबर 2020 में सेवा सहकारी समिति मातगुवां से खाद के लिए 14 हजार 200 रूपए का ऋण सहकारी समिति से लिया गया।
मृतक मुनेन्द्र राजपूत की मां ग्राम में आटा पीसने की चक्की संचालित करती थी। विद्युत खपत की राशि का भुगतान नहीं किया गया था। मृतक के पिता घनश्याम लोधी को पीएम-सीएम किसान योजना का लाभ प्राप्त होता है। उन्हें अभी तक 5 किश्तों के रूप में 10 हजार रूपए की किसान सम्मान निधि दी जा चुकी है। वह पेंशनर होकर विद्युत वितरण कम्पनी से सेवानिवृत्त हुए हैं, जिसकी मासिक पेंशन 25 हजार 90 रूपए है और उसका भाई लोकेन्द्र वितरण केन्द्र छतरपुर ग्रामीण 1 में मीटर रीडर के पद पर बिजली विभाग में कार्यरत है।
               

28 दिसंबर, 2020

तेंदुए का शिकार


सतना/MP/ 28 /12/20

जिले के रामनगर थाना क्षेत्र के जंगल में  तेंदुआ का शव मिला l  आशंका जताई जा रही है कि तेंदुए का शिकार किया गया है,l देर रात सूचना मिलने पर वन  अधिकारी मौके पर पहुंचे ,और  तेंदुए की लाश को कब्जे में लेकर जाँच शुरू की

 

राम नगर के गौहानी के जंगल में तेंदुए का शव  संदिग्ध परिस्थितियों में  जंगल सर्चिंग मे बीट गार्ड ने देखा l  तेंदुए के शव  की सूचना मिलते ही वन विभाग के डीएफओ और मुकुंदपुर वाइट टाइगर रिजर्व की टीम भी मोके पर पहुंची l  बताया जा रहा है कि तेंदुए का शव 4 दिन पुराना है, उम्र लगभग 4 वर्ष है, l

 कुछ दिन पूर्व ही सफेद टाइगर सफारी मे एक सफेद बाघ का शव मिला था l 

27 दिसंबर, 2020

निर्यात होने लगा बुंदेलखंड का गेंहू

 बुंदेलखंड की डायरी 

निर्यात होने लगा  बुंदेलखंड का गेंहू 


रवीन्द्र व्यास 

बुंदेलखंड  का गेंहू अब बांग्लादेश  जाने लगा है , बांग्लादेश के लोगों को यह गेंहू इतना पसंद आया कि पिछले वर्ष की तुलना में इसके निर्यात में चार गुना से ज्यादा बढ़ोतरी हुई है | दशकों पहले बुंदेलखंड का पान  पाकिस्तान को निर्यात होता था  संघर्ष और विवादों के कारण पान निर्यात तो बंद हो गया अब गेंहू निर्यात होने लगा है |   रेत के खेल के लिए जाना पहचाना बुंदेलखंड अब  रेत  राजस्थान भेजने लगा है | दूसरी तरफ बुंदेलखंड एक्सप्रेस वे निर्माण के नाम पर लगभग दो लाख वृक्षों की बलि चढ़ा दी गई |  यह सब उस बुंदेलखंड में हो रहा है जहां का किसान बुनियादी समस्याओं से जूझ रहा है |  प्रकृति पर निर्भर अधिकांश किसान  प्रशासन की  मार का भी शिकार हो रहा है |  



                बुंदेलखंड का कठिया गेंहू   अपनी कई विशेषताओं के जाना जाता है ,  कठिया गेंहू ना सिर्फ पाचक होता है बल्कि इसमें प्रोटीन की मात्रा भी सामान्य गेंहू से लगभग दो गुनी होती है , इस गेंहू से बना दलिया  औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता है |    पिछले पांच महीनो के दौरान सबसे ज्यादा कठिया गेंहू वा सामान्य गेंहू   बांग्लादेश  भेजा गया  |   कठिया  गेंहू में इतनी सारी  विशेषताओं के पीछे बताया जाता है की इसका उत्पादन मुख्यतः प्राकृतिक  होता है इसमें किसी भी तरह की रासायनिक खाद का इस्तेमाल नहीं होता है | पहले तो इस गेंहू के उत्पादन के लिए  वर्षा जल पर ही किसान निर्भर रहता था पर अब इसमें सिचाई भी की जाने लगी है |  कृषि के जानकार कहते हैं की इस गेंहू के उत्पादन के लिए अधिक जल की आवश्यकता नहीं होती है | 

          बुंदेलखंड के सागर जिले के खुरई का गेंहू पहले से ही काफी विख्यात रहा है  ,खुरई के गेंहू की मांग देश के अनेक हिस्सों में काफी व्यापक है | अब बुंदेलखंड के ही  झाँसी ,ललितपुर , महोबा, चित्रकूट, ,बांदा ,हमीरपुर ,जालौन , छतरपुर, टीकमगढ़, दतिया  जैसे जिलों  के  गेहूं की मांग  देश ही नहीं   विदेशों तक में होने लगी  है।  बुंदेलखंड का गेहूं   बांग्लादेश के लोगों को ऐसा  भाया कि  गेहूं की मांग लगातार बढ़ती जा रही  है। बीते पांच माह में  बुंदेलखंड के गेंहू की  20 मालगाड़ी बांग्लादेश भेजी गई  है। इन मालगाड़ियों में गेहूं दतिया, ललितपुर, मुरैना  स्टेशन  से लोड किया गया। बुंदेलखंड के गेंहू  से लदी ये मालगाड़ियां  बांग्लादेश की बेगमपुर दर्शना रेलवे साइट पर  अनलोड की जाती हैं   रेलवे के आधिकारिक लोग बताते हैं की प्रत्येक मालगाड़ी पर रेलवे को 55  लाख का मुनाफ़ा होता है | बुंदेलखंडी गेंहू की जावक पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष ज्यादा होने से  रेलवे के मुनाफ़ा में भी बढ़ोतरी हुई है | गेंहू के साथ खली और अन्य बुंदेलखंड के खाद्य पदार्थ भी बांग्लादेश भेजे जा रहे हैं | 

प्रकृति के भरोषे  खेती 

      बुंदेलखंड देश का  वह इलाका  है  जिसकी अधिकाँश भूमि  पथरीली  है |  भू संरचनाओं की बात करें  तो जमीं से 100 फिट नीचे  ग्रेनाइट का स्ट्रेटा पाया जाता है ,जो यह बताने के लिए पर्याप्त है कि अगर  भू जल की उपलब्धता है तो सिर्फ 100 फिट तक ही है इसके नीचे  चट्टानों में  पानी की आशा ना के बराबर है | यह स्थिति बुंदेलखंड के  अधिकाँश क्षेत्रों में मानी जाती है |  पथरीली भूमि के कारण  यहां सिचाई के लिए पानी की  जरुरत कहीं ज्यादा है |  सैकड़ों वर्ष पहले बुंदेलखंड की इस बुनियादी समस्या को समझ लिया गया था , और बुंदेलखंड के अधिकाँश इलाकों में बड़ी संख्या में सिचाई के लिए तालाबों और नहरों का निर्माण किया गया था | इतना ही नहीं  तालाबों के निर्माण के साथ ही तालाबों के मध्य में एक कुँए का भी निर्माण कराया जाता था ,ताकि किसी भी प्रकार के अकाल के हालात में जल की उपलब्धता बनी रहे |                                                                           समय के साथ आधुनिकता का खुमार  शासकों पर हावी हुआ और तालाब  नष्ट होते चले गए |  आज बुंदेलखंड इलाके में तमाम तरह के बाँध होने के बावजूद किसान पानी के लिए परेशान है ,| बुंदेलखंड का अधिकाँश किसान छोटी जोत का है जो ना तो ट्यूब वेळ लगवा सकता है और ना कुआ खुदवा सकता है |  ऐसे किसान पडोसी खेत वाले से पानी की हिस्सेदारी तय करता है और  अपनी उपज का बड़ा हिस्सा पानी के एवज में पडोसी को देने को मजबूर होता है | पिछले दिनों छतरपुर जिले के बक्स्वाहा  ब्लॉक  सुनवाहा  गाँव के किसान  नाथू राम विश्वकर्मा ने प्रधान मंत्री मोदी जी को एक पत्र लिखा कि मेरे पास  एक एकड़ की कृषि भूमि है | साल भर की एक फसल की कमाई बा मुश्किल  ११ हजार रु छह माह में होती है |  आप बताइये के ये दुगनी कैसे होगी |  पत्र में उसने वे तमाम तरह के खर्चे भी लिखे जो खेती में होते हैं ,   और आय में फसल के वेस्टेज  और फसल से होने वाली आय को भी लिखा | 

                                                     दरअसल हालात से मजबूर बुंदेलखंड का किसान  आज भी प्रकृति के भरोसे ही है | इस बार की खरीफ फसल  वर्षा की अनियमितता के कारण  चौपट हुई थी | रवि फसल अब तक  के हालात  उनके ठीक हैं जिनके पास सिचाई के साधन हैं , जिनके पास सिचाई के साधनो का अभाव है वे मायूस है  वहीँ बिजली की अनियमित आपूर्ति भी किसानो के सामने कई तरह की समस्याएं खड़ी  कर रही हैं |  बुंदेलखंड के कई इलाकों में इसको लेकर प्रदर्शन भी हो चुके हैं | ऐसे इलाके से अगर  कृषि पैदावार का निर्यात होने लगे तो एक अच्छी खबर ही मानी जा सकती है , जरुरत इस बात की है कि  निर्यात होने वाली  पैदावार को बढ़ाने की दिशा में किसानों को प्रोत्साहित  किया जाए | 

रेतीले राजस्थान  में जायेगी बुंदेलखंड की रेत 


           25 दिसंबर को बांदा से राजस्थान के भरतपुर के लिए एक मालगाड़ी भरकर केन की रेत  भेजी गई |  केन की यह रेत  निर्माण कार्यों के लिए सबसे अच्छी मानी जाती है , यही कारण है कि केन नदी  के यह रेत  जो बाहरी इलाकों में खजुराहो सेंड के नाम से जानी जाती है  नेपाल बार्डर तक डम्परों के माध्यमों से अब तक पहुँचती थी | रेल से रेत  भेजने का पहले भी कई बार प्रयास हुआ है , एक बार सिंहपुर स्टेशन से भेजी जाने वाली रेत को प्रशासन ने अवैध मान कर जप्त कर लिया था |   

                      ललितपुर स्थित बजाज पावर प्लांट से एश (राख) रूपनगर पंजाब, गाजियाबाद, मैहर सतना  भेजी जाने लगी है। बुंदेलखंड के कई ऐसे उत्पाद हैं जो रेलवे की कमाई का एक बड़ा साधन बन गए हैं |  रेलवे के सूत्र बताते हैं कि  बुंदेलखंड  मिनिरल्स और  खाद्य वस्तुओ के परिवहन से  झाँसी रेलवे मंडल को 60 से 95 करोड़ रु की सालान आय होती है | परिवहन व्यवस्था के लिए 138  लोग रेलवे  में पंजीकृत हैं | 

दो लाख वृक्ष विकाश की भेंट चढ़े 

बुंदेलखंड एक्सप्रेस वे निर्माण के  लिए  उत्तर प्रदेश के चित्रकूट ,बांदा ,हमीरपुर ,महोबा ,जालौन ,ओरैया ,और इटावा  जिले  के लगभग दो लाख वृक्षों  को काटा गया | सरकार कह रही है की इनकी एवज में  दो लाख 70 हजार नए वृक्ष लगवाए जाएंगे |  इटावा से चित्रकूट जिले तक बन रहे  296 किलोमीटर  लम्बे इस एक्सप्रेस वे के  निर्माण पर सरकार 14 हजार 849 करोड़ रु  व्यय  कर रही है | इसी तरह  झाँसी खजुराहो  एक्सप्रेस वे के निर्माण  में भी हजारों वृक्ष काटे गए |  मजे की बात ये है की सरकार कहती है की काटे गए वृक्षों की भरपाई के लिए बुंदेलखंड एक्सप्रेस वे पर दो लाख सत्तर हजार नए वृक्ष सड़क के दोनों और लगाए जाएंगे |   
                                                                   वर्षो पुराने वृक्ष  आम नीम महुआ ,पीपल बरगद के वृक्षों को उजाड़ने के बाद  नए वृक्ष कब लगाए जाएंगे और कौन से लगाए जाएंगे इनका कोई  हिसाब नहीं है | ग्रीन ट्रिब्यूनल की गाइड लाइन कहती है की जितने वृक्ष कटे जाएँ उसके पांच गुना वृक्ष लगाए जाने चाहिए , पर यहाँ तो दुगने वृक्ष भी लगाने की भी योजना नहीं है | दरअसल सरकार  सड़क निर्माण करने वाले के भरोसे  ही वृक्ष लगाने  का दावा करती है | ठेकेदार सड़क निर्माण के बाद  वृक्ष लगा कर और गिनवाकर अपने कर्तव्य की इति श्री कर लेता है | होना यह चाहिए की सड़क के ले आउट के साथ ही  नवीन  वृक्षों का रोपण  निर्धारित स्थल पर हो |  इससे सड़क निर्माण के दौरान ठेकेदार उन वृक्षों की देख भाल भी कर लेगा और वृक्षों की सुरक्षा भी संभव हो सकेगी | 
                                                         
  

20 नवंबर, 2020

बुंदेलखंड का  मोनिया नृत्य ,  मौन व्रत धारण कर लोक नृत्य में लीन होते नर्तक  
रवीन्द्र व्यास

  बुंदेलखंड में ऐसी  कई परम्परा  और  लोक साहित्य है जो  यहाँ की  अपनी एक अलग पहचान बनाता है ।पर काल के गर्त में धीरे- धीरे  ये परम्पराएं  समाप्त होती जा रहीं हें ।अच्छी बात ये भी है कि  इन लोक परम्पराओं को बचाने और जीवन्त बनाये रखने के लिए कई लोग और संगठन कार्य भी कर रहे हैं |   ऐसी  ही एक परम्परा है  दिवारी गीत और  मौनिया  नृत्य । चरवाही संस्कृति के प्रतीक , मौनिया नृत्य के नर्तक मौन धारण कर यह नृत्य करते हैं |  ये काल की गति है की जिस गोवंश के लिए यह नृत्य होता है उस गोवंश से अब लोगों का नाता टूटता जा रहा है | 


                                      वैसे तो बुंदेलखंड में हर काल खंड के अपने अपने अलग अलग लोक गीत और लोक नृत्य हैं , जो बुंदेलखंड की जीवंतता और लोक मनोरजन के साधन हुआ करते थे ,इनमे सबसे ख़ास बात यही रहती थी कि इनके माध्यमों से समाज में एक सन्देश देने का भी प्रयास होता था \ ऐसा ही एक नृत्य है दिवारी जिसे मौनिया नृत्य भी कहते हैं | दीपावली के समय होने  वाले इस लोक नृत्य की लय  बद्धता देखते ही बनती है | इस मोनिया नृत्य में एक गाने वाला रहता है , जो लोक गीत के पद के साथ गाता  है लोक वाद्य ,ढोलक और नगड़िया की थाप पर दल के बाकी सदस्य मौन रहकर हाथ में लाठी और मोर पंख लिए  नाचते थिरकते हैं | उनके नाचने और थिरकने में गो  वंश  की अनुभूति सहज ही हो जाती है |

 

दिवाली के दूसरे  दिन जहां इनके  ये दल हर गली और नुक्कड़ पर दिख जाते थे,  अब सिमित होते जा रहे हें ।दिवारी  गीत  मूलतः चरागाही  संस्कृति के गीत ह़े , यही कारण है  की इन गीतों में  जीवन  का यथार्थ मिलता है । फिर चाहे  वह सामाजिकता हो,या धार्मिकता , अथवा श्रृंगार  या  जीवन का दर्शन । ये वे  गीत हें जिनमे  सिर्फ  जीवन की वास्तविकता के रंग हें ,  बनावटी  दुनिया से दूर , सिर्फ चारागाही संस्कृति  का प्रतिबिम्ब । अधिकाँश गीत  निति और दर्शन के हें । ओज से परिपूर्ण इन गीतों में विविध रसों की अभिव्यक्ति मिलती है ।



काल खंड : 
दिवारी गीत दिवाली  के दूसरे  दिन  उस समय गाये जाते हें जब  मोनिया मौन व्रत रख कर गाँव- गाँव  में घूमते  हें । दीपावली के पूजन के बाद मध्य रात्रि  में मोनिया -व्रत शुरू हो जाता है । गाँव के अहीर - गडरिया और पशु पालक तालाब नदी में नहा कर , सज-धज कर मौन व्रत लेते हें । इसी कारण इन्हे मोनिया भी कहा जाता है । इनके साथ चलते हें गायक और वादक , वादक अपने साथ ढोल ,नगड़िया और मंजीरा रखते हें ,तो कहीं -कही म्रदंग  और रमतूलों   का भी उपयोग होता है ।  गायक जब  छंद गीत का स्वर छेड़ता है तो वादक उसी अनुसार वाद्य यंत्र का उपयोग करता है । हालांकि मोनिया कोंड़ियों  से गुथे लाल,पीले  रंग के जांघिये   और लाल पीले रंग की कुर्ती या सलूका अथवा बनियान  पहनते हें । जिस पर झूमर लगी होती है ,  पाँव में भी घुंघरू ,हाथो में मोर पंख  अथवा चाचर के दो डंडे का शस्त्र  लेकर जब वे चलते हें तो एक अलग ही अहसास  होता है । मोनियों के इस निराले रूप और उनके गायन और नृत्य  को देखने  खजुराहों में विदेशी भी ठहर जाते हें । 
 इतिहास   

 दिवारी गीतों का चलन कब शुरू हुआ इसको लेकर अलग -अलग मान्यताएं हें ।  कुछ कहते हें की दिवारी गीतों का चलन 10वी .सदी  में हुआ । तो कुछ का मानना है की द्धापर  में कालिया के मर्दन के बाद ग्वालोंने श्री कृष्ण का असली रूप देख लिया था। श्री कृष्ण ने उन्हें गीता का ज्ञान भी  दिया था। गो पालकों को दिया गया ज्ञान वास्तव में गाय की सेवा के साथ शरीर को मजबूत करना था। श्री कृष्ण ने उन्हें समझाया कि इस लोक व उस लोक को तारने वाली गाय माता की सेवा से न केवल दुख दूर होते हैं बल्कि आर्थिक सम्बृद्धि का आधार भी यही है।इसमें गाय को 13 वर्ष तक मौन चराने की परंपरा है। आज भी यादव (अहीर) और पाल (गड़रिया)जाति के लोग गाय को न सिर्फ मौन चराने का काम करते हैं\|    गांव के राम लाल यादव  का कहना है कि भगवान कृष्ण गोकुल में गोपिकाओं के साथ दीवारीनृत्य कर रहे थे, गोकुलवासी भगवान इंद्र की पूजा करना भूल गए तो नाराज होकर इंद्र नेवहां जबर्दस्त बारिश की, जिससे वहां बाढ़ की स्थिति बन गई। भगवान कृष्ण ने अपनी अंगुलीपर गोवर्धन पर्वत उठाकर गोकुल की रक्षा की, तभी से गोवर्धन पूजा  और दिवारी नृत्य की परम्परा चली आ रहीहै।पर अब यह परम्परा अब धीरे-धीरे  कम होती जा रही है । छतरपुर के रामजी यादव कहते हें की  अब गाँव ही सिमट रहे हें गो पालन अब घटता जा रहा है , इसे में अब गाय चराने वाले भी सिमित होते जा रहे हें । जिसका परिणाम है की  अब पहले की तरह ये दल नहीं दिखते हें । हालांकि बुंदेलखंड के  लोग इस परम्परा को जीवित बनाए रखने का प्रयास कर रहें हें । इसके आयोजन के कई तरह के अब समारोह भी होने लगे हैं , इसी तरह का एक  आयोजन बुंदेलखंड के चरखारी में होता है , इस नृत्य समारोह  के माध्यम से 

क्या है मौनिया नृत्य 
कार्तिक मास की अमावश्या के दूसरे दिन परमा से 15 दिनों तक यह मोनिया गाँव गाँव और धार्मिक स्थलों तक पहुँचते हैं |, पूर्णिमा को इसका समापन होता है । लोक  संस्कृति के जानकार डॉ. केएलपटेल बताते हैं मौन साधना के पीछे सबसे मुख्य कारण पशुओं को होने वाली पीड़ा को समझनाहै। वे बताते हैं कि जिस तरह किसान खेती के दौरान बैलों के साथ व्यवहार करता है। उसी प्रकार प्रतिपदा के दिन मौनिया भी मौन रहकर हाव-भाव करते हैं। वे प्यास लगने पर पानी जानवरों की तरह ही पीते हैं। पूरे दिन कुछ भी भोजन नहीं करते हैं। वे कम से कम 7 से 12  गांवकी परिक्रमा करते हैं। 

07 नवंबर, 2020

पर्यटकों के लिए होम स्टे योजना अब गाँव में भी

 

खजुराहो//दर्शना महिला कल्याण समिति छतरपुर द्वारा ग्रामीण पर्यटक होम स्टे योजना के लिए कार्य किया जा रहा है l  खजुराहो के नजदीक के गाँव धमना ,बसाटा,नारायणपुरा में यह कार्य शुरू किया गया है l 

प्रोजेक्ट कॉर्डिनेटर दिनेश शुक्ला  ने बताया कि हमारी संस्था  गांवों को पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने का कार्य कर रही हैं । सरकार की भी मंशा है कि शहरी जिंदगी और दौड़-भाग से दूर सैलानी इन गांवों में शांति के साथ कुछ समय गुजारे। ये गांव विदेशी पर्यटकों के लिए आकर्षण का खास केंद्र बन सकते हैं। यहां पर्यटकों को ठेठ देसी बुंदेली  अंदाज में ही घूमने-फिरने से लेकर खाने-पीने तक की सुविधा मिल सकेगी।

  इस योजना के लिए खासकर खजूराहो के आसपास के ग्रामो का चयन किया है। अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल  खजुराहो  विदेशी सैलानियों का बड़ा केंद्र है। यहां विलेज क्राफ्ट की भी संभावना हैं।


गाँव   में पर्यटकों को जहां बुंदेली व्यंजन  के साथ बुंदेली संस्क्रति  की झलक मिलेगी वहीँ गांवों में बैलगाड़ी, ऊंट-घोड़े की सवारी से लेकर वहां के लोकगीतों और लोककलाओं से पर्यटकों का मनोरंजन किया जाएगा।

--- खजुराहो आई  जर्मनी की   महिला पर्यटक एलिस ऐ जीवा  ( भी अपने देश मे होंम स्टे पर ही कार्य करती हैं)  होंम स्टे का विजिट कियाl उन्होंने कहा कि

। इस योजना के तहत गांवों में ऐसी पारंपरिक हवेलियां, पुराने किले या मकान चुने जाएं जो पर्यटकों के रहने के लिए उपयुक्त हो। इसमें कुछ मकान ऐसे भी होंगे जहां मकान मालिक स्वंय भी अपने परिवार के साथ रहता हो और एक हिस्से में पर्यटकों को ठहरा सके। इससे गांवों में मकान मालिकों की आय भी होगी और  संस्कृति का आदान प्रदान     भी हो सकेगा। ग्रामीण होंम।स्टे में पर्यटन की अपार संभावनाएं है मुझे अगर वर्किंग बीजा मिलेगा तो में आप सभी महिलाओं को ट्रेनिग निःशुल्क देकर    ,स्वाबलंबी बनाउंगी

22 सितंबर, 2020

पाकिस्तान में प्रतिपक्ष के पीछे किसकी सियासत


राजेश बादल 

पड़ोसी पाकिस्तान की सियासत बदले अंदाज़ में है।प्रधानमंत्री इमरान ख़ान को ऐसे विपक्षी तेवरों का सामना करना पड़ रहा है,जिसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की होगी।रविवार को तमाम विपक्षी दलों के एक मंच पर आने से यह स्थिति बनी है। इसमें दो धुर विरोधी पार्टियाँ पीपुल्स पार्टी और मुस्लिम लीग भी एक साथ आ गई हैं।इन दलों ने ऑनलाइन ऑल पार्टी कांफ्रेंस की और इमरान सरकार के ख़िलाफ़ निर्णायक संघर्ष छेड़ने का ऐलान कर दिया।इस कांफ्रेंस को पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ ने भी संबोधित किया। इन दिनों वे लंदन में इलाज़ करा रहे हैं। कांफ्रेंस में उनके भाषण पर हुक़ूमत को सख़्त एतराज़ था। इसलिए मीडिया पर उसे दिखाने या प्रकाशित करने पर पाबंदी लगा दी गई थी।फिर भी विदेशी पत्रकारों  और सोशल मीडिया के अन्य अवतारों के ज़रिए लोगों तक ख़बरें पहुँच ही गईं।अब समूचे प्रतिपक्ष ने एक लोकतांत्रिक मोर्चा बना कर मुल्क़ में बड़ा आंदोलन छेड़ने का फ़ैसला लिया है। यह मोर्चा पाकिस्तान के चारों राज्यों में गाँव -गाँव रैलियाँ निकालेगा ,सभाएँ करेगा और नए साल की शुरुआत पर जनवरी में राजधानी इस्लामाबाद में महा रैली करेगा।इस मोर्चे ने छब्बीस सूत्री एक कार्यक्रम बनाया है। इस कार्यक्रम के सहारे विपक्ष आगे बढ़ेगा। 

पाकिस्तान के इतिहास में इस तरह की प्रतिपक्षी एकता पहले कभी नज़र नहीं आई। पीपुल्स पार्टी के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो ज़रदारी ने इस कांफ्रेंस के लिए पहल की थी। शुक्रवार को उन्होंने टेलिफ़ोन पर पूर्व प्रधानमंत्री  नवाज़ शरीफ से अनुरोध किया था कि वे इस आयोजन में शिरक़त करें और मार्गदर्शन दें । पहला भाषण पूर्व राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी का था। उन्होंने पाकिस्तान में लोकतंत्र की बहाली पर ज़ोर दिया। ज़रदारी ने कहा कि इमरान सरकार जिस तरह से  सत्ता में आई है,वह वैध नहीं है । फ़ौज के समर्थन से इमरान की पार्टी तहरीक़ ए इंसाफ़ ने चुनावों में धाँधली की है। ज़रदारी ने फ़ौज पर इशारों ही इशारों में आक्रमण किए। उनकी पार्टी इमरान ख़ान को कठपुतली ही मानती है। असल केंद्र बिंदु तो पाकिस्तान की सेना ही थी। ज़रदारी के बाद नवाज़ शरीफ़ बोले। उनके सुर बेहद तीख़े थे। ज़रदारी की तुलना में नवाज़ ने फ़ौज पर खुलकर प्रहार किए। उन्होंने हालाँकि इमरान सरकार को कोसते हुए कश्मीर का मुद्दा उछाला और चीन के राष्ट्रपति शी ज़िन पिंग की तारीफ़ की। ग़ौरतलब है कि जब इमरान विपक्ष में थे तो शी ज़िन पिंग की पाकिस्तान यात्रा के ख़िलाफ़ धरने पर बैठ गए थे और चीनी राष्ट्रपति को अपनी यात्रा रद्द करनी पड़ी थी। तब नवाज़ शरीफ़ प्रधानमंत्री थे। अपने संबोधन में नवाज़ शरीफ़ इसका ज़िक्र करना नहीं भूले ।यह भी याद रखना ज़रूरी है कि कारगिल जंग के बाद अपने बयानों से नवाज़ शरीफ़ की छबि भारत के प्रति सहानुभूति रखने वाले राजनेता की बन गई थी।इस कारण उन्हें बाद में ग़द्दार तक कहा गया। इसके बाद वे सँभले और अपनी छबि चीन के संग अच्छे रिश्तों वाले राजनेता की बनाई।

हालिया घटनाक्रम के चलते चीन ने पड़ोसी देशों पर भारत के ख़िलाफ़ खुलकर सामने आने का दबाव बनाया था। नेपाल तो इस दबाव में आ गया। श्रीलंका ने बता दिया कि उसकी पहली प्राथमिकता भारत ही रहेगा और बांग्लादेश ने भी चीन का बहुत साथ नहीं दिया। पाकिस्तान ने दबाव में भारत को घेरने की कोशिश तो की लेकिन वह कश्मीर से आगे नहीं बढ़ पाया। चीन पाकिस्तानी सेना से और आक्रामक होने की अपेक्षा कर रहा था। लेकिन पाक सेना का मनोविज्ञान 1971 के बाद हिन्दुस्तान से पंगा नहीं लेने का है। वह गुरिल्ला तरीक़े से तो लड़ सकती है ,लेकिन खुले युद्ध में उसके लिए मुश्किल खड़ी हो जाएगी। चीन पाक फ़ौज के संकोच से ख़ुश नहीं है। वह एकदम सीधा साथ चाहता है। बीते दिनों चीन - पाकिस्तान आर्थिक गलियारे की धीमी रफ़्तार पर चीन ने इमरान सरकार से ग़ुस्से का इज़हार किया था। नाराजगी दूर करने के लिए इमरान सेनाध्यक्ष जनरल बाजवा के साथ तीन बार चीन जा चुके हैं। विदेश मंत्री महमूद क़ुरैशी भी चीन से बेआबरू होकर लौट चुके हैं।उनसे तो शी ज़िन पिंग ने मिलने से भी इनकार कर दिया था। इसलिए इस निष्कर्ष पर पहुँचने में कोई उलझन नहीं होनी चाहिए कि भारत की आक्रामक घेराबंदी के लिए चीन पाकिस्तान से खुलकर साथ देने की आस लगाए बैठा है।वह अपनी सेना को जंग में शायद नहीं झोंकना चाहे। अलबत्ता पाकिस्तानी सेना के बहाने से भारत को परेशान करने उसे सहूलियत है। अब वह पाकिस्तान में ऐसी सरकार चाहता है ,जो उसके इशारों पर नाचे।क्या  ज़रदारी और नवाज़ शरीफ की जोड़ी उसकी ख़्वाहिश पूरी कर सकती है।भारत के साथ सीधी जंग तो वहाँ की कोई भी सरकार पसंद नहीं करेगी। बहुत संभव है कि ऑल पार्टी कांफ्रेंस बीझिंग में लिखी गई पटकथा का एक अध्याय हो। लेकिन यह तय है कि अगर इसके पीछे चीन का हाथ है तो उसे नाक़ामी हाथ लगेगी। फिर भी हिन्दुस्तान को इस नज़रिए से पाकिस्तान पर ध्यान देना होगा। भारत के लिए पाकिस्तान में चीन के इशारे पर नाचने वाली कठपुतली सरकार की तुलना में दिमाग़ी तौर पर लंगड़ाती हुक़ूमत अधिक अनुकूल होगी।

Political_ उमा श्री और शिवराज की जुगल बंदी

 

रवीन्द्र व्यास 

बीजेपी की फायर ब्रांड नेता उमा भारती बुंदेलखंड से ताल्लुख रखती हैं | अपने  बेबाक  विचारो   के लिए मशहूर उमा  भारती एक दशक से ज्यादा समय के  बाद फिर से  मध्यप्रदेश की सियासत में सक्रीय हो रही हैं | इस बार उन्हें साथ मिल रहा है शिवराज सिंह चौहान का | ये वही चौहान हैं जो अपने सियासी लक्ष्य को पाने के लिए  चूकते नहीं  हैं | इसी के चलते उन्होंने उमा को मध्यप्रदेश के आसपास फटकने नहीं दिया था | अब वही चौहान उमा जी को साथ लेकर चुनावी सभाएं कर रहे हैं  उनका गुण  गान कर रहे हैं | कहते हैं कि राजनीति में हर बात के अपने एक अलग मायने होते हैं |उमा और शिव की इस जुगल बंदी के क्या मायने हैं यह आने वाले दिनों में स्पष्ट हो ही जाएगा    

 


                                        15 सितम्बर को इंजीनियर्स डे के  दिन उमा श्री और शिवराज जी एक अलग ही राजनैतिक इंजीनयरी में व्यस्त थे | इसका नजारा लोगों को छतरपुर जिले के   बड़ामलहरा विधान सभा क्षेत्र के लिधौरा गाँव में  देखने को मिलामध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री ने  यहां होने वाले उप चुनाव को लेकर  चुनावी सभा में अपने कार्यकाल की उपलब्धियों का बखान  कियायह जतलाने का जतन किया कि जनता का उनसे बड़ा शुभ चिंतक और कोई नहीं है | विरोधी दल पर भी हमला करना चाहिए इसलिए उन्होंने  कांग्रेस के कमलनाथ और दिग्विजय सिंह  को जनता का सबसे बड़ा दुश्मन बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी|ये सब तो सियासी संग्राम के  शब्द वाण  थे जो चलते ही रहते हैं | इन सबसे अलग  उमा और शिव के  शब्दों से एकाकार होने के नव राजनैतिक दर्शन से लोग जरूर आश्चर्य  चकित हो गए  |   

                                                          सभा में उमा भारती ने शिवराज सिंह चौहान के पुराने रिश्तों का स्मरण करते हुए कहा कि 2003 में कार्यकर्ताओं के बल पर हमने मध्य प्रदेश में सरकार बनाई ,बाद में शिवराज सिंह चौहान मुख्य मंत्री बने | शिवराज सिंह चौहान ने जितनी अच्छी सरकार चलाई उतनी अच्छी में भी नहीं चला सकती थी |1980 के लोक सभा चुनाव में शिवराज  जी द्वारा  उनके चुनाव प्रचार का भी उन्होंने स्मरण कर यह जताने का प्रयास किया कि शिवराज से समबन्ध आज के नहीं बल्कि चार दशक पुराने हैंसभा में उन्होंने ज्योतरादित्य सिंधिया को  विजया राजे का एक तरह से पर्याय बताया

                                                            शिवराज भी उमा जी के महिमा मंडन में कोई चूक नहीं की | उन्होंने उमा जी को देश की राजनीति में बड़ी भूमिका निभाने वाली बताते हुए कहा कि  हमारी माता जी निधन तो  बचपन में ही हो गया था , किन्तु  उमा दीदी से हमें मात्र  वत  स्नेह मिला | दीदी ने ही मध्यप्रदेश से बंटाढार की सरकार को उखाड़ फेंका था | उनके पंचज अभियान पर 15 वर्ष तक मौन रहने वाले शिवराज जी कहने लगे कि सम्बल योजना उनके पंचज अभियान पर ही आधारित है | वे यहीं नहीं रुके उन्होंने कहा  आत्म निर्भर भारत के लिए आत्म निर्भर मध्य प्रदेश बनाना है उसका ड्राफ्ट आप (दीदी) फाइनल करेंगीबुंदेलखंड में उद्योग का जाल फेलायेंगे | 

    दोनों दिग्गज नेताओं की इन बातों को सुन  बड़ामलहरा के लोगो का आश्चर्यचकित होना स्वाभाविक भी था | उन्हें आज भी याद है कि 2006 के उपचुनाव में ठीक मतदान के दिन उमा भारती को सेरोरा गाँव में घेर लिया गया था | उनके सुरक्षा गार्डों ने किसी तरह से उनकी जान बचाई थी | उस समय भी मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान ही थे | उमा भारती ने 2003 में इसी विधान सभा क्षेत्र से चुनाव जीत कर मुख्य मंत्री  बनी थी ,| लोधी और यादव  बाहुल्य  इस इलाके में उमा भारती  31698  मतों से जीती थी |उनके मुख्य मंत्री बनने और हटने फिर राम रोटी यात्रा निकालने और   अपनी अलग जनशक्ति पार्टी बनाने,  फिर वापस बीजेपी में लौटने की उमा भारती की कहानी काम दिलचस्प नहीं है | इन सब हालातों का गवाह भी बड़ामलहरा  क्षेत्र रहा है |

                   मध्यप्रदेश की 27 सीटों पर होने वाले उपचुनाव में कई सीटें लोधी बाहुल्य हैं | भिंड और अशोकनगर जिलों के अलावा छतरपुर जिले की बड़ामलहरा विधान सभा सीट पर भी लोधी मतदाताओं का प्रभाव अच्छा खासा है | ऊपरी तौर  पर तो यही लगता है कि  इन चुनावी सभाओं में अपनी विरादरी के मतदाताओं को लुभाने के लिए शिवराज सिंह चौहान ने उमा भारती का साथ लिया है | सियासत के जानकार कहते हैं कि कहानी सिर्फ इतनी नहीं है इसके पीछे भी कोई बड़ी  सियासी कथा लिखी जा रही है | दरअसल सियासत में जब लोगों के व्यवहार में इस तरह के परिवर्तन देखने को मिलने लगते हैं तो अनेकों तरह के सवाल उठने लगते हैं |  

                       बदलते चाल चरित्र और चेहरे को देख लोग उन तमाम चीजों की तलाश में जुट जाते हैं जो इनकी वजह बनते हैं | बीजेपी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष उमा भारती की उन तमाम बातों का सियासी जानकार विश्लेषण करने में जुट गए हैं | अब कहा जाने लगा कि उमा जी का लोधी वर्ग के विधायकों पर अच्छी खासी पकड़ है , इसी के तहत उन्होंने कांग्रेस विधायक  प्रदुम्न लोधी का विधायक पद से इस्तीफा दिलाकर बीजेपी की ना सिर्फ सदस्यता दिलाई बल्कि नागरिक आपूर्ति निगम का अध्यक्ष बनवाकर केबिनेट मंत्री का दर्जा भी दिलवाया | इसके पहले उन्होंने मंत्री मंडल में पिछड़े वर्ग की उपेक्षा पर नाराजगी भी जताई थी | राजनैतिक तौर पर देखा जाए तो उमा जी ने यह सन्देश पार्टी और सरकार को दिया है कि मध्य प्रदेश में पिछड़े वर्ग पर उनकी पकड़ कमजोर नहीं हुई है | दूसरा इस बड़े वोट बैंक के बहाने वे फिर से मध्य प्रदेश की राजनीति में वापस आना चाहती हैं | 

                            पार्टी के आंतरिक सूत्रों की माने तो उमा जी मध्यप्रदेश की ऐसी नेता हैं जिन्हे आर एस एस द्वारा भी सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है | विष्णु दत्त शर्मा को प्रदेश अध्यक्ष बनाये जाने के समय भी उमा जी की सहमति ली गई थी जब कि इस मसले पर शिवराज के सुझाव को अनदेखा किया गया था | संगठन में उमा जी की पकड़ बनने के बाद उनके कई समर्थकों को संगठन में अहम् पद मिले | मध्यप्रदेश की राजनीति में उमा जी को फिर से सक्रीय करने के लिए पार्टी का एक बड़ा वर्ग लगा हुआ है | यही कारण है कि उमा भारती के फिर से बड़ामलहरा चुनाव लड़ने की चर्चाएं जोरों पर हैं | कहा तो यह भी जा रहा है कि एन  वक्त पर उमा जी को बड़ा मलहरा से चुनावी रण में उतार सकती हैं | इन सब हालातों से वाकिफ शिवराज ने उमा दीदी से सम्बन्ध बेहतर रखने में ही भलाई समझी |

 

 राजनीति के इस संग्राम में सच और झूठ भी चलता ही रहता है | अब शिवराज जी को ही देख लें वे कहते हैं कि आत्म निर्भर भारत के लिए आत्म निर्भर मध्य प्रदेश बनाना है उसका ड्राफ्ट आप (दीदी) फाइनल करेंगीबुंदेलखंड में उद्योग का जाल फेलायेंगे | जबकि 11  अगस्त 2020 को  मुख्यमंत्री श्री चौहान ने  4 दिवसीय वैबिनार के समापन सत्र को संबेधित करते हुए  कहा था  कि प्रधानमंत्री     नरेन्द्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत को साकार करने के लिए आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश का रोडमैप तैयार किया जा रहा है।  4 दिवसीय वैबिनार में महत्वपूर्ण सुझाव प्राप्त हुए हैं। इन सुझावों को शामिल कर रोडमैप को अंतिम रूप देने के लिए प्रदेश के मंत्रियों के समूह गठित किए जा रहे हैं। मंत्री समूह अपना ड्राफ्ट 25 अगस्त तक प्रस्तुत कर देंगे। इस ड्राफ्ट पर नीति आयोग के सदस्यों के साथ विचार-विमर्श उपरांत 31 अगस्त तक आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश के रोडमैप को अंतिम रूप दे दिया जाएगा तथा एक सितम्बर से इसे आगामी 3 वर्ष के लक्ष्य के साथ प्रदेश में लागू कर दिया जाएगा। दोनों ही स्थितियों में कोई एक जगह तो झूठ बोला जा रहा है |  

                       इन तमाम सियासी हालातों में उमा जी को आर आर एस एस और  प्रदेश अध्यक्ष का भरपूर साथ मिल रहा है | ऐसे समय में वे एक बार फिर से विधायक बन कर मध्यप्रदेश की राजनीति में सशक्त उपस्थिति दर्ज करा सकती हैं | जिसकी सम्पूर्ण रूप रेखा तैयार बताई जा रही है | अब देखना ये होगा की उमा का अभियान सफल हो पाता  है  अथवा शिवराज का दांव सफल होता है |    

 

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